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नभाटा के ‘कुपुत्रों’ को सुपुत्रों के देश में औरंगज़ेब याद रहा, अजातशत्रु नहीं !

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 “औरंगज़ेब ने अपने पिता शाहजहाँ को आगरा में क़ैद कर दिया था। अगर इस एक किस्से को छोड़ दें तो भारत के इतिहास में बेटों की बग़ावत के बड़े उदाहरण नहीं मिलते। पौराणिक परंपरा तो सुपुत्रों की महिमा से भरी पड़ी है। भारत अज्ञाकारी, बलिदानी, पितृभक्तों की धरती है। बग़ावती बेटों के लिए इसकी यादों में कोई जगह नहीं है । ”  

ऊपर का पैराग्राफ़ गीताप्रेस की किसी बालपोथी को पढ़ने का भ्रम दे सकता है, लेकिन यह दिल्ली के नंबर 1 ‘ राष्ट्रीय अख़बार’ नवभारत टाइम्स’ में (1 जनवरी 2017, पेज नंबर 6, दिल्ली संस्करण) में छपा ‘इतिहास’ है। इसका रिश्ता यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव के साथ तनातनी वाली ख़बर से है। अख़बार के राजनीतिक संपादक नदीम की बाईलाइन से छपी ख़बर के साथ एक रंगीन बक्से में ‘सुपुत्रों के देश में बगावत’ शीर्षक से छपा यह विशेष संदर्भ संपादकों की ग़ैरज़िम्मेदारी का नमूना है। ऐसा लगता है कि किसी ‘शाखा-मृग’ रिपोर्टर की कॉपी को बिना किसी सवाल के छाप दिया गया। भारतीय संस्कृति की महानता का गुणगान करने वाली हेडलाइन किसी उपसंपादक के कौशल का नमूना हो सकती है।

जो भी हो, एक बात तो साफ़ है कि लिखने वाले को न इतिहास का ज्ञान है और भारतीय संस्कृति का। औरंगज़ेब का विशेष उल्लेख उसकी दिमाग़ी बनावट का संकेत भी देती है क्योंकि इतिहास या पौराणिक क़िस्सों में ऐसे चरित्र कई हैं जिन्होंने न सिर्फ़ पिता को क़ैद किया, बल्कि उनकी जान तक ले ली। औरंगज़ेब जैसा सिर्फ़ एक क़िस्सा नहीं है भारतीय इतिहास और पुराणों में।

 

 

आइये पहले बात इतिहास की करें। पता नहीं,ख़बर लेखक महोदय को अजातशत्रु का नाम पता है या नहीं, लेकिन उन्हें यह जानकारी हिंदी विकीपीडिया से भी मिल सकती थी कि ईसापूर्व 544 प्रथम मगध साम्राज्य की स्थापना करने वाले और राजगीर को राजधानी बनाने वाले बिम्बसार की हत्या उनके ही बेटे अजातशत्रु ने की थी। यही नहीं बौद्धग्रंथों में कहा गया है कि अजातशत्रु की हत्या उसके बेटे उदयन ने की थी। यह वही उदयन था जिसने पाटिलपुत्र को बसाया था।

इसके अलावा अशोक को कौन भूल सकता है। मौर्य वंश ही नहीं भारतीय इतिहास के सर्वाधिक सफल शासक कहा जाने वाला अशोक महान अपने 99 भाइयोौं को मारकर सम्राट बना था। सुपुत्रों के देश में अशोक और पिता बिंदुसार में लगातार तनातनी रहती थी। अशोक को निर्वासित भी किया गया था।

चूँकि सुपुत्रों के देश की महानता साबित करने के लिए ख़बर लेखक महोदय ने पुराणों का भी सहारा लिया है और राम, भीष्म से लेकर ययाति तक का ज़िक्र किया है इसलिए इस पर आश्चर्य होता है कि उन्हें कंस की याद न आई। लेखक महोदय यादवों के पूर्वज यदु का ज़िक्र करते हैं लेकिन कंस को भूल गए। औरंगज़ेब की तरह कंस ने भी अपने पिता उग्रसेन को बंदी बनाकर मथुरा का सिंहासन हथिया लिया था। लेकिन लेखक महोदय के मुताबिक पिता विरोधी चरित्र पश्चिम की परंपरा में मिलते हैं, भारत में नहीं।

वैसे,सवाल यह भी उठता है कि महान भारतीय संस्कृति में सुपुत्र का अर्थ केवल पितृभक्त होना ही है क्या? क्या वजह है कि माँ का गला काटने वाले परशुराम को भी अवतार ही माना जाता है? और फिर भक्त प्रह्लाद जैसी कहानियों को किस खाँचे में रखा जाएगा? प्रह्लाद सुपुत्र होते तो पिता हिरण्याकश्यप की बात मानते। बग़ावत न करते।

ग़ौरतलब है कि ऐसे रंगीन बॉक्स काफ़ी पढ़े जाते हैं। ख़बरों से इतर समाज का मानस बनाने में इनका बड़ा योगदान होता है। इसलिए इन पर संपादकों की कड़ी दृष्टि होनी चाहिए, https://www.acheterviagrafr24.com/achat-viagra-en-ligne-suisse/ लेकिन लगता है कि नवभारत टाइम्स के संपादक ‘हैप्पी न्यू इयर’ मनाने में व्यस्त थे और कोई शाखामृग अखिलेश यादव को औरंगज़ेब वाले खेमे में डालकर अपना काम कर गया।