Home काॅलम आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 27 मार्च, 2018

आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 27 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

साख और सूचना

 

नमो ऐप को लेकर विदेश में हुए एक खुलासे ने इसे इंस्टॉल करने वाले लाखों लोगों की चिंता बढ़ा दी है। फ्रांस के शोधार्थी इलियट एल्डरसन ने हाल में ट्वीट कर कहा कि ‘नमो ऐप’ इंस्टॉल करते ही इंस्टॉल करने वाले से जुड़ी सारी सूचना, यानी नाम, पता, ईमेल, फोटो, लिंग, रुचि आदि तमाम जानकारियां एक अमेरिकी कंपनी तक पहुंच जाती हैं। इस पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुटकी ली कि मोदी जी का ‘नमो ऐप’ आपके दोस्तों तथा परिवार के सदस्यो का ऑडियो, वीडियो चुपचाप रिकार्ड कर रहा है। गौरतलब है कि ‘नमो ऐप’ एक ऐसा मोबाइल ऐप है जिसके जरिए कोई भी व्यक्ति भारतीय प्रधानमंत्री से सीधे जुड़ सकता है। इसके जरिए उनके संदेश लोगों तक पहुंचते रहते हैं। इस पर ‘मन की बात’, पीएम का ब्लॉग और बायोग्राफी भी उपलब्ध हैं। ऐसे लाखों लोग, जो मोदी के निजी तौर पर प्रशंसक हैं और उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करना चाहते हैं, इस ऐप के जरिये उनसे जुड़े हुए हैं। लेकिन अब उनका डेटा थर्ड पार्टी को दिए जाने की खबर ने उनके होश उड़ा दिए हैं। अफसोस कि बीजेपी ने इसे सिर्फ एक राजनीतिक आरोप के रूप में लिया है। वह इससे जुड़े संकट को समझने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल यह सूचना सार्वजनिक होने के सिर्फ एक दिन पहले नमो ऐप में यह बात जोड़ी गई कि बेहतर यूजर एक्सपीरियंस के लिए आपकी कुछ सूचनाएं थर्ड पार्टी के साथ शेयर की जा सकती है। ये सूचनाएं नाम, ईमेल, मोबाइल नंबर, डिवाइस की जानकारी, लोकेशन और नेटवर्क करियर आदि हो सकती हैं। इसके पहले ऐप की पॉलिसी में स्पष्ट लिखा था ‘आपकी सूचनाएं बिना आपकी इजाजत के किसी भी रूप में किसी तीसरी पार्टी को नहीं दी जाएंगी।’ अब विवाद उठने के बाद बीजेपी आईटी सेल के चीफ का कहना है कि नमो ऐप से जिस डेटा को तीसरी पार्टी के साथ शेयर किया जाता है, उसका मकसद ठीक उसी तरह विश्लेषण प्राप्त करना है, जैसा गूगल एनालिटिक्स किया करता है। उनकी दलील है कि डेटा को न तो संग्रह किया जाता है, न ही थर्ड पार्टी द्वारा इसका किसी तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बीजेपी को पता होना चाहिए कि थर्ड पार्टी को डेटा ट्रांसफर अभी आईटी सेक्टर का एक बड़ा संकट बन गया है। फेसबुक तक को इसके लिए माफी मांगनी पड़ी है। नमो ऐप का संबंध सीधे-सीधे केंद्र सरकार से है या नहीं, यह अभी अस्पष्ट है, क्योंकि इसके डिवेलपर का पता बीजेपी ऑफिस दर्ज है। लेकिन प्रधानमंत्री का नाम जुड़ा होने के चलते सरकार इससे पल्ला नहीं झाड़ सकती। नमो ऐप को लेकर सारी आशंकाएं उसे दूर करनी ही होंगी। डेटा शेयर करने का मकसद बताने के अलावा उसे लोगों को आश्वस्त करना चाहिए कि उनकी सूचनाओं का कोई दुरुपयोग नहीं हुआ है।


 जनसत्ता

बेईमानी का खेल

 

मैच के दौरान गेंद से छेड़छाड़ के कारण आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम के कप्तान पद से स्टीव स्मिथ और उपकप्तान पद से डेविड वार्नर को आखिरकार अपने-अपने पद से हटना पड़ा। इस वाकये से आस्ट्रेलियाई क्रिकेट की साख गिरी है। साथ ही, यह घटना पूरे क्रिकेट जगत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। सबसे अफसोसनाक यह है कि गेंद को खराब करने की हरकत के पीछे किसी एक खिलाड़ी की सनक नहीं थी, बल्कि ऐसा सुनियोजित रूप से किया गया, और इसमें टीम का नेतृत्व भी शामिल था। कोच के भी संलिप्त होने की शंका जताई गई है। घटना यह है कि मेजबान दक्षिण अफ्रीका से तीसरे टैस्ट मैच के दौरान आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बेनक्रॉफ्ट ने फील्डिंग करते हुए गेंद से छेड़छाड़ की, ताकि गेंदबाज रिंवर्स स्विंग करा सके। इस शृंखला के अब तक मैचों में रिवर्स स्विंग कारगर साबित हुई है। क्या पता अगले मैच में भी हो। लेकिन बेनक्रॉफ्ट की यह हरकत कैमरे में कैद हो गई, और इसी के साथ विवाद खड़ा हो गया। मामला तूल पकड़ने पर आस्ट्रेलियाई टीम को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गलती कबूल करनी पड़ी।

सबूत इतने पक्के थे कि कबूलनामे के सिवा कोई चारा नहीं था। यों अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में गेंद से छेड़छाड़ का यह कोई पहला मामला नहीं है। मसलन, 1977 में चेन्नई में खेले गए अंतरराष्ट्रीय मैच में भारतीय टीम के तत्कालीन कप्तान बिशन सिंह बेदी ने इंग्लैंड के गेंदबाज जॉन लेवर पर वेसलीन से गेंद चमकाने का आरोप लगाया था। जांच में आरोप सही पाया गया, पर मामले को दबा दिया गया। ऐसे भी उदाहरण हैं कि दोषी खिलाड़ी पर एकाध मैच का प्रतिबंध और जुर्माना लगा या उसकी मैच फीस में कटौती की गई। आरोप लगने और साबित न हो पाने के उदाहरण भी हैं। क्या पता, कई अन्य मामलों में भी सिर्फ एक खिलाड़ी दोषी न रहा हो। पर ताजा मामले में गेंद से छेड़छाड़ करने वाले खिलाड़ी के अलावा टीम नेतृत्व की संलिप्तता प्रमाणित है। लिहाजा, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने कप्तान स्मिथ को एक मैच के लिए प्रतिबंधित कर दिया और उन पर सौ फीसद मैच फीस का जुर्माना भी लगा दिया। गेंद से छेड़छाड़ करने वाले बेनक्रॉफ्ट की सिर्फ पचहत्तर फीसद फीस काटी गई है। उन पर एक भी मैच का प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया? आइआइसी का रवैया भले नरमी का दिख रहा हो, सीए यानी क्रिकेट आस्ट्रेलिया और एएससी यानी आस्ट्रेलियाई खेल आयोग ने मामले को कहीं ज्यादा गंभीरता से लिया है।

एएससी के दबाव में सीए ने स्मिथ और वार्नर को फौरन पद-मुक्त कर दिया। 2015 से स्मिथ आस्ट्रेलिया के लिए काफी सफल कप्तान रहे हैं, पर अब वे किरकिरी का कारण बन गए हैं। हो सकता है अब वे आइपीएल में राजस्थान रॉयल्स की कप्तानी भी न कर पाएं। जीतने का जज्बा जरूरी है और वही खेलों को रोमांचक बनाता है। पर जज्बा और किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने की मनोवृत्ति, दो एकदम अलग-अलग चीजें हैं। किसी भी कीमत पर जीतने की अंध-इच्छा गलत-सही के विवेक को हर लेती है और तब जहां खिलाड़ी को बेईमानी से संकोच नहीं होता, वहीं दर्शक या प्रशंसक उन्मादी बन जाते हैं जो खेल नहीं, हर हाल में सिर्फ अपनी टीम की जीत देखना चाहते हैं। इस मानसिकता से उबरे बिना खेलों को बेईमानी का खेल बनने से नहीं रोका जा सकता।


हिन्दुस्तान

परमाणु मंशा पर पाबंदी

आतंकवाद को शह देने के मामले में दुनिया के तमाम मंचों पर परेशानियों में घिरा पाकिस्तान अब कुछ दूसरे क्षेत्रों में भी फंसता जा रहा है। अमेरिकी सरकार ने सात पाकिस्तानी कंपनियों पर इसलिए पाबंदी लगा दी है कि वे परमाणु अप्रसार के खिलाफ काम कर रही हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो ये पाकिस्तानी कंपनियां ऐसी संवेदनशील सामग्री और संयंत्रों की खरीद-फरोख्त में लिप्त पाई गई हैं, जिनका इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में हो सकता है। खबरों में यह भी कहा गया है कि ऐसी ही पाबंदी पाकिस्तान की कुछ और कंपनियों पर भी लग सकती है। भले ही पहली नजर में यह एक नियमित कार्रवाई लगे, लेकिन अमेरिका ने यह सब उस समय किया है, जब पाकिस्तान न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानी एनएसजी का सदस्य बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है।

जबसे भारत का इस ग्रुप में प्रवेश हुआ, पाकिस्तान भी इसके लिए जुटा हुआ है। चीन इस कोशिश में हर कदम पर उसका साथ दे रहा है, लेकिन दोनों मिलकर दुनिया को इस बात के लिए आश्वस्त करने में नाकाम रहे हैं कि इतनी संवेदनशील और संहारक तकनीक पाकिस्तान में सुरक्षित हाथों में रहेगी। ताजा पाबंदी बताती है कि पाकिस्तान परमाणु सामग्री खरीदने के लिए सभी जायज-नाजायज तरीके अपना रहा है, इसलिए यह पाबंदी ग्रुप की सदस्यता के लिए उसके दावे के खिलाफ जाएगी। हालांकि अमेरिका ने बस इतना ही कहा है कि ये कंपनियां उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति-हितों के खिलाफ काम कर रही थीं

हालांकि एक दूसरी तरह से देखें, तो यह कदम उस समय उठाया गया है, जब चिड़िया पूरा खेत बहुत पहले ही चुग चुकी है। इस तरह की पाबंदी या सख्ती अगर अमेरिका ने चार दशक पहले दिखाई होती, तो पाकिस्तान आज शायद दुनिया के लिए इतना बड़ा खतरा बनकर न उभरा होता। यह बात शुरू से ही स्पष्ट रही है कि पाकिस्तान ने अपना पूरा परमाणु कार्यक्रम चोरी और तस्करी के जरिए ही सिरे चढ़ाया है। लेकिन कई समीकरणों में पाकिस्तान की सामरिक उपयोगिता के चलते पश्चिमी देश इसे लेकर आंख मूंदे रहे। इसलिए अब इस तरह की पाबंदी का अर्थ बहुत सीमित है। कहा जाता है कि पाकिस्तान हर साल 20 से ज्यादा परमाणु बम बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। यह भी कहा जाता है कि उसके परमाणु जखीरे में बमों की संख्या सौ से भी ज्यादा है। यह पाबंदी इस सूरत को नहीं बदल सकती। किसी भी नई पाबंदी का पाकिस्तान की विध्वंसात्मक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यह खतरा बना रहेगा कि उसकी विध्वंसात्मक क्षमता किसी आतंकवादी समूह या किसी चरमपंथी गुट के हाथ कभी भी पड़ सकती है। खुद पाकिस्तान ने भी लंबे समय से इसे इस्लामिक देशों के परमाणु बम के रूप में काफी प्रचारित किया है।

फर्क बस इतना पड़ेगा कि एनएसजी के जरिए अपनी परमाणु क्षमता को नई धार देने की पाकिस्तान की कोशिश थोड़ी कुंद जरूर हो जाएगी। इसके अलावा विश्व बिरादरी में भारत के बराबर खड़े होने की उसकी महत्वाकांक्षा भी थोड़ी सी आहत हो जाएगी। हालांकि इसका भी अपना एक महत्व है, लेकिन दुनिया के सामने यह चुनौती पहले की तरह ही खड़ी रहेगी कि आतंकवादियों के दुनिया के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता को आतंक फैलाने से कैसे रोका जाए? परमाणु सामग्री का कारोबार करने वाली सात कंपनियों पर पाबंदी में इसका कोई आश्वासन नहीं है


अमर उजाला

ये कैसा खेल

दक्षिणअफ्रीका के प्रवास पर गई ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के एक खिलाड़ी द्वारा गेंद से छेड़छाड़ किए जाने से उपजा विवाद जितना अप्रिय है, उससे कहीं अधिक निंदनीय इस कृत्य में इस टीम के कप्तान स्टीव स्मिथ और उपकप्तान डेविड वार्नर का लिप्त होना है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने जब दोनों टीमों के बीच हुए तीसरे टेस्ट में गेंद से छेडखानी किए जाने के आरोप की जांच की, तो स्मिथ ने बेशर्मी के साथ स्वीकार किया कि इसका निर्णय टीम में उच्च स्तर पर लिया गया था! आईसीसी ने इस घटना को खिलाड़ियों के लिए बनाई गई आचार संहिता का उल्लंघन माना है, लेकिन स्मिथ पर मैच फीस और एक मैच के प्रतिबंध की सजा ही सुनाई है। संबंधित खिलाड़ियों को भी इसी तरह की सजा सुनाई गई है, जोकि इस लिहाज से नाकाफी हैं, क्योंकि यह सिर्फ एक मैच को प्रभावित करने का ही मामला नहीं है, बल्कि इसके जरिये क्रिकेट की साख को धक्का पहुंचाया गया है। गेंद से छेड़खानी करने का यह पहला मामला नहीं है। वास्तव में आधुनिक क्रिकेट में गेंद से छेड़खानी का पहला शिकार तो भारत हुआ था, जब 1976 में मेहमान टीम इंग्लैंड के युवा तेज गेंदबाद जॉन लीवर ने अपने जीवन के पहले ही टेस्ट में दस विकेट झटक लिए थे और बाद में पता चला कि वह गेंद में वैसलीन लगाकर उसे चमकाते थे। लेकिन यह मामला तूल नहीं  पकड़ सका था, तो इसलिए क्योंकि न तो उस समय वैसी जागरूकता थी और न ही आईसीसी जैसी संस्था। दरअसल यह विश्व क्रिकेट पर दबदबे और बादशाहत का भी मामला है। स्मिथ भले ही दुनिया के इस समय सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज हों, लेकिन उनकी कप्तानी में इसी सीरीज में उनकी टीम दक्षिण अफ्रीका से बुरी तरह पिछड़ चुकी है। आज टेस्ट मैचों की रैकिंग में भारत शीर्ष पर है और ऑस्ट्रेलिया दक्षिण अफ्रीका के बाद तीसरे नंबर पर। इस घटना ने स्मिथ, वार्नर और बेनक्रॉफ्ट का करियर दांव पर लगा दिया है। स्मिथ को राजस्थान रॉयल्स ने कप्तान के पद से भी हटा दिया है और अब उनका आईपीएल में खेलना भी संदिग्ध है। यह कितना पीड़ादायक है कि जिस स्मिथ का नाम टेस्ट बैटिंग रैंकिंग में 947 अंकों के साथ डॉन ब्रैडमैन जैसे महान बल्लेबाज के बाद दूसरे नंबर पर दर्ज है, उस पर आजीवन प्रतिबंध का खतरा मंडरा रहा है।


राजस्थान पत्रिका

पटरी पर कब ट्रेन

देश में कितनी सरकारें आईं और गई लेकिन सरकारी  कामकाज के ढरें में बदलाव नजर नहीं आया। सरकारी कामकाज का जो तरीका नेहरू, इंदिरा और मोरारजी देसाई के शासन काल में था, लगभग वही रवैया मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल में भी देखने को मिला। मनमोहन सरकार बदली और मोदी सरकार आई तो लगा था कि सरकारी विभागों में लेटलतीफी का दौर शायद खत्म हो जाए। देश के सबसे बड़े सरकारी विभाग रेलवे के कामकाज से जुड़ी एक खबर सामने आ रही है। पच्चीस शताब्दी ट्रेनों का किराया-घटने की उम्मीद जताई जा रही है। छह महीने से ये खबर रह-रहकर मीडिया की सुर्वी बनती है लेकिन किराया है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। रेलवे ने पिछले साल दो रूट पर शताब्दी का किराया कम किया था। इस प्रस्ताव को अच्छा समर्थन मिला और उन दोनों रूटों पर आमदनी 17 फीसदी बढ़ गई। इसके बाद रेलवे की तरफ से कम यात्री संख्या वाले रूटों पर शताब्दी का किराया कम करने की बात चल रही है।

फैसला महीनों तक टालने की वजह क्या है, कोई नहीं समझ पा रहा। यही हाल रेलवे की डेढ़ साल पहले शुरू की गई फ्लैक्सी फेयर योजना का है। शताब्दी, राजधानी और दुरंतो जैसी ट्रेनों के किराए में टिकट बिक्री के साथ ही किराए में बढ़ोतरी की योजना लागू की गई थी। यानी ट्रेन के दस फीसदी टिकट बिकते ही किराया दस फीसदी बढ़ जाता है। इसी तरह 30 फीसदी टिकट बिकने पर 30 फीसदी अधिक किराया देना होता है। टिकट मंहगे होने पर इन ट्रेनों में यात्रियों की संख्या में कमी आई। इसके बाद फ्लैक्सी फेयर किराए में संशोधन के लिए कमेटी बनाई गई। कमेटी की बैठक भी हो चुकी है लेकिन उस पर फैसला नहीं लिया जा रहा। भारतीय रेलवे दुनिया में चौथी सबसे बड़ी रेलवे है, जिसका मुकाबला अब हवाई सेवा के साथ हैं। हवाई सेवा के टिकट यदि तीन- चार महीने पहले ले लिए जाएं तो शताब्दी और राजधानी टिकटों की कीमत पर मिल जाते हैं। ऐसे में रेलवे को तुरंत फैसले लेकर ही आगे बढ़ना होगा। किराया कम करने का प्रस्ताव महीनों लटका पड़ा रहे, ये किसी के हित में नहीं है।


दैनिक भास्कर

डोकलाम विवाद का स्थायी हल खोजा जाना चाहिए

डोकलाम में चीन की आक्रामकता फिर बढ़ रही है और इसी वजह से रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन को कहना पड़ा है कि भारत वहां किसी भी स्थिति के लिए तैयार है। रक्षा मंत्री के इस बयान के हफ्ते भर पहले चीन में भारत के राजदूत गौतम बम्बावाले ने कहा था कि अगर चीन डोकलाम में यथास्थिति को बदलेगा तो पिछले साल वाली स्थिति खड़ी हो जाएगी। पिछले साल वहां चीन के सड़क निर्माण के विरोध में एक तरफ भारतीय सेना ने तो दूसरी तरफ चीनी सेना ने डेरा डाल दिया था। दोनों सेनाओं और देशों के बीच उस स्थान के लिए 73 दिनों तक गतिरोध कायम रहा और फिर जब चीन की सेनाओं ने अपने कदम पीछे खींचे तो भारतीय सेना ने भी वापसी का निर्णय लिया। इस बीच उपग्रह से मिले चित्रों के अनुसार चीन ने विवादित स्थल के करीब सात हेलीपैड बनाए हैं। इस मसले पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी मौजूदा सरकार को आड़े हाथों लिया था और उसके बाद रक्षा मंत्री ने राज्यसभा में दिए बयान में यह स्वीकार किया था कि चीन ने वहां कुछ ढांचागत निर्माण किए हैं और संतरियों की चौकियों के साथ हेलीपैड भी बनाए हैं। डोकलाम पर चीन के दोहरे रवैये के कारण भारत न सिर्फ अपनी सैन्य तैयारी कर रहा है बल्कि उससे राजनयिक वार्ताएं जारी रखे हुए है। चीन सारे मुद्‌दों पर एक साथ बातचीत का हिमायती रहा है, जबकि भारत धीरे-धीरे और एक-एक कर। हालांकि चीन में भारत के राजनयिक ने कहा है कि डोकलाम के मामले पर स्पष्ट और दोटूक बात होनी चाहिए। संभवतः इसी प्रकार की वार्ता के लिए पिछले महीने विदेश सचिव विजय गोखले चीन गए थे और अगले महीने रक्षामंत्री निर्मला सीतारमन भी चीन जा रही हैं। जबकि जून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई सहयोग संगठन(एससीओ) की बैठक के लिए चीन यात्रा पर रहेंगे। भारत-चीन के बीच चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का मामला भी उलझा हुआ है। भारत चीन की ओआरओबी वाली परियोजना का हिस्सा नहीं है लेकिन, वह उसका विरोधी भी नहीं है। भारत को आपत्ति अगर है तो इस परियोजना के अहम भाग सीपीईसी से, क्योंकि वह पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर से गुजरता है। चीन की शक्ति और राजनय का मुकाबला करने के लिए भारत को भी इन दोनों उपायों का सहारा लेना ही होगा।


दैनिक जागरण

एमएसपी का वादा

प्रधानमंत्री की ओर से अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात के माध्यम से किसानों को कृषि उपज की लागत का डेढ़ गुना एमएसपी अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का भरोसा दिलाने के बाद यह आवश्यक हो जाता है कि इस संदर्भ में कोई ठोस रूपरेखा भी सामने आए। इसकी जरूरत इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि ऐसी खबरें आ रही हैं कि विभिन्न मंडियों में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कहीं कम पर उपज बेचनी पड़ रही है। यह सही है कि कृषि उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम देने की घोषणा पर अमल नए वित्त वर्ष से होना है और इसका अर्थ यह है कि किसानों को लाभकारी मूल्य पाने के लिए आगामी खरीफ की फसल तक इंतजार करना होगा, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इन दिनों अपनी उपज बेच रहे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने में भी कठिनाई का सामना करना पड़े। इस कठिनाई के चलते किसानों में असंतोष भी बढ़ रहा है और वे अपने भविष्य को लेकर बेचैन भी हो रहे हैं। कृषि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य के मामले में एक बड़ी समस्या उसके निर्धारण को लेकर है। हालांकि प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया कि कृषि उपज की लागत तय करने में बीज, खाद, सिंचाई आदि के मूल्य के साथ श्रमिकों और खुद किसानों की मेहनत का भी मूल्य जोड़ा जाएगा, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं कि यह काम किस फामरूले के तहत होगा? इसमें और देर नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि एक तो नया वित्त वर्ष शुरू ही होने वाला है और दूसरे एमएसपी को राजनीतिक मसला बनाया जा रहा है। ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर जब वर्तमान में किसानों को अपनी उपज तय एमएसपी से नीचे बेचनी पड़ रही है तब फिर इसकी क्या गारंटी कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा? इस सवाल को हल करके ही आशंकाओं को दूर किया जा सकता है।1यह सही है कि केंद्र सरकार की ओर से बार-बार यह रेखांकित किया जा रहा है कि वह 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इस वायदे को पूरा करने के लिए अभी तक जो भी कदम उठाए गए हैं उनसे अभीष्ट की पूर्ति होती नहीं दिख रही है। इससे इन्कार नहीं कि खाद की उपलब्धता को सुनिश्चित करने, मिट्टी का परीक्षण कराने की सुविधा प्रदान करने के साथ जो अन्य अनेक उपाय किए गए हैं उनसे किसानों को कुछ न कुछ लाभ मिला है, लेकिन इस सबके बावजूद खेती अभी भी घाटे का सौदा बनी हुई है। चूंकि आम चुनाव में अब एक वर्ष ही रह गए हैं इसलिए सरकार को ऐसा कुछ करना ही होगा जिससे अगले कुछ माह में किसानों को यह भरोसा हो जाए कि 2022 तक उनकी आय सचमुच दोगुनी होने जा रही है। कृषि और किसानों के उत्थान की जितनी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है उतनी ही राज्य सरकारों की भी। ऐसे में बेहतर यह होगा कि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए जो रूपरेखा बननी है उसमें राज्य भी शामिल हों ताकि इसे लेकर कोई संशय न रहे कि राज्य सरकारों को क्या और कितनी जिम्मेदारी वहन करनी है।


देशबन्धु

सवाल पत्रकारिता की गरिमा का है

विजय सिंह की तेज रफ्तार वाहन से कुचलकर मौत हो गई, और मध्यप्रदेश के भिंड में भी पत्रकार संदीप शर्मा की ट्रक की टक्कर से मौत हो गई। लेकिन इन मौतों को महज सड़क दुर्घटना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इनमें हत्या की साजिश नजर आ रही है।
बिहार में बगवां गांव के पूर्व प्रधान के पति मोहम्मद हरसू पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है, क्योंकि नवीन और विजय की मौत से एक दिन पहले ही हरसू और नवीन के बीच विवाद हुआ था। कहा यह भी जा रहा है कि इस मामले में थाना प्रभारी की आरोपी से मिलीभगत है। इसी तरह संदीप शर्मा ने रेत माफिया और एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ स्टिंग आपरेशन किया था, जिसके बाद से उन्हें जान की धमकियां मिल रही थीं। इस बारे में उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र भी लिखा था।
बिहार और मप्र दोनों राज्यों की घटनाओं में पुलिस की संलिप्तता का संदेह है, जो और अधिक चिंता का विषय है। एक सजग पत्रकार का काम सत्ता, प्रशासन और समाज को बिना डरे सच बयां करना होता है। अगर इसमें उसकी जान को खतरा हो तो सरकार और पुलिस को उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहिए? लेकिन इस वक्त गंगा उल्टी बह रही है। सत्ता में बैठे लोग चाहते हैं कि पत्रकार उनकी चापलूसी करें और वह बदले में उन्हें धन, पद या अन्य तरीकों से उपकृत करते रहें। बहुत से पत्रकार इसी तरह अपना जीवन भौतिक अर्थों में सफल भी कर लेते हैं, लेकिन जो ऐसा न करके सच बोलने का जोखिम उठाते रहते हैं, उन्हें जान से हाथ धोना पड़ता है।
पिछले साल देश ने गौरी लंकेश की हत्या देखी थी, लेकिन इस एक हत्या के अलावा बीते साल ही कम से कम 9 पत्रकारों की हत्याएं हुई थीं। पिछले एक दशक में साल 2017 को पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में सबसे खराब माना जा रहा है। इससे पहले 2015 में उत्तर प्रदेश में 45 दिनों में 4 पत्रकारों की हत्या से मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हुए थे। एक संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि दुनिया भर में पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है. प्रेस आजादी पर संस्था की अंतरराष्ट्रीय सूची में भारत 136 वें स्थान पर है।
एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 2017 में मारे गये पत्रकारों की संख्या पिछले 14 साल में सबसे कम है, लेकिन भारत में स्थिति बिगड़ी है, जो सरकार के लिए चिंता का विषय हो न हो, समाज को इस बारे में जरूर सोचना चाहिए। पत्रकारों की सुरक्षा पर निगरानी रखने वाली प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था सीपीजे यानी कमेटी टू प्रोटेक्स जर्नलिस्ट के अनुसार भारत में भ्रष्टाचार कवर करने वाले पत्रकारों की जान को खतरा हो सकता है। 2015 में इस संस्था की एक विशेष रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में रिपोर्टरों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा अभी भी नहीं मिल पाती है। इससे पहले प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि पत्रकारों की हत्याओं के पीछे जिनका कथित हाथ होता है वे बिना सजा के बच कर निकल जाते हैं। इन रिपोर्ट्स के तीन साल बाद भी अगर पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो यह मान लेना चाहिए कि एक सभ्य और जागरूक समाज के रूप में हमारा स्तर कुछ और नीचे गिर गया है।
पत्रकारों की इस तरह हत्या को केवल कानून-व्यवस्था का मामला बताकर सरकार और राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी को बचाए रखने में उनका सबसे ज्यादा योगदान हो सकता है। अब वह जमाना तो शायद ही लौटे, जब संपादकों, पत्रकारों से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री नियमित मुलाकात करते थे, उनकी खरी और सच्ची बातों को सुनने का माद्दा रखते थे। अब तो तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकार चरण छूने वाले अंदाज में सवाल पूछ कर गदगद होते हैं और ढिंढोरा पीटा जाता है कि यह साल का सबसे बड़ा साक्षात्कार है। पत्रकारों को पालतू बनाने वाले इस माहौल में मीडिया पर गुलामी की जंजीर लटक रही है और सत्ताधीशों से लेकर विपक्ष तक के राजनेता मीडिया की आजादी पर प्रवचन दे रहे हैं। बेहतर हो पत्रकार खुद अपनी आजादी और गरिमा की रक्षा करें।


प्रभात खबर

शिक्षा के साथ खिलवाड़

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के आकलन से जुड़े एक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने जिन अकादमिक पत्रिकाओं को स्तरीय मानते हुए सूचीबद्ध किया है, उनमें से 88 फीसदी निम्न कोटि की हैं. सहज बुद्धि से यह सोच पाना मुश्किल है। कि सूचना-प्रौद्योगिकी के इस तेज-रफ्तार दौर में कोई ऐसी भी पत्रिका हो सकती है, जिसका संपादक अज्ञात हो, डिजिटल युग में भी जिसका जिक्र इंटरनेट पर न हो या फिर पत्रिका के बारे में बुनियादी जानकारी पत्रिका के पन्नों पर ही न मिले. विभिन्न शिक्षण संस्थाओं से जुड़े शोधकर्ताओं के दल ने यूजीसी द्वारा अनुमोदित शोध-अनुसंधान की 35 फीसदी पत्रिकाओं/जर्नल में ये कमियां पायी हैं. यूजीसी ने पिछले साल 35 हजार अकादमिक पत्रिकाओं को मान्यता देते हुए सूचीबद्ध किया था. इनमें प्रकाशित लेखों के आधार पर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति या प्रोन्नति के लिए योग्यता के निर्धारण में अंक दिये जाते हैं. अध्ययन के मुताबिक, 35 फीसदी जर्नल में संपादक का नाम, प्रकाशन

का स्थान या फिर वेबसाइट का उल्लेख नहीं है, पचास फीसदी से ज्यादा जर्नल ऐसे हैं, जिनमें आइएसएसएन (मानकीकरण की संख्या), इम्पैक्ट फैक्टर (प्रकाशित शोध का प्रभावकारिता) या प्रकाशन-जगत की संस्थाओं के साथ संबद्ध होने जैसी जानकारियों के बारे में आधारित समाज बनने कच्ची जानकारी दी गयी है या झूठ बोला है. ज्ञान का सत्यापन और प्रमाणीकरण जरूरी है और इसके लिए ज्ञान का उचित ब्यौरे के साथ सार्वजनिक होना पहली शर्त है. किन ब्यौरों को ज्ञानराशि के प्रमाणीकरण और सत्यापन के लिए उचित माना जाये, इसकी एक परिपाटी होती है और यूजीसी ऐसी ही परिपाटी तय करनेवाली उच्च शिक्षा की नियामक संस्था है. इस कारण यूजीसी से अनुमोदन प्राप्त जर्नलों में ऐसी खामियां होना उच्च शिक्षा में गिरते मानदंड का एक संकेत ही है. इस स्थिति की व्याख्या में मात्र इतना कहकर संतोष नहीं किया जा सकता है कि हाल के सालों में एक बुनियादी भूल हुई है. शिक्षण और अनुसंधान को परस्पर स्वायत्त क्षेत्र न मानते हुए शिक्षकों की नियुक्ति और प्रोन्नति में प्रकाशित शोध-कार्य को एक आधार बनाने के कारण निहित स्वार्थों को यूजीसी जैसी नियामक संस्थाओं में घुसपैठ करने का मौका मिला. समस्या कहीं ज्यादा गहरी है और निगरानी के तंत्र के कमजोर होने की सूचना देती हैं. मानदंड गुणवत्ता की परख की कसौटी भर नहीं होते, वे किसी समाज के आदर्श और आकांक्षा की पहचान भी होते हैं. अकादमिक जर्नलों में कमियों का होना और उनकी लापरवाह मानकीकरण ज्ञान-आधारित समाज बनने के राष्ट्रीय स्वप्न पर गहरी चोट की तरह है. इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर यूजीसी को तुरंत सोच-विचार कर फौरी तौर पर गलतियों को दुरुस्त करना चाहिए. हर स्तर पर अच्छी शिक्षा व्यवस्था के बिना देश के विकास और समृद्धि की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती है.


The Hindu

Principle & procedure 

The Delhi High Court verdict setting aside the disqualification of 20 Aam Aadmi Party MLAs in Delhi is a searing indictment of the manner in which the Election Commission handled the complaint that they held offices of profit while serving as parliamentary secretaries. For a body vested with the crucial power to determine whether lawmakers have incurred disqualification in certain circumstances and advise the President or the Governor suitably, this is an embarrassing moment. The court has not reviewed its decision on merits. Rather, it has ruled that the EC violated the principles of natural justice while adjudicating a lawyer’s complaint against the legislators. It failed to offer an oral hearing on the merits of the complaint and chose to hide under the specious argument that notices had been issued to the MLAs to respond to documents that the EC had summoned from the Delhi government. After saying in its order of June 2017 that it would fix a date for the next hearing, the commission issued two notices seeking replies but fixed no date; instead, it proceeded to give its decision on January 19, 2018. Further, Election Commissioner O.P. Rawat, who had recused himself at an earlier point, rejoined the process without intimation to the legislators. And another vitiating factor was that Election Commissioner Sunil Arora, who had not heard the matter and assumed office only in September 2017, had signed the order. It is a basic feature of judicial or quasi-judicial processes that someone who does not hear a matter does not decide on it.

The high court order scrupulously adheres to the core principles of judicial review of decisions made by a duly empowered adjudicatory body. Courts do not normally plunge into the merits of such a decision, but examine whether there has been any violation of natural justice, whether sufficient opportunity has been given to the parties and whether the proceedings were vitiated by bias, arbitrariness or any extraneous consideration. That a pre-eminent constitutional body should be found wanting in ensuring natural justice while answering a reference from the President is a sad comment on its functioning. It ought to have treated the matter with abundant caution, given the ease with which political parties tend to question the EC’s impartiality. The EC has an opportunity to redeem its name by more carefully considering the same question that has now been remanded to it for fresh adjudication. It could appeal to the Supreme Court, but a better course would be to hold a fresh and fair hearing. The high court has acknowledged the EC’s “latitude and liberty” in matters of procedure, but cautioned that any procedure should be sound, fair and just. In proceedings that may result in unseating elected representatives, fairness of procedure is no less important than finding an answer to the question whether they have incurred disqualification.


The Indian Express

Path to polarisation

Ram Navami is meant to be a celebration of good over evil. But the celebrations to mark Lord Ram’s birthday in West Bengal are increasingly becoming a tense occasion for ordinary people with the BJP and the Trinamool Congress turning it into an exercise for mobilising cadres. The competing displays of religiosity have more to do with politics and little with religion and spirituality. As the rallies over the weekend show, these are now posing a threat to normal civic life with the overt display of militancy. Both political parties must explore other methods to keep their respective cadres active and reach out to ordinary citizens.

This newspaper has reported that at least one person was killed and few policemen injured in clashes that erupted over Ram Navami rallies on Sunday. The buildup to the festivities indicated that the rallies could lead to violence. The state government too seemed to anticipate violence and had imposed a ban on public display of weapons at the rallies. However, the state BJP chose to defy the ban and take out processions with swords, tridents and maces. State BJP chief Dilip Ghosh’s statement that cadres will not respect the ban and there will be trouble if the processions were stopped indicated that the party preferred a confrontation with the administration over peaceful conduct of the festival. Children marching with knives, swords, tridents etc in open defiance of the police order not only posed an unedifying sight but framed the party in poor light. No mature leadership would have risked the safety of children and lined them up on the street to confront the police and rival party cadres. Better political sense and judgement is expected of a party that is running the government at the Centre and wants to claim office at the state. This utterly callous and insensitive mobilisation with a clear intent to polarise the society on communal lines is surely not the best way to further the party’s prospects in the state.

That the Trinamool Congress, which won assembly elections in 2016 with a two-thirds majority, has chosen to mirror the BJP’s tactics speaks poorly of the party’s vision. If a political rival hits the street in defiance of the administration, the ruling party’s response surely can’t be a counter-mobilisation with equally religious hues. Like its predecessor in government, the CPM, the Trinamool seems unable to distinguish between cadre might and governance. People voted for Trinamool because it promised change — change in terms of a better delivery of public goods, more jobs, improved infrastructure and so on. With the general election a year away, Trinamool chief and West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee appears keen to explore the chances of a regional front. The Ram Navami confrontation is unlikely to help her pitch.


Times Of India

His Own Enemy

Union tourism minister KJ Alphons has veered from his brief, besides betraying a poor understanding of the concerns underpinning privacy, data protection and service delivery, when he contrasted the voluntary act of Indians getting fingerprinted and providing information for securing a US visa to the compulsion of surrendering personal and biometric data for an Aadhaar card, which could potentially be linked to a comprehensive database monitoring citizens. To put it simply, an Indian citizen should enjoy certain rights in India he may not be entitled to when travelling abroad – including the right to entry itself. That is the very meaning of citizenship, and cannot be used to negate a citizen’s fundamental right to know what purposes Aadhaar data will be used for and how it will be safeguarded.

Supreme Court orders have reiterated Aadhaar’s limited scope and non-mandatory nature. Questions about Aadhaar’s intrusiveness in practice are legitimate when the country does not have a strong data protection law (see accompanying oped) and a citizen’s life, liberty, livelihood or privacy can be under threat because of identity theft, leakages, exclusion, or service failure. Comparing this to a body scan at US airports, which is an example of technological improvement that makes air travel safer and invasive body frisking redundant, makes no sense.

Moreover, Alphons’s choice of words for body scans – “whole body naked in front of a white man” – is singularly graceless, uncivil and perhaps tinged with reverse racism (what would he have to say if similar technology were adopted at UAE or South African airports?). It can only strengthen the voices of Aadhaar pessimists who suspect the government has something to hide or wants to divert attention from problems with Aadhaar’s implementation.

As tourism minister Alphons should be less worried about what Indians do for US visas and instead seize the opportunity to swell the ranks of foreigners headed to India. In that regard, the proposal to throw open Arunachal Pradesh to tourists is promising. The mountain state’s scenic destinations have been locked away for long due to “protected area” restrictions. Easing such restrictions for north-east states can ensure a steady stream of tourists and do wonders for north-east’s development. It also sends the right message in response to China’s territorial claims and is an invitation to Asean neighbours to come closer to India, realising the promise of the ‘Act East’ policy.


 The Telegraph

TARIFF THRUST

The move of the president of the United States of America, Donald Trump, to impose punitive duties on trading partners with which the US has large merchandise trade deficits, sets the political context for the tariff tweaks, raising the spectre of a tit- for- tat global trade war.

Mr. Trump first raised duties on a range of steel and aluminium imports by 25 and 10 per cent respectively.

But he left out countries like Canada and Mexico, two principal trading partners from which the US imports steel. He has now turned his attention to China and India, which rank low in the list of steel exporters to the US, each accounting for less than 2 per cent of total US steel imports.

China is the world ‘ s second- largest economy and runs a merchandise trade surplus of $ 375 billion with the US. Last week, Mr Trump threatened to raise tariffs on $ 60 billion worth of imports of a range of goods from China in an effort to persuade Beijing to bring down its trade surplus by $ 100 billion and lift non- tariff restrictions on the sales of US- manufactured cars, planes and semi- conductors.

China responded by slapping penalties on $ 3 billion worth of goods it imports from the US, including fruit, pork and recycled aluminium.

Both sides are shadowboxing. The scale of US threatened action is small in relation to the size of its merchandise trade deficit with China. China has not targeted the big- ticket items of import from the US: soybean, sorghum and Boeing airplanes.

More than half of all US soybean exports goes to China, and any action on this front will hurt American farmers in the mid- west who voted overwhelmingly for Mr Trump. Tempers have already started to cool on both sides amid reports that the US treasury secretary, Steven Mnuchin, may soon travel to Beijing for conciliatory talks.

Mr Trump ‘ s tetchiness on trade issues springs from a very simplistic understanding of the concept of reciprocity. In essence, it means that if a country slaps high duties and places non- tariff barriers on US goods, then he has the right to repudiate trade agreements that previous regimes have signed. Mr Trump chooses to focus on the glaring inequity in tariffs with China imposing a 25 per cent duty on car imports from the US while Washington levies just 2.5 per cent on car imports from China. This ignores the fact that car sales are predominantly one way — from US to China. He has applied this warped logic with India as well, arguing that the Narendra Modi government imposes a 50 per cent import duty on Harley Davidson motorcycles while it levies zero per cent on superbikes from India and 10 per cent on engines with a cylinder capacity of less than 500 cc. India does not make superbikes, and two- way motorcycle trade between India and the US is a negligible fraction of their overall trade. Mr Trump is blind sided by his ambition of making America great again.

 

 

 

 

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