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‘परलोक’ के ज्ञानी बाबा ‘इहलोक’ में ज़ीरो, जनता पर अज्ञान उलीचें, बन जाते हैं हीरो!

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डॉ.स्कन्द शुक्ल

 

बात उन दिनों की है जब एक शहर में किसी बहुख्यात बाबाजी का एक लेज़र-शो हो रहा था । उस शो में दूर-दूर से पधारे भक्तगणों के साथ एक नास्तिक-धर्मच्युत व्यक्ति भी पहुँचा था ।

बाबाजी हज़ारों लोगों की भीड़ में ज्ञान बाँट रहे थे। परलोक का , परकाया का , परमात्मा का। सारे ‘पर’ बाबाजी की जिह्वा पर तक-धिन-धिन करते थे , एक भी ‘इह’ नहीं फटकता था। काहे को फटके ! इह-विह की बातें छोटे लोगों की हैं। ब्लडी पुअर हंग्री पीपुल ! बड़के लोग भौतिक बातों में समय नहीं व्यर्थ करते, वे पराभौतिकी में गोते लगाते हैं। 

लेकिन नास्तिक-धर्मच्युत से रहा न गया। बाबा के शिष्यगण श्रद्धालुओं से और-और प्रश्नों के लिए कह रहे थे। सो उसने तय किया कि वह भी बाबा से एक प्रश्न तो करेगा ही। एकदम साधारण। और उससे तय कर लेगा कि इतने महान् व्यक्ति की सत्यता असल में कितनी गहरी है। तो उस गर्हित व्यक्ति ने बाबा को प्रणाम करके प्रश्न किया :

“बाबा प्रणाम ! आपके पीछे चल रही लेज़र-किरणें अद्भुत हैं !”

बाबा को यह वाक्य बहुत नहीं जँचा। ( अरे मूर्ख ! पीछे की क्या बात करता है ! सामने सदेह बैठे व्यक्ति की बात कर ! ख़ैर ! हो सकता है , यह व्यक्ति तेजपुंज के बारे में कुछ कहना चाहता हो। )

“बाबा ! मेरी जिज्ञासा है कि आप मुझे लेज़र और टॉर्च के साधारण प्रकाश में अन्तर बता दें।”

बाबा ने ऐसे मुँह बनाया , जैसे प्रश्न सुना ही न हो। ( बस ! इतनी सी बात ! इतना साधारण सवाल ! यह भी कोई प्रश्न है ! निहायत क्षुद्र ! यह व्यक्ति भी एकदम ही तुच्छ निकला ! इसे इतनी की जिज्ञासा है !)

लेकिन बाबा ने फिर भी धर्मधृष्ट से कहा , “तुझे और कोई समस्या नहीं बालक ? कुछ और पूछ। कोई कष्ट ?”

व्यक्ति ने कहा, ” न बाबा ! मुझे कोई कष्ट नहीं। मुझे केवल दुविधाएँ ही कष्टस्वरूपा लगती हैं। अभी यही पीड़ा दे रही है। कि प्रकाश के इस अद्भुत स्रोत का रहस्य मुझे समझाएँ। टॉर्चों और लेज़रों की प्रकृति में मैं भेद जानने का इच्छुक हूँ।”

आगे की कथा आप जानते हैं। बाबा को उत्तर नहीं आता था, इसलिए उन्होंने ख़ूब मेटाफ़िज़िकल होने की कोशिश की। सूक्तियाँ दागीं, सुभाषित सुनाये। लेकिन वे लेज़र और साधारण ज्योति में भेद न बता पाये।

उस दिन वह व्यक्ति एक निश्चित निष्कर्ष लेकर लौटा और सीधे आठवीं में फ़िज़िक्स पढ़ाने वाले मास्टर जी के घर गया। बोला ,”सर, आपको परलोक आता है ?”

वे सकपका गये। बात को समझ न सके।

“जहाँ से आ रहा हूँ , वे परलोक-परकाया-परमात्मा सब जानते हैं , लेकिन लेज़र और टॉर्च में अन्तर नहीं जानते।”

मास्टर जी मुस्कुराये। बोले, ” इसीलिए वे वहाँ हैं और मैं यहाँ। आसपास इतना कुछ अनसमझा है आदमी के पास, लेकिन वह अनदेखे-अनजाने के लिए पहले लालायित है। दृष्ट से पहले अदृष्ट को समझने को जहाँ भीड़ जमा होगी, वहाँ बाबा-जैसों के ठीक सामने कोई दृष्ट के नाम पर पैसे कमा रहा होगा। बाबा का टिकट कितने का था ?”

“हज़ार रूपये का।”

“पता करना कि लेज़र किसने लगाया और कितने का उसे मुनाफ़ा हुआ। यही फ़िज़िक्स-मेटाफ़िज़िक्स की कहानी का दुर्भाग्यपूर्ण सच है।”

 



पेशे से चिकित्सक (एम.डी.मेडिसिन) डॉ.स्कन्द शुक्ल संवेदनशील कवि और उपन्यासकार भी हैं। इन दिनों वे शरीर से लेकर ब्रह्माण्ड तक की तमाम जटिलताओं के वैज्ञानिक कारणों को सरल हिंदी में समझाने का अभियान चला रहे हैं।



 

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