Home काॅलम चाँद के पिछवाड़े चीन !

चाँद के पिछवाड़े चीन !

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अतीत को उसकी हथेलियों के निशानों से ही पहचान सकेंगे हम।

डॉ.स्कन्द शुक्ल

चीन ने चन्द्रमा के दूरस्थ हिस्से पर कदम रख दिये हैं और चन्दू एफ़एम रेडियो पर इस ख़बर को सुन रहा है। उसके कानों तक रेडियो-तरंगें आ रही हैं : पृथ्वी के आयनमण्डल में तैरती हुई वे विशालकाय टावरों से संचारित रेडियो-सेटों में समा रही हैं , जहाँ वे ध्वनि-तरंगों में बदल रही हैं। फलस्वरूप चन्दू उन्हें सुन पा रहा है : सुनना दरअसल एक ख़ास क़िस्म की ध्वनि कही जाने वाली तरंगों को विशेष क़िस्म के यन्त्रों द्वारा समेटना और उन्हें तन्त्रिका-सन्देशों में बदल कर मस्तिष्क तक पहुँचाने को कहते हैं। रेडियो-सेट विद्युतचुम्बकीय तरंगों को ‘सुन’ रहे हैं , चन्दू ध्वनि तरंगों को।

रात के ढाई बजे हैं , गाना चल रहा है : चलो दिलदार चलो , चाँद के पार चलो। नायिका का अनुरोध है कि वह अपने दिलदार को चाँद के पार ले जाए। किन्तु चाँद के पार जाने से भला क्या होगा ? और आशिक़ी चाँद के परे भला जाकर कैसे परवान चढ़ जाएगी ?

हमने सदा चाँद का एक ही हिस्सा देखा है। नायिका ने भी, चन्दू ने भी। दूसरा दूरस्थ हिस्सा कभी किसी पृथ्वीवासी ने देखा ही नहीं यहाँ से। जिन्होंने देखा, वे पृध्वी छोड़कर अन्तरिक्ष में गये। वहाँ से उन्हें चाँद का वह हिस्सा नज़र आया। ( कारण कि जैसे ही पृथ्वी घूमती है , चन्द्रमा भी घूम जाता है। इस तरह से कि उसका एक ही हिस्सा हमारे सामने आता है। हमेशा वही। )

हम चाँद के घर में पीछे से प्रवेश करना चाहते हैं। चोरी-चोरी, चुपके-चुपके। पर क्यों ? चन्द्रपृष्ठ में पहुँचने से भला क्या अर्जित कर लेंगे हम ऐसा ? सदियों से जितना चाँद दिखता आया , क्या उतना हमारे लिए काफ़ी नहीं ?

चाँद के दूरस्थ हिस्से पर क़दम रखने से हमें वह सुनाई देगा , जो यहाँ पृथ्वी पर हम बमुश्किल सुन पाते हैं या नहीं सुन सकते। हमारे ही जन्म के तरंगीय जन्मचिह्न। वे विद्युतचुम्बकीय तरंगें जो बिग बैंग के बाद से समूचे ब्रह्माण्ड में बिखरी हुई हैं। हमारे ग्रह तक भी आ रही हैं : लेकिन आते-आते वे बहुत ही न्यून आवृत्ति की हो चुकी हैं। फिर हमारी पृथ्वी के चारों ओर शोर का ऐसा आवरण है , कि उन्हें भी सुन पाना सरल नहीं। पृथ्वी जिसने आयनमण्डल की पोशाक और सैटेलाइटों के इतने गहने पहन रखे हैं और जिस पर रहने वाले इतने सम्पर्कवान् और शोरगुल में अलमस्त हैं कि उन्हें दूर से चली आती इन मद्धिम इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों को सुन पाने में बहुत समस्या पेश हो रही है।

समस्या होनी भी है। बहुत बातूनी लोग मौन में छिपे मद्धिम पदचाप कैसे सुन सकेंगे भला ? हम भी नहीं सुन पा रहे। वे पदचाप जो बिग बैंग के हैं। वे प्राचीन रेडियो-तरंगें जो खरबों वर्ष पहले निकली थीं और अब अति न्यून आवृत्ति की हो कर सर्वत्र फैल गयी हैं। लेकिन उन्हें सुनने के लिए हम कान अर्थात् रेडियो-टेलिस्कोप कहाँ लगाएँ ? पृथ्वी पर तो आयनमण्डल है जो बाधा उत्पन्न करता है और फिर पृथ्वीवासियों द्वारा पैदा किया गया टेलीकम्यूनिकेशन का ऐसा शोर !

तब नायिका चन्दू को समझाती है कि चन्दू हम चाँद के पार चलेंगे , ताकि हम पृथ्वी से परे हट सकें। पृथ्वी से दूर चन्द्रमा के सुदूर हिस्से पर ठहरना एकान्त में ठहरना है। वहाँ से हमें ब्रह्माण्डीय रेडियो-तरंगें बेहतर सुनायी देंगी। वहाँ हम रेडियो-टेलिस्कोप लगाएँगे।

जिन ढेरों कारणों से संसार के वैज्ञानिक चाँद के दूरस्थ हिस्से पर जाना चाह रहे हैं , उनमें से एक महत्त्वपूर्ण कारण वहाँ रेडियो-टेलिस्कोप लगाकर ब्रह्माण्ड से रेडियो-तरंगें बटोरना भी है। वे अति न्यून आवृत्ति वाली तरंगें जिनमें हमारे ही जन्म के बिग बैंग-सम्बन्धी रहस्य छिपे हैं।

मुहब्बत पहले ही चन्दू को इशारा दे चुकी है। उसे मौन भाता है। मौन में महीन बातें पकड़ में आती हैं। जीवन के उद्भवों का उद्भव भी।

चीन चाँद के दूरस्थ हिस्से पर है। अन्य देश भी जल्द पहुँचेंगे। देखते हैं रेडियो-टेलिस्कोप कौन लगाता है। किसके यान्त्रिक कान सबसे बेहतर ब्रह्माण्ड के जन्म के रहस्य सुन पाते हैं।

तब तक इस ख़बर के महत्त्व को समझ कर आप गाना दुबारा सुनिए चन्दू-संग : 
“चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।”

और एक लाइन जोड़ दीजिए :

“टेलिस्कोप तैयार चलो, तरंगों को सम्हाल चलो।”

( चित्र में चाँद का वह हिस्सा जो हमें दिखा करता है और फिर वह , जो कभी नहीं देख पाते हम यहाँ से। चन्दू माशूक़ा-संग इसी हिस्से में जाएगा , टेलिस्कोप लगाएगा एयर रेडियो-तरंगें बटोरेगा ताकि ब्रह्माण्ड के अनसुलझे रहस्य सुलझा सके। )

(पेशे से चिकित्सक (एम.डी.मेडिसिन) डॉ.स्कन्द शुक्ल संवेदनशील कवि और उपन्यासकार भी हैं। लखनऊ में रहते हैं। इन दिनों वे शरीर से लेकर ब्रह्माण्ड तक की तमाम जटिलताओं के वैज्ञानिक कारणों को सरल हिंदी में समझाने का अभियान चला रहे हैं।)

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