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नोटबंदी : इंडियन एक्सप्रेस का ‘प्रश्नवाचक’ और ‘गोदी’ मीडिया का मिमियाता कवरेज !

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रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि नोटबंदी पूरी तरह फ़ेल हो गई है। 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक नोटबंदी का ऐलान करने के साथ काला धन और आतंकवाद के सफ़ाए के जो उद्देश्य रखे थे, उन्हें प्राप्त नहीं किया जा सका।  99 फ़ीसदी मुद्रा की वापसी काले धन को लेकर किए गए तमाम दावों की पोल खोल रही है।

ज़ाहिर है, यह वक़्त सरकार से सवाल पूछने का है। क़रीब 200 लोग बैंकों की लाइन में लगे-लगे मर गए, इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा। तमाम विशेषज्ञों की यह बात अब सही साबित हो रही है कि यह अर्थव्यवस्था की गाड़ी को पंक्चर करने वाला क़दम है तो ज़िम्मेदार कौन है? लेकिन लोकतंत्र में  जिस मीडिया पर सवाल पूछने की सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी है, उसकी पूँछ सरकी हुई है।

न्यूज़ चैनलों से ऐसे विषयों पर चर्चा की उम्मीद भी बेमानी है, लेकिन अख़बारों ने भी लगता है कि आँख पर पट्टी बाँध ली है। 31 अगस्त को दिल्ली से निकलने वाले प्रमुख हिंदी और अंग्रेज़ी अख़बारों में सिर्फ़ इंडियन एक्सप्रेस एक अपवाद है जिसने नोटबंदी पर सवाल उठाया है। ज़्यादातर ने सिर्फ रिजर्व बैंक की विज्ञप्ति ही छापी है। हिंदुस्तान और अमर उजाला जैसे तुर्रम खाँ अख़बारों में तो यह ख़बर पहले पन्ने पर भी नहीं है।

सबसे पहले बात हिंदुस्तान की। इस अख़बार ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी को पूरे देश के प्रधानमंत्री होने की याद दिलाने वाली अदालती टिप्पणी को ग़ायब ही कर दिया था और एक बार फिर टिटहरी साबित हुआ है। नोटबंदी से जुड़ी ख़बर पहले पन्ने पर है ही नहीं। बस,तीन लाइन की सूचना दी गई है। पेज नंबर 19 पर दो कॉलम ख़बर है कि 500 और 1000 के 99% नोट बैंक में वापस लौटे। साथ में जेटली का बयान कि- कम समझ वाले नोटबंदी पर सवाल उठा रहे हैं….

हिंदुस्तान की लीड है आप विधायकों का राजभवन में धरना। संपादकीय है- बारिश और महानगर। संपादकीय पेज पर भी नोटबंदी से जुड़ा कोई लेख नहीं।

 

वहीं नंबर 1 के दावे में लिथड़े रहने वाले दैनिक जागरण की लीड है -सेना में सबसे बड़े सुधार को मंजूरी

टॉप पर दो कॉलम खबर है- ‘अधिकतर प्रतिबंधित नोट वापस लौटे। ‘ अख़बार को लगता है कि काले धन वालों ने अपना पैसा सिस्टम में खपा दिया। सराकार की आलोचना या जनता की तक़लीफ़ों का कोई ज़िक्र नहीं।

यही नहीं, पेज नंबर 12 पर जागरण ने एक दो कॉलम ख़बर छापी है -मोदी सरकार का अगला मकसद राजनीति से काले धन का खात्मा। गोया पहले क़दम से अर्थव्यवस्था से काला धन ख़त्म हो गया। संपादकीय है – आरक्षण की विसंगति और पालीथीन खात्मे के लिए इच्छाशक्ति पर। संपादकीय पेज पर कोई लेख नोटबंदी से संबंधित नहीं है।

दैनिक भास्कर की लीड है- नोटबंदी में 1000 और 500 के 99% नोट वापस आ गए। आरबीआई की घोषणा छाप दी गई है। वित्तमंत्री अरुण जेटली की सफाई और चिदंबरम का हमला भी है।

भास्कर के संपादकीय मेंं ‘विवाह में बलात्कार’ को अपराध ना बनाने की केंद्र सरकार की दलील का समर्थन करते हुए लिखा गया है। संपादकीय पेज पर कोई लेख नोटबंदी से जुड़ा हुआ नहीं है। चेतन भगत ने मुंबई बारिश पर लिखा है।

कभी तुलनात्मक रूप से दृष्टिसंपन्न उजाला की हालत तो सबसे दयनीय है। पहले पन्ने पर आप नोटबंदी का ‘ना’ भी नहीं खोज सकते हैं। पेज मेकिंग ऐसी है कि लीड का ठीक-ठीक पता नहीं कर सकते। पहले पन्ने पर सबसे उभर कर आने वाली ख़बर है-वाड्रा के जमीन सौदों की सीबीआई जांच शुरू।

 

 

‘निर्भीक पत्रकारिता का सातवां दशक’ लिखकर अपनी पीठ थपथपाने वाले अमर उजाला में संपादकीय पेज पर भी नोटबंदी नहीं। संपादकीय ‘प्रवाह’  है-बारिश में बदहाल मुंबई  पेज नंबर 13 है कारोबार—वहाँ भी नोटबंदी पर आरबीआई के आँकड़ों की ख़बर नहीं है।

बहुत खोजने पर पेज नंबर 14 पर नीचे की ओर सिमटी एक ख़बर मिलती है कि 99 फ़ीसदी नोट वापस लौट आए हैं।

नवभारत टाइम्स की पहली ख़बर है 99 फीसदी बंद नोट बैंकों में वापस। लेकिन संपादकीय पन्ने पर नोटबंदी से जुड़ा कुछ नहीं। संपादकीय है—मुंबई का संकट। पेज नंबर 20 पर जेटली का बयान है कि धन किसका, नोटबंदी से इसकी पहचान हुई।

अब ज़रा अंग्रेजी के प्रमुख अख़बारों पर नज़र डालते हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी ख़्याति के अनुरूप काम किया है। पहले पन्ने पर नोटबंदी को निशाने पर लेते हुए सवाल उठाया है।  हेडलाइन है-DEMONETISATION ?

यही नहीं, पहले पन्ने पर ही सरकार के दावों पर सवाल उठाती हुई कई स्टोरी हैं जिन्हें पेज नंबर 2 पर विस्तार से पढ़ा जा सकता है।

वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से नोटबंदी गायब है। लीड मुंबई की बारिश रुकने के बाद आई भयावह कहानियों पर है। पेज नंबर पाँच पर आरबीआई रिपोर्ट के हवाले से 99 फीसदी नोट बैंकों में वापस आने की खबर है। एक बाक्स के जरिए बताया गया है कि यह खबर टाइम्स आफ इंडिया ने 27 अगस्त को ही छाप दी थी..पेज नंबर 19 पर विस्तार से अरुण जेटली की सफाई छपी है..नोटबंदी से जुड़ी कहानियाँ गायब हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने की लीड मिलिट्री रिफार्म पर है। फिर दाईं ओर दो कॉलम ख़बर आरबीआई रिपोर्ट पर है। पेज नंबर 13 पर विपक्ष के हमलावर बयानों को जगह दी गई है। साथ में एक तस्वीर है जो नोटबंदी के समय लगी लाइनों की याद ताजा करती है।  पर कोई संपादकीय इसमें भी नहीं है।

सवाल उठता है कि इतने महत्वपूर्ण मसले पर अख़बारों में संपादकीय क्यों नहीं छपा जिसके लिए वक़्त की कोई कमी नहीं थी। नोटबंदी को फ़ेल लिखने में संपादकों के हाथ क्यों काँप रहे हैं। वे एक तबाही के गवाह हैं, लेकिन गवाही देने से इंकार कर रहे हैं। क्या यह सही वक़्त नहीं था कि उन लोगों की क़ुर्बानियों को याद किया जाता जिनकी नोटबंदी की वजह से जान गई। या फिर उनसे सवाल किया जाता  जिनकी वजह से नोटबंदी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ी। संपादकगण यह सब जानते-बूझते जो कर रहे हैं, नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं !

बहरहाल नोटबंदी के पूरे ड्रामे की असलियत बीजेपी पहले दिन से जानती थी। आपको अगर वह वीडियो ना याद हो जिसमें दिल्ली प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ख़ुद मान रहे हैं कि लाइन में खड़े लोगों को बेवक़ूफ़ बनाने के लिए उन्होंने देशभक्ति का गाना गाया, तो यहाँ देख लीजिए–

.बर्बरीक


 

5 COMMENTS

  1. मुझ जैसा सामान्य आदमी तक जो अपने आस-पास (निवासी-कानपुर, उत्तर प्रदेश) नोटबदली(यहाँ तो पढ़े-लिखे मूर्ख भी नोटबंदी न केवल कह बल्कि छाप तक रहे हैं) के बाद जैसी स्थितियों को देख समझ रहा है इस आधार पर इसका तहेदिल से न सिर्फ समर्थन करता है बल्कि सुझाव भी देना चाह रहा है कि अब इसी आकस्मिक तरीके से दो हज़ार का नोट बंद कर दिया जाये और तत्पश्चात 100 का नोट भी बदल दिया जाये! यहाँ देखिये प्रॉपर्टी के रेट्स कम से कम 15-25 प्रतिशत तक कम हुए और KDA के फ्लैट्स बार-बार लुभावने विज्ञापन के बाद भी बिक नहीं रहे, अर्थात दलाल और प्रॉपर्टी माफ़िया दोनों की हालत खराब है! यही क्या कम फायदा है? वास्तव में डोमेस्टिक कालाधन बैंकों में पहुँच गया, असली मज़ा ज़रा पैन-आधार लिंक हो जाने दीजिये उसके बाद आएगा! मोदी प्लान कम से कम बुद्धिजीवियों की समझ से बाहर है! वैसे भारतीय विशेषज्ञों ने दुनिया के तमाम उन अर्थ-विशेषज्ञों जिनका स्पष्ट मत कि करेंसी को सात-आठ साल में बदल देना चाहिए को अपने मूर्खतापूर्ण कुतर्कों से तो फेल कर ही दिया है!

  2. प्रदीप जी ये तो सच है, कोई बुद्धिजीवी हो तो.., उसकी समझ के तो बाहर है..!!

  3. भाई, आपने इतना लंबा-चौड़ा जो लिख मारा है, उसमें आपकी फ्रस्ट्रेशन के साथ-साथ कुछ सच्चाई भी अवश्य है, लेकिन लगता है, आपने कभी अखबार में काम नहीं किया, ना ही उनके कामकाज के विषय में आपको विशेष जानकारी है. इसके बावजूद आपने सारे अखबारों की छानबीन का काम हाथ में ले लिया, ये आपको हास्यास्पद बना रहा है. नोटबंदी की सफलता/असफलता पर आपसे बहस नहीं करूंगा, पर इतना कहना चाहता हूं कि नोटबंदी के आंकड़े आरबीआई ने देर शाम में जारी किए. उसको जिस किसी अखबार ने फ्रंट पेज की लीड नहीं बनाया, तो उसकी गलती कही जा सकती है, लेकिन अगर आप इसी खबर पर उसी दिन संपादकीय पन्ने पर लेख ढूंढ़ रहे थे, तो इसमें आपकी भी कम गलती नहीं है. चूंकि संपादकीय पन्ने बाकी पन्नों से पहले तैयार कर लिये जाते हैं, इसलिए नोटबंदी पर संपादकीय लेख अगले दिनों में आए होंगे.

  4. प्रदीप श्रीवास्तव तो बड़े वाले बुद्धिजीवी हैं। वैसे जितने लाला होते हैं, 95 प्रतिशत संघी और बुद्धिजीवी ही होते हैं।

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