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विनोद शुक्ल की ‘कट्टा’ पत्रकारिता से प्रभाष जोशी की ‘सत्ता’ पत्रकारिता तक !

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हम अपने लिये कब लड़ेंगे साथी ?

 

भाऊ कहिन-23

यह तस्वीर भाऊ की है…भाऊ यानी राघवेंद्र दुबे। वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे को लखनऊ,गोरखपुर, दिल्ली से लेकर कोलकाता तक इसी नाम से जाना जाता है। भाऊ ने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया है और कई संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अनुभवों ख़ज़ाना है जिसे अपने मशहूर बेबाक अंदाज़ और सम्मोहित करने वाली भाषा के ज़रिए, जब वे सामने लाते हैं तो वाक़ई इतिहास का पहला ड्राफ़्ट नज़र आता है। पाठकों को याद होगा कि क़रीब छह महीने पहले मीडिया विजिल में ‘भाऊ कहिन‘ की पाँच कड़ियों वाली शृंखला छपी थी जिससे हम बाबरी मस्जिद तोड़े जाते वक़्त हिंदी अख़बारों की भूमिका के कई शर्मनाक पहलुओं से वाक़िफ़ हो सके थे। भाऊ ने इधर फिर से अपने अनुभवों की पोटली खोली है और हमें हिंदी पत्रकारिता की एक ऐसी पतनकथा से रूबरू कराया है जिसमें रिपोर्टर को अपना कुत्ता समझने वाले, अपराधियों को संपादकीय प्रभारी बनाने वाले और नाम के साथ अपनी जाति ना लिखने के बावजूद जातिवाद का नंगानाच करने वाले संपादकों का चेहरा झिलमिलाता है। ये वही हैं जिन्होंने 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की नियुक्ति पर पाबंदी लगवा दी है ताकि भूल से भी कोई ऐसा ना आ सके जिसके सामने उनकी चमक फ़ीकी पड़ जाए ! ‘मीडिया विजिल’ इन फ़ेसबुक संस्मरणों को ‘भाऊ कहिन’ के उसी सिलसिले से जोड़कर पेश कर रहा है जो पाँच कड़ियों के बाद स्थगित हो गया था-संपादक

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अगस्त 11 से दिल्ली हूं । मेरे दोस्तों को पता है , हर महीने की यह दिल्ली यात्रा क्यों होती है । (भाऊ की पत्नी बीमार हैं- संपादक) इस बार तो मुझे भी पीठ दर्द की खासी परेशानी कई दिन झेल लेनी पड़ी । इसलिए पोस्ट डालने का क्रम थोड़ा बाधित हुआ । अब फिर शुरू हो गया ।

मीडिया खासकर हिंदी अखबारों ( ‘ हिंदी का ‘ या ‘ हिंदी में ‘ जैसी बहस नहीं उठाना चाहता ) और पत्रकारिता की पतन गाथा लिखते हुये , अतीत में दाखिल तो होना ही होता है । स्मृतियों की उंगली पकड़े , संघर्षशील और बेहतर इंसान , अपने तमाम मित्रों का स्वघोषित प्रतिनिधि बन कर ।

तब मौजूदा परिदृश्य आत्मवंचक आस्था और यथार्थजीवियों के बीच सीधे मुकाबले का कुरुक्षेत्र लगने लगता है । गुरुग्राम ( गुड़गांव ) में ही रुकता हूं , इसलिये महाभारत के प्रतीक कहीं न कहीं से आ ही जाते हैं । पॉलिटिकल एक्टिविज्म और 6 – 7 साल की चल निकली वकालत छोड़ कर पत्रकारिता में आने के बहुत पहले से मैंने भी जाने क्या – क्या धारणा बना ली थी ।

तब जैसा कि लोग मानते भी थे , मुझे भी लगता था कि फौरी साहित्य होने के नाते पत्रकारिता भी तत्कालीन समाज , मानवीय व्यवस्था , राजसत्ता , शक्ति संरचना की पीठों और हाशियाकृत समूहों की स्थिति का गहराई से लेखे – जोखे का जरिया या वातायन है । तय है मैं ज्यादा ही रूमानी , सपनीला बेवकूफ था ।

तीव्रतर नव उदारीकरण के इस दौर में कारपोरेट चालित पत्रकारिता तो चमक, सनसनी , लंपटपन , मिथ्या गौरव और आघात करने वाली सजावट के नये मिथ गढ़ने में लगी है । जो वस्तुजगत या आत्मसत्ता के विभाजन से पैदा तथ्यों को दरी के नीचे खिसका देने की कोशिश है ।

साफ कर दूं कि इन सन्दर्भों में मैं जब दो से तीन दशक पीछे की पड़ताल करने बैठा हूं तो कोई नाम मेरे लिये महान और पवित्र नहीं है । गलतियां या पाप सबके लिखे जाएंगे ।

पत्रकारिता के मौजूदा परिदृश्य और बस दो से तीन दशक के उसके सद्य: अतीत पर लिखना मेरे लिये अपने सपनों को ढूढ़ने की यायावरी है । मैं अंधेरे में गर्क कुछ यादों को केवल उकेरने की ही नहीं , बल्कि खुद में बौराई स्मृतियों को उलीचने की कोशिश में हूं । यह कुछ उजड़ जाने की आह भी नहीं है , अपने भीतर का उजाड़ भरने की कोशिश है ।

 

 

पत्रकारिता के उपकरण थे रॉड, हॉकी और कट्टा !

 

हां , अब एक ख्वाब मेरा फैसला है । पूर्व प्रधानमंत्री

स्व. चंद्रशेखर जब कभी मिले , तो इसी तरह । वे ट्रेंड सेटर राजनीतिज्ञ थे , वैचारिक से लेकर लोगों की जीवनशैली तक में ।
( उनपर लिख चुका हूं )
जब चन्द्रशेखर जी की याद आती है , गौरी शंकर सिंह उर्फ गौरी भैया की भी याद आ जानी स्वाभाविक है । गौरी भैया 1977 से 2000 तक विधायक रहे । एक संजीदा राजनीतिक और चन्द्रशेखर जी के अनन्य सहयोगी । चन्द्रशेखर जी के पॉलिटिकल और चुनाव मैनेजर भी ।
रॉयल होटल ( विधायक निवास , लखनऊ ) के एक नम्बर फ्लैट में उनकी चौपाल , कचहरी या बैठक , राजनीतिक और पत्रकारीय दशा – दिशा का कंपास ( दिशासूचक यंत्र ) था । 20 – 25 लोगों के भोजन और कुछ के सुरासिक्त होने का यहां स्थायी इंतजाम था ।
गौरी भैया की ख्याति गाढ़े वक्त के दोस्त और भरपूर आतिथ्य सत्कार करने वाले शानदार आदमी की थी । यशवंत सिंह , राजबहादुर सिंह , रामकरन सिंह , अरविंद सिंह , रघुनन्दन सिंह काका , एम . ए . लारी आदि यहां बराबर जमे रहने वालों में से थे ।
पत्रकारों में डॉ. सदाशिव द्विवेदी , जयप्रकाश शाही , विनोद शुक्ल और उनके दो हिंच मैन , मसल मैन यहां तकरीबन रोज के थे ।
एक बार यहीं विनोद शुक्ल की रॉयल होटल के तत्कालीन व्यवस्थाधिकारी के बेटे से मारपीट हो गयी ।
विनोद शुक्ल के लिये यह अक्सर की बात थी । जो लखनऊ में रहते हुए ( अखबार में ) मैने कई बार
देखी है । ऐसी सूरत में तुरंत अखबार के दफ्तर संदेश भेजा जाता था और विनोद भैया के लोग रॉड , हॉकी लिये एकदम फिल्मी स्टाइल में घटना स्थल पर एक खास जीप ( जो अब चलन से बाहर हो गयी ) पर लद कर पहुंच जाते थे ।
रॉयल होटल के व्यवस्थाधिकारी के बेटे ने विनोद शुक्ल के कपडे फाड़ डाले । दरअसल दोनों के हाथ में एक दूसरे की नुची – चुथी कमीज लहरा रही थी , वे एक दूसरे को गालियों से छेद रहे थे । दोनों के हाथ – लात भी खूब चले ।
गौरी भैया दौड़े आये । उन्होंने डांट कर दोनों को अलग किया । विनोद शुक्ल ने किसी को तुरंत वहां संदेश देने भेजना चाहा , जिनके नाम से एक जमाने में किसी को सांप तो सूंघ ही जाता था ।
गौरी भैया ने समझाया — … केहू के बोलावा मत । एहिजा केहू ना आई । गलती दूनों जने के बा । चला कुर्ता दे तानी , पहिन ला ।
एक हादसा हुसेनगंज बार का है । विनोद शुक्ल अपने एक आइएएस मित्र के साथ यहां दारू पीने गये । उनके साथ उनका मसल मैन कन्हैया ( बदला हुआ नाम ) भी था । वहीं एक आदमी बगल वाली मेज पर रिवाल्वर , और कुछ टूटे पैसे रुपये रख कर दारू पी रहा था ।
विनोद शुक्ल डॉन यह देख भड़क गये । उन्होंने खास ढंग से सिर झटक कर कहा — भो… गुंडा बनता है … माद…..।
उसने सुना और उछल कर रिवाल्वर की नली शुक्ल जी के मुंह में डाल दी । खैर कन्हैया ने मौका ताड़ कर उसके हाथ पर मारा । रिवाल्वर नीचे गिर गया । फिर इन लोगों ने उसे मारा और वहां से भाग आये ।
एक बार प्रेस क्लब में डॉन शुक्ल का झगड़ा एक तेवर वाले पत्रकार से हो गया
वह बोतल फोड़ कर उनकी ओर बढ़ा ।
पत्रकारिता की दशा – दिशा तय और कंटेंट रिडिफाइन कर रहीं थीं गालियां । उसके उपकरण थे मारपीट के लिए रॉड , हॉकी और कट्टा ।

खास बात यह कि आज भी कुछ संपादकों के आदर्श विनोद शुक्ल ही हैं ।
 

 

प्रभाष जोशी, गोयनका के हनुमान थे !

 

 

पहले ही लिख चुका हूं —

पत्रकारिता की पतन गाथा लिखते हुए , जब  दो – तीन दशक पीछे की छान – बीन कर रहा हूं , कोई मेरे लिये पवित्र और महान नहीं है । सबके पाप लिखे जायेंगे ।

एक संदर्भ में इसी शृंखला में मैंने पहले लिखा है —
‘ … जनसत्ता दरअसल उसके मालिक रामनाथ गोयनका के बहुत सधे राजनीतिक नजरिये का ही प्रतिबिंबन था। उनके साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नानाजी देशमुख थे तो युवा तुर्क चन्द्रशेखर भी ।
जनसत्ता दरअसल एक प्रोजेक्ट था और प्रभाष जोशी जी उसी मुहिम के संपादक ।
कभी – कभी लगता है जिस तरह लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति , एक खास काट की राजनीति और एक खास खेमे के लिये अचूक अवसर होकर खलास हुई , जनसत्ता के साथ भी ऐसा ही हुआ । हो सकता है प्रभाष जोशी जी इसके निमित्त बने हों …।’

अभी – अभी राजीव मित्तल की पोस्ट देखी । उनके फेसबुक भीत पर । किसी ने मैसेज किया था । उन्हें साभार कोट कर रहा हूं ।
राजीव मित्तल जी लिखते हैं —
‘ …. रामनाथ गोयनका ने जनसत्ता , प्रभाष जोशी को इसलिये नहीं सौंपा था कि वो हिंदी पत्रकारिता की भलाई करें , या सारी गंदगी साफ कर दें । बल्कि बहुत छोटे-छोटे स्वार्थ इस खेल के पीछे जुड़े थे ।
इंदिरा गांधी के रहते गोयनका जी अपनी मनमर्जी या पत्रकारिता के जरिये अपनी चाणक्यगिरी नहीं चला पा रहे थे , या वो फायदे नहीं उठा पा रहे थे , जो एक उद्योगपति के धंधों को मिलने चाहिये ।
इंदिरा गांधी की मौत और राजीव गांधी के नये नवेलेपन ने वो मौका गोयनका को दे दिया था । अगर राजीव की जगह संजय गांधी आये होते तो , या तो गोयनका जेल में पड़े सड़ रहे होते या संजय के चरणों में पड़े होते । …..
जहां तक प्रभाष जोशी का सवाल है , वो कुल मिलाकर अपने राम के हनुमान थे । इससे ज्यादा की उनकी हैसियत नहीं थी ।
पत्रकारिता को वास्तव में पूरी ईमानदारी से अगर किसी ने जिया तो वो आखिरी शख्स राजेंद्र माथुर थे । प्रभाष जोशी तो गोयनका के चाकर थे । किसी मंत्री को गाली दिलवाना हो , अपने काम करवाने हो , प्रभाष जोशी का गोयनका इस्तेमाल करते थे ।…’

अगली किस्तों में कहीं प्रभाष जोशी जी की राज्यसभा जाने की तड़प ( जो पूरी न हो सकी ), उनके कारसेवक और रामभक्त पत्रकार जो ऋतु हैं और उनके बारे में भी जिनपर उनकी कृपा बरसती रही ।
 

प्रभाष जोशी साधने लगे थे सत्ता की राजनीति !

 

 

जनसत्ता का प्रकाशन 1983 में शुरू हुआ । 1995 में संपादक पद से रिटायर होने के बाद भी , एक दशक से ज्यादा तक , आदरणीय स्व. प्रभाष जोशी जी इस दैनिक के संपादकीय सलाहकार थे ।
वह लोकनायक जयप्रकाश नारायण की ‘ सम्पूर्ण क्रांति ‘ आंदोलन की गतिविधियों में भी सक्रिय रहे । तब गोयनका जी के सहयोग से ‘ सम्पूर्ण क्रांति ‘ के समर्थन में अंग्रेजी की ‘ एवरी मेंस ‘ और हिंदी में ‘ प्रजानीती ‘ दो पत्रिकाएं भी निकल रहीं थीं । प्रभाष जोशी जी इससे भी जुड़े । इससे पहले भी खासकर 80 के दशक और उसके बाद तक कई यशस्वी पत्रकार , वाम , समाजवादी या मध्य वाम आंदोलनों से ही अखबारों / पत्रकारिता में आये । इसीलिए वे जीवन सन्दर्भों से समृद्ध थे । उन्होंने समाज की अंतर्यात्रा की थी ।
लेकिन एक बड़े आंदोलन के बड़े मकसद में नहीं , सत्तागत बदलाव के तात्कालिक नतीजे में सब के सब खप नहीं गये । हो सकता है इससे कुछ को आपत्ति हो लेकिन सच यही है कि प्रभाष जोशी जी की पत्रकारिता बाद के दिनों में सत्ता की राजनीति से संचालित होने लगी थी । या वही सत्ता की राजनीति साधने में लग गये ।
इसीलिए ‘ प्रभाष परम्परा ‘ से कौन लोग हैं और क्या रही उनकी जीवन यात्रा , यह भी देखा जाना चाहिये ।
इस परंपरा में वे लोग भी हैं जो मालिक का कोई काम हो जाने पर किसी कुख्यात माफिया के यहां मिठाई का डिब्बा लेकर पहुंचते रहे ।
वे भी जो रामभक्त ऋतु हैं । शिशिर के बाद आता है हेमंत । जिनके पास अकूत पैसा है ।  मुझे तो कभी के हम सब के आवेश , स्व. जयप्रकाश शाही की याद आ रही है जो जनसत्ता में रहते हुये , लखनऊ से मुंबई स्थानांतरित कर दिये गये । शातिर कुशलता से उनकी जगह खाली करने के तर्क गढ़े गये। बनारस में जनसत्ता से बतौर स्ट्रिंगर ( आजकल इसे कुछ अखबारों में संवाद सूत्र कहा जाता है ) जुड़े , एक शख्स को राज्य मुख्यालय, लखनऊ लाने के लिये । लखनऊ के दिनों से वह मेरे लगभग मित्र से रहे , हो सकता है यह एकतरफा हो । हो सकता है मेरी गलतफ़हमी भी हो ।
शाही जी , प्रभाष जोशी से पूछना चाहते थे — कारण कौन नाथ मोहिं मारा ..।
उन्होंने अपने अनन्य मित्र रामेश्वर पांडेय ‘ काका ‘ से भी कई बार पूछा — आखिर गलती मेरी क्या थी ? तब उदास शाही जी के साथ काका ही थे । एक साथ के पढ़े । वह सारे कार्य व्यापार सघन और व्यापक ढंग से शुरू हो चुके थे , जिसके लिए राकेश कोहरवाल को हटाया गया । गलती उनकी थी भी तो बहुत मामूली । वह तत्कालीन मुख्यमंत्री देवीलाल के साथ दफ्तर से बिना इजाजत, यात्रा पर निकल गये थे । लेकिन हेमंत पर शिशिर की आर्द्र कृपा बनी रही ।
 

प्रभाष जोशी ने कहा-सबसे बेहतर राजनेता ब्राह्मण !

 

 

प्रभाष जोशी जी से रविवार raviwar.com के लिए कभी की , आलोक प्रकाश पुतुल की बातचीत पढ़ रहा था ।

जरा देखें प्रभाष जोशी जी  क्या कहते हैं —

‘ …. धारणा शक्ति उन लोगों में होती है , जो शुरू से धारणा करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते हैं । अब आप देखो अपने समाज में , अपनी राजनीति में ।  अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन हैं ?
आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण , इंदिरा गांधी ब्राह्मण , अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण , क्यों ? … सिलिकॉन वैली अमेरिका में न होती अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता ।
ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है । तो जो वायवीय चीजें होती हैं , जो स्थूल सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी हैं , जो अमूर्तन में  काम करते हैं , जो आकाश में काम करते हैं यानि चीजों को इमैजिन करने का काम करते हैं । ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है । इसलिए वे अव्यक्त , अभौतिक और अयथार्थ को यथार्थ करने की कूवत रखते हैं ।…ब्राह्मणों ने अपने कौशल से सिलिकॉन वैली में झंडा गाड़ रखा है । ब्रह्म से वायवीय दुनिया से अपने सम्पर्क के पारंपरिक कौशल के कारण … । ‘
सती प्रथा पर उन्होंने कहा था —

‘ …… मैं मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है , वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है । अपने यहां सती , पति की चिता पर जल कर मरने को कभी नहीं माना गया । सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां ?  सीता । सीता आदमी के लिए मरी नहीं । दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती । वो खुद जल मरी लेकिन पति का जो गौरव है , सम्मान है , वो बनाने के लिए । उसके लिये ।
सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है । सावित्री वो है जिसने अपने पति को जिंदा । मृत पति को जिंदा किया । सती अपनी परम्परा में सत्व से जुड़ी चीज है । भारत में सती प्रथा को अपनी परम्परा में देखने की जरूरत है ।

जारी …

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