Home अख़बार किसानों पर कोड़ा चलाते ‘मोदी की तस्वीर’ हिंदुस्तान अंग्रेज़ी में छपी, हिंदी...

किसानों पर कोड़ा चलाते ‘मोदी की तस्वीर’ हिंदुस्तान अंग्रेज़ी में छपी, हिंदी में नहीं !

SHARE

क़र्ज़माफ़ी की माँग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बैठे तमिलनाडु के किसानों ने अपनी रचनात्मकता के ज़रिये मीडिया को तवज्जो देने के लिए मजबूर कर दिया है। 18 अप्रैल को को उनमें से एक ने प्रधानमंत्री मोदी का रूप धरकर बाकी को कोड़ों से पीटने का अभिनय किया। यह केंद्र सरकार की संवेदनहीनता दर्शाने का एक तरीक़ा था और राजनीतिक रूप से शायद सबसे तीखी टिप्पणी।

20 अप्रैल को दिल्ली से निकलने वाले हिंदुस्तान टाइम्स में बॉटम ख़बर की तस्वीर यही प्रधानमंत्री के कोड़ा चलाने वाली थी। लेकिन इसी अख़बार के हिंदी संस्करण में इस तस्वीर का ज़िक्र ही नहीं। यह तो संभव नहीं कि संपादक शशि शेखर की मेज़ पर यह तस्वीर पहुँची ना हो,लेकिन इसे छापने की हिम्मत वे नहीं कर पाए। वैसे भी सारा ‘खेल’ हिंदी का है जिसे बोलने वालों के बीच मोदी को भगवान बनाने का प्रोजेक्ट ही पत्रकारिता का दूसरा नाम हो गया है।

हाँ, हिंदुस्तान ने पेज नंबर पाँच पर कुछ छोटी-तस्वीरों के साथ एक ख़बर लगाई गई थी जिसे पढ़कर लग रहा था कि 37 दिन बाद अख़बार को इस आंदोलन की ख़बर लेने का होश आया है। हिंदुस्तान हिंदी ने पहले पेज पर सोनू निगम के गंजे होने का बॉटम लगाया।

कहना मुश्किल है कि कोड़े मारते प्रधानमंत्री की यह तस्वीर छापने या दिखाने की हिम्मत कितने अख़बार कर पाए।

करीब हफ्ते भर पहले इन किसानों ने प्रधानमंत्री दफ़्तर के सामने नग्न प्रदर्शन किया था तब राष्ट्रीय कहे जाने वाले न्यूज़ चैनलों ने इस सनसनीखेज़ प्रतिवाद को दिखाया था।। इन किसानों को सनसनीखेज़ वीडियो रचने का हुनर मालूम है, इसलिए वे कभी चूहा खाते हैं, कभी नरमुंडों के साथ प्रदर्शन करते हैं और कभी सड़क के डामर पर चावल और साँभर सान कर खाते हैं। उन्हें पता है कि ऐसा ही कुछ करने से उनका मुद्दा ज़िंदा रहेगा, वरना जंतर-मंतर पर कितने आए और गए। जब महीने भर से ज़्यादा वक़्त से चल रहे प्रदर्शन पर प्रधानमंत्री ही नहीं पसीजे तो फिर चैनल क्यों पसीजेंगे।

बुधवार को उनकी थीम पागलपन थी। उन्होंने पागलों की तरह व्यवहार करते हुए प्रदर्शन किया। शायद एक-दो तस्वीरें फिर छप जाएँ, लेकिन क़र्ज और ख़दकुशी के चक्र में फँसे किसानों की समस्याओं का कोई रिश्ता इस देश की आर्थिक नीतियों से भी है, यह कोई चैनल या अख़बार ज़ोर देकर कहने के लिए तैयार नहीं है। एबीपी जैसे चैनल ने अपने एक संवाददाता को तमिलनाडु भी भेजा लेकिन वहाँ से यही बताया गया कि नदियों में पानी नहीं है और किसान क़र्ज़ अदा नहीं कर पा रहे हैं। आख़िर वह दुष्चक्र क्या है और कैसे रचा गया, उस पर बात करने का मतलब है कि दिल्लीश्वर को कठघरे में खड़ा करना।

वैसे तो यह मीडिया का सामान्य दायित्व था, लेकिन अब इसके लिए बड़े साहस की ज़रूरत है। मोदी का कोड़ा किसानों पर ही नहीं मीडिया पर भी चला है।

.बर्बरीक

यह भी पढ़ें-राजा नंगा है या किसान? गांधीजी कह गए हैं बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो!