Home काॅलम आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 31 मार्च, 2018

आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 31 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

सफलता का मतलब

आज समाज में सफल कौन है? पहला जवाब होगा- वह जिसके पास ढेर सारा पैसा हो। पर ठहरिए, यह सोच बदल रही है। अब देश के ज्यादातर प्रफेशनल्स सफलता का पर्याय संपन्नता को नहीं मानते। उनकी राय में सफल वही है जिसके पास खुशी है, सुकून है। प्रफेशनल नेटवर्किंग साइट ‘लिंक्ड-इन’ के सर्वे के अनुसार करीब 72 पतिशत भारतीयों ने माना कि सफलता का अर्थ है खुशी हासिल करना। 65 फीसदी के लिए बेहतर स्वास्थ्य और 57 प्रतिशत के लिए पेशेवर जिम्मेदारी और निजी जीवन के बीच संतुलन ही सफलता है। सर्वे में करीब 79 फ़ीसदी भारतीयों ने माना कि शिक्षा का सफलता में महत्वपूर्ण योगदान है। लिंक्ड-इन ने यह सर्वे पिछले वर्ष 12 अक्टूबर से 3 नवंबर के बीच ऑनलाइन कराया था। इसमें 16 देशों के 18,191 लोगों ने हिस्सा लिया था। सर्वे से एक बात तो साफ़ है कि भारतीय प्रफेशनल्स अब पैसे के पीछे नहीं भाग रहे। उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं। वे संतुलन को महत्व देने लगे हैं। उन्हें पैसे चाहिए, लेकिन उसके साथ-साथ एक सुखद जीवन भी चाहिए एक बड़े सामाजिक बदलाव का भी संकेत है। दरअसल भूमंडलीकरण और उदारीकरण की शुरुआत के साथ ही नौकरी के स्वरुप में भारी बदलाव आया। विदेशी और भारतीय कंपनियों ने योग्य पेशेवरों को इतना वेतन देना शुरू किया जो अब तक कल्पना से परे था। कंपनियों में आपसी प्रतियोगिता के कारण अनुभवी प्रफेशनल्स को आगे बढ़ने के खूब अवसर मिले और उन्होंने उनका पूरा लाभ उठाया। एक ऐसा माहौल बना कि अधिक से अधिक मेहनत करके बेहिसाब दौलत कमाई जा सकती है। प्रफेशनल्स के बीच अधिक से अधिक सैलरी कमाने की होड़ लग गई। लेकिन पैसे कमाने की गरज में वे बाकी चीजें भूल गए। अब पहले की तरह कामकाज के घंटे सीमित नहीं थे। अब कंपनी द्वारा दिए गए टारगेट पूरा करने के लिए सोलह से अठारह घंटे तक काम करने का चलन शुरु हो गया। बहरहाल इससे पैसे की बरसात तो हुई, लेकिन प्रफेशनल्स ने अपना जीवन दांव पर लगा दिया। उनका स्वास्थ्य खराब हो गया, पारिवारिक जीवन चौपट हो गया। उन्होंने जो पैसे हासिल किए, उसका ढंग से उपभोग नहीं कर पाए। इस पीढ़ी के हश्र को इनके बाद आए प्रफेशनल्स ने देखा है और उससे सबक लिया है। यह पीढ़ी जीवन का आनंद उठाना चाहती है। वह चाहती है कि उसका पारिवारिक जीवन सुखद हो, उसे घूमने-फिरने का मौका मिले। पिछले कुछ समय से दुनिया भर की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी घोषित-अघोषित रूप से एक वैचारिक आंदोलन चलाया है जिसमें भौतिक साधनों की होड़ से बचने, स्वस्थ रहने जीवन में संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है। इन सबका परोक्ष प्रभाव भी भारतीय पेशेवरों पर पड़ रहा है।


 जनसत्ता

गैस की कीमत

एक समय था जब देश में प्राकृतिक गैस की कीमत बहुत मायने नहीं रखती थी और बाजार पर इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था। जो भी हल्ला-गुल्ला होता था वह पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर। लेकिन अब परिवहन से लेकर रसोई, बिजली और यूरिया उत्पादन आदि की लागत प्राकृतिक गैस की कीमत से प्रभावित होती है। इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में गौरतलब है कि सरकार ने देश में उत्पादित होने वाली प्राकृतिक गैस की कीमत एक अप्रैल से छह फीसद बढ़ा दी है। इससे जहां सीएनजी व पाइप के जरिए घरों में पहुंचने वाली रसोई गैस महंगी होगी, वहीं यूरिया की लागत भी बढ़ेगी। भारत में बिजली उत्पादन में गैस आधारित बिजली संयंत्रों की हिस्सेदारी बहुत कम है, इसलिए ताजा फैसले का बिजली की दरों पर कोई खास प्रभाव शायद न पड़े। छह फीसद बढ़ोतरी के साथ गैस की कीमत दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है और यह छह महीने के लिए लागू रहेगी। एक यूनिट गैस का दाम 2.89 डॉलर से 3.06 डॉलर तय किया गया है। गहरे समुद्र और अत्यधिक तापमान-अत्यधिक दबाव वाली जगहों से निकाली जाने वाली गैस की कीमत 6.30 डॉलर से बढ़ा कर 6.78 डॉलर प्रति यूनिट तय की गई है।

दरअसल, मोदी सरकार ने सत्तासीन होने के कुछ महीने बाद ही अमेरिका, रूस, कनाडा जैसे गैस-समृद्ध देशों में औसत दरों के आधार पर गैस की कीमत के निर्धारण का जो फार्मूला तय किया था, उसके तहत निर्धारित की गई दर छह माह तक ही लागू रहती है। उसके बाद सरकार उसमें संशोधन कर सकती है। अक्तूबर 2014 में तय किए गए फार्मूले की बाबत गैस उत्पादक कंपनियां असंतुष्ट रही हैं, क्योंकि यह फार्मूला तय होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क कीमत में लगातार गिरावट के कारण गैस की कीमत ढलान पर रही। तब से गैस उत्पादक कंपनियां कीमत को लेकर बराबर असंतोष जाहिर करती रही हैं। वे कहती रही हैं कि उपर्युक्त फार्मूले के कारण गैस उत्पादन का काम पुसाने वाला नहीं रह गया है। दूसरी ओर, सरकार पर आरोप लगा कि उसने जो फार्मूला तय किया उसके पीछे मंशा एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने की थी। बहरहाल, तीन साल में पहली बार गैस की बेंचमार्क कीमत में बढ़ोतरी पिछले साल अक्तूबर में की गई थी, पांच बार की कटौतियों के बाद।

सरकार के ताजा फैसले से जहां गैस के उपभोक्ताओं को चपत लगेगी, वहीं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ओएनजीसी और निजी क्षेत्र की रिलायंस इंडस्ट्रीज को सबसे ज्यादा फायदा होगा। मोटे अनुमान के मुताबिक ओएनजीसी की सालाना कमाई बढ़ कर इकतालीस सौ करोड़ पर पहुंच जाएगी। देश में रोजाना नौ करोड़ घन मीटर प्राकृतिक गैस का उत्पादन होता है। इसमें सत्तर फीसद उत्पादन भारत की सबसे बड़ी गैस उत्पादक कंपनी ओएनजीसी करती है। भारत गैस की अपनी कुल खपत का आधा हिस्सा आयात करता है। गैस की कीमत में बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब गैस उत्पादक कंपनियां नए गैस-क्षेत्रों में अरबों रुपए निवेश करनी योजना बना चुकी हैं। कमाई में बढ़ोतरी से उन्हें अपनी नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में सहूलियत होगी। लेकिन गैस के उपभोक्ताओं को तो ताजा फैसले का कड़वा अनुभव ही होगा।


हिंदुस्तान

नौकरियों का तोहफा  

नौकरियों पर भारी संकट के दौर में भारतीय रेलवे ने राहत भरी खबर दी है। यह खबर निश्चित तौर पर युवाओं और नौकरी की उम्मीद खो चुके तमाम प्रभावित परिवारों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाली है। रेलवे ने एक लाख दस हजार नई भर्तियां करने का एलान किया है। यह अलग बात है कि कई चरणों में आए इस एलान से कुछ भ्रांतियां भी पैदा हुईं, लेकिन बढ़ते हुए यह संख्या एक लाख 10 हजार रिक्तियों तक पहुंच गई है, तो युवाओं का उत्साहित होना स्वाभाविक है।

सरकार के लिए भी खुश होने का अवसर है कि इतनी ज्यादा रिक्तियों के साथ नौकरियां उपलब्ध कराने वाला यह अभियान दुनिया का सबसे बड़ा भर्ती अभियान साबित होने जा रहा है। शायद एक ही विभाग में एक खास समय-सीमा में आए आवेदनों का भी यह विश्व रिकॉर्ड हो, क्योंकि इस वर्ष की शुरुआत में जिन नौकरियों की घोषणा की गई थी, उनके लिए दो करोड़ से ज्यादा आवेदन आ चुके हैं। ताजा घोषणा के बाद इसमें अप्रत्याशित इजाफा होने की संभावना है। आवेदनों की इस भीड़ से हालांकि एक आशंका भी दिखाई दे रही है कि क्या हमारा मौजूदा तंत्र इस अथाह उम्मीदों को समय-सीमा के अंदर कारगर तरीके से खंगाल पाएगा?

देश में रोजगार की स्थिति बहुत खराब है। बीते कुछ साल में इसने बहुत ही खराब दौर देखा-दिखाया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने तो 2012 में ही विश्व में रोजगार की स्थिति पर चिंता जताते हुए भारत को खासतौर से आगाह किया था।

उसने बेरोजगारी थामने के लिए वैश्विक स्तर पर 60 करोड़ से ज्यादा नौकरियों की जरूरत बताई थी। उसने श्रम क्षेत्र में महिलाओं की घटती भागीदारी के प्रति भी अलग से चिंता जताई थी। हालांकि परिदृश्य में कोई सकारात्मक बदलाव तो नहीं ही आया, हालात बदतर जरूर होते गए हैं। तमाम प्रयासों के बावजूद रोजगार मुहैया करने के वायदे पूरे नहीं हुए हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार में रोजगार सृजन के प्रति कोई बेचैनी ही नहीं रही। प्रयास तो यहां तक हुए कि कैबिनेट को भेजे जाने हर प्रस्ताव के लिए यह लिखने की शर्त तक लगा दी गई कि उस पर अमल से रोजगार के कितने अवसर सृजित होंगे? सच तो यही है कि हर सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा हों, लोगों की आमदनी बढे़ और लोग गरीबी के अभिशाप से बाहर निकल सकें। लेकिन महज चाहने से कुछ नहीं होता। इसके लिए गंभीर प्रयासों और ढांचागत मूलभूत खामियों को दूर करने की जरूरत होती है, जिस पर लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया।

ऐसे वक्त में, जब रोजगार के अवसर कम से कमतर होते जाने का संकट भयावह रूप में सामने हो, तब रेलवे का यह मेगा से भी कहीं बड़ा भर्ती अभियान निश्चित तौर पर बड़ी उम्मीदें लेकर आया है। स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी संख्या में रिक्तियों के लिए भारी संख्या में आवेदन भी आएंगे। दो करोड़ से ज्यादा अवेदन तो अभी ही आ चुके हैं। ऐसे में, इनको छांटने और जांचने की प्रक्रिया भी थकाऊ होगी। लिखित और मौखिक परीक्षाओं के दौर के साथ तमाम अन्य औपचारिकताएं भी होंगी। तय है कि इस सब में बहुत लंबा वक्त लगने वाला है। लेकिन नाउम्मीदी को उम्मीद में बदलने के लिए इतना धैर्य धरना तो बनता है। यह अलग बात है कि अवसरों की संख्या और इसकी लंबी व थकाऊ प्रक्रिया राजनीतिक बहस भी शुरू कर सकती है।


 अमर उजाला

ये कैसी परीक्षा

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के बारहवीं और दसवीं की परीक्षाओं के क्रमशः अर्थशास्त्र और गणित के पर्चे लीक होने के बाद विद्यार्थियों और अभिभावकों की नाराजगी स्वाभाविक है। इससे पता चलता है कि सीबीएसई की पर्चा की गोपनीयता संबंधी व्यवस्था कितनी लचर है, जिसका खामियाजा देश भर के लाखों बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। हैरानी की बात यह है कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय और सीबीएसई की। ओर से विद्यार्थियों को आश्वस्त करने वाला कोई जवाब भी नहीं मिला। है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव ने बारहवीं के पर्चे 25अप्रैल को कराने की घोषणा की है, लेकिन दसवीं के पर्चे के बारे में अब भी भ्रम की स्थिति है; अभी यह पता नहीं है कि क्या यह पर्चा दोबारा होगा या नहीं। एक-एक अंक के लिए गलाकाट स्पर्धा वाली हमारी शिक्षा व्यवस्था में बारहवीं और दसवीं के बोर्ड परीक्षाओं का कैसा मानसिक दबाव विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है। और ऐसे में साल भर की तैयारी के । बाद जब यह पता चले कि पर्चा लीक हो गया है, तो उसका असर बाकी के पर्चा और बोर्ड परीक्षा के बाद होने वाली प्रतिस्पर्धी या प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी पर भी पड़ना स्वाभाविक है। खासतौर से बारहवीं के बच्चे बोर्ड परीक्षा के बाद इंजीनियरिंग, मेडिकल या लॉ कॉलेजों में दाखिले से संबंधित प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते हैं, ऐसे बच्चों को हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? बोर्ड तो अभी यह बताने की स्थिति में भी नहीं है कि पर्चे लीक कैसे हो गए और बिना यह जाने वह कैसे आश्वस्त करेगा कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी। वास्तविकता यह है कि देश के भीतर पर्चे लीक कराने और नकल कराने का एक पूरा आपराधिक समानांतर तंत्र विकसित हो गया है, जो कि मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिये इसे अंजाम देता है। अधिक दिन नहीं हुए, जब एसएससी की परीक्षा का पर्चा लीक हो गया था, जिसे लेकर हजारों छात्रों ने प्रदर्शन भी किये थे। जाहिर है, परीक्षा का ऐसा तंत्र विकसित करने की जरुरत है,जिसमें कोई सेंध न लगा सके। इसके साथ ही सीबीएसई परीक्षा के पर्चे लीक होने की घटना के लिए जो लोग भी जिम्मेदार हैं,उनके खिलाफ यथाशीघ्र कड़ी कार्रवाई की जाए तभी इस बोर्ड पर विद्यार्थियों का भरोसा कायम हो सकेगा।


राजस्थान पत्रिका

कथनी और करनी

संकट के समय कहावत तो ‘नानी याद आने की है लेकिन गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा चुनाव की करारी हार ने भाजपा को यूपी में ‘रामजी’ की याद दिला दी। इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि हर संकट में भाजपा को सबसे पहले ‘रामजी’ का सहारा ही नजर आता रहा है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भीमराव अम्बेडकर के नाम के साथ ‘रामजी’ शब्द जोड़ दिया है। यह तर्क देते हुए कि महाराष्ट्र में नाम के साथ पिता का नाम भी जोड़ा जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार के इस तर्क को मान भी लिया जाए तो यह काम सरकार आते ही क्यों नहीं कर लिया गया। एक साल तक इंतजार क्यों किया गया? आश्चर्य तो तब और अधिक होता है, जब सरकारें अपने ऐसे फैसलों को पारित कराने मेंराज्यपालों तक को शामिल कर लेती है। भाजपा हो या कांग्रेस अथवा कोई और दल, सबको समझ लेना चाहिए कि आज मतदाता परिपक्व हो चुका है। उसे विकास चाहिए। काम करने वाली सरकार चाहिए। राम मंदिर, अम्बेडकर अथवा ऐसे दूसरे शब्दों के उपयोग से सरकारें फिर मतदाताओं का विश्वास हासिल नहीं कर सकती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को ईमानदारी के साथ मंथन करना चाहिए कि जिस जनता ने एक साल पहले उसे भारी बहुमत से जिताया था, अब नाराज क्यों हो गई? बात सीधी सी है और सभी के समझ में आ भी रही हैं। वो ये कि मतदाता को सरकार की कथनी और करनी में अंतर लग रहा है। योगी सरकार बताए कि उसने एक साल में कितने युवाओं को रोजगार दिया? कितने बेघरों को छत मुहैया कराई ? सरकार अगर इन सवालों का हल तलाश लेगी तो उसे गोरखपुर-फूलपुर की हार के कारण अपने आप समझ में आ जाएंगे।


दैनिक भास्कर

सांप्रदायिक संघर्ष के दुष्चक्र में उलझता पश्चिम बंगाल

रामनवमी के मौके पर आसनसोल में भड़के दंगों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वाममोर्चा के शासन में शांत रहने वाले पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तेजी से हो रहा है और उसे रोक पाने में तृणमूल कांग्रेस की नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने को लाचार पा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि ममता बनर्जी हिंदू समुदाय की सुरक्षा नहीं कर पा रही हैं। यही कारण है कि आसनसोल और दुर्गापुर से हिंदू समुदाय के लोगों के घर छोड़कर भागने की खबरें आ रही हैं और वहां के भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो डीसीपी से लड़ते और उन्हें धमकाते हुए देखे जाते हैं। जबकि ममता बनर्जी इसे भाजपा की बड़ी साजिश मानती हैं और कहती हैं कि सोशल मीडिया पर कभी बांग्लादेश और कभी किसी और देश के वीडियो चलाकर लोगों को भड़काया जाता है। ममता बनर्जी एक जुझारू नेता और कुशल रणनीतिकार हैं और उन्होंने कम्युनिस्टों के 34 साल के शासन को पहले भाजपा के साथ हाथ मिलाकर कमजोर किया तो बाद में माओवादियों का सहयोग लेकर उखाड़ फेंका। बदले दौर में ममता बनर्जी की मुठभेड़ कमजोर हो चुकी माकपा से नहीं उस भाजपा से है और जो काडर आधारित राष्ट्रीय पार्टी हो चुकी है। भाजपा विकास और धर्म दोनों के आधार पर राजनीति करती है और उसके साथ स्थानीय मुद्‌दों का समावेश करती है। उसके सामने 2019 का लक्ष्य है और वह उसके लिए आर्थिक रूप से पिछड़े पश्चिम बंगाल को कई तरीके से लुभाना चाहती है। इसलिए ममता को आर्थिक की बजाय भावनात्मक मुद्दों की राजनीति से मुकाबला करना है। इस लड़ाई में देश के बाहर की शक्तियां भी उनके लिए सहायक होंगी और इसीलिए वे पूरे देश में भाजपा विरोधी मोर्चे की तलाश में भटक रही हैं। उन्होंने पिछले साल बशीरहाट-भादुरिया के दंगों के बाद यह संकल्प जताया था कि वे पूरे राज्य में शांति वाहिनी का निर्माण करेंगी पर दंगे बताते हैं कि वे वैसा कर नहीं पा रही हैं। वाममोर्चा से लड़ते हुए ममता को अगर यह बात समझ में आई हो कि उनके कार्यकाल में राज्य में दंगे क्यों नहीं होते थे तो उन्हें उनसे सबक लेते हुए चुस्त और निष्पक्ष प्रशासन के साथ प्रशिक्षित काडर तैयार करना चाहिए।


दैनिक जागरण

जेलों में सुधार का इंतजार

यह अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में क्षमता से ज्यादा कैदी होने और साथ ही उनमें कैदियों से हो रहे व्यवहार पर चिंता जताई, लेकिन इस तरह की टिप्पणियों से शायद ही बात बने कि अगर कैदियों को सही तरह नहीं रखा जा सकता तो क्यों न उन्हें रिहा कर दिया जाए? आखिर कैदियों को ऐसे कैसे रिहा किया जा सकता है? इसके लिए तो नियम-कानून बनाने होंगे और उन कारणों का निवारण भी करना होगा जिनके चलते तमाम कैदी जमानत मिल जाने के बावजूद बाहर नहीं आ पाते। यह ठीक नहीं कि जमानत पाए कैदी मुचलके के अभाव में जेल में ही सड़ते रहें। इसी तरह इसका भी कोई औचित्य नहीं कि न्यायिक प्रक्रिया की सुस्ती के चलते जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ती रहे। विडंबना यह है कि न्यायिक सुधार सुप्रीम कोर्ट के एजेंडे में ही नहीं दिखता। उसे केवल न्यायाधीशों के रिक्त पदों की ही चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि न्यायिक मामलों के निष्पादन की गति कैसे तेज हो? चूंकि प्रशासनिक तौर पर जेलें राज्यों के अधीन आती हैं इसलिए उन्हें भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए सक्रिय-सचेत होना चाहिए। बेहतर हो कि केंद्र सरकार यह पहल करे कि जेलों में सुधार राज्यों के एजेंडे पर आए और जो योजनाएं बनें उन पर अमल भी हो। चूंकि जेलों में सुधार का मसला उपेक्षित है इसीलिए ऐसे तथ्य सामने आए कि जेलें कैदियों से अटी पड़ी हैं और कहीं-कहीं तो क्षमता से छह सौ प्रतिशत अधिक कैदी है। इसका मतलब है कि उन्हें भेड़-बकरियों की तरह रखा जा रहा है। आखिर ऐसी स्थिति में कैदियों के मानवाधिकारों की रक्षा कैसे संभव है? 1नि:संदेह जेलों में लोग अपने अपराध की सजा भुगतते हैं और वे वहां सुख-सुविधा भरे जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन उन्हें न्यूनतम सुविधाएं तो मिलनी ही चाहिए। कैदी जीवन भी एक गरिमा की मांग करता है। चंद खुली जेलों को छोड़ दें तो अपने देश में ज्यादातर जेलों में अव्यवस्था का बोलबाला है। भले ही जेलों को बंदी सुधारगृहों के तौर पर जाना जाता हो, लेकिन वहां का माहौल ऐसा है जो मामूली अपराधियों को शातिर अपराधियों में तब्दील कर देता है। जेलों की अव्यवस्था अराजकता का पर्याय बनती जा रही है और इसी कारण जब भी कभी उनमें औचक निरीक्षण होता है तो प्रतिबंधित वस्तुओं के साथ नशीले पदार्थ और हथियार तक बरामद होते हैं। रह-रह कर ऐसे भी मामले सामने आते रहते हैं जो यह बताते हैं कि शातिर अपराधी जेलों के अंदर रहकर अपराध तंत्र का संचालन करने में सक्षम हैं। यह तो अव्यवस्था की पराकाष्ठा है। इस पर हैरत नहीं कि गंभीर मामलों में आरोपित और भारत में वांछित तत्व यह आड़ लेने में सफल रहते हैं कि यहां की जेलों में भयंकर दुर्दशा है। ब्रिटेन में जा छिपे कई तत्वों को तो इसी कारण भारत ला पाने में नाकामी मिली है। बेहतर हो कि जहां सुप्रीम कोर्ट जेलों की अव्यवस्था पर चिंता जताने तक ही सीमित न रहे वहीं राज्य सरकारें यह समङों कि जेलों में सुधार का जरूरी काम शेष है।


The Hindu

Exposing faults lines
It has taken a voice of humanity to call out the manufactured nature of the political blame game around the communal clashes over Ram Navami processions in West Bengal and Bihar. In Asansol, the imam of a mosque who lost his teenage son to the clashes this week announced that should anyone carry out a retaliatory attack, he would leave town. At least four persons have died in the Raniganj-Asansol belt in West Bengal’s Paschim Bardhaman district after a procession turned violent. The area remains tense, Internet services are limited and prohibitory orders are in place. It is a shame that a sitting Union Minister, Babul Supriyo, who represents Asansol in the Lok Sabha, not just tried to defy the local administration, but also uttered inflammatory comments. Accounts about what ignited the clashes vary, and it would be best to await the findings of the official inquiry. But it is a reason for disquiet that ‘religious’ processions are becoming a pretext to force communal polarisation in many States. In Rajasthan’s Jodhpur district, a tableau was taken out on Ram Navami glorifying Shambhu Lal Raigar, currently in jail for hacking a man to death and videographing the violence along with an anti-Muslim rant. In Bhagalpur in Bihar this month, a religious procession organised by Sangh Parivar groups provoked communal clashes — there is an FIR against Arijit Shashwat, son of Union Minister Ashwini Choubey, for inciting violence. After Ram Navami, communal tension has spread to more areas of the State, including Aurangabad, Samastipur and Nawada.

In all such situations, the responsibility of isolating areas and causes of violence and tension is best assigned to the local administration, instead of State-level and national politicians weighing in. However, the violence suggests a pattern that is worrying. While the Raniganj-Asansol industrial belt is surprising territory for such clashes, the number of incidents of communal violence in West Bengal has increased sharply over the past three years. The violence in Bihar comes soon after the setback to the BJP-led National Democratic Alliance in the recent by-elections, with some party leaders giving the result a sectarian spin. Across swathes of north India, daily interactions between the majority and minority communities have been rendered fraught with the probability of violence. The majoritarian persuasion is carried out at the grassroots level, but the Sangh Parivar cannot plead plausible deniability. In this context, the increasingly assertive Ram Navami and other religious processions are drawing new fault lines. As the air gets politically charged in the lead-up to the 2019 general elections, the burden on the law and order machinery becomes that much more heavy — to pursue every incident of violence and incitement in order to limit its potential to be used for further polarisation.


Times of India

Communal Strife
With incidents of communal violence continuing in Bihar and Bengal, authorities in both states must tackle the issue head on. On March 17 clashes erupted in Bhagalpur during an unauthorised procession taken out by BJP, Bajrang Dal and RSS activists, which resulted in more than 35 people being injured. The procession was led by Arijit Shashwat, son of Union minister Ashwani Choubey, against whom an arrest warrant is yet to be implemented.
Similar was the case in Aurangabad on March 25 where a Ram Navami procession saw stone pelting, leading to clashes for two days – at least 25 people were injured and 50 shops gutted. Samastipur, Munger, Nalanda followed a near-identical pattern. Bihar chief minister Nitish Kumar has long crafted a ‘sushasan babu’ (good administrator) image for himself based on his law and order track record. But the question today is whether having allied with BJP, Nitish can rein in Hindutva organisations who look to weaponise religious festivals to foment communal trouble. To retain the ‘sushasan’ tag, however, it is imperative that he does so.
Meanwhile in Bengal, clashes following Ram Navami processions have claimed five lives across West Burdwan, Purulia and North 24-Parganas. BJP may be trying to make political inroads by using religion and the ruling Trinamool trying to counter with its own religious processions, but using religion for politics is a dangerous game. Moreover, given today’s social media and fake news atmosphere, anything can be twisted to stir up people’s passions. This can only be countered by tough and non-sectarian law enforcement. Clear rules must be implemented regarding religious processions, including banning public display of weapons. Plus, better community policing to identify troublemakers needs to be emphasised. With Hanuman Jayanti being observed today, police must not allow repeat of violence.


The Indian Express

Matter of mistrust
There’s no rule preventing a top banker’s or bureaucrat’s relative from doing business. But a potential conflict of interest situation arises when that relative’s dealings are with someone having significant commercial transactions with the bank or government department concerned. The case of ICICI Bank — involving its managing director and CEO Chanda Kochhar’s husband, Deepak, and the Videocon Group’s chairman Venugopal Dhoot — is a textbook example of this. As an investigation by The Indian Express has revealed, a Dhoot-owned company, in March 2010, loaned Rs 64 crore to a renewables firm that he and Deepak Kochhar had jointly promoted only in late-2008. Through a series of complex deals thereafter, the company that extended the loan got wholly acquired by a trust controlled by Deepak Kochhar in April 2013. Well before that, Dhoot had also sold his 50 per cent stake in the renewables joint venture for a paltry Rs 2.5 lakh. What’s more, even the transfer of shares in the lending company to Deepak Kochhar’s trust was made at just Rs 9 lakh.

But the real issue is not about a lender being subsumed by its borrower, on terms seemingly most opaque. More germane is ICICI Bank sanctioning a Rs 3,250-crore loan to the Videocon Group and this taking place in April 2012, a year before the mysterious transaction involving Deepak Kochhar’s trust was concluded. While it may not be easy to establish any quid pro quo here, the question to be asked is: Should Deepak Kochhar have been allowed to do business with somebody, to whose group ICICI Bank had lent large monies? The bank’s board has claimed no conflict of interest, despite Chanda Kochhar having sat on the credit committee that sanctioned the loan to Videocon. The loan, moreover, was part of a credit facility aggregating around Rs 40,000 crore extended to the group by a consortium of over 20 banks. Chanda Kochhar couldn’t apparently have influenced the credit decision, when ICICI Bank was not even the lead bank of this consortium. Yes, the Videocon loan became a non-performing asset (NPA), but that, itself cannot have been ascribed to any nepotism or quid pro quo.The above arguments, however, simply don’t wash. Whether or not Deepak Kochhar’s business relations with Dhoot helped facilitate ICICI Bank’s loan to Videocon only a detailed investigation can establish. What’s not in doubt is a clear conflict of interest and the bank’s seeming reluctance to get to the bottom of it. A knee-jerk press release in defence of Chanda Kochhar and talking assurances by the bank’s board do not make for an credible institutional response. In fact, it only undermines the bank’s leadership. ICICI is after all India’s third largest bank by assets. At a time when state-owned banks are facing an unprecedented NPA and corporate governance crisis — the PNB-Nirav Modi scam is only a manifestation of that — the country cannot afford any public mistrust in systemically important private sector banks.


Telegrapgh

Failing The Future

The Bharatiya Janata Party is in love with the grand scale. Even the act of launching a moralizing self- help book by the prime minister called, with misplaced excitability, Exam Warriors , was accompanied by a blinding and deafening publicity blitz.

Now that the Central Board of Secondary Education, under the aegis of the Central government, has failed the exam warriors, that, too, is on a massive scale. All of the over 20 lakh students who sat for the Class X mathematics and Class XII economics papers for their board examinations this year have worked for nothing, for these papers were leaked. It is difficult to imagine a greater failure by an examination board or greater inefficiency on the part of a government. The prime minister ‘ s loudly proclaimed desire to relieve students ‘ stress may seem like a bitter joke to many young people whose dismay and anger can only be imagined. That the government can ask them to sit for a retest is, most feel, completely unfair.

Why should the innocent re- sit an examination because some criminals leaked the papers? Apart from renewed stress, who is going to guarantee that they will perform as well as they could have done the first time? The government ‘ s attitude is remarkable.

Would it have ignored the leak if it could? The remarks of the human resource development minister and the CBSE chairperson sound shockingly hollow. When the chairperson talks of the re- test as a decision made in fairness to all students, and says they should not worry since the board, presumably, is ” with ” them, it is not clear whether she is at all aware of the scale of the failure of basic duty. The HRD minister ‘ s comments are even more edifying. He has actually had one sleepless night, he will make sure that the criminals are caught and that reforms are made in a way that no more leaks happen. There seems to be not an inkling of what is happening to lakhs of children, or of the magnitude of the government ‘ s lack of accountability.

There is no explanation as to why this year the system of three sets of papers with three sub- sets for each, meant to stop cheating, was dropped, or why the police did not follow up the lead about leaked papers that the board reported before the test. Is this over- confidence or something else? The government cannot pretend ignorance of the means of leaking and cheating: the discovery of the Staff Selection Commission cheating racket is still fresh.

Maybe the government ‘ s pale response — no apology to the children — is to be put down to the BJP ‘ s inability to perceive people as anything but voters.

Many of these young people will vote in 2019. Evidently, the BJP feels that the prime minister ‘ s special notice of them as exam warriors is enough to ensure their loyalty. If the party had intended to institute reform, then the sole focus on examinations would have been substituted by a more modulated system of assessment. Why should so many young people ‘ s future turn on a re- test because their examination board failed them? The leaked test papers show that the government and the examination board have failed at the basic level in their duty to students


New Indian Express

Centre Right on Apex Court’s Sc/St order

Thankfully, the Centre is examining the “desirability” of filing a judicial review against the Supreme Court order that laid down stringent safeguards before registering a case under the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989. The communication from the law ministry is welcome for two reasons. First, it shows there is bipartisan consensus—the government is not unresponsive to demands for a review, regardless of whether those demanding it are opponents or allies (its own Dalit MPs are demanding a restoration). Secondly, it’s a step towards righting a wrong.

The two-judge Bench has made it mandatory for a ‘preliminary enquiry’ to be conducted before an FIR can be registered on caste-related discrimination or violence. The Bench, ironically, termed a law enacted by Parliament to prevent atrocities against Dalits and Adivasis as “a charter for exploitation or oppression”, a tool for “blackmail” being used to perpetuate casteism. Pray why? Data shows 5,347 and 912 false cases of atrocities against SCs and STs respectively—an average of 10 per cent of cases registered. (This corresponds to the 9-12 per cent false cases attested for other crimes, abduction to forgery.) The remaining 90 per cent is India’s reality.

Even with the law as it stood, getting FIRs registered was a tall ask, say Dalit activists. Now, with higher sanction made mandatory, it will be well nigh impossible. Have we as a nation reached a point where the most vulnerable sections have become so empowered, as the Bench would like us to believe? If indeed we have, the Act should be scrapped, not diluted, and we should celebrate our attaining of a truly egalitarian society! If not, as is evident, we better think twice and take remedial measures as the Centre is considering. Does that mean Section 498A cannot be misused? Of course, it can be, as can any other law. But why does no one demand the dilution of those acts, citing misuse, as they do for those that protect the vulnerable? Look at the order on the anti-dowry law by the same Bench, and you see the pattern.

 

 

 

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