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हताशा इस बात की है कि EPW का बोर्ड मेंबर भी ‘हमरे-आपके जैसा मुंह-कान वाला’ है!

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जितेन्द्र कुमार

पता नहीं पिछले तीन चार दिनों से बचपन की यह कहानी मुझे बार-बार क्यों याद आ रही है। वाकया यह है कि एक बहुत ‘बड़ा आदमी’ हमारे गांव आने वाला था। उनके आने की चर्चा आसपास के गांवों में काफी दिनों से थी। इसलिए जब वो पधारे तो उनको देखने वालों की भीड़ सैकड़ों में नहीं हजारों में थी। देखने सुनने के बाद जब लोग लौटे तो उस बड़े आदमी के बारे में मेरे पिताजी उस व्यक्ति से पूछ रहे थे जिन्हें देखने के लिए उसने अपनी दिहाड़ी छोड़ दी थी। पिताजी ने उनसे पूछा, “तो कैसा लगा उनको देखकर?” उनका जवाब था- “हां, ठीके था।” पिताजी का प्रतिप्रश्न- “मतलब?” “मतलब कि वो ठीके थे।” “अरे भाई, वो लगा कैसा?” “अरे और का बताएं… मतलब कुछ खास नहीं थे।” “क्यों?” “अब का बताएं, मतलब हमरे-आपके जैसा ही मुंह-कान था जी!”

हां, बातचीत मैथिली में हो रही थी, लेकिन बातें बिल्कुल वही थीं जो मैंने लिखी है।

पिछले कई दिनों से इकनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली (ईपीडब्लू) को लेकर जो भी बातें सामने आ रही हैं, वे निराशाजनक से ज्यादा दुखदायी हैं और हताशा पैदा करती है। खबर आई कि ईपीडब्लू बोर्ड ने अपने निवर्तमान संपादक परंजय गुहा ठकुरता से तीन बातें कहीं- 1. अब से आप अपने नाम से नहीं लिखेगें, 2.  हम सहसंपादक नियुक्त करेंगे और 3. हमारे और आपके (मतलब बोर्ड और एडिटर) बीच व्यवहार का एक लिखित मानदंड तैयार किया जाएगा!

इसकी शुरूआत कहां से हुई? परंजय गुहा ठकुरता को पिछले साल राममनोहर रेड्डी के हटने के बाद संपादक नियुक्त किया गया था। परंजय पिछले सवा साल से ईपीडब्लू की प्रतिष्ठा और गुणवत्ता के मुताबिक इसे निकाल रहे थे। पढ़ने वालों की बीच प्रतिष्ठा बनी हुई थी। परंजय ने इस बीच पत्रिका में देश के दो बड़े और वर्तमान में सबसे ताकतवर घरानों, अंबानी और अडानी के खिलाफ लेख प्रकाशित किया, जिसे द वायर ने भी छापा। अडानी ने इस लेख को हटाने के लिए ईपीडब्लू को लीगल नोटिस भेजा कि अगर इस लेख को नहीं हटाया जाता है तो हम आपके खिलाफ मानहानि का मुकदमा करेंगे। इस पर परंजय गुहा ठकुरता ने यह कहते हुए जवाबी नोटिस भेज दिया कि हम अपने कहे एक-एक शब्द पर अडिग हैं, इन शब्दों के लिखे जाने का हमारे पास पुख्ता सबूत हैं, आप हमारे खिलाफ मुकदमा कर सकते हैं, हम कोर्ट में आपका सामना करने को तैयार हैं!

हां, तकनीकी तौर पर एक गलती परंजय ने जरूर कीः उन्होंने बोर्ड को बताए बगैर अडानी के नोटिस का बोर्ड के नाम से जवाब भेज दिया। जब बोर्ड ने उनसे मीटिंग में पूछा तो परंजय ने इस बात के लिए माफी मांग ली। अब कायदे से होना तो यह चाहिए था कि बोर्ड उनसे पूछता कि आपने जो लिखा है उसका सारा सबूत है या नहीं और क्या आपने तथ्यों को दोबारा जांच लिया था न लेख छापने से पहले? (हालांकि अगर मैं बोर्ड में होता तो अपनी तरफ से कोशिश करता कि यह सवाल उनसे न पूछा जाए-क्योंकि मैं जानता हूं कि परंजय जैसे प्रोफेशनल पत्रकार बिना जांचे-परखे आज, प्रधानसेवक जी के राज में यह गलती तो कतई नहीं करेगें)!

फिर भी, जवाबदेही ट्रस्टियों के सिर होने के नाते यह सवाल इतना गलत भी नहीं कहा जा सकता है। जब परंजय गुहा ठकुरता ने माफी मांग ली तब ट्रस्टियों को कहना चाहिए था कि देखो भाई ठकुरता, अगली बार से बिना बताए हमारे नाम से कोई भी नोटिस नहीं जाएगी क्योंकि हम लोगों के लिए थोड़ा सा एम्‍बरैसमेंट हो जाता है क्योंकि हमें पता नहीं होता है कि हमारे नाम पर आपने क्या नोटिस भेज दिया है किसी को? एनी वे, आपने बहुत अच्छा काम किया है, वेलडन! और हां, अगली बार से भी इस बात का और खयाल रखें कि ये लोग किसी भी स्तर तक जा सकते हैं इसलिए तथ्यात्मक रूप में कभी भी कोई गलती एकदम न हो।

ऐसा नहीं हुआ। उलटा उनके खिलाफ इतनी शर्तें रख दी गईं कि उन्हें इस्तीफा देकर निकल जाना पड़ा।  थोड़ा इस बात की कल्पना करें कि जब मीटिंग शुरू हुई होगी तो क्या-क्या हुआ होगा और कैसे बोर्ड की मीटिंग शुरू होने से पहले ही यह निर्णय ले लिया गया होगा कि परंजय गुहा ठकुरता को एक दिन के लिए भी अब नहीं रहने देना है!

बोर्ड में कौन-कौन लोग हैं इसके बारे में जान लें: 1. दीपक नायर (अध्यक्ष), 2. डी. एन घोष (मैनेजिंग ट्रस्टी), 3. आंद्रे बेते, 4. दीपक पारेख, 5. रोमिला थापर, 6. राजीव भार्गव, 7. दीपांकर गुप्ता और 8. श्याम मेनन। उपर्युक्त सभी नामों को देखें तो सब अपने-अपने क्षेत्र के महत्वपूर्ण व्यक्ति रहे हैं, लेकिन अडानी के एक नोटिस से मामले के इतने बिगड़ जाने का क्या अर्थ लगाया जा सकता है? अगर ठकुरता ने इतनी बड़ी गलती कर दी थी (जो लगता नहीं है) तो भले ही ठकुरता को हटाने का फैसला ले लेते, लेकिन अडानी के एक लीगल नोटिस की धमकी से आर्टिकिल हटा लेना पड़ा, यह बात किसी की समझ में नहीं आती है। आज भी दोनों लेख द वायर पर यथावत लगे हुए हैं। आखिर बोर्ड में कौन लोग थे जिन्होंने दूसरों पर दवाब डाला हो कि इन लोगों से ‘पंगा’ नहीं लेना चाहिए?

फेसबुक मित्र मुकेश असीम ने इस बात की तरफ ध्यान भी दिलाया है कि दो ट्रस्टी ऐसे हैं जिनका दो बड़े घरानों के साथ लगातार उठने-बैठने का रिश्ता रहा है। पहला डीएन घोष और दूसरे दीपक पारेख। दीपक पारेख वे सज्जन हैं जिन्होंने मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी के बीच मध्यस्‍थता की थी और डीएन घोष स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे हैं जिन्होंने पूंजीपतियों को बड़े नजदीक से देखा है। क्या बोर्ड के सदस्यगण उनके कई संस्मरण सुनकर विचलित नहीं हुए होंगे?

बात को और स्पष्ट करने के लिए कहूं तो क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि दीपक पारेख ने कहा हो, “भई, मैं अंबानियों को बहुत ही नजदीक से जानता हूं, जब वे अपने सगे भाई के नहीं हुए तो हमारा-आपका होगा? अगर कोर्ट में किसी तरह मामला फंस जाए तो एक लेख के लिए हमें अपना बुढ़ापा क्यों खराब करवाने के लिए फंसा रहे हो?”

और उनकी बात की सहमति में घोष बाबू भी यह कहते कूद पड़े कि यार मेरा अनुभव भी उन लोगों के प्रति ठीक नहीं है। मैंने कई प्रधानमंत्रियों को देखा है, बोलें कुछ भी लेकिन  उनके सामने धिग्‍घी बंध जाती है।

क्या आपको लगता है कि किसी में भी इतनी हिम्मत बची होगी कि वह कह सके कि नहीं यार, परंजय गुहा ठकुरता को एक वार्निंग देकर छोड़ दिया जाए क्योंकि सारे सबूत हैं उनके पास! आखिर कितने भी बड़े नाम हों, उम्र तो सबकी हो चली है और एकाध को छोड़कर ज्यादातर सत्तर पार कर चुके हैं!

समीक्षा ट्रस्ट में बुद्धिजीवियों ने मिलकर जिस तरह एक संपादक को हटाया वह भले ही पढ़े-लिखे और एकेडमिशियनों के लिए बहुत मायने नहीं रखता हो (क्योंकि वे उस पत्रिका को तो कभी भी कोट करेंगे-संपादक कौन हो इसका बहुत मतलब नहीं होगा) लेकिन देश के छोटे-मोटे पत्र-पत्रिकाओं के परेशानी का सबब बन गया है क्योंकि उन्हें लगेगा कि जब समीक्षा ट्रस्ट इन बड़े पूंजीपतियों का सामना नहीं कर सका तो हम किस लिहाज से इनसे लड़ पाएंगे?

कहने का मतलब यह है कि समस्‍या परंजय गुहा ठकुरता के इस्‍तीफ़े से उतनी नहीं है। हताशा इस बात की है कि ईपीडब्‍लू का बोर्ड मेंबर भी ‘हमरे-आपके जैसा मुंह-कान वाला’ है!


 

जितेन्‍द्र कुमार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं। दो दशक से ज्‍यादा लंबे पत्रकारीय करियर के दौरान कई पत्र-पत्रिकाओं में जिम्‍मेदार पदों पर रह चुके हैं।

 

 

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