Home अख़बार …दिल ढाह कर जो काबा बनाया तो क्‍या हुआ!

…दिल ढाह कर जो काबा बनाया तो क्‍या हुआ!

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जावेद नक़वी

जब हमें कोई तोहफ़ा देता है, तो उसे लेने में या अदब से ठुकराने में भी हम अपनी शराफ़त दिखाते हैं। सिंध में रहने वाले अल्‍पसंख्‍यक हिंदुओं ने इस साल तय किया कि वे रामलीला नहीं मनाएंगे क्‍योंकि मुहर्रम का दसवां रोज़ यानी अशुरा उसी दिन पड़ रहा था। इस समुदाय के नेताओं ने दोनों मज़हबों के बीच सौहार्द बढ़ाने के लिहाज़ से उदारता दिखाते हुए यह पेशकश रखी।

यह अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है कि अशुरा के दौरान सुरक्षा इंतजामात की मजबूरियों के चलते यह कदम उठाया गया होगा, जिसका जलसा कराची जैसे शहरों में अकसर अराजक रूप ले लेता है। जाहिर है फिदायीनों के इस दौर में यदि रामलीला और मुहर्रम का जश्‍न साथ मनता, तो एक साथ दोनों नाज़ुक समुदायों की निगरानी और सुरक्षा का काम एक चुनौती बन जाता।

इसलिए शियाओं की तरफ़ हिंदुओं के इस सौहार्दपूर्ण बरताव की सराहना की जानी चाहिए। खासकर एक ऐसे दिक्‍कततलब वक्‍त में, जब मज़हब का इस्‍तेमाल लोगों को साथ लाने के बजाय डराने-धमकाने और आतंकित करने में किया जा रहा हो। मान लीजिए कि मुहर्रम पर ग़मी मनाने वाले मुसलमानों ने सिंध के हिंदुओं की इस पेशकश को ठुकरा दिया होता, तब क्‍या होता। ऐसा बेशक हो सकता था। इसकी ठोस वजहें हैं।

मुहर्रम और रामलीला दोनों ही पर्व बुरे पर अच्‍छे की जीत का पैग़ाम देते हैं। कुछ ऐसे मुसलमान बेशक हैं जो मुहर्रम के बारे में इस राय से इत्‍तेफ़ाक़ नहीं रखते। मसलन, दिल्‍ली में मेरे एक पड़ोसी हैं जो इस्‍लाम पर बच्‍चों की किताबों का एक प्रकाशन चलाते हैं। उन्‍होंने अशुरा के दिन अपनी बिटिया की शादी पर मुझे बुलाया था।

इस बात पर कई मुसलमानों को हैरत हो सकती है, चाहे शिया हों या सुन्‍नी। कई हालांकि ऐसे भी हैं जो अचरज नहीं करेंगे। बड़ी अजीब बात है कि खाड़ी के अदबी मुसलमान शासकों के लिए मुहर्रम आज एक-दूसरे को नए साल की बधाई भेजने का मौका बन गया है। संचार तकनीक के आने के चलते ही ऐसा मुमकिन हुआ है।

इसी तरह दक्षिण भारत में कुछ लोग हैं जो रावण की पूजा करते हैं, फिर भी उन्‍हें हिंदू माना जाता है। इंडोनेशिया में तो मंच पर रामलीला खेलने वाले सारे कलाकार मुसलमान ही होते हैं। पश्चिम बंगाल के मुसलमान भी दुर्गा पूजा मनाने के लिए कमेटियां बनाते हैं और पैसे जुटाते हैं, जो रामलीला या दशहरा के साथ ही पड़ती है।

पाकिस्‍तान के मुसलमानों के बीच शिया भले ही अल्‍पसंख्‍यक हों, लेकिन मुट्ठी भर हिंदुओं के मुकाबले वे सियासी और आर्थिक रूप से ज्‍यादा मज़बूत हैं। अगर उन्‍हें हिंदुओं के प्रति उदार होने में परेशानी हो, तो वे करबला के नायक इमाम हुसैन से सबक ले सकते हैं। करबला की कहानी के बारे में मेरी सीमित जानकारी कहती है कि बेहद खराब वक्‍त में इमाम हुसैन ने बहुत उदारता दिखायी थी। प्‍यासे हूर और उसकी फौज ने जब हुसैन के काफिले से पानी के लिए पनाह मांगी, तो उन्‍होंने अपने काफिले के पास सीमित मात्रा में मौजूद पानी का मुंह नहीं देखा बल्कि दुश्‍मन की प्‍यास बुझायी। वैसे भी, सिंध के हिंदू शियाओं के कोई दुश्‍मन थोड़े हैं।

मीर तक़ी मीर महान शायर होने के साथ एक समर्पित शिया मुस्लिम भी थे। उन्‍होंने कहा था, ”मत रंज कर किसी को, कि अपने तो ए’तिक़ाद / दिल ढाय कर जो का’ब: बनाया, तो क्‍या हुआ।” वे क्‍या कहना चाह रहे हैं? उनका आशय है कि अपना काबा बनाने के लिए किसी का दिल मत तोड़ो। मीर यहां बुल्‍ले शाह की भावना को ज़बान दे रहे हैं।

उदारभाव के अनंत फायदे हैं। एक किस्‍सा यहां याद आता है हिंदुओं से जुड़ा हुआ, जो खुद को हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं। मैं दावा नहीं कर सकता कि यह कितना सच है, लेकिन कहते हैं कि करबला की जंग में इमाम हुसैन की ओर से लड़ने वाले हिंदुओं को यह नाम मिला था। भारतीय अभिनेता सुनील दत्‍त खुद को हुसैनी ब्राह्मण मानते थे। वाकई? मुझे उनके बारे में जितनी मालूमात है, वह अपने आप में एक शानदार और अनोखी कहानी है।

दशकों पहले लखनऊ में मेरी मुलाकात एक बुजुर्ग आध्‍यात्मिक शिया औरत से हुई थी। उनका नाम ज़कीरा था। वे मुहर्रम में औरतों के जुटान में सोज़ और सलाम गाया करती थीं और किसी छोटे-मोटे नवाब के यहां नौकरी बजाती थीं। वे मुझे उन दिनों की बात बताती थीं जब विभाजन में हुई हिंसा के दौरान सुनील दत्‍त ने उनके साथ लखनऊ में पनाह ली थी। उनकी हिंदू पहचान सामने न आने पाए, इसलिए वे उन्‍हें अख्‍़तर कह कर बुलाती थीं। बाद में दत्‍त जब मशहूर फिल्‍मी हस्‍ती हो गए, तब भी वे दोनों एक-दूसरे के संपर्क में बने रहे।

करबला की जंग में यदि ऐसी उदारता नहीं दिखायी गई होती तो हिंदू कवि मुंशी छन्‍नूलाल दिलगीर क्‍या लिख पाते? तब क्‍या उन्‍होंने अपना मशहूर नोहा लिखा होता, ”घबराए जी ज़ैनब”? दिलगीर 1803 में पैदा हुए और मीर अनीस से पहले हुए थे। उन्‍होंने 417 मर्सिये भी लिखे। मुझे पता चला कि लखनऊ में ‘घबराए जी ज़ैनब’ को काफी तेज़ स्‍वर में पढ़ा जाता था। नासिर जहां ने जब 1956 में रेडियो पाकिस्‍तान के लिए इसे पढ़ा, तो उन्‍होंने इसकी अदायगी थोड़ा धीमी कर दी। यह दिल को छू लेने वाले राग गारा और भटियारी धुन के बीच की बंदिश है।

जब हम फ़ैज़ को यह कहते सुनते हैं- हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएंगे- तो स्‍वाभाविक रूप से दिमाग में अचानक अल्‍जीरियाई क्रांति पर फ्रांज़ फैनन के विचार कौंध उठते हैं और उन किसानों की याद हो आती है जिन्‍हें अपने संघर्ष से केवल इंसाफ़ और बराबरी मिलने की उम्‍मीद थी। फैनन की किताब दि रेचेड ऑफ दि अर्थ का फ़ारसी में तर्जुमा ईरानी विद्वान अली शरीयती ने किया था और उसका नाम दिया था- मुस्‍तज़फीन-ए-ज़मीं।

दरअसल फ़ैज़ जिस बराबरी और इंसाफ़ की बात करते हैं, वह सियासी खयाल ही खाड़ी के कुलीनों को परेशान करता है। ये और बात है कि पश्चिमी मीडिया ने ईरानी क्रांति को एक कट्टरपंथी खतरा बताकर इसमें मदद ही की है और इसे एक लोकप्रिय चुनौती के तौर पर पेश नहीं किया, जो बड़ी संख्‍या में सुन्नियों के साथ होने का दावा करता है जहां दोनों ही पक्ष क्षेत्रीय तानाशाहों और सामंती क्षत्रपों के खिलाफ़ हैं।

अयातुल्‍ला खोमैनी ने क्रांति-पूर्व के ईरानी समाज को समझाने के लिए शरीयती से ही शब्‍द उधार लिए थे। उनके मुताबिक यह समाज दो विरोधी तबकों में बंटा था: शोषित तबका (मुस्‍तज़फ़ीन) और शोषक (मुस्‍तक़बरीन)। जितनी मेरी समझ है, मैं कह सकता हूं कि सिंध के हिंदू और पंजाब के ईसाई बाकायदा मुस्‍तज़फ़ीन कहे जाने की हैसियत रखते हैं।


वरिष्‍ठ पत्रकार जावेद नक़वी पाकिस्‍तान के मशहूर अख़बार डॉन के दिल्‍ली में संवाददाता हैं। उनका डॉन में नियमित स्‍तंभ छपता है। यह टिप्‍पणी 3 अक्‍टूबर को डॉन में प्रकाशित हुई है। वहीं से साभार। अनुवाद अभिषेक श्रीवास्‍तव का किया है।

 

3 COMMENTS

  1. श्री अभिषेक श्रीवास्तव,
    नमस्कार।
    आपने श्री जावेद नकवी की सारगर्भित टिप्पणी का सुंदर अनुवाद किया, उसके लिए आप सराहना के पात्र हैं। मुस्तजफीन और मुस्तजबरीन शब्दों से पहली बार वाकिफ हुया। श्री नकवी ने धार्मिक इतिहास, संस्कृति और वर्तमान माहौल को बखूबी समझाया और नसीहतें भी दीं। उसमें काफी जनरल नॉलेज भी है।
    मीडिया विजिल के अधिकतर खबरें और लेख काफी विचारोत्तेजक होते हैं।

  2. Geetaa Press—SANT VISHESHANK—-It consists of at least dozens of Muslim devotees who adored RAM and Krishna etc. Maternal uncle of Bharat ratna Ustad Bismillah Khan was a secular. A famous temple s door opened with his shehnai recital.Countless example…. When you see an emotional scene of cinema do you think Amir Khan is Muslim? Or Mohammed Rafi.

  3. बरजस्ता(तत्काल), तारीफ के लिए अल्फाज़ नहीं सूझ रहे हैं. अभिषेक श्रीवास्तव जी, इसे share और अनुवाद के लिए आपका आभार.

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