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काश हिंदी में भी होता कोई टेलीग्राफ़ जो लिखता- ‘गले लगने से चूर हुआ 56 इंच का सीना!’

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संसद में कल पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव के दौरान हुई बहस को अख़बारों ने कैसे कवर किया, इसका विश्लेषण वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने किया है। कोलकाता से निकलने वाले टेलीग्राफ़ ने अपनी प्रस्तुति, हेडलाइन और विश्लेषण से बाज़ी मार ली है। यह अख़बार हाल के दिनों में निर्भीकता और अंतरदृष्टि के लिए अलग से पहचाना जा रहा है। एक ज़माने में कई अख़बार ऐसा करते थे, लेकिन अब यह अपवाद हो गया है। हिंदी का हाल तो बहुत ही बुरा है। संजय कुमार सिंह की टिप्पणी के नीचे वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन की भी टिप्पणी है जो हिंदी पत्रकारिता के इस गौरव के गह्वर में जाने की करुण कथा है- संपादक

 

ऐसे कितने दिन और किसलिए चलेंगे ये अखबार?

 

संजय कुमार सिंह

 

मैं कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ का फैन हूं। शुरू से। भाजपा सांसद एमजे अकबर इसके संस्थापक संपादक हैं और मैं स्थापना के समय से पढ़ रहा हूं। हो कांग्रेस होते हुए भाजपा में पहुंचे हैं। दिल्ली आने के बाद यह अखबार नहीं मिलता था पर जब भी मौका मिला पुरानी फाइलें भी पढ़ता रहा। इधर कुछ साल से नेट पर मिलने लगा है तो मैं और कुछ करूं या नहीं टेलीग्राफ जरूर पढ़ता हूं। अब नेट (डेस्क टॉप कंप्यूटर पर) पढ़ने की ऐसी आदत पड़ गई है कि क्या बताऊं। अक्सर लगता है कि काश, हिन्दी में कोई ऐसा अखबार होता। मैं अक्सर उसकी खबरें शेयर करता रहता हूं और आम दिन भी उसकी लीड की हेडिंग या पहला पन्ना देखने लायक होता है। यही नहीं, खबर लिखने का भी इसका अंदाज अलग ही है।

आज का इसका शीर्षक भी कमाल का है इसका हिन्दी किया जाए तो मोटे तौर पर इस तरह होगा, “गले लगने से 56 ईंची सीना चूर हो गया और प्रतिक्रिया गुस्से व घृणा की थी” तूफानी गले लगना (या पड़ना, सात कॉलम में) लीड का शीर्षक है। इसके नीचे तीसरी लाइन में लिखा है, वह भी कोष्ठक में, “और हां, सरकार 325-126 से जीत गई”। इसके मुकाबले हिन्दी के अखबारों का पहला पन्ना बहुत ही नीरस और थका हुआ लगता है। आइए देखें हिन्दी के कुछ अखबारों ने कल के अविश्वास प्रस्ताव को कैसा ट्रीटमेंट दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र में कल जैसा दिन कभी-कभी आता है और मीडिया ने इससे निपटने की खास तैयारी की होगी, करनी चाहिए। पर नतीजा क्या रहा?

 

 

हिन्दी अखबारों में दैनिक जागरण वैसे भी अलग ही रहता है। इसने तो सात कॉलम में नरेन्द्र मोदी के जवाब को ही शीर्षक बना दिया है। लीड के ऊपर पट्टी में एक शीर्षक है, सुमित्रा महाजन ने पढ़ाया संसदीय गरिमा का पाठ। इसकी खबर अंदर है। हालांकि, ईयर पैनल की जगह सुमित्रा महाजन की फोटो लगी है। जागरण की फ्लैग हेडिंग है, “औंधे मुंह गिरा विपक्ष का पहला अविश्वास प्रस्ताव, सरकार दो तिहाई बहुमत से जीती (इसमें दो तिहाई हाईलाइट किया हुआ है), कांग्रेस पर बरसे पीएम”।

शीर्षक है हम आपकी तरह सौदागर नहीं : मोदी। इसमें कहीं विपक्ष की कोई बात नहीं है। आंख मारने वाली एक और प्रधानमंत्री के गले लगने तथा उनसे बात करते राहुल की एक कुल तीन फोटो चार कॉलम में है और इसके नीचे एक खबर है, अति उत्साह में मर्यादा भूले राहुल गांधी और सिंगल कॉलम में आंख भी मारी। इसके नीचे चार कॉलम में ही एक खबर है राफेल पर गलतबयानी कर फंसे कांग्रेस अध्यक्ष। राहुल अतिउत्साह में थे ये अखबार को कैसे पता चला मैं नहीं जानता। संसद में उनकी इस कार्रवाई को बचकाना कहा गया था। यह तो मैंने सुना, पढ़ा औऱ देखा।

नया इंडिया का पहला पन्ना साफ सुथरा और कम माथा पच्ची करके बनाया हुआ लगता है। इसमें गले लगने वाली फोटो नहीं है। और प्रधानमंत्री के कथन, “अस्थिरता के लिए अविश्वास प्रस्ताव” को लीड बनाया गया है। राहुल के आरोपों को साथ ही बॉक्स में राहुल की फोटो के साथ लगाया गया है जबकि ‘ टीडीपी ने भाजपा को दिया श्राप शीर्षक से एक बॉक्स फोल्ड के ऊपर है। कुल मिलाकर संतुलित है पर श्रम और संसाधन की कमी साफ दिखती है। वह अलग समस्या और विषय है।

प्रभात खबर ने यह खबर सात कॉलम में छापी है। पर राहुल के आरोप नहीं हैं। प्रधानमंत्री के जवाब को प्रमुखता दी गई है। शीर्षक है, 199 मतो से गिरा अविश्वास प्रस्ताव, मोदी बोले चार साल काम के बूते खड़ा हूं और अड़ा भी हूं। राहुल के भाषण की खबर छोटे बॉक्स में है शीर्षक औऱ फोटो कैप्शन एक सा है पर शुरुआत इसी से होती है कि राहुल के व्यवहार ने सभी को आश्चर्य में डाल दिया।

हिन्दी अखबारों में राजस्थान पत्रिका का पेज मेहनत करके बनाया हुआ और संतुलित लगता है। “राहुल की गांधी गीरी, मोदी का विपक्ष के ‘विश्वास’ पर प्रहार” फ्लैग के साथ अविश्वास के बहाने चुनावी मंच बनी संसद सारी बातों को समेटने वाला शीर्षक है। नीचे तमाम प्रमुख बातें जो हुईं – का उल्लेख है। गले लगने की तीन तस्वीरें लीड के साथ हैं। सबसे दिलचस्प है राहुल की फोटो एक उंगली दिखाते हुए है तो मोदी की फोटो दोनों हाथों की एक-एक उंगली दिखाते हुए है।

दैनिक हिन्दुस्तान का पहला पेज सबसे कमजोर लगा। शीर्षक वही है जो सुबह ही लगाकर अखबार छापा जा सकता था। शिवसेना के बिना सरकार ने भरोसा जीता – की बैनर हेडिंग के बाद विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव खारिज – दोहराव है। दोनों ओर से खूब चले सियासी तीर और मोदी बोले अहंकार में लाए प्रस्ताव – खबर के नाम पर पाठकों को कूड़ा परोसने के अलावा कुछ नहीं है। विशेष संवावदाता की लीड खबर पर मैं टिप्पणी नहीं कर रहा पर डेस्क का काम बहुत कमजोर दिख रहा है। शाकाहारी किस्म का मामला है – किसी को कोई शिकायत नहीं, कुछ खास नहीं और बिल्कुल बेकार भी नहीं।

दैनिक भास्कर ने, “गले पड़ा अविश्वास” शीर्षक लगाया है। यह कुछ नया अनूठा करने की कोशिश है। पर किसके गले पड़ा यह अखबार और पाठक की राय में अलग हो सकता है। गले लगने वाली फोटो के ऊपर लिखा है 52 मिनट बोले राहुल। आप मुझसे नफरत करें, मुझे पप्पू कहें पर मेरे अंदर आपके लिए नफरत नहीं है। इसके साथ ही दो कॉलम में (गले लगने पर) मोदी का जवाब शीर्षक है – वोटिंग से पहले मेरी कुर्सी तक पहुंचने का उत्साह है। पर यहां तो जनता पहुंचाती है। इसके नीचे एक कॉलम में राहुल के आरोप और दूसरे में मोदी के जवाब हैं।

अमर उजाला ने राम विलास पासवान के बयान को प्रमुखता दी है कि एससी-एसटी ऐक्ट पर कोर्ट का फैसला उल्टा आया तो लाएंगे अध्यादेश। यह खबर अंदर के पेज पर है। लेकिन मुख्य खबर का शीर्षक बहुत ही रूटीन 199 वोटों से गिरा अविश्वास प्रस्ताव। राहुल बनाम मोदी में बदली चर्चा – कांग्रेस अध्यक्ष ने लगाए सीधे आरोप तो प्रधानमंत्री ने कहा प्रस्ताव से देश में अस्थिरता फैलाने की साजिश। गले लगने वाली फोटो का शीर्षक है, इस झप्पी ने सबको चौंकाया …. प्रस्ताव से ज्यादा इसी के चर्चे। इसके साथ लोकसभा अध्यक्ष का बयान भी है, अध्यक्ष खफा, बोलीं ड्रामा देख मैं भी हैरान।

कुल मिलाकर हिन्दी अखबारों में धार या पैनापन नहीं है। जहां चाटुकारिता नहीं है वहां भी नयापन नहीं है। जबकि टेलीग्राफ ने लीड के साथ पहले पेज पर डायपर में एक बच्चे की तस्वीर है और उसके साथ लिखा है, “भाजपा, रोने वाले बच्चे मत बनो बल्कि दुलारने लायक बच्चा बनो।” इसके नीचे कैप्शन है, अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी के गले लगने से अप्रभावी लगे तो भाजपा ने मंत्री अनंत कुमार को सद्भावना और शांति के सदाबहार कार्य को “बचाकाना” कहने के लिए लगाया। अपने जवाब में मोदी ने राहुल के इस कृत्य को बचकानी हरकत कहा। अखबार ने लिखा है कि गले लगने के उस्ताद के शिकार देखने के लिए पेज चार देखें और पेज चार पर कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों से गले लगते प्रधानमंत्री की तस्वीर है।

मेरा मानना है कि राहुल का संसद में गले लगना बिल्कुल अलग किस्म का मामला था। अखबार इसपर अपनी राय क्यों न दें? और न दें तो अखबार में नया क्या है? ऐसे कितने दिन चलेंगे ये अखबार?

इस मसले पर वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने भी एक दिलचस्प टिप्पणी की है। यह टिप्पणी जनसत्ता को लेकर है। पढ़िए–  

जनसत्ता ने चाटुकार पत्रकारिता के जिस मुकाम को आज हासिल किया है वो गैर मामूली है. दैनिक जागरण को यहां पहुँचने में बहुत वक़्त लगा लेकिन जनसत्ता के मौजूदा संपादक मुकेश भारद्वाज ने जिस तेजी से चाटुकार पत्रकारिता में झंडे गाड़े हैं कम लोग कर पाते हैं. उनके आज के दिल्ली संस्कारण के बैनर हेडलाइन “देश का विश्वास, मोदी के साथ” उनकी इस चमत्कारिक प्रतिभा की गवाही दे रही है. वो तो भला हुआ कि ओम थानवी रिटायर हो गये वर्ना पत्रकारिता का ये नायाब रत्न कहाँ से मिलता हमे. आज की हेडलाइन देख कर तो मैं इनका फैन हो गया. केवल पाँच रुपए में झोला भर चाटुकार पत्रकारिता कहाँ मिलेगी इस महंगाई के जमाने में. तुस्सी ग्रेट हो मुकेश भारद्वाज.

बाकी अखबारों ने भी अपनी अपनी पत्रकारिता की है – टेलीग्राफ हमेशा की तरह सबसे अलग रहा.

 



 

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