Home अख़बार अख़बारनामा: प्रचार वाली असंवैधानिक कार्रवाई पहले पन्ने पर, प्रतिक्रिया नदारद

अख़बारनामा: प्रचार वाली असंवैधानिक कार्रवाई पहले पन्ने पर, प्रतिक्रिया नदारद

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संजय कुमार सिंह

आज भी अखबारों में कोई ऐसी खबर नहीं है जो सभी अखबारों में समान रूप से पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी हो। आज तो कल जैसी कोई असंवैधानिक खबर भी नहीं है जो ज्यादातर अखबारों में लीड बनी हो। ऐसे में आज के अखबारों में मुझे दो खबरें दिखीं जिन्हें प्रमुखता दी जानी चाहिए थी। पहली खबर तो जीएसटी से संबंधित प्रधानमंत्री की घोषणा पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया है। इसे उन अखबारों को प्रमुखता से छापना चाहिए था जो कल दैनिक भास्कर की तरह उससे जुड़ी दूसरी खबरें नहीं बता पाए। इसके अलावा, आज के अखबारों में एक और खबर पहले पन्ने पर छोटी और कुछ अखबारों में अंदर बड़ी छपी है जिसे खबरें नहीं होने की आज जैसी स्थिति में पहले पन्ने पर छापा जाना चाहिए था।

असल में आज की दूसरी खबर लिचिंग (भीड़ के हाथों मार दिया जाना) का डर बताती है जो सामान्य दुर्घटना या संयोग के रूप में छपी है। आइए, पहले दोनों खबरें जान लें फिर आप तय कीजिएगा कि आपके अखबार ने यह खबर कैसे दी है और उसका अंदाज ठीक है या नहीं और ठीक है तो कितना या गलत है तो कितना। इससे आप अपने अखबार को जान सकेंगे। मेरी कोशिश है कि आपको पूरी और निष्पक्ष खबर मिले और आपको पता रहे कि आपके अखबार कैसी लापरवाही करते हैं या कैसे चूक जाते हैं।

आप जानते हैं कि जीएसटी से संबंधित घोषणा प्रधानमंत्री को नहीं, वित्त मंत्री को करनी चाहिए और कैसे कल ज्यादातर अखबारों में शीर्षक भ्रमित करने वाला था। इसके अलावा बैठक शनिवार को होनी है उसमें क्या होगा यह पहले बताना कितना उचित है या उसका मकसद क्या हो सकता है। क्या आप जानते हैं कि देश के प्रमुख विपक्षी दल, कांग्रेस ने सरकार की इस कोशिश के बारे में कहा है कि अब वह लोगों को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है तथा कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि यह पाखंडियों की सरकार है?

जीएसटी वाली कल की खबर पर कांग्रेस की यह प्रतिक्रिया अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ में अंदर के पन्ने पर सिंगल कॉलम में छपी है। आपके लिए उसका हिन्दी अनुवाद पेश है। इस खबर के मुताबिक, बुधवार को कांग्रेस ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जीएसटी व्यवस्था के तहत टैक्स दर पर अब अलग राग अलाप रहे हैं क्योंकि उनकी पार्टी को तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता से बेदखल कर दिया गया है। पहले कांग्रेस के बार-बार कहने और दबाव डालने पर भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया था। और ऐसा जीएसटी ही नहीं, किसानों की मांगों के मामले में भी है।

कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि सरकार अब संसदीय चुनाव से पहले लोगों को (फिर से) मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने 29 नवंबर 2017 को गुजरात चुनाव प्रचार अभियान के दौरान कहा था कि जीएसटी के तहत टैक्स दर एक रखने की राहुल गांधी की मांग, ग्रैंड स्टुपिड थॉट (बेहद मूर्खतापूर्ण विचार) है। और अब, मोदी ने राहुल गांधी की मांग लगभग मान ली है। सिंघवी ने कहा है कि मोदीनोमिक्स खराब आर्थिक निर्णयों से लोगों की पीठ में छुरा भोंकने की कला है।

इस तरह के आर्थिक कुप्रबंध तथा आर्थिक अराजकता की स्थिति बनने से लोगों की आजीविका नष्ट होती है, रोजगार खत्म होते हैं और छोटे कारोबार बंद होने के लिए मजबूर हैं। सिंघवी ने कहा कि अब जब लोकसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं रह गए हैं तो मोदी अचानक जग गए हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी सरकार ने जिस जीएसटी को लागू किया है वह खराब ढंग से लागू की गई है। इसके बावजूद उन्होंने घोषणा कर दी जबकि वह (जीएसटी कौंसिल के लिए) इशारा है न कि उसका फैसला। क्या आपके अखबार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह आपको यह सूचना दे। दी?

इस तरह के आर्थिक कुप्रबंध तथा आर्थिक अराजकता की स्थिति बनने से लोगों की आजीविका नष्ट होती है, रोजगार खत्म होते हैं और छोटे कारोबार बंद होने के लिए मजबूर हैं। सिंघवी ने कहा कि अब जब लोकसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं रह गया है तो मोदी अचानक जग गए हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी सरकार ने जिस जीएसटी को लागू किया है वह खराब ढंग से लागू की गई है। इसके बावजूद उन्होंने घोषणा कर दी जबकि वह (जीएसटी कौंसिल के लिए) इशारा है न कि उसका फैसला।

उत्तर पश्चिम दिल्ली के मुकुंदपुर इलाके में एक ट्रक से तीन लोगों को धक्का लगा और इनमें से 17 साल की शिखा की मौत हो गई। एक अन्य छात्रा कंचन (17) और युवक उमेश (35) की मौत हो गई। बताया जाता है कि दुर्घटना के बाद वाहन चालक ने वाहन लेकर भागने की कोशिश की पर कुछ लोगों ने मोटरसाइकिल से उसका पीछा किया। भागने और बचने की कोशिश में उसकी गाड़ी डिवाइडर से टकरा उलट गई जिससे ट्रक ड्राइवर राजन की ठौर मौत हो गई। सवाल यह उठता है कि मोटर साइकिल वालों को किसने अधिकार दिया ट्रक का पीछा कर उसे रोकने या ड्राइवर को पकड़ने का?

क्या ड्राइवर को यह डर नहीं होगा कि वह पकड़ा गया तो मार दिया जाएगा। क्या ऐसे में उसका भागना गलत है? क्या अभी तक यही होता रहा है? क्या मोटर साइकिल वाले ट्रक का नंबर पुलिस को देते तो ड्राइवर पकड़ा नहीं जाता? क्य़ा पहले ऐसे ही दुर्घटना कर भागने वाले ड्राइवर पकड़े नहीं गए हैं? मेरे ख्याल से ड्राइवर को पकड़ने की भीड़ की कोशिश निहायत बेजरूरत है और इसमें उसकी जान चली गई। मुमकिन है उसने एक की जान ली और खुद मर गया तो आप अफसोस न करें पर क्या वह और ज्यादा लोगों की मौत का कारण नहीं बन सकता था?

यह लिंचिंग और लिचिंग का डर नहीं है तो क्या है। इसमें कोई शक नहीं है केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद लिचिंग के मामले बढ़े हैं। सरकार और उसके समर्थक भले न मानें पर कई ऐसे मामले सुनने में आए हैं और मुमकिन है अब अखबारों में खबरें ज्यादा छप रही हों। पर लिचिंग का डर तो इन्हीं कारणों से है। दिल्ली में तो भाजपा की सरकार भी नहीं है। पर स्थितियां तो लिचिंग वाली ही हैं। पर इसमें कोई राजनीतिक या सांप्रदायिक एंगल नहीं है तो इसे प्रमुखता नहीं मिलेगी। पर अखबारों को रिपोर्ट करने से कौन रोक रहा है? कैसे यह सामान्य दुर्घटना कैसे है?

आज के कुछ अखबारों की लीड का स्क्रीनशॉट देखिए। सब अलग खबरें हैं। अगर निष्पक्षता, खबरों में संतुलन इनके एजंडे में होता तो ये खबरें भी होतीं -जिनकी मैंने चर्चा की है। देखिए, हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनसत्ता में रहते हुए लंबे समय तक सबकी ख़बर लेते रहे और सबको ख़बर देते रहे। )

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