Home प्रदेश मध्य प्रदेश नर्मदा बचाओ आंदोलन: आंदोलनकारियों का केन्द्रीय एनसीए और एनवीडीए पर प्रदर्शन

नर्मदा बचाओ आंदोलन: आंदोलनकारियों का केन्द्रीय एनसीए और एनवीडीए पर प्रदर्शन

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बड़वानी| नर्मदा चुनौती सत्याीग्रह में चले मेधा पाटकर और नर्मदा घाटी के विस्थापित प्रतिनिधियों के उपवास की समाप्ति के वक्त जैसा कि तय हुआ था, आंदोलन द्वारा उठाए सभी सवालों और मुद्दों पर नर्मदा घाटी विकास विभाग से विस्तृत चर्चा 9 सितंबर 2019, सोमवार को हुई। भोपाल में तेज बारिश के कारण निर्णय लिया गया कि आंदोलनका‍री नर्मदा नघाविप्रा, इंदौर पर ही पहुंचेंगे  जहां भोपाल से आए मंत्री, श्री सुरेन्द्र सिंह बघेलजी, अधिकारियों एवं आंदोलन के 35 साथी – देवराम कनेरा, रणवीर तोमर, गोखरु सोलंकी, सुरभान भीलाला, सुरेश प्रधान, राहुल यादव, वरिष्ठ पत्रकार चिन्मय मिश्र व अन्य – मेधा पाटकरजी के साथ पूरे 8 घण्टे चर्चा निर्णय में भिड़े रहे। इस बैठक में मध्‍यस्थ के रुप में भूतपूर्व मुख्य सविच श्री शरदचंद्र बेहार जी के अलावा वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान शामिल थे।

बैठक की शुरूआत में सकारात्मक भूमिका और विस्थापितों का साथ देने का आश्वासन मंत्री सुरेन्द्र सिंह बघेलजी ने दोहराया। आंदोलन की ओर से नर्मदा घाटी में डूब क्षेत्र की गंभीर स्थिति का वर्णन करते हुए रणवी सिंह तोमर ने सरदार सरोवर के गेट्स खोलने की मांग रखी। मेधा पाटर, अतिरक्त मुख्य सचिव गोपाल रेड्डीजी तथा आयुक्त आयुक्त पवन कुमार शर्मा के बीच गुजरात और केन्द्र अगर 138.68 मीटर तक ले जाने की जिद पर अड़ा हुआ है तो मध्य प्रदेश शासन अंतर्राज्यीयी मोर्चे पर, पूरी हकीकम क्यों नहीं बयां करती, इस पर बहस हुई। शासन के नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण (एनसीए) को लिखे सारे पत्र सार्वजनिक करते हुए भी आंदोलन का कहना रहा कि डूब क्षेत्र में एवं बढ़ते प्रभावित क्षेत्र में निवासरत् परिवारों की संख्या 6000 नहीं है।

आयुक्त महोदय ने मंजूर किया और दोहराया कि 27 मई 2019 के मुख्य सचिव के पत्र में 76 गांवों के 6000 परिवार प्रभावित होने की बात लिखी थी, लेकिन वास्तव में 178 गांव प्रभावित होंगें। उन्होंने यह भी कहा कि 2010 में कम किए बैक वाटर लेवल्स के आधार पर यह संख्या है। लेकिन मध्यप्रदेश शासन ने केन्द्रीय जल प्राधिकरण को पत्र लिखकर उस रिपोर्ट और निर्णय, जिससे 15946 परिवारों को डूब से बाहर कर दिया गया था और उससे तथा पुनर्सर्वेक्षण प्रभावितो की संख्या में भी बढ़ोतरी होनी है। आंदोलन का कहना रहा है कि 136 मीटर तक जल स्तर पहुंचने पर ही गांव-गांव में सड़कों का डूबना, मोहल्लों का तथा खेती के बड़े क्षेत्र का टापू बन कर फसलें बर्बाद होना, बिना संपूर्ण पुनर्वास के भी घरों का खेतों का डुबाना आदि के साथ कानूनी उल्लंघन हो रहा है तो ‘‘जीरो बेलेन्स‘‘ यानी पुनर्वास पूरा होने के शपथ-पत्र किन अधिकारियों ने बनाए थे, इसकी जांच होना तथा इस स्थिति में राज्य शासन से राष्ट्रीय स्तर पर कड़े संघर्ष के तेवर और आधार बनाना जरूरी है।

पुनर्वास के कई मुददों पर तात्कालिक गंभीरता को सबने माना और आदेश हुए कि किसी भी घर – परिवार का हटाते वक्त लिखित पंचनामा और वीडियो तैयार किया जाएगा, हटाना पड़े ऐसे परिवारों की पात्रता तत्काल सुनिश्चत करें, उन्हें भी प्लॉट या अनुदान के लाभ तत्काल ही देने की जिम्मेदारी पुनर्वास अधिकारी पर रहेगी। और राहत शिविर में खाने का स्तर सुधारा जाएगा।

मुख्य मुददों में ट्रिब्यूनल का फैसला एवं सर्वोच्च अदालत के फैसलों का पालन और 2017 के आदेशों का पालन करने के लिए शिकायत निवारण प्राधिकरण के आदेशों का पालन करने आग्रह आंदोलन ने किया। महिला खातेदारों संबंधी मामले में पिछली सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की अपील करने के कारण सैकड़ों प्रभावितों को पात्रता का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इस कारण अदालत में दाखिल याचिकाओं की वापसी की मांग रखी गई। इस पर तथा 8 फरवरी 2017 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार 2 हेक्टर से अधिक भूमि डूब में आने वाले परिवारों की पात्रता 60 लाख रूपए से अधिक होनी चाहिए या नहीं, इस मुददे पर विधि मंत्रालय की सलाह लेकर निर्णय तय हुआ।

गुजरात में एक विस्थापितों को अगर खेती के अयोग्य जमीन दी गई है तो उन्हें बसाने की, जमीन के बदले नया सुप्रीम कोर्ट पैकेज देने की मांग पर यह तय हुआ कि मध्यप्रदेश शासन, गुजरात शासन को साथ लेकर, विस्थापितों के प्रतिनिधियों सहित गुजरात में आवंटित की जांच करेगी और निर्णय लिया जाएगा।

गुजरात से 115 जमीन की पात्रता रखने वाले परिवारों को जीआरए के आदेशों के अनुसार 60 लाख देने के लिए 69 करोड़ रूपए राशि प्राप्त हुई है। इस पर संतोष व्यक्त करते हुए भी आंदोलन ने आग्रहपूर्वक रखा कि 1857 करोड़ रूपए की मांग मध्य प्रदेश की होते हुए, गुजरात से टुकड़ों मे राशि स्वीकारने का कारण क्या है? कानूनन अधिकार होते हुए, जरूरी है उतनी संपूर्ण राशि लने के लिए गुजरात और केन्द्र के समक्ष प्रस्तुति और संघर्ष क्यों नहीं?

भ्रष्टाचार पर हुई झा आयोग की 7 साल की जांच रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर होते हुए, आंदोलन की मांग है कि उसपर त्वरित कार्रवाई की जाए।

घाटी में आज भी जब हाहाकार मचा हुआ है तब हर गांव में शिविर द्वारा हर एक बचे हुए परिवार की पात्रता सुनिश्चित करने काकार्य जल्दी से जल्दी पूरा होने का आग्रह स्वीकार किया गया। केवटों को घाटों पर एवं मछलीमारों को जलाशय पर संघ द्वारा हक देने के मुददे पर सैद्धांतिक मंजूरी देते हुए, पूर्व में बनी 2007 की नीति के पालन संबंधी एवं तत्काल आजीविका की सुरक्षा के लिए सहायता संबंधी भोपाल में त्वरित ही एक विशेष बैठक लेकर निर्णय लेने की बात अतिरिक्त मुख्य सचिव ने सुझाई, इस पर सहमति बनी है। राहुल यादव, दयाराम यादव, भागीरथ धनगर, सुरभान भीलाला, दिनेश केवट, जितेन्द्र कहार, सरस्वती बहन आदि ने मेधा पाटकर के साथ चर्चा में सहभाग लिया। चर्चा में अन्य कई मुददे आए और शासन का सकारात्मक रूख रहा, फिर भी पुनर्वास अधिकारियों से उचित बर्ताव, भ्रष्टाचारी दलालों की भूमिका, त्वरित लाभ देने के बदले अक्षम्य ढिलाई इत्यादि पर तीखी बहस भी चलती रही।

आंदोलन ने नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के कार्यालय पर 3 घण्टे तथा नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण पर 3 घण्टों प्रदर्शन किया। नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के अधिकारी नदारद रहने पर एक-एक विस्थापित की शिकायत उपस्थितों से लिखवाकर, कार्यकारी सदस्य तक पहुॅंची। एनसीए के प्रदर्शन में महाराष्ट्र के प्रतिनिधि मांगलिया भाई, लतिका ताई तथा दिल्ली के समर्थक संजीव कुमार भी शामिल थे।

नघाविप्रा के बाहर सैकड़ों महिलाओं ने मीटिंग के बाद भी विभाग के मंत्री सुरेन्द्र सिंह बघेल जी का रास्ता रोककर उनके समक्ष विनाश के प्रति आक्रोश प्रकट किया। मेधा पाटकर ने उन्हें हर गांव की जानकारी और पर्यटन इत्यादि के कार्य बाजू रखकर नर्मदा घाटी के हजारों विस्थापितों के संपूर्ण अधिकार पुनर्वास स्थलों पर हर सुविधा और गुजरात और केन्द्र से टकराव पर पूरा ध्यान और कटिबद्धता का आग्रह किया। इस दौरान प्रभावितों ने कहा कि बिना पुनर्वास डुबाए जा रहे प्रभावित स्थानीय सरकारी भवनों पर कब्जा करेंगें। अब तक लगाए शिविरों – राजघाट, जांगरवा, और छोटा बड़दा – का तुरंत निराकरण नहीं किए जाने पर संघर्ष कड़ा किया जाएगा। शिवराज सिंह चौहानजी तो नर्मदा भूल ही गए हैं। आज की राज्य सरकार को भी कर्तव्य दक्ष रहना जरूरी है। चिन्यम मिश्र ने घाटी की जन शक्ति और मजबूत करके चुनौती जारी रखने पर बल दिया। शरदचंद्र बेहार जी ने राज्य सरकार के विस्थापितों के प्रति संवाद और संवेदना की सराहना की।

भागीरथ धनगर, रेहमत मंसूरी, देवीसिंह तोमर, मुकेश भगोरिया, महेंद्र तोमर, सुरेश प्रधान, गोखरु सोलंकी, सुरभान भीलाला, दिनेश केवट, सरस्‍वती जीजी, जगदीश पटेल, रणवीरसिंह तोमर, मेधा पाटकर


नर्मदा बचाओ आन्दोलन द्वारा जारी 

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