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बाबरी ध्वंस हो चुका था और पंडित जी नभाटा में लिख रहे थे -राधा का लास्य !

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हम अपने लिये कब लड़ेंगे साथी ?

 

भाऊ कहिन-22

यह तस्वीर भाऊ की है…भाऊ यानी राघवेंद्र दुबे। वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे को लखनऊ,गोरखपुर, दिल्ली से लेकर कोलकाता तक इसी नाम से जाना जाता है। भाऊ ने पत्रकारिता में लंबा समय बिताया है और कई संस्थानों से जुड़े रहे हैं। उनके पास अनुभवों ख़ज़ाना है जिसे अपने मशहूर बेबाक अंदाज़ और सम्मोहित करने वाली भाषा के ज़रिए जब वे सामने लाते हैं तो वाक़ई इतिहास का पहला ड्राफ़्ट नज़र आता है। पाठकों को याद होगा कि क़रीब छह महीने पहले मीडिया विजिल में ‘भाऊ कहिन‘ की पाँच कड़ियों वाली शृंखला छपी थी जिससे हम बाबरी मस्जिद तोड़े जाते वक़्त हिंदी अख़बारों की भूमिका के कई शर्मनाक पहलुओं से वाक़िफ़ हो सके थे। भाऊ ने इधर फिर से अपने अनुभवों की पोटली खोली है और हमें हिंदी पत्रकारिता की एक ऐसी पतनकथा से रूबरू कराया है जिसमें रिपोर्टर को अपना कुत्ता समझने वाले, अपराधियों को संपादकीय प्रभारी बनाने वाले और नाम के साथ अपनी जाति ना लिखने के बावजूद जातिवाद का नंगानाच करने वाले संपादकों का चेहरा झिलमिलाता है। ये वही हैं जिन्होंने 40 की उम्र पार कर चुके लोगों की नियुक्ति पर पाबंदी लगवा दी है ताकि भूल से भी कोई ऐसा ना आ सके जिसके सामने उनकी चमक फ़ीकी पड़ जाए ! ‘मीडिया विजिल’ इन फ़ेसबुक संस्मरणों को ‘भाऊ कहिन’ के उसी सिलसिले से जोड़कर पेश कर रहा है जो पाँच कड़ियों के बाद स्थगित हो गया था-संपादक

कार्तिक आया, बोओ-काटो 

 

चंदन , पानी , धूप और चांदनी तक पंडित जी ( विद्यानिवास मिश्र ) की चुटकी में थी और मंत्र भी ।

सिल्क की ही धोती और सिल्क के ही कुर्ते में वह कई के ललित कोन में गहरे उतर  जाते थे । कुछ मंत्रविद्ध हो जाती थीं या हो जाते थे ।
कुछ खास का ही प्रवेश उनके दरबार तक हो पाता था । जहां आलंकारिक शैली का अद्भुत और चमत्कृत करने वाला कठोर अनुशासन भी पसरा रहता था । यहां आने वाले को उनके चरणों के नीचे की जमीन ( चरण नहीं ) स्पर्श करनी होती थी । पंडित जी के आभामंडल में तो तब कई – कई सूरज टंक चुके थे जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविताओं के संकलन का विमोचन भी किया । वह राज्यसभा के सांसद भी बने ।

इससे पहले कोई शक नहीं कि पंडित जी समाजवादी थे । मैंने उन्हें लखनऊ में ही मुलायम सिंह यादव की पहल पर नये , पुराने और लुप्तप्राय समाजवादियों के महासम्मेलन की सदारत करते भी देखा है । जिसका संचालन छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र कर रहे थे । पंडित जी के पास डा. लोहिया और बद्री विशाल पित्ती से जुड़े जगमग संस्मरण भी थे ।
संस्कृति और संस्कृत से दुर्लभ लगाव वाले साहित्यकार , सांसद और पद्मभूषण से सम्मानित विद्यानिवास मिश्र जी ने अपने बारे में खुद ही कहा है —
‘ ..वैदिक सूत्रों के गरिमामय उद् गम से लेकर , लोकगीतों के महासागर तक जिस अविछिन्न प्रवाह की उपलब्धि होती है , उस भारतीय परम्परा का मैं स्नातक हूं ।
लेकिन मुझे कभी नहीं लगा कि , अज्ञेय , रघुवीर सहाय , धर्मवीर भारती और मनोहर श्याम जोशी की तरह उनमें पत्रकार भी कभी था ।
किन्ही आनंद त्रिपाठी ने मुझे ‘ तथाकथित बुद्धिजीवी ‘ कहा है । उन्हें विनम्र सलाह है कि ‘ बुद्धिजीवी ‘ शब्द मुझे बहुत गंदा लगता है । इससे एक खास ढंग की परजीविता का बोध ध्वनित होता है । हो सके तो ‘ बुद्धिजीवी ‘ की जगह ‘ बुद्धिधर्मी ‘ लिखा करें । और यह मैं विनम्रता पूर्वक स्वीकार करता हूं कि मैं ‘ बुद्धिधर्मी ‘ नहीं हूं । एक औसत क्षमता का पत्रकार जरूर हूं ।
फिर अगर कोई पंडित जी में पत्रकार देखता ही है तो उसे 1991 – 92 के दौर की दो बड़ी परिघटनाओं की कसौटी पर उनके व्यक्तित्व को क्यों नहीं कसना चाहिए ? क्यों यह नहीं देखा जाना चाहिये कि एक पत्रकार के तौर पर , इन परिघटनाओं के संदर्भ में उनकी क्या प्रतिक्रिया थी ?
बाबरी ध्वंस हो चुका था और पंडित जी नवभारत टाइम्स में लिख रहे थे —
राधा का लास्य … , कार्तिक आया बोओ काटो ।

जो भी जमीन थी अपनी , हिंदी पत्रकारिता की ,उससे अलग पूरी ललक से उसका अगला कदम जहां झूल रहा था , वह पूंजीवादी उपभोक्ता व्यूह का विस्तार ही था । व्यक्ति को वस्तु और न्यूज को कमोडिटी बनाने की शुरुआत इसी कालखंड से होती है ।

 

‘कामदेव’ संपादक के कमरे के बाहर जल जाती थी लाल बत्ती !

 

लाल , हरे और पीले लट्टू के पीछे  संपादक के कक्ष में के मायावी माहौल की कल्पना और उससे उड़ी चटख सांय – सांय , खासी उत्तेजक थी । इन बल्बों में से किसी एक की शोख चमक आंगतुकों को भौचक और दिशाहारी बना देती थी । इतना कि नंगे और कॉरपेट से ढंके फर्श के बीच के बित्ता भर फासले में ही कई

कदम अक्सर लड़खड़ा जाते थे ।
अंगुलियां आपस में फंसाकर , सिर के पीछे रखे घुंघराले बाल कमर तक छितराये , सुंदर देहयष्टि की फ्रंट आफिसर हरे रंग वाला बल्ब जग उठने की आतुर प्रतीक्षा करती रहती थी ।
तब कामदेव , घनश्याम पंकज , कुबेर टाइम्स के प्रधान संपादक थे । मैं ब्यूरो में सीनियर रिपोर्टर ।
नवभारत टाइम्स का इवनिंगर , सांध्य समाचार, दिनमान टाइम्स और स्वतंत्र भारत लगभग डुबो कर या बंद कराकर वह अब यहां आये थे ।

संपादक के कक्ष के आगे लाल बत्ती परम्परा की शुरुआत कब से हुई , ठीक – ठीक नहीं बता सकता ।
धर्मयुग के यशस्वी संपादक धर्मवीर भारती या हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरुष आदरणीय राजेन्द्र माथुर जी के कक्ष के आगे लाल बत्ती का एक औचित्य था ।
माथुर जी जब खासकर संपादकीय लिख रहे होते थे , तब ही उनके कक्ष के आगे लाल बत्ती जल रही होती थी । प्रायः नहीं । उसका एक वाजिब तर्क था । उनसे मिलने आने वाले किसी अन्य से तो कमरे के बाहर खड़ा परिचारक कह सकता था –
… अभी नहीं , साहब कुछ लिखने में व्यस्त हैं ।
लेकिन अगर मालिक ही मिलने आ जायें तो परिचारक उन्हें नहीं रोक सकता था । लाल बत्ती बस इसलिए जलायी जाती थी कि मालिक खुद ब खुद समझ जायें कि माथुर जी सृजनात्मकता में व्यस्त हैं और उन्हें थोड़ी देर बाद आना चाहिये ।
लेकिन बाद के अन्य खासकर , कामदेव संपादकों के कक्ष के आगे लाल बत्ती , रुतबे की निशानी थी और नीली कहानियों की खदान भी ।
लखनऊ में टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स कुछ महीनों के अंतराल में लगभग एक साथ ही लांच हुआ ।
तब आदरणीय माथुर जी ने फ्रंट पेज एडिट लिखा था — आज से आपके बीच ।
यशस्वी पत्रकार नवीन जोशी जी ने जैसा बताया – उसके पहले एक टेलेक्स संदेश था ‘ इंदौर का कर्ज लखनऊ में चुकाते हुए ‘ , जो नवभारत टाइम्स , लखनऊ के प्रथम प्रकाशन पर राहुल वारपुते , नरेंद्र तिवारी और नई दुनिया के साथियों के नाम भेजा गया था ।
अंग्रेजी का प्राध्यापक रहते हुए ही , पत्रकारिता से जुड़े माथुर जी बाद के दिनों में पूरी तरह हिन्दी का हो चुके थे । प्रभाष जोशी की , उनके देहावसान पर लिखी पंक्तियां आज तक याद हैं —-
अब हम अंग्रेजी वालों से नहीं पूछ सकेंगे , है तुम्हारे पास कोई राजेन्द्र माथुर ।
माथुर जी हिंदी पत्रकारिता का उसी के इलाके में सघन और गुणात्मक विस्तार चाहते थे । वह उसके मूल स्त्रोतों को विकसित करने की मुहिम चलाना चाह रहे थे ।

तब रामपाल सिंह स्थानीय संपादक और सुनील गुप्त मैनेजर थे । श्री गुप्त के कमरे के आगे भी लाल बत्ती लगी थी । कमरे में कोई लड़की गयी और लाल बत्ती भक्क से जल उठी । ऐसी उस समय की चटख चर्चा थी ।

संपादक ने पत्रकार से कहा- लहसुन कम खाया करो…और परफ्यूम छिड़क दिया..

 

घनश्याम पंकज अपने दाहिने हाथ की अनामिका में प्लैटिनम की अंगूठी पहनते थे ।
सिर पर गिनती के बाल रह गये थे लेकिन उनके लिये ही हाथी दांत की कंघी रखते थे ।
परफ्यूम सनी देहगंध के अलावा कोई दूसरी गंध उनका मूड खराब कर देती थी ।

उस समय कुबेर टाइम्स में संपादकीय टीम में से उनके दो एजेंट कुछ सुंदर लड़कियों को अपनी भौतिक और दैहिक एषणाओं के बीच शानदार और व्यवहारिक संतुलन का गुर सिखाते थे ।
वे बताते थे पंकज जी के आगे बिछी और पसर गयीं यानि देह की शहादत दे चुकीं , कई पर जिंदगी इतनी मेहरबान हुई कि , उसकी तब कल्पना भी नहीं की जा सकती थी ।
वह अपने हाथ में हमेशा एक स्प्रे रखते थे । किसी से बात करते हुये कह सकते थे — थोड़ा पीछे हटो …। और बढ़ी दूरी के बीच परफ्यूम स्प्रे कर देते थे ।
अमृत प्रभात के एक वरिष्ठ

पत्रकार को उन्होंने स्वतंत्र भारत में नौकरी भी दी तो सब एडिटर के पोस्ट पर । इस दौरान इधर – उधर भटकाते भी रहे । कभी इस डेस्क , कभी उस डेस्क ।
एक बार पंकज ने उनसे कह दिया —
….. लहसुन कम खाया करो ।
फिर चारो ओर स्प्रे किया । दरअसल पंकज को उनमें से बास आती महसूस हो रही थी ।
उस दिन वह पत्रकार भी तन गये — ऐ घनश्याम पंकज ….।

कुबेर टाइम्स अब खस्ताहाल हो रहा था । कर्मचारियों की तनख्वाह दो से तीन महीने की बाकी चल रही थी । तब भी पंकज की दिल्ली यात्रा का खर्च संस्थान वहन करता था ।
बात 1998 -99 की होगी । उनका दिल्ली का प्रतिदिन का खर्च 40 से 50 हजार रुपये तक का
आता था ।
वह शाम को आठ बजे ही दफ्तर छोड़ देते थे । अखबार का ए – फोर साइज पन्ना उनके आवास पर जाता था । वह उसमें कोई संशोधन एक स्लिप पर लिख देते थे , जिसके शीर्ष पर मोटे अक्षरों में लिखा होता था —
प्रधान संपादक की मेज से ।

कहते हैं आठ बजे के बाद पंकज पर एक खास किस्म की भूख टूट पड़ती थी । कोई साथी होती थी और दोनों स्कॉच पर सवार । पंकज ने अपने भूख के हवनकुंड के लिए हर संभव तर्कों की समिधा भी जुटा ली थी ।
उनके एजेंट तो बताते थे कि यह सब वह अंततः पत्रकारिता के स्वर्णिम भविष्य के लिये कर रहे होते थे । और तब कमरे में नीली रोशनी होती थी ।


नेता ने पैसा देने के लिए संपादक को बुलाया और कुटाई कर दी !

 

शुरुआत में कुबेर टाइम्स के संपादक रहे , तड़ित कुमार ( चटर्जी ) ‘ दादा ‘ । स्थापना भी उनकी ही थी ।
दादा का जिक्र आते ही ‘ गांधी बेनकाब ‘ , ‘ नेहरू बेनकाब ‘ और ‘ ग़ालिब बेनकाब ‘ , लिखने वाले हंसराज रहबर की याद आनी स्वाभाविक है ।
उस कविता संग्रह ‘ शुरुआत ‘ की भी याद आ रही है , जिसकी भूमिका हंसराज रहबर ने ही लिखी थी । इसमें तड़ित कुमार , उग्रसेन सिंह और हरिहर द्विवेदी की कविताएं थीं ।

दादा का अंग्रेजी , हिंदी , उर्दू और बांग्ला पर अद् भुत अधिकार है ।
उस समय या उससे पहले भी वह लखनऊ में अकेले पत्रकार थे , जो हजरतगंज की ब्रिटिश
लाइब्रेरी में ( नहीं जानता वह अब है भी या नहीं ) जाकर वाशिंगटन पोस्ट , न्यूयार्क टाइम्स या गार्जियन , नियमित पढ़ते थे ।
कुबेर टाइम्स नान बैंकिंग फाईनेसिंयल कम्पनी थी । पारा बैंकिंग या चिटफंड कम्पनी ।
दादा के नेतृत्व में अपने शुरुआती दो महीने में ही शहर में कुबेर टाइम्स का प्रसार , दैनिक जागरण से कुछ हजार ज्यादा हो गया । विनोद शुक्ल की खीज भी याद है —
यह साला …. डेढ़ रुपये का अखबार …।
कई अखबार बंद कराकर , घनश्याम पंकज अब यहां आ गये । मालिक को जाने कैसे पटाकर , प्रधान संपादक के पद पर ।
दादा उस हद तक , जो कमजोरी या बुराई बन जाये सीधे और सरल रहे हैं । उन्होंने अखबार को एक कसाई के हाथ आसानी से चले जाने दिया । प्रदीप मिश्र आज भी कहता है —
अगर दादा की जगह रामेश्वर पांडेय ‘ काका ‘ होते तो अव्वलन , पंकज यहां काबिज ही नहीं हो पाते , या फिर पिट जाते ।
पंकज ने एक महिला कर्मचारी को भी रख लिया जिससे उनका भर चुका था । वह अब उनके लिये कूटनी का काम करती थी । यह दूसरी महिलाओं को समझाती या इस बात के लिये सहमत करती थी कि अवसर उनके सामने है । बस एक छोटी सी कंप्रोमाइज , जो दरअसल फन है , से वे अपने ऊंचे सपनों की राह आसान कर सकेंगीं । लेकिन एक थी ऐसी , जिसमें लोहा था । उस पर फंदा नहीं कसा जा सका तो , उसकी नौकरी छीन लिये जाने की व्यूह रचना तैयार कर ली गयी ।
पंकज कभी – कभी अपना चेहरा प्लैटिनम की अंगूठी में लगे नग में देखा करते थे । जिसमें उनका चेहरा देह भोगने की फैंटेसी में झिलमिल करता रहता था । वह किसी भी ठीक दिखती लड़की को अपने कक्ष और बिस्तर में ही सोचते रहने के आदती हो चुके थे । उनके दो एजेंट , जिनमें से एक मर चुका है और दूसरे के बारे में पता नहीं , उनकी नील कामनाओं की राह सुविधाजनक बनाते थे । उन दोनों का नाम न खोला जाना ही ठीक रहेगा । गीता जी , हां या ना में जवाब दीजियेगा , उन दोनों को आप जान पायीं या नहीं ?
कुबेर टाइम्स में आप , मैं , प्रदीप मिश्र , दिव्य प्रकाश शुक्ल , साथ ही तो थे ।

अचानक याद आया एक और वाकया । पंकज , नवभारत टाइम्स के सांध्य समाचार में एक दबंग कांग्रेस नेता की रंगरेलियां छाप रहे थे । हद हो जाने के बाद उस कांग्रेस नेता ने इनसे डील की । कहा — इतने पैसे ले लीजिए और इसे बंद करिये ।
पंकज , नेता के बुलाने पर पैसा लेने अटैची लेकर गेस्ट हाउस पहुंचे । वहां नेता ने इन्हें बंद करके खूब पीटा । जूते , लात , घूंसे से । कहा — साले , खुद क्या करते हो ? जाओ अब यह भी छापना कि फलां ने मुझे बहुत पीटा । यह भी कि लात कहां मारी । अब जाओ जो मन करे लिखो ।
वह कांग्रेस नेता मेरे भी अच्छे परिचित रहे हैं । उस समय से जब मैं टीडी कालेज ( तिलकधारी सिंह कालेज , जौनपुर ) में पढ़ता था ।

जारी ……..

 

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