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बर्फ़ की तह में : डाउनटाउन श्रीनगर में 27 बरस से रिसता एक ज़ख्‍म

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तस्‍वीर कश्‍मीर के फोटोपत्रकार जुनैद भट्ट के सौजन्‍य से

उस रोज़ श्रीनगर का तापमान था माइनस 7 डिग्री सेल्सियस. कश्मीरियों के लिए यह अप्रत्याशित तापमान नहीं होता. उन्हें मालूम है कि कश्मीर में 25 दिसंबर से 30 जनवरी के वक्त हांड़ कंपा देने वाली ठंड होती ही है. चालीस दिनों तक चलने वाले इस मौसम को वहां ‘चिलइ कलान’ कहा जाता है. इसीलिए वे अपने फिरन में कांगड़ी लेकर ही निकलते हैं. मैं उस रोज़ होटल का कमरा छोड़ना नहीं चाहता था. बाहर तेज सर्द हवाएं चल रही थीं. मैं अभी बिस्तर में लेटा ही था कि स्थानीय पत्रकार सलमान (बदला हुआ नाम) ने फोन कर दिया. उन्होंने पूछा, “आप अल-उमर के पूर्व  कमांडर से मिलना चाहेंगे?” बतौर पत्रकार यह एक अवसर था, जिसे मैं यूं ही जाने नहीं दे सकता था.  मैंने चहक कर कहा, “हां, जरूर”. उधर से उन्होंने कहा, “आधे घंटे में आप नोहट्टा पहुंचें. मैं जामिया मस्जिद के पास मिलूंगा.” 

शाम के साढ़े पांच बज रहे थे. अंधेरा घिर चुका था. श्रीनगर की सड़कों पर जगह-जगह सुरक्षाबलों के नाके लग गए थे. नोहट्टा डाउनटाउन में लगभग सारी दुकानें बंद हो चुकी थीं. बताते हैं कि डाउनटाउन का बाज़ार छह- साढ़े छह तक बंद हो जाता है. सलमान से दुआ-सलाम भी नहीं हुई थी कि अब हम नोहट्टा की तंग गलियों में पहुंच गए.

जामिया मस्जिद से तकरीबन सौ मीटर अंदर, गलियों से दाएं-बाएं होते हुए हम एक छोटे गेट वाले घर में प्रवेश करते हैं. बिजली न होने के कारण गलियों में अंधेरा था. हम कमरे में दाखिल होते हैं. कमरे के अंदर जेनरेटर की बिजली थी. पीली स्वेट-शर्ट के ऊपर शॉल लपेटे, आंखों पर चश्मा, फर्श पर दीवार के साथ पीठ टिकाए एक व्यक्ति बैठा है. वह हमें बैठने को कहता है. सलमान (बदला हुआ नाम) ने बताया यही खुर्शीद हैं जिसके बारे में उन्होंने फोन पर बताया था. कमरे में दो और लड़के, तीन महिलाएं और एक दुधमुंही बच्ची मौजूद थे. सभी टीवी देख रहे हैं, जेके न्यूज़ 24×7.

सलमान  ने मुझे इशारा किया. उनका मतलब था कि बातचीत की शुरुआत की जाए. टीवी से ध्यान खींचने के लिए मैंने अपना परिचय दिया, “मैं पत्रकार हूं और दिल्ली से आया हूं”. खुर्शीद अहमद खान (48) ने अपनी नज़रें टीवी से हटाईं और कहा, “जी, हमें मालूम हैं, पूछें जो पूछना है.” बातचीत की शुरुआत खान की सेहत से हुई.

खुर्शीद की रीढ़ की हड्डी में कई फ्रैक्चर हैं. दाहिने जांघ में गंभीर जख्म हैं, जिससे पस निकलता रहता है. यह हालत उनकी पिछले 27 वर्षों से है. बरसों से रिस रहे इस ज़ख्म की संभाल वे दिनभर रूमाल बदल कर करते हैं. दाहिना पैर भी बेजान हो चुका है. इसमें उन्हें कोई अहसास नहीं होता. वे चल-फिर नहीं सकते. इस हादसे का रिश्‍ता चरमपंथी गुट अल-उमर के साथ खुर्शीद के जुड़ाव से है.

बातचीत का सिलसिला अभी शुरू ही हुआ था कि मेहमाननवाज़ी में सेब से भरी एक तश्‍तरी हमारे आगे बढ़ा दी गई. मिनट ही बीते थे कि नून चाय भी हमारे आगे थी. “आप खाते-पीते बातचीत करो. दिल्ली से हमारे घर मेहमान आए हैं, आपकी खातिरदारी हमारी जिम्मेदारी है,” खुर्शीद ने कहा. मैं समझ रहा था खुर्शीद हमें सहज करना चाह रहे हैं. यह सच है कि नोहट्टा आते वक्‍त रास्‍ते में मैं डरा हुआ था. अल-उमर, श्रीनगर का डाउनटाउन, अनजान जगह और रात का वक्त- कुल मिलाकर एक ऐसी छवि बन रही थी कि एकबारगी दिल दहल उठे.  उनकी सहजता ने सच में मुझे काफी सहज किया.

खुर्शीद 1988 में अल-उमर नाम के चरमपंथी संगठन से जुड़ गए थे. तब उनकी उम्र 18 वर्ष थी. “मैंने कश्मीर की आज़ादी के लिए हथियार उठाया था. आज़ादी ही एकमात्र मकसद था.” ऐसा लगा गोया खुर्शीद हमें हथियार उठाने पर अपनी सफाई दे रहे हों. 1990 में उनके छोटे भाई मोहम्मद अयूब खान भी अल-उमर से जुड़ गए थे लेकिन कुछ ही दिनों बाद सुरक्षाबलों ने उन्हें मार गिराया. दोनों भाइयों के हथियार उठाने की कीमत उनके परिवार को चुकानी पड़ी. आए दिन सुरक्षाबलों द्वारा उनके परिवार से पूछताछ की जाती, घर की तलाशी ली जाती, “लेकिन परिवार पर हुई जुल्मतों के बाद भी मैंने कश्मीर की आज़ादी से समझौता नहीं किया”, खुर्शीद कहते हैं.


अल-उमर का पूर्व कमांडर खुर्शीद अहमद खान

1992 में अल-उमर के संस्थापक और कमांडर इन चीफ मुश्ताक़ ज़रज़र को सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार कर लिया. मुश्ताक की गिरफ्तारी के बाद अल-उमर लगातार कमज़ोर होता गया. संगठन के भीतर ही टूट होनी शुरू हो गई. यह वह मौका था जब खुर्शीद ने तय किया कि वे हथियार छोड़ देंगे.   

खुर्शीद को उम्मीद थी कि हथियार छोड़ने के बाद वे सामान्य जीवन में वापस लौट आएंगे, हालांकि यह उम्मीद, उम्मीद ही रह गई. वह नोहट्टा की जामिया मस्जिद में माली का काम करने लगे. इसी दौर में उन्होंने रिज़वाना से निकाह किया. खुर्शीद नब्बे के दशक को याद करते हुए कहते हैं, “वह एक दौर था जब अकेले श्रीनगर डाउनटाउन में कम से कम 800 सक्रिय मिलिटेंट्स थे.”

वह साल 1995 था. सुरक्षाबलों ने खुर्शीद के नोहट्टा स्थित घर पर दस्तक दी. सेना के मेज़र ने उन पर बंदूक तान दी. एक ओर अपनी मौत की कल्पना और दूसरी तरफ सीढ़ियों पर जवानों के बूट की टाप, खुर्शीद ने अपने सिरे से बचने की आखिर कोशिश की. उन्होंने घर के दूसरे तल्ले से नीचे छलांग मार दी. नतीजतन  खुर्शीद के रीढ़ की हड्डी में कई फ्रैक्चर हुए और वे चलने में असमर्थ हो गए.

नब्बे का यह वह दौर था जब घाटी से कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ था. कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर पलायन करना पड़ा था. “क्या आपको नब्बे का दौर याद कर अफसोस होता है कि जो हुआ, वह नहीं होना चाहिए था,” मैंने पूछा. “हां, अफ़सोस होता है. हम चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित घाटी में लौटें, हालांकि नब्बे के दौर में भी हिंसा को भारत की सरकार ने ही उकसाया था. 1987 के चुनावों में धांधली हुई थी, जिसके बाद कश्मीरियों को लगने लगा कि आज़ादी हथियार के रास्ते ही आएगी,” खुर्शीद ने अफ़सोस जाहिर करने के साथ हिंसा की मुख्य वजह भी रेखांकित करने की कोशिश की.

अस्वस्थ खुर्शीद इस भरोसे रहे कि तीन बच्चे- शबीर, समीर और शौक़त की बदौलत उनका जीवन कट जाएगा लेकिन 2010 में 17 वर्षीय कश्मीरी छात्र तुफैल मट्टो की हत्या के बाद घाटी में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने खुर्शीद के परिवार को भी प्रभावित किया. तुफैल की मृत्यु सिर में आंसू गैस का गोला लगने से हुई थी. उन विरोध प्रदर्शनों में लगभग 120 कश्मीरियों की जानें गईं थीं और कर्फ्यू लगातार महीने भर तक जारी रहा था.

ऐसे ही किसी एक दिन जब कर्फ्यू में ढील दी गई थी तब दसवीं में पढ़ने वाला शबीर घर से ट्यूशन जाने के लिए निकला था. “जानू (शबीर) को घर से गए मुश्किल से दस-पंद्रह मिनट हुए होंगे, हमें फोन आया कि जानू के सिर पर चोट लगी है और उसे शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ले जाया जा रहा है”, रिज़वाना बताती हैं.

रिज़वाना का परिवार आजतक शबीर की गलती नहीं ढूंढ सका है- “उस दिन कर्फ्यू नहीं था. वह पत्थरबाज़ी के लिए भी नहीं निकला था. फिर क्यों शबीर पर आंसू गैस का गोला दागा गया?”

शबीर के इलाज का खर्चा परिवार के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा स्थानीय अखबारों में मदद के इश्तेहार छपवाए गए. लोगों ने आर्थिक मदद ज़रूर दी लेकिन लाखों खर्च करने के बावजूद वह पूरी तरह के ठीक नहीं हो सका. शबीर के शरीर का दाहिना हिस्सा सुन्न पड़ गया. वक्त से साथ उसे कुछ चीज़ें याद रहने लगी हैं वर्ना वह अपनी याददाश्त भी खो चुका था.

मेरी नज़रें शबीर पर जा टिकीं. वह काले फि‍रन के भीतर ही अपने पैर सिकोड़कर कांगड़ी में हाथ ताप रहा है. उसके पिता उसके बारे में चर्चा कर रहे हैं और उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं है. खुर्शीद बताते हैं कि सिर की चोट को छुपाने के लिए वह दिनभर टोपी लगाए रहता है.


फिरन में सिकोड़कर बैठा लड़का- शबीर जिसके सिर में आंसू गैस का गोला लगा था

बड़े भाई का निरीह शरीर और घर की दयनीय आर्थिक हालत-  ऐसे में दोनों छोटे भाइयों समीर और शौकत का ‘भारत’ के प्रति गुस्सा बढ़ता गया. इस गुस्से को ज़ाहिर करने का तरीका बना सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकना. दोनों नियमित रूप से पत्थरबाज़ी करने लगे. शौकत  को जब पहली बार सुरक्षाबलों ने गिरफ्तार किया, तब वह कक्षा छह का छात्र था. खुर्शीद के मुताबिक, “मेरे बेटे शौकत को सुरक्षाबलों ने थर्ड डिग्री टॉर्चर किया”. यह पंक्ति खत्म करते हुए खुर्शीद ने दसियों बार टॉर्चर शब्द कहा होगा, “टॉर्चर-टॉर्चर-टॉचर…”

परिवार के लिए 2012 में एक और कठिन घड़ी आई. शबीर के सिर में इनफेक्शन हो गया. डॉक्टरों के मुताबिक उसके सिर में जो प्लेट लगा था, वह कारगर नहीं था और तत्काल ऑपरेशन करने की जरूरत थी. घर की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि ऑपरेशन करवाया जा सके. रिज़वाना ने बेटे के इलाज के लिए गहने बेच दिए.

भाई की बिगड़ती हालत देखकर शौकत के भीतर गुस्से का गुबार बढ़ता ही गया. उसे सुरक्षाबलों द्वारा थर्ड डिग्री यातना दी जाती फिर भी उसने पत्थर फेंकना बंद नहीं किया. यही वह दौर था जब जामिया मस्जिद में जुमे की नमाज़ के बाद पत्थरबाज़ी ने एक चलन की शक्‍ल लेनी शुरू की.

खुर्शीद के मुताबिक, शौकत के ऊपर नोहट्टा पुलिस स्टेशन में दर्जनों एफआईआर दर्ज किए जा चुके थे. शौकत कई बार जेल भी गया लेकिन उसका पत्थर फेंकना बंद नहीं हुआ. पत्थर फेंकना, जेल जाना और सुरक्षाबलों से तनातनी उसे कश्मीर की ‘आज़ादी’ का संघर्ष लगता था.

शौक़त को याद करते हुए खुर्शीद बताते हैं, “1 मार्च 2015 को सुबह 10 बजे शौक़त को खानयार पुलिस स्टेशन से फोन आया और अफसर ने उसे फौरन बुलाया. उसने बताया कि अफसर कह रहा है कि उसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है.”

जब शौक़त को पुलिस थाने से फोन आया था, तब उसने घर पर कुछ भी नहीं बताया था. शौकत की मौत के बाद खुर्शीद के भतीजे ने उस रोज़ की पूरी बात परिवार को बताई. शौक़त ने चचेरे भाई को थाने जाने से पहले सूचित किया था.  

“वह 11 बजे घर लौटा. उसकी आंखें लाल थीं. चेहरा उतरा हुआ था. मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ है, तबीयत तो ठीक है? उसने मुझसे कहा कि वह सोना चाहता है”, रिज़वाना बताती हैं.

खुर्शीद के दिमाग में 1 मार्च की स्मृतियां अब भी ताज़ा हैं. वे बताते हैं, “दशकों बाद उस दिन मार्च में बर्फबारी हुई. बहुत बर्फ़ पड़ी थी. मैंने अपने पूरे जीवन में पहली बार मार्च में बर्फ को गिरते देखा था. शायद यह कुदरत का कुछ पैगाम रहा होगा.”

शौक़त के घर लौटने के करीब एक घंटे बाद रिज़वाना उसे खाने के लिए बुलाने उसके कमरे में गईं. उन्होंने देखा कि वह बिस्तर पर बेसुध पड़ा है. “पता नहीं उसे थाने वालों ने क्या खिला-पिला दिया या कहां उसे मारा कि वह चल बसा,” खुर्शीद ने कहा. तब शौक़त की उम्र सिर्फ़ 16 वर्ष थी.


दीवार पर टंगी तस्वीर जिसमें दो लड़के हैं- दाहिने चश्मे में शौक़त, खुर्शीद का सबसे छोटा बेटा

“वह डीएसपी परवेज़ था जिसने शौक़त का स्कूल छुड़वा दिया. कुपवाड़ा जेल में इकबाल नाम का एक इंस्पेक्टर था, उसने भी मेरे बच्चे (शौक़त) को बहुत मारा.’’ खुर्शीद उन पुलिसकर्मियों का नाम याद करते हैं जिनका जिक्र शौक़त किया करता था. मैंने खुर्शीद से पूछा, “क्या आप लोगों ने शौक़त को कभी पत्थरबाजी से नहीं रोका?” जवाब में वह कुछ देर के लिए खामोश हुए. उन्होंने कहा, “रोका. बहुत रोका. हम असहाय हो जाते थे जब वह घर में अपने भाई की हालत देखता था. उसे गुस्सा आता था कि उसके बड़े भाई ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा फिर भी उसे परेशान किया गया.” खुर्शीद अपनी बात पूरी करते हैं, “आज घाटी में हरेक घर किसी न किसी तरह से कश्मीर में सुरक्षाबलों के उत्पीड़न से प्रभावित है. बच्चों का बचपन खत्म हो गया है. बच्चे अपने घरों में देखते हैं, जुल्म सहते हैं और पत्थर फेंकने को उकसाये जाते हैं.”

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक दक्षिण कश्मीर में 14 साल के बच्चे हथियार उठा रहे हैं. बीते साल दिसंबर में सुरक्षाबलों के साथ हुई मुठभेड़ में उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा जिले का 14  साल का एक मिलिटेंट मुदासिर राशिद मारा गया था. जुलाई 2016 में बुरहान वानी की हत्या के बाद महिलाओं का जनाज़े में जाना और युवतियों/छात्राओं के सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने के दृश्य आम हो चले हैं. ख़बर तो ये भी है कि महिलाएं भी अब कश्मीर के सशस्त्र विद्रोह में शामिल हो रही हैं, हालांकि वे अपवाद हैं.      

इसी बीच दरवाज़े पर खटखट की आवाज हुई. शबीर ने दरवाज़ा खोला. एक नौजवान युवक कमरे के भीतर आया. चेहरे पर ऐसी मासूमियत जैसे कॉलेज जाने वाला लड़का हो. उसने झटके से हमारी तरफ देखा और महिला के बगल में जा बैठा. यह समीर था. खुर्शीद का दूसरा बेटा और शबीर का भाई. वह काम से घर लौटा था. महिला उसकी पत्नी है. महिला के हाथ में जो बच्ची है, उसकी बेटी है. समीर अपने बच्ची को पुचकारने लगा। जिस दृश्य की परिभाषा में प्रेम का व्याख्यान होना था, वहां दया-पात्र की छवि बनने लगी.

शौकत की अचानक हुई मौत ने परिवार को सदमे में डाल दिया था. समीर की पढ़ाई छूट गई. समीर को भी पुलिस कई बार महीने- डेढ़ महीने के लिए गिरफ्तार कर लेती थी. “हमारे परिवार में अमूमन 30-35 की उम्र में शादी होती है. सुरक्षाबलों के जुल्म से बचने के लिए और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हमने 17 वर्ष की आयु में ही समीर की शादी उसकी चचेरी बहन से करवा दी”, खुर्शीद ने कहा. वर्तमान में समीर एक निजी दुकान में काम करता है. परिवार की हालत ऐसी है कि शबीर और खुर्शीद की दवाइयों के खर्च का वहन  बमुश्किल ही हो पाता है.

“चूंकि आप पूर्व में अल-उमर के साथ जुड़े थे, क्या इसीलिए परेशानियों का यह सिलसिला आपके परिवार के साथ जारी रहा”, मैंने पूछा. खुर्शीद कहते हैं, “खुदा की क़सम मैं यह मानने को तैयार नहीं होता. मैं हर घर से जुल्म की अंतहीन कहानियां सुनता हूं. हां, यह सच है कि मैं हथियार छोड़कर भी सामान्य सुकूनदेह  जीवन नहीं जी सका.”

सहसा मेरी नज़र घड़ी पर गई. बातचीत करते हुए पौने दस बजे चुके थे. मैंने खुर्शीद से विदा होने की अनुमति ली. वह कहने लगे, “आज रात आप यहीं रूक जाओ. पता नहीं बाहर कौन पूछताछ करने लगे. किसके पास गए थे, क्यों गए थे, कहां से आए हो, और पता नहीं क्या-क्या.” हमने उनकी चिंता के लिए शुक्रिया अदा किया और निकले. दरवाजे की तरफ मुड़े ही थे कि दीवार पर टंगी एक तस्वीर ने ध्यान खींच लिया. यह तस्वीर खुर्शीद की मीरवाइज उमर फारुक के साथ थी. खुर्शीद ने कुछ पूछने के पहले ही कह दिया, “यह जवानी के दिनों की है, मीरवाइज साहब के साथ की”.


दीवार पर टंगी तस्वीर-  मीरवाइज़ फारूक के साथ खुर्शीद 

“पीडीपी अच्छी पार्टी थी लेकिन वह सिर्फ चुनाव चिह्न में कलम दवात की पार्टी है, पर महबूबा ने क्या किया. कलम को बनाया बंदूक और दवात को बनाया कश्मीर कौम का खून. खून बहवाती गई,” खुर्शीद ने कहा. वह महबूबा मुफ्ती का एक बयान याद दिलाते हैं, जो उन्होंने भाजपा के साथ गठबंधन सरकार के दौरान दिया था, “पत्थर फेंकने वाले बच्चे बाहर चॉकलेट लेने जाते हैं या दूध लेने?’’ ऐसा  कहकर उसने कश्मीरियों पर होने वाले जुल्म पर तंज किया. जिस मुख्यमंत्री को यह फर्क़ नहीं समझ आ रहा कि एक तरफ बच्चों के पास पत्थर है, दूसरी तरफ सुरक्षाबलों के पास पैलेट और बंदूक है. उनसे क्या उम्मीद करेंगे.”

खुर्शीद नेशनल कान्फ्रेंस से भी बिफरे दिखे, “एक बार फारुक अब्दुल्लाह ने कहा कि कश्मीरी युवाओं के पास प्रतिरोध का सिर्फ एक हथियार है- पत्थर. कश्मीरी अवाम खुश हो गई. कोई नेता तो कश्मीरियों के हालात समझ रहा है. लेकिन जब वही फारुक अब्दुल्लाह हिंदुस्तान गया, तो उसने कहा पत्थर फेंकने वालों को जेल में भर दो. जय हिंद!”

घड़ी की सुई समय रात के पूरे दस बता रही थी. हम निकलने को हुए कि खुर्शीद की मां अपनी जगह से उठीं और उन्‍होंने मेरा ललाट चूम लिया, “यह अपने शौक़त की याद दिला गया, चंचल और मुस्कुराता चेहरा.”

(रोहिण Newslaundry में काम कर चुके हैं. कई वेबसाइटों के लिए स्वतंत्र लेखन और फिलहाल फ्रीलांस)