Home काॅलम आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 24 फ़रवरी, 2018

आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 24 फ़रवरी, 2018

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नवभारत टाइम्स

नेता के घर भूत

भारतीय राजनीति में काफी दिनों बाद भूत फिर से चर्चा में चर्चा में आए हैं। बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव ने कहा कि पटना में आवंटित सरकारी बंगला वह भूतों के डर से छोड़ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने उनके पीछे भूत छोड़ दिया है। यादव के बयान से लगा कि भूत-प्रेत सियासत में ही नहीं, प्रशासन में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। क्योंकि तेजप्रताप जैसे नेता से मकान खाली करवा लेना किसी सामान्य मनुष्य के बूते की बात नहीं। उनके बयान के जवाब में उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कहा कि ‘जो लोग खुद भूत हैं, उनके लिए भला भूत छोड़ने की क्या जरूरत। शुक्र है, सीएम साहब ने लालू परिवार से पिंड छुड़ा लिया नहीं तो बिहार का न जाने क्या होता।’ बहरहाल, भूत की गतिविधियां अभी सिर्फ बिहार और विपक्ष तक सीमित नहीं हैं। राजस्थान के सत्ताधारी बीजेपी विधायक भी भूत से डरे हुए हैं। दो विधायकों की असमय मौत के बाद उनका ध्यान दैवी कारकों की तरफ गया है। उनका प्रेक्षण है कि राजस्थान विधानसभा में अब तक 200 विधायक कभी भी एक साथ नहीं बैठे हैं। पार्टी के एक विधायक ने भूत-प्रेत का साया हटाने के लिए सीएम वसुंधरा राजे से विधानसभा में यज्ञ करवाने की मांग की है। भूत-प्रेत से डरने वाले नेताओं को भले ही हम अंधविश्वासी या पुरातनपंथी कहें, पर इतनी ईमानदारी तो इनमें है कि अपने मन की बात खुलकर कह रहे हैं। इसके विपरीत प्रगतिशील छवि वाले कुछ नेता अपने विश्वास विश्वास अपने विश्वास विश्वास को छुपाते रहे हैं, लेकिन उनकी बातें भी किसी न किसी तरह बाहर आ ही हैं। यूपी के पिछले तीन सीएम कोई न कोई बहाना बनाकर नोएडा की यात्रा डालते रहे। नेताओं के बंगले में वास्तु दोष के कारण अगले दरवाजा बंद करने, किसी तांत्रिक से आशीर्वाद लेने, अंगूठी या रुद्राक्ष धारण करने या यज्ञ कराने की खबरें अक्सर आती ही रहती हैं। जयललिता के अनुष्ठानों की चर्चा खूब होती थी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने पांच दिवसीय महायज्ञ सात करोड़ के खर्चे पर कराया। इस पर सवाल उठे तो उन्होंने सफाई दी कि इसके लिए सरकारी फंड से कोई खर्च नहीं किया गया। सवाल केवल खर्च का नहीं, एक जिम्मेदार पद पर बैठे राजनेता के व्यवहार का भी है। उसके आचरण का असर उसके समर्थकों पर भी पड़ता है। एक जनप्रतिनिधि का काम विकास कार्यों में हिस्सा बंटाने के अलावा जनता का सामाजिक-सांस्कृतिक और मानसिक परिष्कार करना भी है। वह खुद ही अंधविश्वास और पोंगापंथी मूल्यों से ग्रस्त रहेगा तो जनता की चेतना पीछे ही जाएगी। एक आधुनिक और और मजबूत भारत के निर्माण के लिए जरूरी है कि हमारा सिस्टम किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा न दे।


जनसत्ता 
विवाद के बावजूद

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडू की हफ्ते भर की भारत यात्रा की परिणति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत और दोनों देशों के बीच छह समझौतों के साथ हुई। इन समझौतों में उच्च शिक्षा, ऊर्जा और खेलकूद आदि क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है। इस तरह अंत भला तो सब भला के अंदाज में ट्रुडू की इस यात्रा का समापन हुआ। पर इससे पहले जो खटास पैदा हुई थी वह इस अवसर पर भी छिपी न रह सकी, सांकेतिक रूप से सतह पर दिख ही गई। द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत के बाद जब संयुक्त रूप से मीडिया से मुखातिब होने की बारी आई तो मोदी ने कहा कि ऐसे लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है जो राजनीतिक लक्ष्यों के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हों; भारत की एकता और अखंडता को चुनौती देने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि यह कहने के पीछे मोदी का इशारा किधर रहा होगा। अमूमन ऐसे मौकों पर भारतीय नेतृत्व की शब्दावली ऐसी होती है कि सीमापार आतंकवाद और इस तरह पाकिस्तान की तरफ ध्यान जाता हो। लेकिन मोदी ने जो कहा उसमें साफ तौर पर इशारा खालिस्तानी आतंकवादी जसपाल अटवाल की तरफ था। अटवाल के कारण ही ट्रुडू की यात्रा विवाद में घिर गई थी।

मुंबई में ट्रुडू के स्वागत में हुए एक समारोह में अटवाल की मौजूदगी से हंगामा मच गया। यही नहीं, बाद में खुलासा हुआ कि दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग में एक भोज-समारोह में शामिल होने के लिए भी उसे निमंत्रित किया गया था। अलबत्ता उसे निमंत्रित किए जाने की बात सामने आते ही वह समारोह रद्द कर दिया गया। इसलिए जब मोदी ने देश की एकता और अखंडता को बर्दाश्त न करने की बात कही, तो शायद वे कनाडाई अतिथि को यह जताना चाहते रहे होंगे कि उन्हें भारत की चिंताओं का खयाल रखना चाहिए। अटवाल की वजह से विवाद खड़ा होने से पहले भी यह लग रहा था कि ट्रुडू को लेकर भारत सरकार कुछ खास उत्साहित नहीं है, जबकि वे कोई निजी नहीं, बल्कि आधिकारिक यात्रा पर आए थे। हाल में कई राष्ट्राध्यक्षों की अगवानी करने के लिए मोदी प्रोटोकॉल की परवाह न करते हुए हवाई अड््डे पहुंचे थे। लेकिन हवाई अड््डे पर ट्रुडू का स्वागत करने न प्रधानमंत्री पहुंचे न कोई केंद्रीय मंत्री। परिवार सहित ट्रुडू ताजमहल देखने आगरा गए, साबरमती आश्रम गए। पर न उत्तर प्रदेश में न गुजरात में वहां के मुख्यमंत्री ने मिल कर उनकी अगवानी की। इस ठंडे रुख के पीछे क्या वजह रही होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

ट्रुडू की लिबरल पार्टी के कई नेताओं और मंत्रियों के बारे में माना जाता है कि खालिस्तानी आंदोलन से उनका करीबी रिश्ता है। कनाडा में लाखों सिख बसे हैं। उनके पास वोट की ताकत भी है और चुनाव में चंदे से मदद करने की भी। इसी ताकत और इसी मदद का हवाला देकर जसपाल अटवाल जैसे तत्त्व अपना उल्लू सीधा करते हैं, राजनीतिक पैठ बनाते हैं या राजनीतिक संरक्षण हासिल करते हैं। लिबरल पार्टी के नेताओं और मंत्रियों को कनाडा के आम सिख समाज और अटवाल जैसे लोगों के बीच फर्क करना होगा। इस मामले में भारत ने इशारों में भी और जाहिराना तौर पर भी सख्त संदेश दिया है। द्विपक्षीय मसलों पर मोदी और ट्रुडू के बीच हुई बातचीत से उम्मीद की जानी चाहिए कि जो थोड़ी-सी वक्ती खटास पैदा हुई वह धुल गई होगी और दोनों देशों के रिश्ते बेहतर ही होंगे।


अमर उजाला
बयान और विवाद

पूर्वोत्तर पर आयोजित डीआरडीओ के एक सेमिनार में सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने असम में घुसपैठ के संदर्भ में बोलते हुए वहां की एक राजनीतिक पार्टी एआईयूडीएफ का जिस अंदाज में जिक्र किया, उस से बचा बचा जाता, तो अच्छा था। इसमें कोई शक नहीं कि सेना प्रमुख का पूरा भाषण तथ्यपूर्ण और पूर्वोत्तर में घुसपैठ से पैदा हुई भीषण स्थिति को संबोधित करता था। असम में लंबे समय से जारी घुसपैठ ने वहां की जनसांख्यिकी बिगाड़ दी है। उसके पीछे कुख्यात आईएमडीटी एक्ट का भी बड़ा हाथ रहा है, जिसके तहत घुसपैठियों के प्रति नरमी बरती जाती रही और जिसे

2005 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद निरस्त किया गया। लेकिन यह कहना, कि बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ के विस्तार में इस घुसपैठ की बड़ी भूमिका रही है, असैन्य मामलों पर टिप्पणी करने का एक असाधारण उदाहरण है, जिसकी इजाजत हमारा संविधान सेना को नहीं देता। चूंकि असम में विधानसभा की 126 में से करीब 50 सीटों पर मुस्लिम मतदाता कमोबेश प्रभावी भूमिका में हैं, लिहाजा यह बिल्कुल हो सकता है कि इस  एआईयूडीएफ को इसका स्वाभाविक लाभ मिला हो, लेकिन यह किसी अति महत्वपूर्ण गैरराजनीतिक व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक मंच से कहे जाने का विषय कतई नहीं हो सकता। तब तो और भी नहीं, जब असम में अवैध घुसपैठियों की शिनाख्त करने के लिए एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन) को अपडेट किया जा रहा है, जिससे वहां तनाव का माहौल बना हुआ है। सेना प्रमुख ने बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ के लिए हमारे पड़ोसियों की ओर इशारा किया, जो सच तो है, लेकिन पूरा सच शायद ही है, क्योंकि घुसपैठ की सबसे बड़ी वजह आर्थिक है। इसके अलावा पड़ोसी देशों पर सेना प्रमुख की टिप्पणी हमारी सरकार को ही असहज करेगी। देश को बाहरी खतरों से सुरक्षित रखने के मामले में हमारी सेना का गौरवशाली इतिहास रहा है। इसके अलावा हमारी सेना ने कई पड़ोसी देशों की सेना के विपरीत राजनीति से खुद को निरपेक्ष रखते हुए शुरू से ही एक शानदार परंपरा स्थापित की है। इसलिए भी यह जरूरी है कि गंभीर से गंभीर स्थिति में सैन्य और असैन्य मामलों के बीच बनी नियंत्रण रेखा का पालन किया जाए।


हिन्दुस्तान

किसानों की अनदेखी

देश भर के किसानों के 68 संगठनों का दिल्ली कूच साबित करता है कि किसानों की समस्याओं के समाधान की दिशा में दरअसल अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो उन्हें लंबे समय के लिए आश्वस्त कर सके। दिल्ली कूच तो इनका प्रतीकात्मक प्रयास है, असल योजना अपने-अपने राज्यों में सक्रिय विरोध प्रदर्शन की है, ताकि उनकी आवाज दूर तक जा सके। उन्हें भले ही सीमाएं बांधकर दिल्ली पहुंचने से रोक दिया गया हो, लेकिन यह सवाल तो फिर से गूंज ही गया है कि किसानों को हल-बैल-ट्रैक्टर छोड़ दिल्ली का रुख करना क्यों पड़ा? किसान कर्ज माफी के साथ एम एस स्वामीनाथन आयोग की वह रिपोर्ट भी लागू करवाना चाहते हैं, जिसे किसानों की दशा सुधारने के लिए कारगर सुझाव देने थे। माना गया था कि यह एक युगांतरकारी कदम होगा। केंद्र सरकार ने साल 2004 में किसानों की दशा सुधारने और खाद्यान्न के मामले में आपूर्ति की कड़ी भरोसेमंद बनाने के लिए जाने माने अर्थशास्त्री एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स का गठन किया था। आयोग ने साल 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें किसानों के तेज और समग्र आर्थिक विकास के उपाय सुझाए गए। सवाल है कि किसानों की रीढ़ मजबूत करने वाली इतनी महत्वाकांक्षी सिफारिशों की आखिर अब तक अनदेखी क्यों होती रही है?

इसमें शक नहीं कि हमारा किसान लंबे समय से तमाम तरह के संकटों से जूझता रहा है, लेकिन उसकी समस्याओं के स्थाई समाधान में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई गई। महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु तक उनकी समस्याएं कमोबेश समान हैं। एक जमाने में भले ही विदर्भ किसानों की आत्महत्या के लिए सुर्खियों में रहा हो, बाद के दिनों में तो कोई भी राज्य इस क्रूर सच से बच नहीं सका। हमारी कृषि विकास दर यूं भी कम रही है। किसान की आमदनी जरूरत और अपेक्षा से भी कहीं कम है। वह सूखे का शिकार होता है, बाढ़ का भी। फसल का उचित दाम न पाने को तो वह अभिशप्त ही है। बिचौलियों का तंत्र उसे इन अभिशाप से निकलने नहीं देता। ऐसे में, अगर वह कोई दूरगामी और स्थायित्व वाली योजना की मांग करता है, तो गलत क्या है? लेकिन सच यही है कि जब भी उसने आवाज उठाई, उसे समाधान तो नहीं मिला, व्यवस्था का कोपभाजन जरूर बनना पड़ा।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में किसानों को उत्पादन मूल्य का पचास प्रतिशत से ज्यादा दाम देने और उन्नत किस्म के बीज कम दामों में उपलब्ध कराने की बात है। यह किसानों को प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए जोखिम फंड बनाने की वकालत करती है। यह चाहती है कि फसल बीमा योजना पूरे देश में और हर फसल के लिए तो मिले ही, खेती के लिए कर्ज की ऐसी व्यवस्था हो, जो गरीब से गरीब किसान तक आसानी से पहुंचे। यह कर्ज वसूली में हालात के अनुरूप राहत की बात भी करती है। ऐसा भी नहीं है कि किसानों की समस्याओं पर आज तक कुछ हुआ ही नहीं। बहुत कुछ है, जो हुआ और इन सिफारिशों के आसपास भी होगा। लेकिन असल जरूरत किसानों की समस्याओं के प्रति संजीदा और उनका समाधान करने के प्रति सचेष्ट दिखने की है। उनके साथ बैठकर उनकी बातें संजीदगी से समझने की जरूरत है। शायद यही पहल अब तक छले गए किसानों को आश्वस्त कर जाए।


राजस्थान पत्रिका

गंभीर पहल जरूरी!

लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की सालों पुरानी पुरानी मांग पर एक बार फिर मंथन होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एनडीए में शामिल राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उप मुख्यमंत्रियों के साथ इस मुद्दे पर उनकी राय जानेंगे। पिछली बार अपने घोषणापत्र में भाजपा ने एक साथ साथ में भाजपा ने एक साथ साथ चुनाव के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था सन् 1952 से लेकर 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ होते थे। लेकिन इसके बाद ढर्रा फिर कभी पटरी पर नहीं आ पाया है। विधि आयोग ने 1999 में एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई। फिर 2012 में लालकृष्ण आडवाणी ने भी इस मुद्दे को उछाला था। मोदी सरकार आने के बाद 2015 में संसद में विधि मामलों की स्थाई समिति ने एक साथ चुनाव के फायदे गिनाए। इसके बाद सरकार की तरफ से से सरकार की तरफ से से से जनता के विचार मांगने के सिलसिले से से सिलसिले से से लेकर सर्वदलीय बैठक की बात हुई लेकिन हमेशा की तरह आधी-अधूरी। पिछले साल चुनाव आयोग ने घोषणा कर डाली कि सितम्बर, 2018 के बाद वह लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने को तैयार है आयोग का मानना था कि हर छह महीने में में चुनाव होने से पैसा भी अधिक खर्च होता है और आचार संहिता प्रभावी होने के कारण सरकारी कामकाज में भी बाधा पड़ती है। मोदी सरकार आए चार साल हो चुके लेकिन इस दिशा में अब तक ये नहीं कहा जा सकता कि एक साथ चुनाव कब होंगे? जाहिर है इस मुद्दे पर पहल सरकार को ही करनी होगी। विपक्ष को भी इस मुद्दे पर अपने साथ लाना होगा तथा कानूनी पहलुओं का समाधान भी निकालना होगा। एक साथ चुनाव का सुझाव अच्छा है लेकिन काम सिर्फ बातों से चलने वाला नहीं है।


दैनिक भास्कर

शीर्ष कोर्ट की दो पीठों में भूमि अधिग्रहण का मसला 

सुप्रीम कोर्ट में तीन-तीन जजों की पीठ के आमने-सामने आने से इंसाफ अटक गया है। यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ और दीपक गुप्ता की पीठ ने उससे पहले आए न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, एके गोयल और मोहन एम शांतनागौडार के भूमि अधिग्रहण संबंधी फैसले को स्टे कर दिया था। अरुण मिश्रा की पीठ ने कहा था कि अगर पांच साल तक किसी को जमीन का मुआवजा नहीं दिया गया है तो उसे जमीन अधिग्रहण रद्‌द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इस पीठ ने यह निर्णय चार साल पहले दिए गए न्यायमूर्ति लोढ़ा के फैसले को पलटते हुए दिया था। स्पष्ट तौर पर यह न्यायिक विकास के दौरान पैदा हुई गतिरोध की स्थिति है और इससे निपटने के लिए बड़े न्यायिक विवेक की जरूरत है। अब इस मामले को देखने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश संवैधानिक पीठ का गठन करेंगे और उसमें न्यायिक अनुशासन, न्यायिक औचित्य और नियमितता के सवालों पर विचार होगा। भूमि अधिग्रहण का सवाल भारतीय राजनीति को भी लंबे समय से मथता रहा है और जाहिर है वह न्यायपालिका को भी आसानी से छोड़ने वाला नहीं है। विकासमान भारतीय समाज एकतरफ तेजी से शहरीकरण और उद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है तो दूसरी ओर उसके भीतर किसानों के हकों की हिफाजत की आवाज भी उठ रही है। इसी खींचतान के बीच 119 साल बाद 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में 2013 में बड़ा संशोधन किया गया और उसे किसान हितैषी बनाया गया। जाहिर है कि संसद की भावना किसानों और उस काश्तकार को संरक्षण देने की थी, जिनकी जमीन जाने से उसका भविष्य असुरक्षित होता है। औद्योगीकरण के पक्षधरों की आपत्ति रही है कि इससे विकास अवरुद्ध हो जाएगा और कारखाने लगाना या शहर बसाना मुश्किल हो जाएगा। एनडीए सरकार इस कानून को कमजोर करने के लिए अध्यादेश लाने और संशोधन करने विफल प्रयास कर चुकी है। यही द्वंद्व न्यायपालिका का भी पीछा कर रहा है। अन्वय का न्यायिक विवेक कहता है कानून की व्याख्या में संसद की भावना का ध्यान रखा जाना चाहिए। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट की दो पीठों में टकराव हुआ है तो कहीं उस भावना को समझने में कमी रही है। उम्मीद है कि संवैधानिक पीठ उसे समझेगी और मौजूदा न्यायालयीन गतिरोध को दूर करते हुए देश के हित में फैसला लेगी।


दैनिक जागरण

कनाडा को जरूरी संदेश

यह अच्छा हुआ कि भारतीय प्रधानमंत्री ने कनाडा के प्रधानमंत्री के समक्ष यह स्पष्ट करने में कोई संकोच नहीं दिखाया कि भारत अपनी एकता-अखंडता को दी जानी वाली किसी भी चुनौती को बर्दाश्त नहीं करेगा। इस बात को दो टूक ढंग से रेखांकित किया जाना इसलिए आवश्यक हो गया था, क्योंकि इसमें कोई संशय नहीं कि कनाडा में खालिस्तान का राग अलाप रहे अतिवादी तत्वों को संरक्षण मिल रहा है। सबसे खराब बात यह है कि कनाडा में ऐसे तत्वों को संरक्षण देने का काम तबसे और तेज हुआ है कि जबसे जस्टिन ट्रूडो ने वहां की सत्ता संभाली है। हालांकि कनाडा में पहले भी खालिस्तान समर्थक तत्वों और यहां तक कि घोषित आतंकवादियों को भी संरक्षण मिलता रहा है, लेकिन यह शुभ संकेत नहीं कि जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी ऐसे लोगों को गले लगाने के लिए कुछ ज्यादा ही आतुर दिखती है। यह समझ आता है कि जस्टिन ट्रूडो कनाडा में बसी सिख आबादी का समर्थन पाकर राजनीतिक तौर पर मजबूती हासिल करना चाहते हैं, लेकिन आखिर वह अपनी राजनीति चमकाने के फेर में भारत के लिए खतरा बने तत्वों को संरक्षण कैसे दे सकते हैं? 1नि:संदेह जस्टिन ट्रूडो करिश्माई नेता की छवि रखते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वह भारत के हितों की परवाह करते न दिखें। क्या उन्हें यह मंजूर होगा कि भारतीय प्रधानमंत्री कनाडा जाएं तो क्यूबेक के अलगाववादियों से मेल-मुलाकात करें? जस्टिन ट्रूडो ने भारत में एक तरह से यही काम किया। वह भारत दौरे पर एक ऐसे तथाकथित पत्रकार को लाए जिसने 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री की कनाडा यात्र के दौरान अतिवादियों के साथ खड़े होकर उनका भद्दे ढंग से विरोध किया था? आखिर इसका क्या मतलब कि कनाडा उच्चायोग एक ऐसे शख्स को भोज पर आमंत्रित करे जो पंजाब के एक नेता की हत्या में सजा काट चुका है? यह सजायाफ्ता शख्स भी जस्टिन ट्रूडो की यात्र के सिलसिले में कनाडा से भारत आया हुआ है। नि:संदेह यह भारत सरकार को भी देखना चाहिए कि आखिर इस शख्स को वीजा कैसे मिल गया और क्या कारण रहा कि कुछ समय पहले उसका नाम निगरानी सूची से हटा दिया गया? जब सरकार को यह पता था कि कनाडा में भारत के अलगाववादियों के प्रति नरमी बरती जा रही है तब किसी को इसके प्रति चौकन्ना रहना चाहिए था कि जस्टिन ट्रूडो के साथ अवांछित तत्व न आने पाएं। उम्मीद है कि भारत सरकार ने जरूरी सबक सीख लिए होंगे। कनाडा और भारत सरकार ने अनेक समझौतों के साथ कट्टरता और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग के लिए एक ढांचे पर भी सहमति जताई है। कनाडा सरकार को इस सहमति के अनुरूप काम करने में तत्परता दिखानी चाहिए और अपने यहां इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन सरीखे अलगाववादी एवं आतंकी संगठनों के खिलाफ जरूरी सख्ती दिखानी चाहिए। यदि कनाडा भारत का हितैषी है तो उसे अपने यहां रह रहे पाकिस्तानी मूल के उन तत्वों के खिलाफ भी कड़ाई करनी चाहिए जो कश्मीर के बहाने अतिवाद को हवा दे रहे हैं। ऐसा करना खुद कनाडा के हित में है, क्योंकि ऐसे तत्व एक दिन उसके लिए भी खतरा बन सकते हैं।