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हम सब लौटकर अपनी दुनिया में खो गए, लेकिन गिरीश को वह मुलाकात याद रही!

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गिरीश कार्नाड (19 मई 1938 – 10 जून 2019)

बात 1990 के दशक की है जब मैं प्रो. इरफ़ान हबीब के एक आमंत्रण पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास उच्च अध्‍ययन केंद्र में एक माह के लिए विज़िटरशिप के लिए गया हुआ था। इत्तफाक से उन्हीं दिनों गिरीश जी भी अपने एक नाटक को जीवंत और तथ्यपरक बनाने के लिए प्रो. हबीब के पास आये हुए थे।

इरफ़ान साहब ने मेरा परिचय बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के नौजवान इतिहासविद् और कम्युनिज्म व कांग्रेसियत के अद्भुत समावेशी व्यक्तित्व के रूप में कराया। कार्नाड ने मुस्कुराते हुए कहा कि इस diversity (विविधता) पर तो कब का ज़ंग लगनी शुरू हो चुकी है, तुम किस दुनिया से आये हो भाई?

फिर एक लंबी सांस खींचते हुए कहा- “हां, समझ में आ गया। ग़ालिब भी तो तुम्हारे शहर में जाकर गंगा स्नान करके इसी diversity का शिकार हो चला था और दारा शिकोह वली अहद से इंसान बन बैठा था।”

इतिहास की उनकी समझ बहुत व्यापक थी। अजीब-अजीब सवाल उनके मन में उभरते थे। एक एक्टिविस्ट की तरह। वाकई उनका पूरा जीवन ही एक्टिविज्म करते बीता। व्यवस्था के खिलाफ उनका संघर्ष मित्र और अमित्र में भेद नहीं करता था। वे तो सिर्फ बेहतर समाज बनाने और विरासत को बचाये रखने वाले अपराजित योद्धा थे। माध्यम कविता, संगीत, कभी नाटक, कभी अभिनय तो कभी सामाजिक सरोकारों के विभिन्न मंच रहे जहां वे निर्भीक खड़े होकर हम जैसे अनेक लोगों का मार्गदर्शन करते रहे।

उनका इतिहास को देखने का नज़रिया वैज्ञानिक और खोजी था। चलते-चलते उन्‍होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- एक मुलाकात आपसे शाम में तन्हाई में होनी चाहिए। आपको भी कुछ जान परख लेते हैं।

मैंने कहा- सर, इरफ़ान साहब से तथ्य आधारित बातचीत के एक लंबे दौर के बाद बचता ही क्या है बताने के लिए, और मैं भी तो इरफ़ान साहब का एक अदना से विद्यार्थी हूं।

गिरीश जी ने मुस्कुराते हुए कहा- भाई, इतिहासकार तथ्यों की मौलिकता को बचाये रखते हुए अपनी परिस्थितियों और वातावरण के अनुकूल व्याख्या करता है। आपके शहर और आपके उस्तादों के नज़रिये ने आपको इतिहास देखने परखने की जो दृष्टि दी है, वह दृष्टिकोण भी हमारे लिए बहुत मायने रखता है।

देर रात्रि तक उस दिन एकांत चर्चा चलती रही। कार्नाड जी मोहम्मद तुग़लक़, अकबर, औरंगज़ेब और बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में तमाम जानकारियों पर बहस करते रहे। उन्हें महात्‍मा गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी में भी दिलचस्पी थी। उनका इतिहास ज्ञान अदभुत था और जिज्ञासा तो शांत ही नहीं होती थी। कई बार वे अनुत्तरित कर देते थे।

मज़ेदार बात ये रही कि बाद में हम सब अपनी-अपनी दुनिया में लौट आये और खो गए, पर गिरीश जी को ये बात याद रही। जब 1994-95 के दौरान दिल्ली में तुग़लक़ नाटक का मंचन हुआ, तो सम्मानजनक ढंग से वे हमें बुलाना न भूले।

आज हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे है जब इतिहास के तथ्य रोज तोड़े-मरोड़े जा रहे हैं और अप्रशिक्षित राजनीतिक हमें इतिहास पढ़ा रहे हैं। गिरीश, तुम्हारा होना नितांत आवश्यक था। तुम चले गए और हमें ये जिम्मेदारी दे गए कि हम इतिहास की मूल आत्मा को न मरने दें।

बड़ा गुरुतर भार देकर और अपनी पारी बेहतरीन और खूबसूरत खेलकर गए हो। इतिहास सदैव तुम्‍हें याद रखेगा।

श्रद्धांजलि…


बनारस में रहने वाले डॉ. आरिफ़ जाने-माने बुद्धिजीवी, इतिहासकार और शिक्षाविद् हैं

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