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अख़बारनामा: एचएएल का पक्ष न देकर सिर्फ़ सरकारी बोली बोल रहे हैं अख़बार ?

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संजय कुमार सिंह

आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के बारे में। 30,000 कर्मचारियों वाली यह कंपनी कई कारणों से चर्चा में है। आप जानते हैं कि कंपनी हाल तक मुनाफे में चल रही थी और पिछले दिनों खबर थी कि कंपनी के पास नकद नहीं हैं। तनख्वाह देने जैसी जरूरतों के लिए उसे करीब 1000 करोड़ रुपए उधार लेने पड़े हैं। रफाल विमान बनाने का ठेका सरकारी कंपनी की जगह निजी कंपनी को दिया जाना साधारण नहीं है और इस पर बिना मांगे सरकारी स्पष्टीकरण होना चाहिए था लेकिन मांगने पर भी संतोषजनक जवाब नहीं है। उल्टे रक्षा मंत्री पर संसद में झूठ बोलने का आरोप लगा है। अब एक और तथ्य सामने आया है। उन्होंने राहुल गांधी पर एचएएल के लिए घड़ियाली आंसू बहाने और एचएएल नहीं जाने का आरोप लगाया है। तथ्य यह है कि रक्षा मंत्री खुद भी नहीं गईं एचएएल का हाल पूछने।

सरकारी कंपनी सरकार के खिलाफ खुलकर अपनी बातें नहीं रख सकती है। फिर भी कंपनी का पक्ष आ रहा है और उससे लगता है कि सरकार और सरकार की तरफ से जो कहा जा रहा है वह सही नहीं है और यह कंपनी के ट्वीटर हैंडल पर जो कहा गया है उससे भी साफ है। ऐसे में मीडिया का काम था कि वह कंपनी को अपनी बात रखने का एक मंच मुहैया कराता और अमूमन सूत्रों के हवाले से खबर देने वाले लोग इस सरकारी कंपनी और 30,000 लोगों की नौकरी के बारे में कुछ बताते ताकि उनके परिवार के लोग भी निश्चित रह सकते। रोज के आरोप-प्रत्यारोप में उनकी स्थिति की कल्पना की जा सकती है। लेकिन मीडिया में आम तौर पर ऐसा नहीं है।

उल्टे, मीडिया में सरकार की तरफ से बोलने वाले नहीं जानते कि ‘कैश इन हैन्ड’ जैसे टर्म का मतलब ‘हाथ में नकद’ नहीं होता है और जब 1000 करोड़ रुपए की बात हो रही हो तो इतने पैसे वैसे भी किसी के हाथ में रखे ही नहीं जा सकते हैं। 1000 का नोट बंद करके 2000 का लाने पर भी!! कल सोशल मीडिया पर एचएएल से संबंधित एक टेलीविजन चर्चा का क्लिप मिला। इसमें पूर्व मंत्री और भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन ने जो कहा उसपर एंकर को भी यकीन नहीं हुआ। उसने कहा, हम गंभीर चर्चा कर रहे हैं और शाहनवाज कहते हैं कि हां, कैश इन हैंड का क्या मतलब होगा। कैशलेस इकनोमी में कैश की क्या जरूरत। हर कोई हर चीज जाने यह बिल्कुल जरूरी नहीं है पर जो इशारा करने पर भी आत्मविश्वास से बजबजाता रहे उसे टेलीविजन वाले चर्चा के लिए क्यों बुलाते हैं, वही जानें।

ऐसी हालत में एचएएल की स्थिति के बारे में आम लोग कैसे जानेंगे? इसलिए नहीं कि रफाल सौदे में घोटाला हुआ है। इसलिए कि एक सरकारी कंपनी पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो हजारों लोगों की नौकरी जा सकती है और जब नौकरी की वैसे कमी है तो सरकार हमें आरक्षण देकर बहलाने की कोशिश कर रही है। नौकरियां खत्म होने की स्थिति को सुधारने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मीडिया को यह लग सकता है कि रफाल पर राहुल और रक्षा मंत्री की भिड़ंत बेकार है या उन्हें रक्षा मंत्री का साथ देना है पर यह भी तो समझना चाहिए कि एचएएल से हजारों लोगों की रोजी रोटी जुड़ी हुई है। और उनसे जुड़े लाखों लोग स्थिति जानना चाहते होंगे।

आइए, देखें रक्षा मंत्री कैसे रफाल मामले में अपनी सरकार और प्रधानमंत्री का बचाव कर रही हैं तथा इस मामले में झूठ का भी सहारा लिया है। इस बारे में मैं “राफेल पर राहुल के सवाल और रक्षामंत्री की खुन्नस” में सात जनवरी को विस्तार से लिख चुका हूं। “सीतारमण ने जो कहा (और अगर आपने वीडियो देखा हो तो मानेंगे कि) उसका मतलब यही था कि उनकी सरकार ने एचएएल का ख्याल रखा है और उसे एक लाख करोड़ रुपए के ऑर्डर दिलाए हैं। इससे नहीं लगता कि ये रूटीन के काम हैं या वैसे ऑर्डर हैं जिनपर काम चल रहा है। इसीलिए टाइम्स ऑफ इंडिया ने अगले दिन खबर छापी वरना वह खबर ही नहीं थी। राहुल ने उसी खबर के आधार पर सवाल उठाया है।”

निर्मला सीतारमण साधारण परिवार, अपने मेहनत के दम पर मंत्री बनने का हवाला देते हुए भी आम राजनीतिज्ञों की तरह आरोप लगा रही हैं कि दलाली नहीं मिलने के कारण यूपीए सरकार के दौरान राफेल सौदा नहीं हुआ। उनके अनुसार यूपीए और राजग सरकार के काम करने के तरीके में बुनियादी अंतर है। यूपीए सरकार में रक्षा सौदे दलाली के लिए किए जाते थे, वहीं हमारी (राजग) सरकार में देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरत के हिसाब से रक्षा सौदे किये जाते हैं। पर यह नहीं बताया गया है कि 126 विमानों से 36 पर क्यों आ गए और इसका सेना या रक्षा मंत्रालय ने विरोध किया कि नहीं। इसका जवाब हां या ना में मांगा गया है।

रक्षा मंत्री ने राहुल गांधी पर एचएएल के लिए घड़ियाली आंसू बहाने का आरोप लगाते हुए एक लाख करोड़ का ऑर्डर दिलाने की बात कही थी जो गलत निकली। यही नहीं, राहुल पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा था कि आपने कभी अमेठी में एचएएल का दौरा नहीं किया। जबकि बैंगलोर में घड़ि‍याली आंसू बहाने पहुंच गए। तथ्य यह है कि खुद रक्षा मंत्री भी कभी एचएएल में नहीं गईं। यह खबर आज अंग्रेजी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ में छपी है। अव्वल तो द टेलीग्राफ जैसी खबर सभी अखबारों में होनी चाहिए और ट्वीटर से लेकर वीडियो फोन के इस जमाने में यह काम ना मुश्किल है ना खर्चीला फिर भी नहीं होता है।

टेलीग्राफ की खबर के संबंधित अंश का हिन्दी अनुवाद पेश है। “एचएएल को इधर कुछ समय से एक और शिकायत है। एक अधिकारी ने कहा, हमारी रक्षा मंत्री एक बार भी एचएएल की किसी भी इकाई में नहीं आई हैं। बैंगलोर यात्रा के समय वे अक्सर हमारे हवाई अड्डे का उपयोग करती हैं। इसके बावजूद एलसीए हैंगर देखने के लिए वे एचएएल कांपलेक्स में ही घूमने का समय नहीं निकाल पाईं। अरुण जेटली के पास रक्षा मंत्री का अतिरिक्त प्रभार था तो वे दो बार हमारे कांपलेक्स में आए थे। मनोहर परिकर रक्षा मंत्री थे तो कई बार आए। कंपनी के मुख्यालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, सरकार को ज्यादा समय लेने वाली डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया का भी ख्याल रखना चाहिए।

एचएएल को आर्थिक मुश्किलों से निकालने के लिए रफाल आदर्श ठेका होता। पर अब तो वह बीती हुई बात है इसलिए हम चाहते हैं कि कम से कम एलसीए ऑर्डर जितनी जल्दी संभव हो, मिलें। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्रालय के हैंडल से ट्वीट की गई 26570 करोड़ की राशि का ठेका बमुश्किल मददगार होगा। कुछ हिस्सों के चलते रहने के लिए यह जरूर पर्याप्त अच्छा है पर जिन्दा रहने के लिए हमें एलसीए (लाइट कौमबैट एयरक्राफ्ट) का ऑर्डर चाहिए।” यह तथ्य है कि एचएएल पहली बार पैसों की कमी से जूझ रहा है। अप्रैल से कंपनी के काम में ठहराव आ गया है और उसके पास नई खरीद करने और यहां तक कि विक्रेताओं को भुगतान करने के लिए पैसे नहीं हैं। एचएएल के सीएमडी आर माधवन ने कहा है, 31 मार्च तक हम 6,000 करोड़ रुपए के घाटे में चले जाएंगे और यह हमें अस्थिर कर देगा। भारतीय वायुसेना पर एचएएल का करोड़ों रुपया बकाया है। वायुसेना ने कंपनी को सितंबर 2017 से अभी तक भुगतान नहीं किया है। वायुसेना पर अक्तूबर तक की बकाया राशि 10,000 करोड़ रुपये थी। 31 दिसंबर तक यह राशि बढ़कर 15,700 करोड़ रुपये हो चुकी है।

जहां तक आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण का सवाल है, सरकार ने संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया और देर रात इसे मंजूरी दे दी गई। आज इसे राज्यसभा में पेश किया जाएगा और केंद्र को उम्मीद है कि यह राज्यसभा में भी पास हो जाएगा क्योंकि कई विपक्षी दल जब सत्ता में रहे हैं तो ऐसे आरक्षण का प्रयोग किया है और अब इसका विरोध करना मुश्किल पाएंगे। टेलीग्राफ ने आज इससे संबंधित एक खबर छापी है, “बिल जिसका विरोध विपक्ष नहीं कर सकता”। हालांकि, मौजूदा सरकार ने इस जिस जल्दबाजी में पेश किया है उससे साफ है कि यह चुनावी शगूफा है और जब नौकरियां ही नहीं हैं तो इसका कोई खास मतलब नहीं है। फिर भी आज और शायद कल के भी अखबारों में इसे ही लीड होना है। इसलिए, मैं इस खबर की संक्षिप्त चर्चा ही करूंगा।

सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी की प्रेस कांफ्रेंस के हवाले से आज द टेलीग्राफ ने लिखा है कि यह मंडल के जमाने का प्रस्ताव है पर जो विधेयक पेश किया गया है उसमें काफी विरोधाभास है। हम कम से कम 18,000 रुपए प्रति माह न्यूनतम वेतन किए जाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और सरकार आठ लाख प्रतिमाह से कम कमाने वाले को आर्थिक रूप से गरीब मान रही है। क्या इस आरक्षण से वास्तव में उन्हें लाभ होगा जो वाकई वंचित हैं। येचुरी ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 2003 में ऐसी ही चाल चली थी। यह पूछने पर कि क्या माकपा इस विधेयक के पक्ष में मतदान करेगी? येचुरी ने कहा कि इस संबंध में रणनीति दूसरे विपक्षी दलों से पूछकर तय की जाएगी । विपक्षी दलों ने कहा कि अधिकतम वे यही कर सकते हैं कि इसे सदन की अगली बैठक तक टाल दें और सरकार को यह आरोप लगाने दें कि विपक्ष गरीबों के पक्ष में कार्रवाई नहीं करने दे रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनसत्ता में रहते हुए लंबे समय तक सबकी ख़बर लेते रहे और सबको ख़बर देते रहे। )

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