Home काॅलम आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 23 मार्च, 2018

आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 23 मार्च, 2018

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नवभारत टाइम्स

मर रहा है पानी

यह एक कड़ी चेतावनी है, जिसे गंभीरता से लेने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक भारत में भारी जल संकट आने वाला है। अनुमान है कि तीसेक सालों में देश के जल संसाधनों में 40 फीसदी की कमी आएगी। देश की बढ़ती आबादी को ध्यान में रखें तो प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता बड़ी तेजी से घटेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर भारत में स्थिति पहले से ही बेहद खराब है। अब देश के और हिस्से भी इस संकट की चपेट में आ जाएंगे। गुरुवार को विश्व जल दिवस के मौके पर देश-दुनिया में पानी को लेकर कई जरूरी बातें हुईं, कई तथ्य सामने आए। सचाई यह है कि भारत में हालात इतने खराब हो गए हैं कि युद्धस्तरीय प्रयास के बिना कुछ हो ही नहीं सकता। जल संकट से निपटने को लेकर हमारे यहां जुबानी जमाखर्च ज्यादा होता है, ठोस प्रयास कम ही देखे जा रहे हैं। भारत में प्रति व्यक्ति के हिसाब से सालाना पानी की उपलब्धता तेजी से नीचे जा रही है। 2001 में यह 1,820 घन मीटर था, जो 2011 में 1,545 घन मीटर ही रह गया। 2025 में इसके घटकर 1,341 घन मीटर और 2050 तक 1,140 घन मीटर हो जाने की आशंका जताई गई है। आज भी करीब 7.5 करोड़ हिंदुस्तानी शुद्ध पेयजल से वंचित हैं। हर साल देश के कोई 1.4 लाख बच्चे गंदे पानी से होनेवाली बीमारियों से मारे जाते हैं। इस संकट की बड़ी वजह है भूमिगत जल का लगातार दोहन, जिसमें भारत दुनिया में अव्वल है। पानी की अस्सी फीसद से ज्यादा जरूरत हम भूजल से पूरी करते हैं, लेकिन इसे दोबारा भरने की बात नहीं सोचते। भारत में ताल-तलैयों के जरिये जल संचय की पुरानी परंपरा रही है। बारिश का पानी बचाने के कई तरीके लोगों ने विकसित किए थे। दक्षिण में मंदिरों के पास तालाब बनवाने का रिवाज था। पश्चिमी भारत में इसके लिए बावड़ियों की और पूरब में आहर-पईन की व्यवस्था थी। लेकिन समय बीतने के साथ ऐसे प्रयास कमजोर पड़ते गए। बावड़ियों की कोई देखरेख नहीं होती और तालाबों पर कब्जे हो गए हैं। संकट का दूसरा पहलू यह है कि भूमिगत जल लगातार प्रदूषित होता जा रहा है। औद्योगिक इलाकों में घुलनशील कचरा जमीन में डाल दिया जाता है। हाल में गांव-गांव में जिस तरह के शौचालय बन रहे हैं, उनसे गड्ढों में मल जमा होता है, जिसमें मौजूद बैक्टीरिया भूजल में पहुंच रहे हैं। जल संकट लाइलाज नहीं है। हाल में पैराग्वे जैसे छोटे, गरीब देश ने सफलता पूर्वक इसका इलाज कर लिया है। दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर ने इस संकट से निपटने के रास्ते खोजे हैं। हमारे लिए भी यह असंभव नहीं है, बशर्ते सरकार और समाज दोनों मिलकर इसके लिए प्रयास करें।


जनसत्ता

साख का सवाल

फेसबुक उपयोगकर्ताओं से जुड़ी सूचनाएं और जानकारियां चोरी होने और उनके बेजा इस्तेमाल की जो घटना सामने आई है, उसने न केवल सरकार बल्कि सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय रहने वालों की नींद उड़ा दी है। फेसबुक को लेकर भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में हड़कंप मचा हुआ है। इसका पता तब चला जब अमेरिका में वहां की संघीय व्यापार एजंसी ने फेसबुक के खिलाफ जांच शुरू की। यूरोपीय देशों में भी जांच शुरू हुई। ऐसे आरोप हैं कि केंब्रिज एनालिटिक नाम की कंपनी ने फेसबुक के पांच करोड़ अमेरिकी उपयोगकर्ताओं की गोपनीय सूचनाएं चोरी कर उनका इस्तेमाल ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव जिताने में किया। इसी तरह ‘ब्रेक्जिट’ के वक्त ब्रिटेन ने भी इसका इस्तेमाल किया। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह फेसबुक उपयोगकर्ताओं के साथ छल नहीं है? अगर कपटपूर्ण तरीकों का इस्तेमाल कर चुनाव जीते जाते हैं तो इससे राजनीतिक व्यवस्था भी कठघरे में खड़ी होती है।

डाटा चोरी करने वाली कंपनी केंब्रिज एनालिटिक कई देशों के लिए इस तरह की चुनाव संबंधी सेवाएं देने का काम करती है। कंपनी का भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, केन्या, ब्राजील जैसे देशों में कारोबार है। डाटा चोरी का खुलासा होने के बाद कंपनी ने अपने सीईओ को हटा दिया है। फेसबुक के सीईओ ने भी इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए मामले की जांच कराने का आदेश दिया है। इस घटना से फेसबुक की साख को गहरा धक्का लगा है। दुनिया में भारत दूसरा देश है जहां बीस करोड़ लोग फेसबुक पर हैं। फेसबुक कंपनी कठघरे में इसलिए है कि वह अपने ग्राहकों की निजता की सुरक्षा नहीं कर पाई। डाटा-चोरी ने भारत की राजनीति में भी भूचाल-सा पैदा कर दिया है। इस हकीकत पर से पर्दा उठा है कि कैसे विदेशी कंपनियों के जरिए सोशल मीडिया के डाटा का इस्तेमाल चुनावी हवा बनाने-बिगाड़ने के लिए किया जाता रहा है। कैसे जनता को अंधेरे में रखा जाता है। चुनाव में शोध, सर्वे, रायशुमारी, विज्ञापन, प्रचार जैसे कामों के लिए राजनीतिक दल इस तरह की एजंसियों को ठेके देते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। केंद्र सरकार और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों इसके लपेटे में आ गए हैं।

सरकार का आरोप है कि कांग्रेस के केंब्रिज एनालिटिक से संबंध हैं और अगले आम चुनाव के लिए वह इसकी सेवाएं लेने की तैयारी में है। दूसरी ओर, सरकार के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कांग्रेस ने दावा किया है कि सन 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (एकी) ने इस कंपनी की सेवाएं ली थीं। आरोपों-प्रत्यारोपों के बरक्स लोगों के मन में जो सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है वह है विश्वसनीयता का। फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्क प्लेटफॉर्म कितना बड़ा खतरा हो सकते हैं निजता के लिए, यह अब सब समझ गए हैं। साथ ही, राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिए हमारी निजी और गोपनीय सूचनाओं का कैसे इस्तेमाल कर रही हैं यह भी अब किसी से छिपा नहीं है। हालांकि सरकार ने फेसबुक के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। सवाल है कि जो सरकार हजारों करोड़ रुपए डकार भाग जाने वालों को वापस ला पाने में लाचार साबित हो रही है, वह डाटा चोरी करने वाले वैश्विक चोरों से कैसे निपटेगी? यह सूचनाओं का युग है, जिसमें डाटा से ज्यादा कीमती कुछ नहीं है। ऐसे में कैसे इसकी सुरक्षा हो और लोगों में भरोसा बना रहे, यह गंभीर चुनौती है।


 हिन्दुस्तान

निजता की कीमत पर

चुनाव सिर्फ जनता की पसंद, नापसंद और उसके आधार पर हुआ मतदान भर नहीं होते। भारत में हम इसे हमेशा से अच्छी तरह समझते रहे हैं कि चुनाव का एक गणित होता है, एक समाजशास्त्र होता है, जो अक्सर जातिशास्त्र भी हो जाता है, चुनाव का एक अर्थशास्त्र भी होता है और सबसे बड़ी बात है कि इसका एक मनोविज्ञान भी होता है। माना यह जाता है कि जो सबको एक साथ साध लेता है, वही राज करता है। सबको साधना आसान काम नहीं है और कुछ लोगों ने तो इसे अपना व्यवसाय ही बना लिया है। हालांकि यह व्यवसाय भी कोई सीधा धंधा नहीं है और इसके साथ कई तरह के गोरखधंधे भी जुडे़ रहते हैं। ताजा खबरें बता रही हैं कि जब से संचार तकनीक आई है, चुनाव का धंधा ही नहीं फल-फूल रहा, उसके गोरखधंधे भी खूब चल निकले हैं।

कैंब्रिज एनालिटिका का ताजा मामला भी हमें यही कहानी बताता है। यह ऐसी कंपनी है, जो कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए तो आंकड़ों का खेल करती ही है, दुनिया भर के राजनीतिक दलों को हराने-जिताने के लिए भी यह काम करती है। अगर आप इस कंपनी की वेबसाइट पर जाएं, तो वहां इस तरह के तमाम दावे मिल जाएंगे। इस साइट पर कंपनी ने अमेरिका के पिछले चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को चुनाव जिताने का श्रेय ही नहीं लिया, बल्कि 2010 का बिहार चुनाव जिताने का श्रेय भी लिया है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्रिटिश अखबार गार्जियन  के ताजा भंडाफोड़ में यह उजागर हुआ है कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए इस कंपनी ने फेसबुक से मतदाताओं की निजी जानकारियों को बड़े पैमाने पर चुराया है। जाहिर है, इससे फेसबुक भी कठघरे में खड़ा हो गया है। ध्यान रहे कि यह फेसबुक कंपनी ही थी, जिसने कुछ समय पहले भारत में गरीब लोगों को फेसबुक समेत कुछ सीमित साइट के इस्तेमाल के लिए मुफ्त इंटरनेट उपलब्ध कराने की बात की थी। इस पर काफी विवाद हुआ था और फिर कंपनी अपने प्रस्ताव से पीछे हट गई थी।

दो अखबारों के ताजा भंडाफोड़ से अमेरिका और अन्य देशों में उतना राजनीतिक भूचाल नहीं आया, जितना भारत की राजनीति में आ गया है। सभी दल एक-दूसरे पर लोगों की निजता के उल्लंघन का आरोप लगा रहे हैं। अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि भारत में किस दल ने कैंब्रिज एनालिटिका या इसके जैसी अन्य कंपनियों की सेवाओं का कितना इस्तेमाल किया। यह भी संभव है कि जितने दलों ने इसका इस्तेमाल किया होगा, उतनी ही संख्या ऐसे दलों की भी होगी, जो बाद में पछताएं होंगे कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। आरोपों की इस राजनीति से लोगों की निजता को बचाने का रास्ता तो खैर नहीं ही निकलेगा।

चिंता इसलिए भी है कि यह किसी दल की प्राथमिकता नहीं है। जो राजनीति लोगों की निजता के उल्लंघन पर अपनी रोटियां सेंक रही हो, उससे फिलहाल तो इसकी बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि निजता का मामला इस समय दुनिया भर में बहुत बड़ा मसला बनता जा रहा है। सब जगह के राजनीतिक दल भले ही इससे मुंह चुरा रहे हों, लेकिन नागरिक अधिकार और मानव अधिकार संगठन इसे बडे़ पैमाने पर उठा रहे हैं। जल्द ही इसकी जरूरत हमारा दरवाजा भी खटखटाएगी। तब शायद इस अधिकार को महत्व देना हमारे राजनीतिक दलों की भी मजबूरी बन जाए।


अमर उजाला

डाटा का खेल

फेसबुक से संबंधित डाटा चोरी के सनसनीखेज आरोप ने अपने देश की राजनीति को भी प्रभावित किया है, जहां पहले ही कटुता कम नहीं है। स्टिंग के जरिये हुए इस खुलासे से पता चला है कि ब्रिटिश सलाहकार कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका (सीए) ने एक ऐप के जरिये करीब पांच करोड़ लोगों के फेसबुक अकाउंट से उनकी निजी जानकारियां हासिल कर 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित किया था, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। इसके अलावा यह भी आरोप लगे हैं कि इस कंपनी की सेवाएं कांग्रेस, जनता दल (यू) और भाजपा ने भी ली हैं और इसे लेकर ये पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ हमलावर हैं। केंद्रीय कानून और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तो फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग को तलब करने तक की चेतावनी दे डाली है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का तब तक मतलब नहीं है, जब तक कि ठोस प्रमाण न प्रस्तुत किया जाए। हमारी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि हमारे देश में डाटा संरक्षण का पर्याप्त कानूनी ढांचा तैयार नहीं है और लोगों में फेसबुक, व्हाट्सऐप सहित अन्य सोशल नेटवर्क के बारे में पर्याप्त जागरूकता भी नहीं है। दरअसल डाटा विश्लेषण के लिए किसी कंपनी की सेवा लेने में कुछ भी गलत नहीं है, जब तक कि वह इसका दुरुपयोग न करे। यह एक नए तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध है, जिसके जरिये फेसबुक या दूसरी सोशल साइट से लोगों से संबंधित डाटा लिए जाते हैं और उनकी ‘साइकोलॉजिकल प्रोफाइल बनाई जाती है और फिर उनके व्यवहार को प्रभावित करने की कोशिश होती है। इस तरह किसी के पक्ष या विपक्ष में धारणा बनाई जाती है। अहम यह भी है कि सूचना प्रौद्योगिकी आज जहां तक पहुंच चुकी है, वहां से पीछे लौटना मुश्किल है; मसलन इंटरनेट के बगैर अब निजी या सार्वजनिक जीवन की कल्पना करना ही मुश्किल है। सोशल मीडिया सिर्फ बाजार के रुझानों को ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रहा है। दरअसल सोशल मीडिया के दुष्प्रचार तंत्र के कारण विश्वसनीयता का ऐसा संकट पैदा हो गया है, जिसमें सच और झूठ की शिनाख्त करना मुश्किल हो गया है। जाहिर है, यह किसी एक देश का मामला नहीं है, इसके लिए वैश्विक स्तर पर पहल की जरूरत है, ताकि व्यक्तिगत जानकारियों का दुरुपयोग नहीं किया जा सके।


राजस्थान पत्रिका

सामने आए सच

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की मौत एक बार फिर रहस्यों में घिर गई है। यों जयललिता से जुड़ी घटनाओं में हमेशा रहस्यमयी बातें ज्यादा रही हैं। जयललिता की मौत के बाद राजनीतिक गलियारों में उनकी ‘कथित हत्या’ की फुसफुसाहट भी लम्बे समय तक चलती रही। अब चेन्नई के अपोलो अस्पताल प्रबंधन के नए खुलासे से जयललिता की मौत की गुत्थी और उलझ गई है। अस्पताल के चेयरमैन ने यह खुलासा किया है कि जयललिता के अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान सभी सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गए थे। सवाल यह उठता है कि आखिर किसके कहने पर ये कैमरे बंद किए गए? क्या भर्ती होते समय जयललिता इस हालत में थी कि वे सीसीटीवी कैमरों को बंद करने के निर्देश देती? यह मान भी लिया जाए कि इस बाबत निर्देश उन्होंने दिए होंगे तो सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल प्रबंधन को इन निर्देशों को मान लेना चाहिए था? और, अगर सीसीटीवी कैमरे बंद करने के आदेश जयललिता ने नहीं दिए तो फिर किसके कहने पर 75 दिन तक कैमरे बंद कर दिए गए।
बड़ा सवाल ये कि कैमरे बंद करने की जरूरत क्या थी? आखिर कौन नहीं चाहता था कि अस्पताल में होने वाली गतिविधियों पर पर्दा पड़ा रहे। सवाल जितने गहरे हैं उनका जवाब भी उसी गंभीरता से देश के सामने आना चाहिए। जयललिता एक राज्य की लोकप्रिय मुख्यमंत्री थी। ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि उनके इलाज में इतनी गोपनीयता बरतने की क्या जरूरत थी ? जयललिता की मौत की जांच कर रहे आयोग को इन सभी तथ्यों पर विचार करना चाहिए। जयललिता की मौत के बाद भी उनके इलाज में कोताही बरते जाने के आरोप लगे थे। आयोग को इन सभी आरोपों को नए सिरे से जांच के दायरे में लेना चाहिए। देश में इससे पहले भी कुछ राजनेताओं की मौत पर सवाल उठ चुके हैं। कुछ मामलों में जांच भी हुई तो कुछ संदेह के घेरों में आकर खामोश होकर रह गए। जयललिता की मौत के मामले की जांच के लिए बने आयोग की सार्थकता तभी साबित होगी जब वह मामले में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर दे। सभी तथ्य और इस मौत से जुड़े सच से पर्दा उठाना ही होगा देश को ये जानने का हक है कि क्या सचमुच इस मौत के पीछे कोई ‘साजिश’ थी? नहीं थी तो भी रहस्य से पर्दा तो उठाना ही होगा।


दैनिक भास्कर

जातिहीनता की राह में कानून के दुरुपयोग की चुनौती 

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 की धारा 18 के विरुद्ध जाते हुए अग्रिम जमानत को मंजूरी देकर और गिरफ्तारी से पहले उच्च अधिकारी या पुलिस प्रमुख की इजाजत को अनिवार्य करके राजनीतिक बहस की गुंजाइश पैदा की है। अदालत ने यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान की धर्मनिरपेक्ष और जातिविहीन समाज की भावना के अनुरूप किया है लेकिन, इस पर अनुसूचित जाति और जनजाति समाज प्रतिक्रिया जता सकता है। न्यायालय ने कहा है कि इस कानून का दुरुपयोग बढ़ गया है और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े इसके प्रमाण हैं। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 15-16 प्रतिशत मामलों में तहकीकात के बाद बंद करने वाली रिपोर्ट लग जाती है और अदालत तक आए 75 प्रतिशत मामलों में अभियुक्त या तो बरी हो जाते हैं या मुकदमे वापस हो जाते हैं। इससे यह आशंका पैदा होती है कि राजनीतिक दुश्मनी के चलते किसी बेगुनाह को परेशान या ब्लैकमेल करने के लिए मुकदमे लगाए गए हों। स्थिति इसके ठीक विपरीत भी हो सकती है। संभव है घटना होने के बावजूद दलित वर्ग को पुलिस, प्रशासन और समाज के प्रभुत्वशाली लोगों का समर्थन न मिलने के चलते मामले छूट जाते हों। उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और महाराष्ट्र में पिछले दिनों अत्याचार के ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां दमित वर्ग के विरुद्ध गंभीर अपराधों में शामिल लोग छूट गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जिन महान लक्ष्यों को आगे करके अधिनियम की धारा 18 को निष्प्रभावी किया है उन लक्ष्यों को कोई भी नागरिक कमतर करके नहीं आंक सकता। उसी के साथ यह सवाल भी है कि उन लक्ष्यों को प्राप्त करने का तरीका क्या है? कठोर कानून समाज में अत्याचार के विरुद्ध एक डर तो पैदा करते हैं लेकिन, प्रेम और भाईचारा विकसित नहीं करते। उनका डर उन्हीं को रोक पाता है जो शरीफ होते हैं। सामंती अपराधियों को रोक पाना उस कानून के वश में भी नहीं होता। हालांकि, इस बीच ब्लैकमेल की घटनाएं भी होती हैं। ऐसे में जरूरी है कि समाज सुधार के उदात्त उद्‌देश्यों को मानने वाले लोग आगे आएं और भाईचारे की जमीन पर बराबरी और मानवीय गरिमा का भवन बनाएं।


दैनिक जागरण

गोपनीयता से खिलवाड़

अमेरिका समेत अन्य देशों के फेसबुक उपभोक्ताओं का डाटा चोरी कर उसका इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने में किए जाने का खुलासा जितना सनसनीखेज है उतना ही चिंताजनक भी। इस मामले में केवल इतने से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि फेसबुक के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने माफी मांग ली, क्योंकि जब तक इस तरह की चोरी को रोकने के लिए ठोस उपाय नहीं किए जाते तब तक डाटा चोरी का खतरा बना ही रहेगा। यह खतरा इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि दुनिया भर में राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। इस क्रम में वे सोशल साइट्स पर सक्रिय लोगों के सोच-विचार को छल-छद्म से प्रभावित करने का भी काम करते हैं। इसकी पुष्टि ब्रिटिश कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका पर लगे इस आरोप से होती है कि उसने करीब पांच करोड़ फेसबुक उपभोक्ताओं का डाटा चोरी करके उसका इस्तेमाल दुनिया के विभिन्न नेताओं की मदद के लिए किया। इन नेताओं में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी हैं। अंदेशा है कि चोरी किए गए फेसबुक डाटा का दुरुपयोग ब्रिटेन के यूरोपीय समुदाय से अलग होने को लेकर कराए गए जनमत संग्रह यानी ब्रेक्जिट के दौरान भी किया गया। कहना कठिन है कि ऐसा ही काम भारत में किया गया या नहीं, लेकिन कैंब्रिज एनालिटिका की सहयोगी कंपनी ने यह स्वीकार करके संदेह बढ़ा दिया है कि उसने यहां के कई दलों को अपनी सेवाएं दी हैं। क्या यह जाना जा सकता है कि सेवाएं देने के नाम पर क्या किया गया-चुनाव में प्रभावी मसलों की जानकारी भर जुटाई गई या फिर सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों के राजनीतिक रुझान को प्रभावित भी किया गया? 1अब इसमें दोराय नहीं कि सोशल मीडिया के जरिये सुनियोजित अभियान चलाकर लोगों की राजनीतिक पसंद-नापसंद को बदलने की कोशिश की जाती है। कई बार इसमें सफलता भी मिलती है, क्योंकि सोशल मीडिया पर सक्रिय सभी लोग इससे परिचित नहीं होते कि उनके समक्ष जो सूचनाएं आ रही हैं वे उनके राजनीतिक रुझान का विधिवत आकलन करने के बाद एक खास इरादे से आ रही हैं। जागरूकता के अभाव में कई लोग इस तरह की प्रचार सामग्री से आसानी से प्रभावित भी हो जाते हैं। अब जब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया पर सुनियोजित प्रचार अभियान चलाकर लोगों के राजनीतिक मिजाज को बदलने की कोशिश की जाने लगी है तब केवल आरोप-प्रत्यारोप से काम चलने वाला नहीं है। जरूरत इसकी है कि जैसे आधार कार्ड के तहत दी गई निजी जानकारी का उपयोग अनुमति के बगैर न करने देने को लेकर सक्रियता दिखाई जा रही है वैसे ही इस मामले में भी दिखाई जाए। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय लोगों का डाटा चोरी कर उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाना निजता का खुला उल्लंघन भी है। यह ठीक है कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फेसबुक को चेताते हुए यह कहा कि सोशल साइट्स के ग्राहकों के हितों की रक्षा को लेकर जो नियम-कानून हैं उनकी नए सिरे से समीक्षा की जाएगी, लेकिन उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सोशल मीडिया साइट्स भारत में भारतीय कानूनों के हिसाब से ही चलें


प्रभात खबर

बिन पानी सब सून

भारत दुनिया के उन हिस्सों में शामिल है, जहां निकट भविष्य में भीषण जल संकट की आशंका है. आसार अभी से ही स्पष्ट दिख रहे हैं. यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट ने फिर एक बार इस चिंताजनक सच को रेखांकित किया है कि पानी की कमी से निपटने के लिए ठोस उपाय नहीं किये जा रहे हैं. वर्ष 2050 तक संकट इतना गहरा हो जायेगा कि हमें पानी का आयात करना पड़ सकता है. उस समय वर्तमान उपलब्धता का मात्र 22 फीसदी पानी ही बचा होगा. वर्ष 1951 और 2011 के बीच प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता में 70 फीसदी की गिरावट आयी है. हमारी मौजूदा आबादी करीब 1.3 अरब है और 2050 तक इसके 1.7 अरब होने का अनुमान है. ऐसे में दुनिया की 16 फीसदी आबादी को समुचित मात्रा में पानी मुहैया कराना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि हमारे हिस्से में धरती को कुल चार फीसदी पानी ही है. इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण भूजल का बेतहाशा दोहन है. इस संबंध में जो कुछ कायदे-कानून हैं, उनकी परवाह न तो सरकार को है और न ही उद्योग जगत या आम नागरिक को. भूजल दोहन के वैश्विक खाते में हमारा हिस्सा करीब 25 फीसदी है और यह मात्रा चीन एवं अमेरिका के संयुक्त हिसाब से भी ज्यादा है. सिंचाई के पानी का 60 फीसदी से अधिक और पेयजल का 85 फीसदी भूजल से ही आता है. इसके बावजूद, जैसा कि विश्व बैंक के आंकड़े करते हैं, 16.30 करोड़ भारतीय साफ पेयजल से वंचित हैं और 21 फीसदी संक्रामक रोगों का सीधा कारण गंदे पानी का सेवन है. हर रोज पांच साल से कम उम्र के औसतन 500 बच्चे डायरिया से मर जाते हैं और 21 करोड़ लोग अच्छी साफ-सफाई से वंचित हैं, नदियों के प्रदूषण की समस्या विकराल होती जा रही हैं, फिर भी इस संबंध में सुविचारित पहल नहीं की जा रही है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित प्रदूषित नदियों की संख्या बीते पांच सालों में 121 से बढ़कर 275 हो चुकी है. दशकों से हमारे नीति-निर्धारकों की नजरों में नदियों की हैसियत जल-आपूर्ति की पाइपलाइन से अधिक कुछ नहीं रही है, औद्योगिक और शहरी नालों की निकासी, बांधों का बेतरतीब अंधाधुंध निर्माण और नदी तटों एवं बालू का कुप्रबंधन ऐसे कारक हैं, जिनके कारण आज हमारी नदियां बजबजाते नाले में बदल गयी हैं और उनमें पानी कमतर होता जा रहा है. केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों से वन क्षेत्रों में कमी आ रही है और नदी तटों पर बेतहाशा निर्माण हो रहे हैं. जल संसाधन मंत्रालय हों या फिर केंद्रीय जल आयोग हो, इनके पास दीर्घकालिक सोच तो छोड़ दें, तात्कालिक रणनीति भी नहीं है. बीते सालों के सूखे और बाढ़ के कहर से भी सीख नहीं ली गयी है. पानी का मसला आम तौर पर राजनीतिक चर्चा से भी अनुपस्थित रहता है और इसकी याद जल-विवादों या आपदाओं के समय ही आती है. इस तबाही से बचाव के लिए सरकारों और उद्योग जगत के साथ समाज को भी सक्रिय होना पड़ेगा.


देशबन्धु

सवाल दलितों की रक्षा का है

एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य और एएनआर मामले में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई, जिस पर फैसला देते हुए न्यायमूर्ति आदर्श गोयल और यू यू ललित की पीठ ने इस कानून में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। अदालत ने इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जांच के बाद  ही आरोप सही पाए जाने पर  गिरफ्तारी की बात कही है। यदि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ इस कानून के तहत कोई शिकायत की गई है, तो उस पर कार्रवाई करने के लिए उसके वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति मांगनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कानून में पहले जमानत की मंजूरी नहीं थी, लेकिन बदलाव के बाद अब इसमें जमानत भी मिल सकती है। इसके अलावा आरोपी सरकारी कर्मचारी नहीं है तो उसकी गिरफ्तारी से पहले एसएसपी स्तर का पुलिस अधिकारी उस मामले की जांच करेगा।

यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो अनुसूचित जाति, जनजाति के किसी व्यक्ति की शिकायत मात्र पर किसी अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं होगी, बल्कि उसकी जांच की पूरी प्रक्रिया होने के बाद ही उस पर कानूनी कार्रवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से समाज का एक तबका खुशी जाहिर कर रहा है कि अब इस कानून का गलत इस्तेमाल कमजोर, वंचित तबके के लोग नहीं कर सकेेंगे। पर सवाल यह उठता है कि वंचित, दलित समुदाय की रक्षा के लिए ऐसा कठोर कानून बनाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी थी? भारत में जातिवाद की जड़ें सदियों पुरानी हैं। सवर्ण जाति के लोग, निचली जातियों के साथ जो अमानवीय व्यवहार करते रहे, वह हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है। तो क्या यह सच्चाई अब बदल गई है? क्या हमारे समाज में तमाम प्रावधानों के बावजूद दलित मजबूत स्थिति में आ गए हैं?

क्या आज भी छुआछूत, भेदभाव की घटनाएं नहीं हो रही हैं? क्या अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों के साथ गांवों, शहरों. स्कूलों, कालेजों, दफ्तरों में बराबरी का व्यवहार हो रहा है? क्या ऊंची और नीची जाति के बीच पारिवारिक संबंध कायम हो सकते हैं? अगर इन सवालों का जवाब ना में है, तो फिर यह सवाल उठता है कि क्या अब भी समाज के इस कमजोर तबके को सशक्त कानून की जरूरत नहीं है, जो उत्पीड़न के खिलाफ उसकी रक्षा कर सके। 1989 में जब यह कानून बनाया गया था तो इसके तहत किसी का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करने के साथ जातिगत आधार पर अपमानित करने को गैर जमानती अपराध माना गया था।

अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को प्रताड़ित करने के लिए मल, मूत्र, गोबर आदि खिलाना, नग्न करके पीटना या मुंह काला करके सार्वजनिक स्थानों पर घुमाना, मानव और पशु नरकंकाल को निपटाने और लाने-ले जाने के लिए तथा बाध्य करना, पानी लेने से रोकना, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करना, चुनाव लड़नेे से रोकना, उनकी महिलाओं का यौन शोषण करना ऐसी कई अमानवीय घटनाएं आज भी होती हैं। याद करें ऊना की घटना, जिसमें सरेआम इस तबके के लोगों को पीट कर उनका वीडियो भी बनाया गया। शायद ही कोई दिन बीतता हो, जब दलित उत्पीड़न की घटना भारत में न होती हो। यह तबका इतना कमजोर है कि पुलिस तक शिकायत करने या न्याय पाने की हिम्मत भी यह नहीं जुटा पाता है। अपने से ऊंची जाति वाले के सामने कुर्सी पर बैठने पर भी जहां पाबंदी हो, वहां ऊंची जाति के अफसर के खिलाफ शिकायत करना भी निचली जाति के लिए बहुत बड़ी बात होती है। इसलिए ही ऐसा कानून बनाया गया था, जिसमें उसे अपने उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत मिले। इन हालात में उनकी रक्षा के लिए बनाए गए कानून में बदलाव का क्या असर इस तबके पर पड़ेगा, यह सोचने वाली बात है।

यह सही है कि किसी कानून का दुरुपयोग हो, तो उसे दुरुस्त किया जाना चाहिए। गिरफ्तारी न करने या जमानत देने से बेहतर होता कि शिकायत की जल्द जांच की जाती और अगर शिकायतकर्ता का इरादा गलत होता, तो उसे दंडित किया जाता, और निर्दोष व्यक्ति की तत्काल रिहाई होती। पर अब तो शायद इस कमजोर तबके का यह रक्षा कवच भी उससे दूर हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य इस कानून के बेजा इस्तेमाल को रोकना है, लेकिन अब इसका गलत इस्तेमाल ऊंची जाति के लोग नहीं करेंगे, यह कैसे सुनिश्चित होगा। इस फैसले पर कांग्रेस ने तो अपनी असहमति जतलाई ही है और मोदी सरकार पर भी सवाल उठाए हैं। अब भाजपा के दलित सांसदों की भी मांग है कि इस फैसले पर पुनर्विचार याचिका सरकार अदालत में दायर करे। यह मामला कांग्रेस और भाजपा के लिए भले राजनीतिक मुद्दा हो, लेकिन इससे लाखों दलितों के हित भी जुड़े हैं, इसलिए सरकार, अदालत और समाज सभी को इस पर विचार करना चाहिए।

 

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