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कोरोना वायरस : WHO की चेतावनी के बावजूद भारत ने नहीं किया सुरक्षा सामग्री का भंडारण

20 से 22 मार्च के बीच भारत में कोविड-19 मरीजों की संख्या 206 से बढ़कर 341 हो गई थी लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों की फौरी आवश्यकताओं का संबोधन करने की बजाय भारतीय जनता बालकलियों से इटली की नकल करते हुए स्वास्थ्य कर्मियों का धन्यवाद दे रही थी. ऐसा करने का कोई मतलब नहीं है और इससे हमारे उन स्वास्थ्य कर्मियों का मनोबल भी नहीं बढ़ने वाला जो इन मामलों की आने वाली सुनामी से घबराए हुए हैं.

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Indians cover their faces as they watch the stock exchange index on a display screen on the facade of the Bombay Stock Exchange (BSE) building in Mumbai, India, Thursday, March. 12, 2020. Global shares plunged Thursday after the World Health Organization declared a coronavirus pandemic and indexes sank on Wall Street. (AP Photo/Rafiq Maqbool)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कहने पर 22 मार्च को भारत के 130 करोड़ लोगों ने “जनता कर्फ्यू” में भाग लिया. इस बीच स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए मास्क, गाउन और दस्ताने जैसे पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट या पीपीई का भंडारण करने में सरकार विफल रही. 18 मार्च को जनता कर्फ्यू की अपील करते हुए मोदी ने लोगों से अपनी-अपनी बालकनी से थाली और ताली बजाकर स्वास्थ्य कर्मचारियों की हौसला अवजाई करने को कहा था. लेकिन अगले दिन ही जाकर भारत सरकार ने देश में निर्मित पीपीई के निर्यात पर रोक लगाई. सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा पीपीई की आपूर्ति में संभावित ढिलाई की चेतावनी के तीन सप्ताह बाद ऐसा किया.

इससे पहले 27 फरवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिशानिर्देश जारी करते हुए बताया था, “दुनियाभर में पीपीई का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी. गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों की तीव्र खरीदारी और साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों के चलते, दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी.” जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों में बताया गया है, पीपीई का मतलब है : चिकित्सीय मास्क, गाउन और एन95 मास्क. इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया.

31 जनवरी को भारत में कोविड-19 का पहला मामला सामने आने के बाद, विदेश व्यापार निदेशालय ने सभी पीपीई के निर्यात पर रोक लगा दी थी, लेकिन 8 फरवरी को सरकार ने इस आदेश पर संशोधन कर सर्जिकल मास्क और सभी तरह के दस्तानों के निर्यात की अनुमति दे दी. 25 फरवरी तक जब इटली में 11 मौतें हो चुकी थीं और 200 से अधिक मामले सामने आ चुके थे, सरकार ने उपरोक्त रोक को और ढीला करते हुए 8 नए आइटमों के निर्यात की मंजूरी दे दी. यह बिलकुल साफ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के बावजूद भारत सरकार ने पीपीई की मांग का आंकलन नहीं किया जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय डॉक्टर और नर्स इसकी कीमत चुका रहे हैं और इस संकट का सामना कर रहे हैं.

स्वास्थ्य मंत्रालय, कपड़ा मंत्रालय और सरकारी कंपनी एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड के पिछले दो महीनों के निर्णयों ने स्वास्थ्य कर्मियों और कार्यकर्ताओं को सकते में डाल दिया है. मुझे कई निर्माताओं ने बताया कि सरकार ने एचएलएल को पीपीई की खरीदारी का एकाधिकार दे रखा है और वह बढ़ी हुई कीमतों में उपकरणों को बेच रही है. संकट की ऐसी घड़ी में सरकार का यह फैसला हैरान करने वाला है. एचएलएल पीपीई का निर्माण नहीं कर रही है और उसे एकाधिकार देने से वह सभी आपूर्तिकर्ताओं से इन्हें इकट्ठा कर 1000 रुपए प्रति किट की दर से बेच रही है. इस बीच इन किटों के निर्माताओं ने मुझे बताया है कि यदि सरकार उन्हें अनुमति दे तो वे इन किटों को 400-500 रुपए में उपलब्ध करा सकते हैं. इसके अलावा इन किटों को असेंबल करने से और देरी हो रही है.

साथ ही कीमतों के बढ़ने ने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ा दी है. उद्योग जगत पर नजर रखने वाली गैर-सरकारी संस्था ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी आयसोला ने मुझे बताया कि उनकी संस्था 23 मार्च को प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर एचएलएल को प्राप्त पीपीई खरीद के एकाधिकार को खत्म करने की मांग करेगी.

आयसोला ने बताया कि सरकार के पुर्वानुमान न लगाने के चलते सबसे बड़ा खतरा यह हो गया है कि जो भी ऑडर अब किए जाएंगे वे पूरी तरह से अपर्याप्त होंगे. उन्होंने कहा, “सरकार ने स्थानीय उद्योग की उत्पादन क्षमता का भी दोहन नहीं किया. मिसाल के लिए एचएलएल ने मई 2020 के लिए लगभग 7.5 लाख पीपीई की आवश्यकता बताई है जबकी वास्तविक आवश्यकता 5 लाख प्रति दिन से ज्यादा की हो सकती है.”

आयसोला का अनुमान है कि भारतीय स्वास्थ्य कर्मियों को प्रति दिन 5 लाख से ज्यादा गाउनों की आवश्यकता होगी लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय को लगता है कि भारत में मई के महीने तक 7.25 लाख गाउनों की ही जरूरत पड़ेगी. मंत्रालय का यह अनुमान 18 मार्च की स्वास्थ्य और कपड़ा मंत्रालयों और एचएलएल की बैठक के मिनट में दर्ज है.

उस मिनट को पढ़ने से चिंताएं बढ़ जाती हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने नोट किया है कि एचएलएल 7.25 लाख गाउनों, 60 लाख एन95 मास्कों और एक करोड़ थ्री-प्लाई मास्क उपलब्ध कराएगी. लेकिन उसी मिनट में मंत्रालय ने नोट किया है कि “कच्चे माल की कमी है और आपूर्ति बढ़ रही मांग की बराबरी नहीं कर पा रही है.” कपड़ा मंत्रालय की मंत्री स्मृति ईरानी हैं और मंत्रालय पर सुरक्षा से संबंधित सभी तरह के निमार्ण के संयोजन का जिम्मा है. कपड़ा निर्माताओं की आपूर्ति किए जाने वाले माल की गुणवत्ता जांच कर सत्यापित करने वाले केंद्रों की संख्या बढ़ाने की मांग का मंत्रालय ने कोई जवाब नहीं दिया है. लेकिन बैठक में मंत्रालय ने नोट किया, “विभिन्न राज्य सरकारों ने अपनी मांगें बढ़ाई हैं और राज्यों ने बाजार में उपलब्धता में हो रही कठिनाई और उपलब्ध आपूर्तिकर्ताओं द्वारा भारी भरकम कीमतों की मांग की बात भी बताई है.”

कपड़ा मंत्रालय ने बॉडी गाउन और एन95 मास्क की कमी के बारे में कहा है, “देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थिति की गंभीरता के मुताबिक आपूर्ति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. इसलिए गाउन और एन95 मास्क का नियंत्रण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा किया जाना चाहिए तथा खरीद को एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड में केंद्रित किया जाना चाहिए.” लगता है कि कपड़ा मंत्रायल की पीपीई की कमी की चिंता और एचएलएल में खरीद को केंद्रित रखने के दबाव में अंतरविरोध है. स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया है कि फिलहाल जो ऑडर दिए जा रहे हैं उनको हासिल करने में हफ्तों का समय लग सकता है. अधिकारियों ने बताया कि हाल तक मंत्रालय के किसी भी ऑडर की आपूर्ति नहीं हुई है क्योंकि ऑडर एडवांस में नहीं दिए गए थे. इस बीच कपड़ा मंत्री 22 मार्च को ट्वीटर पर महामारी से मुकाबला करने के लिए बर्तन बजाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती नजर आईं.

18 मार्च की बैठक में चीजों की कमी की जो चर्चा हुई है वह सरकार के जल्दबाजी और खराब सोच वाले फैसलों का नतीजा है जिसमें उसने विशेष पीपीई के निर्यात पर रोक तो लगाई लेकिन पीपीई बनाने वाले कच्चे माल के निर्यात को नहीं रोका. प्रिवेंटिव वियर मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संजीव कुमार कहते हैं, “अन्य देशों ने पीपीई उत्पादों के साथ-साथ इन्हें बनाने वाले कच्चे माल के निर्यात पर भी रोक लाग दी थी लेकिन भारत ने 19 मार्च तक ऐसा नहीं किया.” उन्होंने आगे बताया, “इस बीच भारतीय कंपनियां विदेशी सरकारों की मांगों को पूरा करती रहीं जो अपने यहां इन सामानों का भंडारण करने में लगी थीं. हमने 7 फरवरी को ही सरकार से अनुरोध कर दिया था कि वह कालाबाजारी रोकने के लिए कदम उठाए, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया. थ्री-प्लाई मास्क बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चीजों का मूल्य 250 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 3000 रुपए प्रति किलो पहुंच गया है. इलास्टिक तो मिल ही नहीं रही है. आज हम जिस समस्या का सामना कर रहे हैं, वह हमारी करनी का फल है.”

इस बीच देश भर के डॉक्टरों को लग रहा है कि सरकार ने उन्हें “राम भरोसे” छोड़ दिया है. महाराष्ट्र के एक सरकारी अस्पताल के रेसिडेंट डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर मुझे बताया, “मुझे तालियों की जरूरत नहीं है बल्कि सुरक्षा उपकरणों की आवश्यकता है.” उन्होंने कहा, “यह तो वैसी ही बात है कि सरकार हमलोगों को आग बुझाने को कह रही है लेकिन पानी नहीं दे रही. मैंने अपने परिवार को तीन महीनों के लिए बाहर भेज दिया है. ऐसा लग रहा था जैसे मैं उनसे आखिरी बार मिल रही हूं. मुझे पता नहीं कि मैं उनसे दुबारा मिल पाऊंगी भी कि नहीं. सुरक्षा उपकरणों के बिना कोविड मरीजों की देखभाल करना बहुत डरा रहा है.”

20 से 22 मार्च के बीच भारत में कोविड-19 मरीजों की संख्या 206 से बढ़कर 341 हो गई थी लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों की फौरी आवश्यकताओं का संबोधन करने की बजाय भारतीय जनता बालकलियों से इटली की नकल करते हुए स्वास्थ्य कर्मियों का धन्यवाद दे रही थी. ऐसा करने का कोई मतलब नहीं है और इससे हमारे उन स्वास्थ्य कर्मियों का मनोबल भी नहीं बढ़ने वाला जो इन मामलों की आने वाली सुनामी से घबराए हुए हैं.


विद्या कृष्णन ने यह स्टोरी कारवां के लिए लिखी है और वहीं से साभार प्रकाशित है। वे स्वास्थ्य मामलों की पत्रकार हैं और गोवा में रहती हैं. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा पर उनकी पहली किताब 2020 में प्रकाशित होगी.

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