Home अख़बार अख़बारनामा: राजनीतिक मैच जिताने वाले ‘छक्के’ की ख़बर आपके अखबार में है?

अख़बारनामा: राजनीतिक मैच जिताने वाले ‘छक्के’ की ख़बर आपके अखबार में है?

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संजय कुमार सिंह

लोकसभा में पेश और पास आरक्षण बिल से संबंधित दो खबरों की चर्चा। पहले, प्रधानमंत्री ने कल महाराष्ट्र के सोलापुर और उत्तर प्रदेश के आगरा में जनसभाएं की। दैनिक भास्कर ने इसे रैली में भी आरक्षण के तहत, “मैंने बिना किसी का हक काटे, गरीब उच्च जातियों के बच्चों की चिन्ता की है” शीर्षक से छापा है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने दावा किया तो यह खबर छपी है और दावा इसलिए किया कि अखबारों में खबर के साथ यह बताने का रिवाज नहीं है कि देश में सरकारी शिक्षा की जो हालत है वह पिछले चार वर्षों में और खराब हुई है तथा उसे ठीक करने की बजाय आरक्षण देना और यह दावा करना कि मैंने किसी का हक काटे बिना ऐसा किया है – अपने आप में गलत तो है ही चुनावी चाल भी है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री या उनके दल और उनके सहयोगियों ने पूरी संसद की सहमति के बाद ऐसा किया है। हालांकि अभी इसमें अड़चन हैं। पर उसे फिलहाल छोड़ भी दें तो कौन नहीं जानता यह आरक्षण दूसरे सभी दलों के समर्थन से ही लागू हो पाएगा और 27 दलों ने इसे समर्थन दिया है तो 19 ने इससे पहले लेकिन भी लगाया है (दैनिक भास्कर की अलग खबर)।

मैं आज जिस दूसरी खबर की चर्चा करूंगा वह है, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग को आरक्षण देने के मोदी सरकार के फैसले को मैच जिताने वाला छक्का बताया। बुधवार को उन्होंने कहा कि अभी इस मैच में विकास से जुड़े और भी छक्के देखने को मिलेंगे। अभी तक जाति के आधार पर जारी आरक्षण के साथ आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रस्ताव बुनियादी तौर पर बिल्कुल अलग चीज है। इसपर चर्चा के लिए किसी तरह की तैयारी का मौका दिए बिना लागू करने की स्थिति बना देना भले सामान्य वर्ग के फायदे के लिए बताया जा रहा हो पर सरकार की ओर से सामान्य कार्रवाई नहीं है। इसके लिए पेश 124वें संविधान संशोधन विधेयक पर राज्यसभा में चल रही चर्चा में हिस्सा लेते हुये रविशंकर प्रसाद ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुये कहा कि सरकार ने यह साहसिक फैसला समाज के सभी वर्गों को विकास की मुख्य धारा में समान रूप से शामिल करने के लिये किया है। सरकार पर अपने वादों को पूरा नहीं करने के विपक्ष के आरोप पर प्रसाद ने कहा ‘‘मैच जिताने वाला यह पहला छक्का नहीं है, अभी ऐसे और भी छक्के लगेंगे।’’

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार जो कर रही है. सोच समझकर कर रही है और स्वीकार भी कर रही है। प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं तो वह बड़ी खबर है प्रमुखता से छप रही है और कानून मंत्री संसद मे स्वीकार कर रहे हैं तो वह खबर अखबारों में नहीं है, या कम महत्वपूर्ण बना दी गई है। और तो और आमतौर पर सभी खबरें विस्तार से छापने वाले दैनिक भास्कर में रविशंकर प्रसाद की यह घोषणा प्रमुखता से नहीं है। हालांकि, प्रधानमंत्री के दावे वाली खबर भी पहले पन्ने पर नहीं है। मैं एक बार अखबार पलट गया, रविशंकर प्रसाद वाली खबर नहीं दिखी। देसी-विदेशी खबरों के पन्ने पर भी ढूंढ़ा, नहीं दिखी। शीर्षक में तो नहीं है। किसी खबर में अंदर चर्चा हो तो मैं नहीं कह सकता। मेरे हिसाब से तो यह खबर प्रमुखता से छपने वाली है।

आइए, देखें दूसरे अखबारों में क्या स्थिति है। हिन्दुस्तान टाइम्स में दोनों ही खबर पहले पन्ने पर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री के दावे वाली खबर है। और अच्छे से है। पहले पन्ने पर दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, “मुख्यमंत्री के रूप में मैं यह कोटा नहीं ला सका, प्रधानमंत्री के रूप में ऐसा करके खुश हूं”। टाइम्स ऑफ इंडिया में रविशंकर प्रसाद वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं है पर सिंगल कॉलम की एक खबर में बताया गया है कि सरकार बजट सत्र में ऐसे और ‘छक्के’ लगा सकती है। इस खबर का विस्तार अंदर के पन्ने पर है और उसपर रविसंकर प्रसाद की भी खबर है – फोटो के साथ। शीर्षक है, “यह पहला छक्का है और के लिए तैयार रहिए”। इंडियन एक्सप्रेस में दोनों ही खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। द टेलीग्राफ में प्रधानमंत्री वाली खबर नहीं है (जो है वह कुछ और है) पर रविशंकर प्रसाद वाली खबर है – “बजट से पहले छक्कों का वादा”। फ्लैग शीर्षक है, टैक्स में छूट या कम से कम जोरदार संकेत।

नवोदय टाइम्स में दोनों ही खबर पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दुस्तान ने प्रधानमंत्री के दावे को तो प्रमुखता से उनकी बड़ी फोटो के साथ बड़े फौन्ट में छापा है पर रविशंकर प्रसाद वाली खबर का जिक्र, विधेयक पास वाली मुख्य खबर में ही है। नवभारत टाइम्स में प्रधानमंत्री के दावे की खबर तो पहले पन्ने पर प्रमुखता से है और विस्तार अंदर होने की सूचना भी लेकिन रविशंकर प्रसाद वाली खबर नहीं है। असल में अखबारों में रिवाज यही है कि किसने कहा वह महत्वपूर्ण है। क्या कहा वह कम महत्वपूर्ण हो जाता है। मैं दोनों खबरों को सरकारी पक्ष मान रहा हूं इसलिए मुझे लगता है कि दोनों को समान महत्व मिलना चाहिए पर राजनीति यही है कि कौन क्या कहे ताकि उसी हिसाब से प्रमुखता मिले। राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और दैनिक जागरण में दोनों ही खबरें पहले पन्ने पर प्रमुखता से नहीं है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। जनसत्ता में रहते हुए लंबे समय तक सबकी ख़बर लेते रहे और सबको ख़बर देते रहे। )

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