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बर्फ़ की तह में: ‘परसेप्‍शन’ की जंग को समझना है तो उन्‍हें देखें जो ‘शहीद’ नहीं हैं!

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“आज आप पुलवामा मत जाना, वहां आज 6 लड़के मारे गए हैं”, जब मेरे टैक्सी ड्राइवर सलमान ने यह चेतावनी दी तो पहले मैं समझ ही नहीं पाया कि वह ‘लड़के’ कहकर किसे संबोधित कर रहा है. बाद में उसने बताया कि लड़कों से उसका मतलब मिलिटेंट्स से था. कश्मीरियों के लिए वहां ये ‘लड़के’ कश्मीर की आज़ादी के लिए शहीद होने वाले लोग हैं. वहां लोग मिलिटेंट्स के लिए शहीद, जिहादी, अपने लड़के जैसे शब्दों का ही इस्तेमाल करते हैं. “जैसे भगत सिंह इंडिया के लिए फांसी चढ़े थे, वैसे ही बुरहान भी हमारा भगत सिंह है”, यह लाइन थी एक होटल के केयरटेकर की.

केयरटेकर की इस पंक्ति से बड़ी आसानी से धारणा निर्मित राजनीति को पकड़ा जा सकता है. आज़ादी की लड़ाई में जो भी देश के लिए मारा गया, उसे शहीद माना गया. अमेरिकी सैनिक जो वियतनाम में मारे गए, उन्हें अमेरिका ने अपना शहीद माना. वियतनाम वालों ने अपने वालों को शहीद माना. पाकिस्तान की लड़ाई में जो उनके लोग मारे गए, वे शहीद कहलाए. कश्‍मीर को केंद्र में रखकर बात करें तो आप समझ पाएंगे कि भारत के नागरिक के लिए अपना शहीद चुनना कितनी कठिन चुनौती है. एक राज्य जिसे ‘’दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे’’ के जुमले में लपेटकर भारत का अभिन्न अंग बताया जाता रहा है, वहां जो लड़के मारे जाते हैं वे उनके लिए शहीद हैं लेकिन जो जवान मारे जा रहे हैं वे भी शहीद हैं. मौजूदा राजनीतिक विमर्श आपसे मांग करता है कि  शहीद कोई एक ही होगा, सैनिक या मिलिटेंट!

जो शहीद नहीं है उसका क्‍या?

पुलवामा के अवंतीपोरा में सेना के काफिले पर हुए हमले के बाद देश फिर से उबल रहा है. आत्मघाती हमले में 40 से ज्यादा जवान मारे गए हैं. गुस्सा लाज़मी है लेकिन संयम के साथ काम लेना भी एक किस्म की रणनीति होती है. टीवी से लेकर सोशल मीडिया पर ‘बदला-बदला’, ‘मारो-काटो’ की चीखें सुनाई दे रही हैं. राजनीतिक सत्ता वैसे तो हमेशा ही युद्ध को उत्सव और जीत की तरह प्रायोजित करती रही है पर कश्मीर के हालात युद्ध के नहीं है. अगर कश्मीर में युद्ध जैसे हालात होते तो हमें दुश्मन साफ़ मालूम होता. आखिर यह कथित युद्ध है किससे?

शायद इस बात पर देश में अब भी आम सहमति है कि कम कम कम कश्मीरी भारत के दुश्मन नहीं हैं. कश्मीरी भी इस बात को लेकर बिल्कुल आश्वस्त हैं कि भारत के लोग उनके दुश्मन नहीं हैं. भारत और कश्मीर को एक दूसरे के विरुद्ध नहीं लड़ना है. फिर कश्मीर को जंग के मैदान के रूप में पेश करना किसके हित में हैं? पाकिस्तान? भारत? चीन? अमेरिका? या भारत और पाकिस्तान को हथियार बेचने वाले यूरोपीय देश? वैसे, क्या हमारी एजेंसियों ने इसकी पड़ताल कर ली है कि यह हमला पाकिस्तान प्रायोजित ही था? जब सुरक्षा एजेंसियां यह मानती हैं कि स्थानीय लड़के हथियार उठा रहे हैं, तो कौन ये पूछेगा कि ये हथियार कहां से आ रहे हैं? अगर ये हथियार पाकिस्तान से आ रहे हैं तो सुरक्षाबलों की इतनी सघन मौजूदगी में चूक कहां हो रही है?

यह लड़ाई वास्‍तविक कम है और धारणागत ज्‍यादा. दिमागों के बीच जंग चल रही है, मन में जंग चल रही है. जंग का एक मनोविज्ञान बनाया गया है जहां कश्‍मीर को मुसलसल जंग की ज़मीन के रूप में प्रायोजित किया जा रहा है. बतौर पत्रकार हमारे कंधों पर परसेप्‍शन यानी धारणा की इस जंग को समझने और बतलाने की जिम्‍मेदारी है. सवाल उठाने की ज़रूरत है कि हर आतंकी हमले के बाद आखिर मुसलमानों पर ही उसकी निंदा करने का अतिरिक्त दबाव क्‍यों आ जाता है? उन्हें ही क्‍यों चिन्हित किया जाता है? पुलवामा की घटना के मार्फ़त मुसलमानों को टारगेट करने का क्या औचित्य है? यह सब सोचते और लिखते हुए जम्मू से सांप्रदायिक तनाव की खबरें आ रही हैं. सोशल मीडिया में माहौल मुसलमानों के खिलाफ है.  

कश्‍मीर में यह नया नहीं है. मौजूदा उन्माद का माहौल राइज़िंग कश्मीर के संपादक शुज़ात बुखारी की हत्या की याद दिलाता है. मेरी स्‍मृति में बुखारी की मौत शायद पहला मौका थी जब देश में किसी कश्मीरी की मौत पर आम सहमति बन सकी थी. बताया गया कि ‘आंतकियों’ ने उन्हें दफ्तर के ठीक बाहर गोलियों से छलनी कर दिया था. जिस जगह शुज़ात बुखारी को मारा गया, वह श्रीनगर का मुख्य इलाका था- लाल चौक. लाल चौक स्थित प्रेस कॉलोनी श्रीनगर के सबसे व्यस्त इलाकों में एक है. यह मेरे जेहन में लाल चौक की छवि से बिल्कुल अलग था. लाल चौक पर पत्थरबाजी होती है, यह क्षेत्र ज्यादातर बंद रहता है- मीडिया से यही छवि मेरे भीतर गढ़ी गई थी. मैं जब वहां एक कश्मीर के पत्रकार से मिला, तो उसने मुझे बताया, “खुफिया एजेंसियों को हमारे-आपके मुलाकात की जानकारी है. उन्होंने नोटिंग कर ली है.” लाल चौक, जहां हर वक्त सुरक्षाबलों की मौजूदगी रहती है, ठीक वहीं शुजात बुखारी की सरेआम की गई हत्या कई सवाल छोड़ गई है. जैसे हर हमला एक सवाल छोड़ जाता है अगले हमले के लिए.

शुज़ात बुखारी से मेरी संक्षिप्‍त मुलाकात न्यूज़लॉन्ड्री के मीडिया रम्‍बल आयोजन में दिल्‍ली में हुई थी. तब मैं पत्रकारिता का छात्र था. कुछ मुलाकातें आपको लंबे वक्त तक याद रहती हैं, वह शायद ऐसी ही एक मुलाकात थी. जब उनकी मौत की खबर आई, तब बहुत बुरा लगा था. लग रहा था कि उनके रहते राइजिंग कश्मीर के दफ्तर जरूर जाना चाहिए था. शायद इसी कसक को पूरा करने अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान मैं राइज़िंग कश्मीर के दफ्तर गया. मुझे उस अखबार का दफ्तर देखना था, जिसके संपादक शुजात बुखारी थे. जो मारे जाने के बाद न इधर के शहीद हुए, न उधर के.

हाफिज़ और तहमीद के साथ रोहिण कुमार

राइजिंग कश्मीर के दफ्तर में मेरी मुलाकात अखबार के वर्तमान संपादक हाफिज़ अयाज़ गनी और शुजात बुखारी के बेटे तहमीद से हुई. हाफिज़, शुजात के बहनोई हैं. वह पहले रूस में रहते थे. शुजात की हत्या के बाद से वह भारत आकर अख़बार का काम संभाल रहे हैं. मैंने हाफिज़ को बताया कि खबरों में मैंने ऐसा सुना है कि शुज़ात की हत्या का मुख्य आरोपी लश्‍कर-ए-तैयबा के कमांडर नवेद जट्ट उर्फ अबू हनजूला को बनाया गया था जिसे नवंबर 2018 में ब्रिजबेहारा में हुए एनकाउंटर में मार गिराया गया. आखिर हाफिज़ इस पर क्या सोचते हैं?

हाफिज़ कहते हैं, “सरकार के दावों के अनुसार तो शुजात जी के हत्यारे मारे जा चुके हैं लेकिन यह मानना हम सबके लिए मुश्किल है. आखिर इतनी सुरक्षा के बीच कोई कश्मीर के इतने अहम अखबार के संपादक को कैसे मार सकता है.” शुजात बुखारी के जानकार भी उनकी हत्या को लेकर आज भी संदेह में जीते हैं. कोई भी यह मानने को तैयार नहीं होता कि उनकी हत्या मिलिटेंट्स ने की है.

शुजात के बेटे तहमीद से जब मैंने बात करने की कोशिश की तो वह बस हां या ना में जवाब देता रहा. उसने कहा कि वह आगे चलकर पत्रकार बनना चाहता है. तहमीद के भावशून्य चेहरे ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था. मैं तहमीद को देखते हुए अपने बारे में सोच रहा था. मेरे पिता पत्रकार नहीं हैं लेकिन उनकी गैर-मौजूदगी के बारे में सोचकर भी कांप जाता हूं.    

हाफिज़ ने खुलकर तो नहीं कहा पर उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों के कामकाज के तरीकों पर गहरी आशंकाएं जताईं. हाफिज बोले, “हमें यह जानना है कि शुजात को कौन लोग मारना चाहते थे? क्यों मारना चाहते थे? वह कैसे शहर के बीचोबीच हथियार के साथ पहुंचे, गोलियां चलाईं और लाल चौक क्षेत्र से सफलतापूर्वक भागने में कामयाब हो गए?”

हाफिज़ ने एक नई जानकारी दी कि प्रेस इनक्लेव और लाल चौक पर लगे ज्यादातर सीसीटीवी कैमरे शुज़ात की हत्या के रोज़ काम नहीं कर रहे थे.

“इतने सारे इत्तेफ़ाकों पर हमें शक होता है”, हाफिज़ ने कहा.

मीडिया में शुजात की हत्‍या को लेकर ओरल नैरेटिव ज्‍यादा सुनने-पढ़ने को नहीं मिले। हाफिज़ की बातों से जो नैरेटिव बन रहा है, उसे खारिज नहीं किया जा सकता. वे जिन ‘इत्तेफ़ाकों’ की बात कर रहे हैं, उनके सिरे आपस में जोड़े जाने पर बहुत सारी बातें खुल सकती हैं लेकिन कोई भी मीडिया संस्थान यह जोखिम नहीं लेना चाहेगा. मीडिया को तो छोड़ दें, किसी राजनीतिक दल में भी ये कुव्वत नहीं है कि वह शुजात बुखारी की हत्‍या के ‘इत्‍तेफ़ाकों’ पर सवाल करे. वजह? शुजात इस देश के लिए ‘शहीद’ नहीं हैं क्‍योंकि वे सरहदों की हिफ़ाजत में तैनात कोई सैनिक नहीं थे. वे कश्‍मीरियों के ‘शहीद’ भी नहीं हैं.

सवाल उठाना तो दूर की बात, अव्‍वल तो यहां तो तथ्‍यों को ही जानने समझने का संकट है। मसलन, हम में से कितने लोगों को मालूम है कि सैनिकों के दस्‍ते पर हुए हमले से ठीक पहले पुलवामा के ही एक पब्लिक स्कूल में ब्लास्ट हुआ था जिसमें कोई डेढ़ दर्जन बच्चे घायल हुए थे? सैनिकों के मारे जाने की ख़बर इतनी बड़ी है कि बच्‍चों के घायल होने की ख़बर अपनी जगह तक नहीं बना सकी। वजह, फिर वही परसेप्‍शन की राजनीति!

कश्‍मीर में हर हमला बराबर अहमियत नहीं रखता. वैसे ही जैसे हर मौत यहां बराबर नहीं होती और हर मारा गया ज़रूरी नहीं कि ‘शहीद’ ही हो- इधर का चाहे उधर का!  युद्ध में चीज़ें साफ-साफ दिखती हैं एकदम ब्‍लैक एंड वाइट. कश्‍मीर में कुछ भी ब्‍लैक एंड वाइट नहीं है. इसीलिए कश्‍मीर युद्धरत भी नहीं है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि कम से कम युद्ध तो कश्‍मीर के संकट का समाधान नहीं है. यह बात हम जितनी जल्‍दी समझ लें उतना बेहतर है.

क्रमश:


(रोहिण Newslaundry में काम कर चुके हैं. कई वेबसाइटों के लिए स्वतंत्र लेखन और फिलहाल फ्रीलांस)

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