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ग्राउंड रिपोर्ट : गोरखालैंड आंदोलन की लाश पर टीएमसी और भाजपा की बंदरबांट जंग

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बीते 3 अप्रैल को सिलिगुड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली ख़त्म होने तक भाजपा को चुनाव में समर्थन दे रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (गोजमुमो) के नेता विमल गुरूंग के पहाड़ पर आने की कोई ख़बर नहीं थी। उसी रात दस बजे ख़बर आई कि 5 अप्रैल को गोजमुमो नेता विमल गुरूंग और पार्टी महासचिव रौशन गिरि दिल्ली से दार्जिलिंग आ रहे हैं। कई महीनों से भूमिगत दोनों गोरखा नेताओं के आने की सूचना मिलते ही पत्रकार से लेकर पुलिस तक हरकत में आ गई। आखिरकार वे नहीं आए। दरअसल, 4 अप्रैल को कलकत्ता हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी खंडपीठ में अग्रिम ज़मानत की याचिका लगाने उन्हें यहां आना था लेकिन अपनी संभावित गिरफ़्तारी की वजह से दोनों नेता दिल्ली में ही रहना ही बेहतर समझा। पहले से ही बदरंग चल रहे दार्जिलिंग के चुनाव को इन गोरखा नेताओं की गैर-मौजूदगी ने और मायूस कर दिया।

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (विनय गुट) के टाउन कमेटी अध्यक्ष कमल छेत्री

पहाड़ की राजनीति में गोरखाओं की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, सीपीएम और कांग्रेस सभी को पता है कि गोरखाओं के बगैर पहाड़ पर सियासी कामयाबी मुमकिन नहीं। लोकसभा के दूसरे चरण में पश्चिम बंगाल की दार्जिलिंग समेत दो अन्य सीटों पर 18 अप्रैल को मतदान होने हैं, बावजूद इसके पहाड़ों पर सियासी सरगर्मियां उतनी तेज़ नहीं है। गोरखा आंदोलन के नेताओं की गैर-मौजूदगी इसकी  बड़ी वजह है। 2017 के हिंसक आंदोलन के बाद से ही विमल गुरूंग और रौशन गिरि भूमिगत हैं।

ध्‍यान रहे कि दार्जिलिंग में 2017 में शुरू हुआ आंदोलन 104 दिनों तक चला था। इस अवधि में पहाड़ का संपर्क देश से कट गया था। बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी जिसमें डेढ़ दर्जन लोग मारे गए थे। बंद की वजह से स्थानीय कारोबार और पर्यटन को काफ़ी नुक़सान हुआ था। अंततः बगैर किसी नतीजे के आंदोलन खत्म भी हो गया। साथ मिलकर इस आंदोलन की शुरूआत करने वाले विमल गुरूंग और विनय तमांग ने 2014 के चुनाव में भाजपा को समर्थन दिया था। इस बार दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। जहां विमल की अगुवाई वाला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा भाजपा के समर्थन में है वहीं विनय के नेतृत्व वाला गोरखा जनमुक्ति मोर्चा तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दे रहा है। चुनाव-प्रचार से विमल की दूरी से भाजपा में मायूसी है। वहीं तृणमूल कांग्रेस इसे चुनावी फ़ायदे के रूप में देख रही है। दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कार्सियांग में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा समर्थित टीएमसी उम्मीदवार अमर सिंह राई के पक्ष में जनसभाएं हो रही हैं जबकि भाजपा का पहाड़ों पर चुनाव-प्रचार उतना प्रभावी नहीं है।

भाजपा की ‘गोरखा बनाम गोरखा’ राजनीति 

दार्जिलिंग लोकसभा का अस्तित्व देश के दूसरे संसदीय चुनाव में आया था। बतौर कांग्रेस उम्मीदवार टी. मेनन ने 1957 में जीत दर्ज की थी। इस संसदीय सीट से कांग्रेस अब तक पांच बार विजयी हुई है। 2004 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार दाबा नरबूला यहां से आखिरी बार जीते थे। 1971 के चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) को यहां पहली बार कामयाबी मिली और रतनलाल बाह्मणिक विजयी हुए। दार्जिलिंग लोकसभा में सबसे अधिक छह बार सीपीएम उम्मीदवारों को जीत मिली और 1999 के चुनाव में सीपीएम उम्मीदवार एस.पी. लेप्चा यहां से आखिरी बार जीते। 1989 के चुनाव में पहली बार दार्जिलिंग संसदीय क्षेत्र से गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के उम्मीवार इंद्रजीत विजयी हुए थे जबकि 1967 में निर्दलीय उम्मीदवार एम.बसु को जीत मिली। गोरखाओं की मदद से पहाड़ की चुनावी राजनीति में भाजपा पहली बार 2009 में कामयाब हुई और जसवंत सिंह को जीत मिली। उसके बाद 2014 के चुनाव में एस.एस. अहलूवालिया ने तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार वाइचुंग भूटिया को करीब डेढ़ लाख मतों से पराजित कर जीत दर्ज की।

इस बार भाजपा ने यहां मणिपुरी मूल के राजू सिंह बिष्ट को चुनावी मैदान में उतारा है जबकि तृणमूल कांग्रेस ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता व दार्जिलिंग के मौजूदा विधायक अमर सिंह राई को अपना उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस की तरफ से माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र से विधायक शंकर मालाकार मैदान में हैं।

इस बार भाजपा का बाहरी उम्मीदवार चर्चा का विषय है। मणिपुरी गोरखा राजू सिंह बिष्ट भाजपा के उम्‍मीदवार हैं जबकि टीएमसी ने स्थानीय नेता व दार्जिलिंग से विधायक अमर सिंह राई को उम्मीदवार बनाया है। दार्जिलिंग में राई को किसी पहचान की जरूरत नहीं है जबकि भाजपा प्रत्याशी के लिए फ़िलहाल यह एक संकट है। भाजपा समर्थक विश्वजीत दहाल इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते। उनके मुताबिक़ दार्जिलिंग में स्थानीय और बाहरी कोई मुद्दा नहीं है। अगर यह मुद्दा रहा होता तो जसवंत सिंह और अहलूवालिया जैसे भाजपा नेता चुनाव नहीं जीतते। सीपीएम और कांग्रेस के जमाने में भी दार्जिलिंग का प्रतिनिधित्व बाहरी नेता कर चुके हैं। भाजपा उम्मीदवार गोरखा हैं यही बड़ी बात है।

तृणमूल सरकार ने 2017 के आंदोलन को जिस प्रकार खत्म किया उसे लेकर लोगों में नाराजगी है। दूसरी ओर गोरखाओं में भाजपा को लेकर इस बात की नाराज़गी है कि जब 2017 में दार्जिलिंग जल रहा था उस वक्‍त अहलुवालिया कहीं नज़र नहीं आए। शायद इसी बात को भांपते हुए भाजपा ने इस बार प्रत्‍याशी बदल दिया है और लड़ाई को गोरखा बनाम गोरखा में तब्‍दील कर दिया है।

वरिष्ठ पत्रकार शुभेंदु मंडल बताते हैं, “विमल गुरूंग का भूमिगत रहना भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है क्योंकि उनके बिना गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ता खुलकर प्रचार करने से डर रहे हैं जबकि पार्टी का विनय तमांग खेमा आक्रामक तरीक़े से तृणमूल के पक्ष में प्रचार कर रहा है। इस नतीज़े पर पहुंचना अभी ज़ल्दबाज़ी होगी कि पहाड़ों पर विमल गुरूंग का वर्चस्‍व ख़त्म हो गया है। ज़ाहिर है उनके न होने की वजह से उनके समर्थक उतने मुखर नहीं हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि गोरखाओं में विनय तमांग की स्वीकार्यता हो गई है।”

गोरखालैंड का मुद्दा गोल

दार्जिलिंग स्थित चौक बाजार में गोजमुमो नेता विमल गुरूंग के खिलाफ चस्पां पोस्टर

उत्तर बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र की अब तक चार जनसभाएं हो चुकी हैं, लेकिन उनके भाषणों में इस बार गोरखाओं से जुड़े मुद्दे शामिल नहीं हैं। 2014 के चुनाव में सिलिगुडी स्थित खपरैल की जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने गोरखाओं के सपने को अपना सपना बताया था। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के दार्जिलिंग टाउन कमेटी के अध्यक्ष कमल छेत्री ने इस संवाददाता को बताया, “सिलिगुड़ी में प्रधानमंत्री का भाषण गोरखाओं को निराश करने वाला था। एनआरसी के मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे गोरखाओं का कोई नुकसान नहीं होगा। उनकी कही बातों पर हमें भरोसा नहीं है। अगर उनकी (प्रधानमंत्री) बातों में सच्चाई है तो वे गोरखाओं को लिखित में दें कि एनआरसी से उन्हें कोई हानि नहीं होगी।”

इस बारे में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (विमल गुट) के प्रवक्ता बी.पी बजगाईं कहते हैं, “काफी अर्से से चल रहे पहाड़ की समस्याओं के स्थायी निराकरण का भरोसा भाजपा ने दिया है। अपने घोषणा-पत्र में उसने गोरखा समुदाय की 11 जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया है। हम इसका स्वागत करते हैं। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री जी ने वीरपाड़ा की जनसभा में गोरखाओं के 11 समुदायों को आदिवासी का दर्जा देने भरोसा दिया था। इसे भाजपा के घोषणा-पत्र में शामिल किया गया है। इससे पहाड़ में भाजपा के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत हुआ है। वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मेहरबानी से विनय तमांग आज़ाद घूम रहे हैं। उसे गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन बोर्ड (जीटीएबी) का अध्यक्ष बनाकर तृणमूल सरकार ने उपकृत किया है। तृणमूल कांग्रेस का समर्थन कर विनय तमांग ने गोरखाओं के साथ विश्वासघात किया है, यह जानते हुए कि तृणमूल सरकार अलग गोरखालैंड के ख़िलाफ़ है। विनय तमांग के एजेंडे में अगर गोरखालैंड होता, तो वह कभी टीएमसी से हाथ नहीं मिलाते। बांग्ला भाषा थोपे जाने के खिलाफ सवा तीन महीनों तक पहाड़ पर बंद रहा। राज्य सरकार ने आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ दमन-च्रक चलाया लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कभी हाल-चाल जानने दार्जिलिंग नहीं आईं।”

दार्जिलिंग संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस, सीपीएम, भाजपा, गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट और यहां तक कि एक आज़ाद उम्मीदवार भी जीत चुके हैं लेकिन तृणमूल कांग्रेस को अभी तक उत्तर बंगाल की इस महत्वपूर्ण सीट से जीत नहीं मिली है। 1998 में जब तृणमूल कांग्रेस बनी थी उस वक्त से दार्जिलिंग फ़तह की उसकी कोशिशें जारी हैं। इस चुनाव में जैसे हालात बन रहे हैं, उससे टीएमसी खेमे में काफी उत्साह है। इससे पहले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को गोरखाओं के प्रभावी दलों को समर्थन नहीं मिला था लेकिन इस बार हालात अलग हैं।

टीएमसी के प्रत्‍याशी अमर सिंह राई

पहाड़ों में तृणमूल का प्रवेश गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बहाने हुआ है। इसी तरह का संयोग दक्षिण बंगाल के जंगलमहल इलाक़े में तृणमूल के साथ बना। तब सीपीएम शासन के ख़िलाफ़ माओवादियों ने ममता बनर्जी का साथ दिया था। जिस तरह आज दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कार्सियांग में तृणमूल कांग्रेस गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के सहारे पहाड़ का रास्ता तय कर रही है  उसी प्रकार साल 2008 में माओवादी नेता छत्रधर महतो की उंगली पकड़कर तृणमूल नेताओं ने पुरुलिया, पश्चिम मिदनापुर, झारग्राम, बांकुडा और वीरभूम के कुछ इलाक़ों में पार्टी को सांगठनिक रूप से मज़बूत किया था। विडंबना है कि उसी जंगलमहल में माओवादी समर्थक इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ हैं। उनका मानना है कि माओवादी नेता किशन जी की मौत और छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के पीछे ममता सरकार की साज़िश थी। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस का सफ़र कितना लंबा होगा, यह दार्जिलिंग के चुनावी नतीज़े तय करेंगे लेकिन इतना ज़रूर है कि इन परिणामों का असर सबसे ज़्यादा गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता विनय तमांग की राजनीति पर पड़ेगा।

गोरखालैंड का आंदोलन

गोरखालैंड की मांग 1980 में शुरू हुई थी, लेकिन गोरखाओं की राजनीतिक पहचान के लिए संघर्ष 1907 में शुरू हुआ था। 1986 में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के नेता सुभाष घीसिंग की अगुवाई में दार्जिलिंग में क़रीब दो वर्षों तक आंदोलन चला। तब विमल गुरूंग और विनय तमांग भी उस आंदोलन का हिस्सा थे। 1988 में पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के बीच एक समझौता हुआ और दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) का गठन हुआ। इसके तहत गोरखाओं के लिए  कुछ विशेष प्रावधान किए गए। उसके पहाड़ों पर कई वर्षों तक शांति बनी रही। सुभाष घीसिंग के कज़जोर पड़ने पर विमल गुरूंग और विनय तमांग ने 2007 में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएमएम) बनाया। गोरखाओं में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इन्होंने गोरखालैंड की मांग को हवा दी। इसका सीधा असर वहां के पर्यटन और उससे जुड़े लोगों पर पड़ा। तीन वर्षों के आंदोलन के बाद पश्चिम बंगाल सरकार गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से वार्ता के लिए तैयार हुई। 18 जुलाई 2011 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेताओं विमल गुरूंग, विनय तमांग और रौशन गिरि साथ समझौता हुआ। इस क़रार के बाद दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) को भंग कर गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन बोर्ड (जीटीएबी) का गठन किया गया।

दिनेश गुरूंग गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (तमांग गुट) के साथ हैं। वह बताते हैं कि 2017 के आंदोलन में वे लोग विमल गुरूंग के साथ थे। “शुरूआत में हमें लगा कि आंदोलन सही दिशा की तरफ बढ़ रहा है लेकिन इसकी वजह से स्थानीय लोगों की तकलीफें बढ़ने पर हम लोगों ने आंदोलन खत्म करने की मांग की। हमारी सलाह पर विमल ने कोई गौर नहीं किया। जब हमें लगा कि एक सनकी की जिद की खातिर गोरखाओं की जिंदगी प्रभावित हो रही है, तब विनय तमांग समेत गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के कई नेता इस आंदोलन से बाहर आ गए।”

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (विमल गुट) के प्रवक्ता प्रेस को संबोधित करते हुए

यह पूछे जाने पर कि क्या विनय और विमल के एक होने की कोई गुंजाइश बची है, इस बारे में उनका कहना था, “गोरखालैंड के नाम पर मकान उजाड़ने वाले तुम लोगों को पहाड़ में आने नहीं दिया जाएगा। विमल गुरूंग पहाड़ में अशांति फैलाने वाला दिल्ली का एजेंट है। विमल गुरूंग कम पढ़ा-लिखा और असंवेदनशील व्यक्ति है जबकि विनय तमांग एक शिक्षित और दूरदर्शी नेता हैं। उसके साथ जाकर हम गोरखाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।”

दार्जिलिंग के चौक बाजार में रहने वाले नरबहादुर तमांग का परिवार गोरखा आंदोलन से जुड़ा रहा है। उनके परिवार को इस तहरीक की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। नरबहादुर बताते हैं- 1986 में सुभाष घीसिंग के गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट की अगुवाई में उनके पिता पद्मबहादुर तमांग पुलिस फायरिंग में मारे गए। उनके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए और उन्हें कई वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। आंदोलन की वजह से काम-धंधा प्रभावित हुआ, नतीजतन घर की आर्थिक स्थिति खराब होती चली गई जबकि गोरखाओं के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं का क़द और क़ारोबार बढ़ता चला गया। आज गोरखालैंड की लड़ाई लड़ने वाले कभी सुभाष घीसिंग के साथ हुआ करते थे। 2017 में यही लोग साथ मिलकर आंदोलन शुरू किए लेकिन अब दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं। अगले चुनाव में ये किनका साथ देंगे कोई नहीं जानता। संभव है दोनों फिर एक हो जाएं। उनके मुताबिक़ 2017 के आंदोलन से पहाड़ के छोटे कारोबारियों का धंधा चौपट हो गया। 104 दिनों की बंदी बड़े कारोबारियों ने झेल लिया, लेकिन छोटे-मोटे धंधों से जुड़े हजारों लोग तबाह हो गए। यही कारण है कि गोरखाओं को आंदोलनों से डर लगता है। हिंसा और आगजनी से गोरखालैंड की समस्याएं हल नहीं होंगी, इसलिए गोरखाओं के अधिकारों से जुड़े नेताओं को स्थायी राजनीतिक हल के बारे में सोचना होगा।

नरबहादुर तमांग के पिता 1986 के गोरखा आंदोलन में मारे गए थे

गोरखा राजनीति के बीच हिंदीभाषी

दार्जिलिंग में गोरखाओं से इतर राजनीति नहीं हो सकती। यहां की सियासत गोरखाओं के इर्द-गिर्द ही घूमती है लेकिन हिंदीभाषी राज्यों खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोगों की संख्या भी कहीं-कहीं निर्णायक स्थिति में हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (विनय गुट) से संबद्ध दार्जिलिंग टाउन कमिटी के अध्यक्ष विमल छेत्री बताते हैं, “ब्रिटिशों के जमाने से यहां हिंदीभाषी लोग रहते आए हैं। पहले चाय बागानों से लेकर लकड़ियों के कारोबार में इनका विशेष असर था लेकिन अब रेस्तरां, होटल, गल्ले और फल-सब्जियों के कारोबार में भी हिंदीभाषियों की संख्या अच्छी है। दार्जिलिंग मार्केट यूनियन में इस समय 771 मेंबर हिंदी भाषी हैं जिनमें बिहारियों की संख्या आधे से ज़्यादा है। पहाड़ पर नेपाली, बंगाली, बिहारी और राजस्थानियों में कोई भेदभाव नहीं है।”

दार्जिलिंग स्थित जज बाजार में जेनरल स्टोर के संचालक मुकेश मंडल

दार्जिलिंग स्थित हिल कोर्ट रोड पर होम अप्लायंस स्टोर के मालिक मोहम्मद अली अशरफ़ मूलतः बिहार के सीवान ज़िले के रहने वाले हैं। 1940 में उनके पिता दार्जिलिंग के चाय बागान में ठेकेदारी करने आए थे और बाद में यहीं के होकर रह गए। अली अशरफ़ बताते हैं, “मेरा जन्म यहीं हुआ है और दार्जिलिंग में यह हमारी तीसरी पीढ़ी है। हमने 1986 में सुभाष घीसिंग का उरूज भी देखा और आखिरी समय उन्हें तन्हा भी। कभी देश और दुनिया में दार्जिलिंग की पहचान टी, टिम्बर और टूरिज्म से होती थी लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता इसकी शिनाख़्त कम हो रही है। यहां के चाय बागान लगातार बंद हो रहे हैं। जो चालू हैं वहां मज़दूरों की तनख्वाह कई महीनों से बकाया है। सन् छियासी में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के आंदोलन के समय जंगलों को काफ़ी नुक़सान हुआ। आंदोलन चलाने और रोज़मर्रा की ख़र्चे के लिए पेड़ों की कटाई होने लगी। गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से जुड़े लोगों को हराम की कमाई की ऐसी लत लगी कि आंदोलन खत्म होने के बाद भी वे अवैध रूप से पेड़ों से जुड़े रहे।”

टिम्बर स्मगलिंग पहाड़ों की एक बड़ी समस्या बन चुकी है और यह देन गोरखा आंदोलन से जुड़े नेताओं की है। उनके मुताबिक़ दार्जिलिंग, कार्सियांग और कलिम्पोंग में भू-स्खलन का ख़तरा बढ़ गया है। इसकी वजह है पहाड़ों पर दरख़्तों की कटाई। इन्हीं वजहों से हालिया कुछ वर्षों में दार्जिलिंग के जलवायु में काफ़ी तब्दीली आई है। जज बाज़ार में जनरल स्टोर चलाने वाले मुकेश कुमार मंडल पंद्रह साल पहले मुज़फ़्फ़रपुर से दार्जिलिंग आए थे। 2017 की आगजनी में उनकी दुकान को भी नुक़सान पहुंचा था। उनकी शिकायत है कि यहां चुनाव के समय स्थानीय समस्याओं पर कभी चर्चा नहीं होती। पहाड़ में पानी की एक बड़ी समस्या है, लोगों को टैंकरों से पानी ख़रीदना पड़ता है। गंदगी और ट्रैफिक यहां की बड़ी समस्या है, लेकिन इस पर कभी कोई बात नहीं करता। हौजरी कारोबारी वाले मदन प्रसाद बताते हैं, “इस बार दार्जिलिंग के नतीज़े चौंकाने वाले होंगे। भाजपा और तृणमूल के उम्मीदवारों को भितरघात का सामना करना पड़ेगा।”

तीसरी आवाज़

मदन प्रसाद की भितरघात वाली बात को यदि सही मानें तो भाजपा और टीएमसी की लड़ाई और अंदरूनी कलह का फायदा क्‍या किसी को मिलने की स्थिति बन रही है? जाहिर तौर पर कांग्रेस की उम्‍मीदवारी पर यहां कोई चर्चा नहीं है लेकिन लोकसभा में दार्जिलिंग सीट से सबसे ज्‍यादा छह बार अपना प्रतिनिधि भेज चुकी सीपीएम की आवाज़ को नकारा नहीं जा सकता है। सीपीएम वह तीसरी ताकत है जो  लगातार टीएमसी और भाजपा दोनों की नीतियों की मुखर आलोचना कर रही है और खुद को गोरखाओं का सच्‍चा हितैशी बता रही है। दार्जिलिंग लोकसभा चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस जहां अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहीं हैं वहीं दूसरी तरफ सीपीएम उम्मीदवार समन पाठक भाजपा और तृणमूल कांग्रेस को अवसरवादी बताते हुए गोरखाओं से इनसे झांसे में नहीं आने की अपील कर रहे हैं।

दार्जिलिंग के चौक बाजार स्थित अपनी जनसभा में उन्होंने भाजपा को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया। एनडीए सरकार की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि पांच वर्षों के दौरान देश में नफरत और हिंसा की राजनीति को बढ़ावा मिला है। भाजपा और आएसएस भारत की धर्मनिपेक्षता खत्म कर इसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। मौजूदा सरकार सभी मोर्चे पर नाकाम साबित हुई है जबकि तृणमूल कांग्रेस को दार्जिलिंग और यहां रहने वाले गोरखाओं से कोई हमदर्दी नहीं है। दार्जिलिंग से उसका हित केवल चुनावों तक है, ऐसे में सीपीएम एकमात्र पार्टी है जो पहाड़ की समस्याओं और गोरखाओं का हित पूरा करने में सक्षम है।


अभिषेक रंजन सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। दूर दराज के इलाकों से रिपोर्ट करने का एक दशक से ज्‍यादा का अनुभव। बंगाल और ओडिशा से प्रचुर मात्रा में रिपोर्टिंग कर चुके हैं। फिलहाल स्‍वतंत्र लेखन और फिल्‍म निर्माण में संलग्‍न

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