Home काॅलम आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 28 मार्च, 2018

आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 28 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

खाप पर हथौड़ा

दो अलग धर्मों या जातियों के वयस्कों के बीच आपसी रजामंदी से होने वाली शादी में खाप पंचायत जैसे समूहों या व्यक्तियों के दखल को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने ऐसे हस्तक्षेप को रोकने के लिए बाकायदा एक गाइडलाइन भी जारी की। अदालत ने कहा कि इस बारे में संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक उसकी यह गाइडलाइन लागू रहेगी। निश्चित रूप से यह फैसला एक जरूरी सामाजिक बदलाव की जमीन तैयार करेगा। यह एक विडंबना ही है कि जो पहलकदमी सरकार की तरफ से काफी पहले हो जानी चाहिए थी, वह न्यायपालिका की ओर से हो रही है। दो वयस्कों को आपसी सहमति से विवाह का अधिकार देना व्यक्ति की स्वतंत्रता का एक बुनियादी तत्व है। आजादी के 70 साल बाद भी अपने वोट से सरकारें चुनने वाले लड़के-लड़कियां अपनी शादी के बारे में खुद से कोई फैसला नहीं कर पाते। करें तो उनकी जान पर खतरा मंडराने लगता है। यह क्या किसी सभ्य समाज का लक्षण है/ भारत में एक व्यक्ति के जीवन में बंदिशें ही बंदिशें हैं। ज्यों ही दो लोग आपसी सहमति से एक साथ जीवन बिताने का फैसला करते हैं, उनके रास्ते में जाति का प्रश्न खड़ा हो जाता है, नहीं तो धर्म का, या फिर पारिवारिक प्रतिष्ठा का। अगर परिवार बाधा न भी खड़ी करे तो समाज के ठेकेदार डंडे लेकर हाजिर हो जाते हैं। खाप पंचायत जैसी संस्थाएं और धार्मिक संगठन उछलकर आगे आ जाते हैं। गांधी, टैगोर और आंबेडकर जैसे हमारे महापुरुषों ने क्या ऐसे ही राष्ट्र की कल्पना की थी? उनके मन में तो एक ऐसे आधुनिक देश और समाज की कल्पना थी, जिसमें हर व्यक्ति अपनी गरिमा को लेकर आश्वस्त हो, हर नागरिक अपने जीवन के फैसले खुद ले सके। जाति, धर्म जैसे बंधन कमजोर हों, उनसे जुड़ी पहचानें स्वैच्छिक हों और निजी दायरे से बाहर उनका कोई अर्थ न हो। लेकिन दुर्भाग्य से हमारी राज्य-व्यवस्था इस दिशा में आगे नहीं बढ़ सकी। समाज को बराबरी के स्तर तक ले जाने का दायित्व निभाना तो दूर, उसे पीछे की ओर ले जाना ही सुविधाजनक लगा। सत्ता के खेल में शामिल वर्ग को आज भी पूरा इत्मीनान है कि जाति और धर्म की बाड़ेबंदियों को मजबूत बनाकर लोगों को अपने पक्ष में एकजुट करना उसके लिए कहीं ज्यादा आसान है। यही वजह है कि उसने अरसे से जड़ जमाए अत्याचारी पहचानों को किसी भी हाल में कमजोर नहीं होने दिया और कई बार उसके लिए अपनी तरफ से खाद-पानी की व्यवस्था भी की। सुप्रीम कोर्ट के इस हनकदार फैसले के बाद यह सब बंद होना चाहिए। जो सरकारें अपनी मर्जी से शादी करने वालों को सुरक्षा न दे सकें, उन्हें एक क्षण भी सत्ता में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए।


हिंदुस्तान

कर्नाटक का चुनावी बिगुल

आखिर कर्नाटक विधानसभा चुनाव की घोषणा हो ही गई। पहले से चर्चा के केंद्र बने इस चुनाव की घोषणा भी विवादों की छाया से बच नहीं सकी। घोषणा के पूर्व ही भाजपा आईटी सेल के ट्वीट पर आई चुनाव की तारीख ने डेटा लीक पर पहले से गरम माहौल को और गरमाने का काम किया। आयोग को भी कहना पड़ा कि तारीख लीक होने की जांच कराई जाएगी। घोषणा के अनुसार, 225 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा की 224 सीटों के लिए एक ही चरण में 12 मई को वोट डाले जाएंगे और 15 मई को वोटों की गिनती होगी। एक सीट पर एंग्लो-इंडियन समुदाय के सदस्य को मनोनीत किया जाता है। कर्नाटक का चुनाव तारीख और ट्वीट विवाद से अलग कई अन्य कारणों से पहले से ही कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण बना हुआ है। इनकी आहट भी ठीक उसी तरह बहुत पहले सुनाई देने लगी थी, जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव को लेकर था। उत्तर प्रदेश अगर देश का सबसे बड़ा और केंद्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाला राज्य होने के कारण हमेशा भारतीय राजनीति के निशाने पर रहा है, तो कर्नाटक आज अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ अलग ही महत्व का राज्य बनकर उभरा है, जहां कांग्रेस और भाजपा दोनों की ही प्रतिष्ठा दांव पर है। लोकसभा चुनाव के लगभग एक साल बाकी हैं। उससे पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। कर्नाटक का महत्व अचानक बढ़ने का यही असल कारण है, जिसने चुनाव की घोषणा के बहुत पहले से यहां की राजनीति को गरमा के रखा है। केंद्र में मजबूती से बैठी भाजपा और राष्ट्रीय परिदृश्य पर तेजी से सिमट रही कांग्रेस, दोनों के लिए यह इतना महत्वपूर्ण यूं ही नहीं बन गया। कर्नाटक दक्षिण का अकेला ऐसा राज्य है, जहां भारतीय जनता पार्टी को अपनी प्रबल संभावना दिखाई दे रही है, तो कांग्रेस के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है कि लगातार हार के बाद दक्षिण का यही अकेला और बड़ा राज्य बचा है, जहां अब उसका शासन शेष है। इसका हाथ से निकलना कांग्रेस के लिए लंबे शून्य का पैदा होना होगा, तो भाजपा इसलिए भी बेचैन है कि इसके नतीजे बाकी बचे चुनावों की दशा-दिशा का आधार और धार, दोनों तय करने का काम करेंगे। भाजपा और कांग्रेस, दोनों इस सच से वाकिफ हैं और इसीलिए कोई कसर भी नहीं छोड़ना चाहेंगे। यही कारण है कि चुनावों से बहुत पहले टीपू सुल्तान के नाम पर शुरू हुई राजनीति अब लिंगायत वोटों के ध्रुवीकरण पर आकर ठहर चुकी है। सच तो यह है कि कांग्रेस ने पहले टीपू सुल्तान के नाम और अब भाजपा के पारंपरिक करीबी लिंगायतों में सेंध लगाकर भाजपा की बेचैनी बढ़ाने का काम किया है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की पार्टी जेडी-एस सत्ता का तीसरा और बड़ा कोण बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती, ताकि सत्ता की एक चाबी अंत तक उसके हाथ रहे। भाजपा की नजर स्वाभाविक रूप से इस चाबी पर भी रहेगी ही। जाहिर है, भाजपा किसी भी तौर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर खुद काबिज होने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेगी, तो कांग्रेस अपने दिग्गज नेता सिद्धारमैया के रणनीतिक कौशल के बूते आश्वस्त दिखने की कोशिश कर रही है। कुछ भी हो, कर्नाटक के नतीजे आगामी चुनावों की दशा-दिशा काफी हद तक तय कर देंगे, इतना तो तय है।

 


जनसत्ता

सुनवाई से आस
तलाक-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक मामले में अपने फैसले के सात महीने बाद सर्वोच्च न्यायालय अब बहुविवाह और निकाह हलाला की संवैधानिकता पर सुनवाई करने को राजी हो गया है, तो यह पिछले फैसले की ही तार्किक कड़ी है। पिछले साल अगस्त में दिए अपने फैसले में संविधान पीठ ने तीन तलाक प्रथा को गैर-कानूनी ठहराया था। अब एक बार फिर मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाओं पर सुनवाई संविधान पीठ करेगा। इन याचिकाओं में मांग की गई है कि मुसलिम पर्सनल लॉ (शरीअत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करने वाला करार दिया जाए। मुसलिमों से संबंधित निजी कानून मुसलिम पुरुष को चार स्त्रियों तक से विवाह करने की अनुमति देता है। ऐसी इजाजत स्त्री की गरिमा के खिलाफ है, उसे वस्तु या इंसान से कमतर प्राणी में और पुरुष को उसके मालिक के रूप में बदल देती है। यह संवैधानिक मूल्यों और संवैधानिक प्रावधानों के भी खिलाफ है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, वहीं अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण ढंग से जीने के अधिकार की बात कही गई है। ऐसे ही प्रावधानों के खिलाफ होने के कारण जिस तरह तलाक-ए-बिद्दत पर हमेशा सवाल उठते रहे, उसी तरह एक से अधिक शादी करने की इजाजत और निकाह हलाला पर भी उठते रहे हैं।

मुसलिम समुदाय में हलाला या निकाह हलाला की रस्म के तहत, जिस व्यक्ति ने तलाक दिया है उसी से दोबारा शादी करने के लिए महिला को पहले किसी अन्य पुरुष से शादी करनी होती है और फिर तलाक लेना होता है, उसके बाद ही दोबारा पूर्व पति से शादी हो सकती है। शरीअत में भले यह एक तरह की ‘सजा’ हो, लेकिन क्या पूर्व पत्नी की तरह पूर्व पति के लिए भी ऐसी शर्त रखी गई है? और फिर जब अलग हो चुके दो बालिग फिर से जुड़ना चाहते हैं, तो उनकी मर्जी और निर्णय काफी होना चाहिए। उन्हें किसी सजा से क्यों गुजरना पड़े? और ‘सजा’ के रूप में औरत के लिए ऐसी शर्त, जो उसके शरीर पर उसका अधिकार नहीं रहने देती! जाहिर है, ऐसी प्रथाओं को निजी कानून की आड़ में नहीं चलने दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने मुता निकाह और मिस्यार निकाह को भी सुनवाई के योग्य माना है, क्योंकि इनके तहत बस एक निश्चित अवधि के लिए शादी का करार होता है। क्या इसे शादी कहा जा सकता है? तलाक-ए-बिद््दत पर बहस के दौरान ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मामले को न्यायिक समीक्षा के परे कहा था। उसकी निगाह में ऐसे मामले में अदालत में सुनवाई होना धार्मिक स्वायत्तता में हस्तक्षेप था। यह अलग बात है कि अलग-थलग पड़ जाने के कारण बोर्ड ने बाद में अपने सुर नरम कर लिए थे। हो सकता बोर्ड और कुछ दूसरी संस्थाएं एक बार फिर वैसी ही दलील पेश करें।

यह सही है कि हमारे संविधान ने धार्मिक स्वायत्तता की गारंटी दे रखी है, पर यह असीमित नहीं है। धार्मिक स्वायत्तता उसी हद तक मान्य हो सकती है जब तक वह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक नागरिक अधिकारों के आड़े न आए। सती प्रथा, नरबलि और जल्लीकट्टू जैसी प्रथाओं के मामलों में भी सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर चुका है। इसलिए बहुविवाह, निकाह हलाला, मुता निकाह और मिस्यार निकाह पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने के उसके फैसले को समुदाय-विशेष की धार्मिक आजादी और परंपरा या रिवाज में बेजा दखलंदाजी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे समानता तथा न्याय के लिए मुसलिम स्त्रियों के संघर्ष के नए मुकाम के रूप में देखना ही सही नजरिया होगा।


अमर उजाला

कर्नाटक की बिसात

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा के बाद राष्ट्रीय राजनीति का इस दक्षिणी राज्य पर केंद्रित होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह चुनाव राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के साथ ही दक्षिण में विस्तार को आमादा भाजपा के लिए भी अहम है। इस दक्षिणी राज्य की 225 विधानसभा सीटों के लिए 12 मई को चुनाव होंगे और 15 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। कर्नाटक विधानसभा के चुनाव 2019 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से अहम तो हैं ही, इसके नतीजे का असर इसी वर्ष होने वाले । राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है। कर्नाटक उन तीन प्रदेशों में से एक है, जहां कांग्रेस की सरकारें हैं और यदि यह राज्य उसके हाथ से निकल गया, तो भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा हकीकत में बदलता नजर आएगा। भूलना नहीं चाहिए कि मई, 2014 के बाद हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सिर्फ पंजाब में ही जीत दर्ज कर सकी। जाहिर है, ये चुनाव सिर्फ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ही नहीं, बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं हैं। दूसरी ओर गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभा के उपचुनाव में पराजित भाजपा को कर्नाटक में भी झटका लगता। है, तो इसका असर प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर पड़ सकता है, जिसके सहारे वह इस वर्ष होने वाले विधानसभा तथा 2019 के लोकसभा चुनावों की नैया पार करना चाहती है। वास्तव में कर्नाटक के चुनाव के लिए बिसात तो चुनाव आयोग की घोषणा से पहले तभी बिछ चुकी थी, जब सिद्धारमैया ने लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने संबंधी प्रस्ताव पारित कर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। दूसरी ओर भाजपा ने 75 वर्षीय येदियुरप्पा पर भरोसा जताया है, तो इसकी बड़ी वजह उनका लिंगायत होना है। प्रदेश में लिंगायत के साथ ही राजनीतिक रूप से प्रभावी वोक्कालिगा समुदाय भी है, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के जनता दल (एस) की पैठ है। जनता दल (एस) ने पिछले विधानसभा चुनाव में 20 फीसदी वोट और चालीस सीटें जीती थीं, लेकिन उसका आधार तेजी से सिकुड़ा है और उसकी अहमियत तभी हो सकती है, जब वह मुकाबले को त्रिकोणा बना दे।


राजस्थान पत्रिका

मुद्दों पर हो चुनाव

त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय विधानसभा चुनाव के बाद गोरखपुर- फूलपुर लोकसभा उपचुनाव की खुमारी उतरी भी नहीं थी कि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज उठी है। दक्षिण भारत के इस राज्य को जीतने के लिए प्रमुख राजनीतिक दल अपनी रणनीति पहले ही बना चुके हैं। इस रणनीति के तहत चुनाव की घोषणा से पहले ही मंदिर से लेकर दरगाह और धर्म से लेकर धर्मगुरूओं की राजनीति का दौर शुरू हो चुका था। इतना ही नहीं एक-दूसरे को भ्रष्ट बताने की शतरंजी चालें भी जमकर चली जा रही हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक दलों ने अपने विरोधी दलों को तोड़ने की कोशिशें भी तेज कर दी हैं। यानी देखा जाए तो कर्नाटक के चुनाव में विकास और उपलब्धियों की चर्चा को छोड़कर वही सबकुछ हो रहा है, जो देश ने चंद महीनों पहले गुजरात में देखा था। यहां न कांग्रेस कर्नाटक में अपनी सरकार की पांच साल की उपलब्धियों की चर्चा करने में दिलचस्पी दिखा रही है। और न ही भारतीय जनता पार्टी केन्द्र की अपनी चार साल की सरकार का लेखा जोखा जनता के सामने पेश करने का साहस जुटा पा रही है। यह बात सही है कि विरोधी दलों को हराकर सत्ता हथियाने के हथकण्डे हर चुनाव में अपनाए जाते रहे हैं। इनमें कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं रहता। लेकिन बीते कुछ सालों में तो चुनाव के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हथकण्डे मादाओं को तारतार करते दिख रहे हैं।
एक दौर था जब राजनीति में साफ-सुथरे लोगों व साफ-सुथरी बातों का दौर था। अब तो साफ-सुथरी राजनीति के वादे कागजोंभाषणों में तो नजर आते हैं लेकिन जमीन पर जो दिखता है, उसमें नफरत के अलावा कुछ नजर नहीं आता। सवाल ये कि क्या चुनाव जीतने के लिए नफरत फैलाना जरूरी है? क्या धनबल और बाहुबल के बिना चुनाव लड़ने की पहल राजनीतिक दल नहीं कर सकते? क्या दलबदलुओं और दागियों की जगह समर्पित और इमानदार छवि वाले कार्यकताओं को प्रत्याक्षी बनाने का साहस राजनीतिक दल दिखाएंगे ? ऐसे सभी सवालों का जवाब भारतीय राजनीति में दशकों से तलाशा जा रहा है लेकिन राजनीति है कि साफ होने की जगह और दूषित होती जा रही है। बड़े-बड़े नेताओं की फिसलती जुबान से निकले शब्द देश को शर्मसार करते रहते हैं। देश उम्मीद करता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव की कड़वाहट से कनटिक दूर रहे। चुनाव जीतने के लिए राजनीति दल मुद्दों के इर्द-गिर्द ही सिमटे रहें तो राजनीति का कल्याण हो सकता है।


दैनिक भास्कर

व्यक्ति की गरिमा के पक्ष में है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने दो बालिग व्यक्तियों के विवाह को रद्‌द कराने वाली खाप पंचायतों को अवैध करार देकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है लेकिन, इसके जमीनी स्तर पर लागू होने की उम्मीदें बहुत कम हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि अगर विवाह करने वाले युवक-युवती बालिग हैं और उन्होंने विवाह का निर्णय लिया है तो उनके विवाह को तोड़ने या उन्हें दंड देने का अधिकार सिर्फ अदालत को है। उस बारे में हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी जाति पंचायत को नहीं है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति एएम.खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए इस बारे में कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। उनका उद्‌देश्य संसद की तरफ से कानून बनाए जाने से पहले प्रशासन को कार्रवाई के लिए आधार प्रदान करना है। शक्ति वाहिनी नामक एनजीओ की याचिका के विरुद्ध खाप पंचायत के वकील की दलील थी कि वे ‘ऑनर किलिंग’ नहीं करते बल्कि अंतरजातीय विवाह भी कराते हैं। हालांकि खाप ने हिंदू विवाह अधिनियम के आधार पर सगोत्र विवाहों को रोकने की दलील दी और कहा कि ऐसा विज्ञान सम्मत है। खाप पंचायत भले कोई दलील दे लेकिन, हकीकत है कि हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के जिन इलाकों में उनका प्रभाव है वहां के युवक अगर अंतरजातीय विवाह करते हैं तो उनके घर जला दिए जाते हैं। उनकी महिलाओं से दुराचार होते हैं और अगर युवक युवती मिल गए तो उन्हें अलग करवा दिया जाता है या मार दिया जाता है। अगर बालिग युवक-युवती परिवार और पंचायत के नियम के विरुद्ध विवाह करके बच गए हैं तो या तो उन्होंने इलाके छोड़ दिए हैं या फिर भूमिगत हो गए हैं। जिस लोकतंत्र का संविधान नागरिकों को जीवन और निजी स्वतंत्रता का अक्षुण्ण अधिकार देता है उसे गैर-कानूनी संस्थाओं द्वारा कुचला जाना उसकी बड़ी विडंबना है। सुधार करने वाले संगठन या तो समाप्त हो गए हैं या भयभीत हैं। उनकी जगह राजनीतिक दलों ने ले ली है, जिनका काम हर हाल में पार्टी और उम्मीदवार के लिए वोट का गणित तैयार करना है। उनके लिए संविधान के मूल्यों से ज्यादा अगला चुनाव महत्वपूर्ण है जो खाप जैसी संस्था से पंगा लेकर नहीं जीता जा सकता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति के अधिकार और गरिमा को कायम करने का स्वागत होना चाहिए। देखना है कि उसके आदेश को प्रशासन-सरकारें किस हद तक लागू करती हैं।


दैनिक जागरण

विकल्प देने की तैयारी

तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिल्ली आकर जिस तेजी से विपक्ष के कई नेताओं से मिलीं उससे यह साफ है कि वह विपक्षी एकता की अगुआई करते हुए दिखना चाह रही हैं। ममता बनर्जी पहले भी यह प्रदर्शित कर चुकी हैं कि वह विपक्ष को गोलबंद करने की क्षमता रखती हैं। वह इस गोलबंदी को तीसरा-चौथा मोर्चा कहने के बजाय संघीय मोर्चे के रूप में रेखांकित कर रही हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं कि वह संघीय मोर्चे में कांग्रेस को स्थान देने के लिए तैयार हैं या नहीं, क्योंकि इस बारे में उन्होंने इतना ही कहा कि अगर इस मोर्चे की ठीकठाक सीटें आ गईं तो कांग्रेस भी साथ देगी। उनके ऐसे रवैये से यही संकेत मिलता है कि उन्हें राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता स्वीकार नहीं। जो भी हो, यह तय है कि विपक्षी एकता की ऐसे प्रयास चलते ही रहने वाले हैं। हालांकि हाल के अतीत में ऐसे प्रयासों को सफलता नहीं मिली, लेकिन इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि आगे भी बात नहीं बनेगी। इतना अवश्य है कि केवल यह नारा प्रभावी नहीं होने वाला कि भाजपा को सत्ता में आने से रोकना है। इस नारे के साथ विपक्षी दल एकजुट तो हो सकते हैं, लेकिन वे जनता को आकर्षित नहीं कर सकते। समाज और देश के उत्थान की कोई प्रभावी नीति और नजरिये के अभाव में विपक्षी एकता की कोशिश अवसरवाद के तौर पर ही देखी जाएगी। ऐसे अवसरवाद से जनता ऊब चुकी है। विपक्षी दलों को यह समझ आ जाए तो बेहतर कि उन्हें जनता को यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि उनके पास ऐसा एजेंडा है जो कारगर साबित हो सकता है। अभी तो इस एजेंडे के नाम पर केवल इतना ही है कि भाजपा को रोकना है। 1इसमे दोराय नहीं कि भाजपा जैसे प्रबल जनादेश के साथ सत्ता में आई उसके अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी है और इसी कारण आम जनता के बीच एक बेचैनी सी है, लेकिन अभी ऐसे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि जनता उसके विकल्प की तलाश में जुट गई है और वह उसे विपक्ष में नजर आने लगा है। अगर भाजपा तमाम बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं खोज सकी और शासन-प्रशासन के तौर-तरीकों में आवश्यक बदलाव नहीं ला सकी तो विपक्षी दल भी अपने शासन वाले राज्यों में सुशासन की कोई नई इबारत नहीं लिख सके हैं। ऐसे दलों में तृणमूल कांग्रेस भी है। विपक्षी दलों के समक्ष एक बड़ी समस्या यह भी है कि राष्ट्रीय महत्व के मसलों पर उनके पास न तो कोई स्पष्ट दृष्टिकोण दिखता है और न ही किसी तरह का न्यूनतम साझा कार्यक्रम। अंतरराष्ट्रीय मामले तो उनकी प्राथमिकता में ही नहीं नजर आते और वह भी तब जब ऐसे मामले देश को कहीं अधिक प्रभावित करते दिख रहे हैं। विपक्षी दलों के लिए भाजपा के खिलाफ एकजुटता की बातें करना आसान हो सकता है, लेकिन यह उन्हें ज्यादा दूर तक ले जाने में शायद ही सहायक हो। अच्छा होगा कि विकल्प देने को तैयार विपक्ष किसी वैकल्पिक एजेंडे के साथ सामने आए।


देशबन्धु

कहां गई क्रिकेट की भद्रता
शासक हैं तो हमारा रंग-रूप, रीति-रिवाज, खान-पान, रहन-सहन ही नहीं हमारे मनोरंजन के तरीके भी दुनिया में एक पायदान ऊपर हैं। अन्यथा किसी खेल को भद्रजनों का यानी जेंटलमेंस गेम कहने का और क्या अर्थ हो सकता है। खेल में भद्रता और शिष्टता की सारी परिभाषाएं इस बात से तय होनी चाहिए कि उसमें नियम कितने पारदर्शी हैं और उनका पालन कितनी ईमानदारी से किया जाता है। अगर इस परिभाषा की कसौटी पर परखें तो आस्ट्रेलिया की टीम ने किकेट ही नहीं खेलभावना के साथ जबरदस्त अभद्रता की है।
द.अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के बीच टेस्ट मैचों का मुकाबला चल रहा है, जिसमें तीसरे टेस्ट मैच में आस्ट्रेलियाई टीम को अपनी हार नजर आई, तो इसके तीसरे दिन कंगारू टीम ने चर्चा कर बॉल टेंपरिंग यानी गेंद के साथ छेड़छाड़ करने का निर्णय लिया। इसके बाद कैमरून बेनक्राफ्ट पारी के ४३वें ओवर में गेंद के साथ छेड़छाड़ करते कैमरे में पकड़े गए। यह नई तकनीकी का लाभ है, वर्ना इस तरह की बेईमानियां पहले भी होती होंगी, बस सबके सामने नहीं आ पाती होंगी। बहरहाल, जब इस विवाद ने तूल पकड़ा तो आस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव स्मिथ और बेनक्राफ्ट ने अपनी गलती स्वीकार कर ली। इसके बाद आईसीसी ने रविवार को अपना निर्णय सुनाते हुए स्मिथ पर पूरी मैच फीस के साथ एक मैच का प्रतिबंध लगाया गया वहीं गेंद के साथ छेड़छाड़ करने वाले कैमरून बेनक्राफ्ट पर ७५ प्रतिशत मैच फीस का जुर्माना लगाया गया साथ ही उनके खाते में तीन डिमेरिट अंक जोड़े गए। आईसीसी की सजा कुछ ऐसी है कि कोई बच्चा कक्षा में शरारत करे तो गुरुजी उसे थोड़ी देर के लिए बाहर खड़ा कर दें।
इस फैसले पर भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने तो तंज कसते हुए ट्वीट किया, वाह आइसीसी, अद्भुत फैसला और गजब की निष्पक्षता दिखाई। सारे सबूत बेनक्रॉफ्ट के खिलाफ होने के बावजूद उस पर कोई बैन नहीं लगाया। साल २००१ में तो हमारे ६ खिलाडय़िों के खिलाफ बगैर किसी सबूत के ज्यादा अपील करने की वजह से बैन लगाया। और २००८ का सिडनी तो टेस्ट याद है ना? मेरी कोई गलती नहीं पाई गई, बावजूद इसके तीन मैच का बैन लगाया। आपके पास अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग नियम हैं। सही बात है, क्रिकेट की यह अंतरराष्ट्रीय संस्था शायद इस मामले को केवल गेंद से छेड़छाड़ तक ही देख रही है, वह इस बात पर गौर नहीं कर रही है कि आस्ट्रेलिया की टीम ने कोई मासूम शरारत नहीं की है, बल्कि मैच को जीतने के लिए सोच-समझ कर बेईमानी की है।
एकाध खिलाड़ी ऐसा करता, तब भी बात और होती, लेकिन यहां तो पूरी टीम इस षड्यंत्र में भागीदार मानी जानी चाहिए, क्योंकि सबको पता था कि हार से बचने के लिए अब बेनक्राफ्ट गेंद को खरोंचने जा रहे हैं। खेल में हार-जीत तो लगी रहती है और खेल भावना भी यही कहती है कि हार या जीत, निर्णय जो भी हो, उसे खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। तो क्या आस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों में खेल भावना जैसा कोई जज्बा ही नहीं है? क्या वे अपनी हार किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते?
स्टीव स्मिथ को टेस्ट बल्लेबाजी की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में नंबर वन माना जाता है। उनकी तुलना अक्सर सर डान ब्रैडमेन से की जाती है। लेकिन अब भी क्या उन्हें सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माना जाना चाहिए, जबकि उनकी बेईमानी सबके सामने आ चुकी है। और यह कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले भारत दौरे पर भी स्मिथ विवाद में पड़े थे जब बेंगलूर में डीआरएस लेने से पहले उन्होंने अपने खिलाड़ियों की तरफ गैलरी में देखा था, जबकि नियमों के तहत डीआरएस लेते समय खिलाड़ी मैदान से बाहर नहीं देख सकता। २०१६ में क्राइस्टचर्च टेस्ट में अंपायर के फैसले पर असंतोष जताने पर भी उन्हें जुर्माना भरना पड़ा था। एक बार गलती तो माफ की जा सकती है, लेकिन बार-बार अगर बेईमानी हो, तो क्या इसे अनदेखा करना चाहिए?
यह गनीमत है कि आस्ट्रेलियाई टीम की इस गलत हरकत पर वहां के प्रधानमंत्री टबुर्नल ने खेद प्रकट किया है और क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख जेम्स सदरलैंड ने मामले की जांच की बात कही है। शायद कप्तान स्टीव स्मिथ और उपकप्तान डेविड वार्नर पर आजीवन प्रतिबंध भी लग जाए। लेकिन कुछ खिलाड़ियों को सजा से क्रिकेट पर लगे दाग शायद ही मिटें। क्रिकेट खिलाड़ियों और इसके प्रशासन-प्रबंधन से जुड़े तमाम लोगों को अब इस बात की चिंता भी करनी चाहिए कि आखिर इस खेल से खेल भावना विलुप्त क्यों हो रही है? बाजार का दबाव, सट्टेबाजों का जोर, अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग का खिलाड़ियों के मार्केट प्राइस से संबंध, आईपीएल जैसी प्रतियोगिताओं में ऊंची बोली और इसी तरह के व्यावसायिकहित क्या क्रिकेट से भद्रता, शिष्टता को बाहर निकाल कर बेईमानी, अभद्रता के लिए जगह बना रहे हैं? इन सवालों का जवाब तलाशा जाएगा, तो क्रिकेट बचेगा और खेलभावना भी।


प्रभात खबर 

सद्भावना कायम रहे

पर्व-त्योहारों को तो हर साल आना है, पर क्या यह आवश्यक है कि पवित्र तिथियों पर हिंसा भी अपने वीभत्स चेहरे के साथ सामने आये? रामनवमी के अवसर पर पश्चिम बंगाल, बिहार और ओड़िशा में कुछ जगहों पर भड़की हिंसा के संदर्भ में यह प्रश्न पूछा ही जाना चाहिए. बीते दिनों में अनेक राज्यों में हिंसा किसी कर्मकांड की ही तरह दोहरायी गयी है.
सांप्रदायिक नारों और हथियारों से लैस भीड़ का प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करते हुए जुलूस निकालना, उत्पात मचाना, जान-माल का नुकसान करना, निषेधाज्ञा और कर्फ्यू लगना- यह सब किसी कर्मकांड की तरह घटित हुआ. यह कहकर तो संतोष नहीं किया जा सकता है कि प्रशासनिक ढिलाई के कारण उपद्रवी तत्वों को मनमानी करने का मौका मिला. यह भी सोचा जाना चाहिए कि प्रशासनिक ढिलाई का मर्ज लाइलाज क्यों होता जा रहा है और विविधताओं का सम्मान करनेवाले एक लोकतंत्र के रूप में हमें इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ रही है? त्योहार निजी नहीं होते और उन्हें अपने घर की चारदीवारी के भीतर सीमित रखना भी संभव नहीं है.
त्योहारों से जुड़े कुछ कर्मकांड सामुदायिक होते हैं और इस नाते त्योहारों का सामुदायिक शक्ति-प्रदर्शन का माध्यम बनकर उभरना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. त्योहारों के सार्वजनिक पक्ष- पूजन के मंत्रोच्चार, प्रतिमा विसर्जन, मातमी जुलूस या फिर खास नमाज की अदायगी के अवसर पर सामुदायिक पहचान और उससे जुड़े गर्व की घोषणा के मौके में तब्दील हो गये हैं.
निहित स्वार्थवश ऐसे उत्सवों को सांप्रदायिक गोलबंदी के लिए आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है. ऐसे में चुनावी सियासत के उस स्वभाव के बारे में भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है, जो हर सांप्रदायिक गोलबंदी को जनाधार जुटाने के एक मौके के रूप में देखती है. हिंसा में हमेशा जनता के ही कुछ लोग शामिल होते हैं, परंतु यह नहीं कहा जा सकता है कि लोग स्वभाव से ही हिंसक हैं. रोजमर्रा के बरताव में लोगों में ऐसी हिंसा शायद ही दिखायी देती है. सो, बड़े जतन से बनायी और फैलायी गयी उन रूढ़ छवियों के बारे में सोचा जाना चाहिए, जो एक-न-एक तर्क से प्रचलित सोच के भीतर यह धारणा दाखिल करती हैं कि फलां समुदाय स्वभाव से ही हिंसक है. यह बात भी तय है कि आम लोगों को भीड़ में बदलने और उकसाने का काम निहित स्वार्थों द्वारा अंजाम दिया जाता है.
धार्मिक अवसरों पर तनाव और हिंसा रोकने के लिए एक तो शासन-प्रशासन को मुस्तैद रहना होगा, ताकि यदि बात बिगड़े भी, तो तुरंत काबू पाया जा सके. दूसरी जरूरत यह है कि सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के रूप में हम ऐसे तत्वों को आयोजनों से दूर रखें तथा उनके बहकावे में न आएं. राजनीतिक, सामाजिक और सामुदायिक संगठनों को भी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभानी चाहिए. धार्मिक अवसर पर हमें मनुष्यता के श्रेष्ठ मूल्यों का प्रदर्शन करना चाहिए और आपराधिक आचरणों से दूर रहना चाहिए.

The Hindu

Homestretch

Karnataka was supposed to be the Bharatiya Janata Party’s point of entry into southern India. But after its historic victory in the 2008 Assembly election, the party lost its way in the State, and the Congress staged a comeback five years later. Now, far from expanding to the neighbouring States, the party is struggling to return to power in Karnataka in the face of a determined defensive battle by the politically savvy Congress Chief Minister, Siddaramaiah. A relatively new entrant to the Congress, he has created his own space in the faction-ridden party and in the wider public sphere by traversing caste divides and resisting communal polarisation. Thus, the single-phase election on May 12 could witness a face-off between the BJP and the Congress, with the Janata Dal (Secular) a distant third. The BJP’s challenge is mounted by the old warhorse B.S. Yeddyurappa, its most valuable asset and arguably also its greatest liability. If he won it for the BJP in 2008, he also ensured a defeat in 2013. After he resigned as Chief Minister following allegations of involvement in illegal mining and land deals, Mr. Yeddyurappa tried to run the government through handpicked men. When there was resistance to his meddling from the outside, he formed his own party, the Karnataka Janata Paksha, to down the BJP in 2013, but returned in time to help the BJP perform creditably in the 2014 election. In the absence of other evidence, it must have seemed to the BJP’s national leadership that it could win only with the active assistance of Mr. Yeddyurappa.

Mr. Siddaramaiah has used divisive tactics of his own. His government aided demands for religious minority status for Lingayats, a Shaivite section from which Mr. Yeddyurappa, and by extension the BJP, draw substantial support. And he indulged regional sentiments by unveiling a Karnataka State flag. Both decisions are awaiting the approval of the Centre, but the Congress believes that irrespective of what the BJP-led government at the Centre does, the dividends are for it to reap. Agitations against the use of Hindi in Metro stations are also being turned to the disadvantage of the BJP, which is trying to refurbish its image as a Hindu-Hindi party by stressing solely on the Hindu aspect. Karnataka will not be the last State to go to the polls before the Lok Sabha election of 2019, but it holds great importance for the campaigns of the Congress and the BJP in the run-up to 2019. A loss for either will be a dampener, and a win a great morale booster. Leaders of both parties need to convince themselves, more than anyone else, that they have their nose ahead as they near the homestretch.


Indian Express

No One Wins

At a time when the NDA government and the RBI are struggling to resolve India’s bad loan mess, the RBI governor, Urjit Patel, and the chief economic advisor (CEA), Arvind Subramanian, seems to have got into an ungainly war of words. Patel sought to counter the government’s criticism of the RBI on its perceived supervisory and regulatory failures saying the central bank was hamstrung when it comes to PSU banks because of inadequate legal powers to supervise and regulate them. On Monday, Subramanian said the “independence (of the central bank) is not acquired through the law but a large part is acquired through reputation and the history of good and effective decision-making. When you say a central bank has credibility, it gets credibility not just because it’s independent… After all, if you are independent and make a series of bad decisions, you lose credibility”. Their remarks appear to reflect a divide that exists between the fiscal and monetary arms of the government. If differences between the finance ministry and the government have widened, both should shoulder the blame. The government was late in responding to the crisis in the banking sector: The government waited for three years to announce the Rs 2.11-lakh crore recapitalisation package and other measures and the delayed the appointment of CEOs of many PSU banks. It has also been slow on governance reforms too. Equally, the RBI cannot absolve itself of supervisory failures, especially its oversight of banks.

It is tempting to view these conflicts as a battle of egos, but the issue goes beyond that. For, there is a structural issue — the dominance of the government in India’s banking landscape and ownership of banks — which in many ways is at the root of this conflict. That the RBI is engaged in multiple functions, including being a merchant banker to the government rather than being a micro prudential regulator with a single mandate, adds to the problem.

Relationships between successive governors and finance ministers over the last decade have been testy. At the current juncture, the overriding objective of both parties should be to clean up bank balance sheets and ensure greater professionalism in state-owned banks and to fortify them so that they are well-positioned to lend when there is an upturn. There are also near-term considerations, among them the challenge of ensuring that the government’s borrowing programme runs smoothly at a time when interest rates are rising.

That’s why it is important for the PMO to step in and end the sparring between the finance ministry and the RBI. These two bodies need to coordinate better. The time is also opportune for a larger debate on accountability mechanisms such as oversight of the Indian central bank by lawmakers on the lines of the US Federal Reserve and a fiscal council for the government.


Times Of India

Correct Course

In a big diplomatic move, the US and a host of European countries expelled 126 Russian diplomats for Moscow’s alleged use of a military-grade nerve agent to poison a former Russian spy and his daughter on UK soil. Washington also ordered the shutting down of the Russian consulate in Seattle believing this to be an intelligence outpost. The coordinated response from Nato allies shows a toughening of stance among Western democracies to Russian subversive activities.

Russia today is increasingly viewed as a provocateur that is out to destabilise Western democracies. Whether it is Russian hackers and online mischief mongers planting fake news and trying to influence elections, or Russian field agents attacking people on foreign soil or infiltrating eastern Ukraine, Moscow believes it can regain past glory by leveraging its intelligence and military prowess. However, the Russian economy is anything but robust. It is increasingly propped up by the energy deal with China, which means sooner or later Moscow will be at Beijing’s mercy.

Nonetheless, Moscow thinks it can address the power asymmetry with the West by taking advantage of the liberal systems of Western democracies. There is a structural parallel to the situation between India and Pakistan, although Pakistani provocations – which include attacks on India’s Parliament in 2001 and on Mumbai in 2008 – are far graver. Pakistan chafes at its power asymmetry with India, and believes this can be addressed through a programme of asymmetric warfare. That has resulted in Pakistan becoming increasingly isolated in the world even as its economy remains depressed and it grows increasingly dependent on China. Soon, its sovereignty over its territory and even its citizens may be bartered away.

Russia has lost more than it has won through its policy of confronting the West. And it may not be a coincidence that it is inching closer to Pakistan. India loses due to the confrontation between Russia and the West, as it would like to ally with both sides. Pakistan loses even more through its policy of confrontation with India. It would be far wiser for Russia and Pakistan to avoid confrontation and choose a path of greater cooperation with the West and India, respectively. Otherwise, both are fighting losing battles.


 The Telegraph

Stealth Mode

If one is not paying for the product, one is the product. Steve Job ‘ s chilling prediction captures perfectly the recent revelation about Cambridge Analytica. The data mining and analysis company bought deceptively obtained user information from an application on Facebook to devise political advertising across the world. But what Cambridge Analytica did is not illegal per se . The company is, in fact, the red herring in this case. It is Facebook ‘ s model of data collection and distribution that should be scrutinized. First, the app that gathered data on users and their friends — as do thousands of other apps every single day — did so with Facebook ‘ s consent. Facebook remains indifferent to this as its entire business model is based on monetizing personal data. It also uses as a shield the excuse that users agree to such a barter of information while signing Facebook ‘ s privacy policy. Such policies are — perhaps deliberately — hard to read and tiresomely lengthy. And most people signing away their rights are not concerned about data privacy because they are unaware of its gravity. More important, agreeing to let Facebook, or apps on it, collect data is not equivalent to allowing future manipulation of such data.

However, of greater concern than the legal nitty- gritty is the lack of transparency. Facebook still has not alerted those users whose profile information was vacuumed up by the app. Further, the company reportedly still does not have a mechanism for monitoring how the data it sells is used or whether it is stored for future use by the buyer.

Expecting Facebook or the other internet giants to change their core business function — profiting from large sets of user data — is futile. This is worrying given that big data is the new oil of world politics.

What is needed are stronger regulations to give people more control over private information and prevent businesses and political campaigns from harvesting personal data under false pretences.

The European Union, for instance, will be enforcing the general data protection regulation this year. India, on the other hand, has been dragging its heels on formulating a strong data privacy law. The ruling Bharatiya Janata Party ‘ s push for a digital India has not been backed by checks to protect the thousands of Indians who are going online for the first time. While a committee has been set up to draft such a law, it is unlikely that the same will be passed before the 2019 general elections.

Given that two of the largest political parties in India are clients of a subsidiary of Cambridge Analytica, concerns regarding the mining of user data for electoral purposes are sure to spike.


New Indian Express

Spies, lies and return of cold war rhetoric

The expulsion of more than 120 Russian diplomats by over 20 western nations has sparked speculation about a return of the Cold War. President Vladimir Putin now faces what is being described as Russia’s biggest diplomatic crisis since it annexed Crimea in March 2014. In another throwback to the Cold War era, the expulsions come after the poisoning of a former Russian double agent and his daughter in the UK with a deadly nerve agent apparently preferred by the Russian military. As expected, Moscow, which denies involvement in the poisoning, has initiated tit-for-tat expulsions and warned of other ‘harsh actions’.

This show of European solidarity with Britain—which expelled 23 Russian diplomats—comes when ties between the UK and Europe are strained over Brexit. The US action is significant because apart from expelling 48 diplomats and shutting the Russian Consulate in Seattle, it has also expelled 12 Russian diplomats at the UN, described by the State Department as “intelligence operatives” who have “abused their privilege of residence” in the US. The main impact of these expulsions will be on Russian intelligence, since most of those expelled are suspected spies.

No Asian or African nation has initiated any action against Russia so far. While it is too early to predict whether Russia will align closely with China in the hope of forging an anti-US axis, one can expect a revival of the strident rhetoric of the Cold War, even though the geopolitical circumstances are radically different today.

For India, this comes at a time when New Delhi has been reaching out to Moscow to speed up defence deals and revive a relationship which has seen better days. Defence Minister Nirmala Sitharaman is expected to visit Russia soon, while PM Narendra Modi is expected to attend the Shanghai Cooperation Organisation—a Eurasian strategic and security platform—summit later this year in China. Under these circumstances, New Delhi is likely to resort to something it is already renowned for: wait and watch.