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आज के हिंदी अख़बारों के संपादकीय: 22मार्च,2018

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नवभारत टाइम्स

स्वायत्ता के सामने

देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता देने की पहलकदमी के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 60 उच्च शिक्षा संस्थानों को दो श्रेणियों में स्वायत्तता प्रदान कर दी है। अब ये संस्थान बिना यूजीसी की अनुमति के नए पाठ्यक्रम शुरू कर सकेंगे और नए विभाग बना सकेंगे। अपना नया कैंपस खोलने के लिए भी इन्हें किसी से इजाजत नहीं लेनी होगी। ये अपने यहां विदेशी शिक्षक नियुक्त कर सकते हैं और कुछ शिक्षकों को अधिक वेतन भी दे सकते हैं। मनचाही संख्या में विदेशी छात्रों को प्रवेश देना इनके हाथ में होगा। दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय के साथ ये समझौता कर सकेंगे। इन उपायों का उद्देश्य उच्च शिक्षा को अब तक की बंधी-बंधाई लीक से आजाद करना है। जाहिर है, उच्च शिक्षा का मकसद सिर्फ कुछ सिलेबस रटा देना भर नहीं है। इसका लक्ष्य अभी तक अर्जित ज्ञान की गहराइयों में उतरना और नए ज्ञान का सृजन करना भी है। यह पूरी तरह एक सृजनात्मक कार्य है, जिसके लिए उपयुक्त माहौल और ढांचा खड़ा करना जरूरी है। दुनिया के महानतम शिक्षण संस्थान अध्ययन और अनुसंधान के क्षेत्र में कुछ मानक सिर्फ इसलिए कायम कर पाए क्योंकि उन्हें पर्याप्त स्वायत्तता मिली। वे किसी सरकारी ढांचे में बंधकर नहीं रहे, न ही अपने खर्चे के लिए किसी सत्ता पर आश्रित रहे। अपने संसाधनों के बल पर ही उन्होंने दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को अपने यहां जुटाया। भारत को भी एक नॉलेज पावर बनना है तो कुछ चुने हुए संस्थानों को इसी मॉडल पर काम करना होगा। उन्हें पाठ्यक्रम तय करने और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों को अपने यहां नियुक्त करने का अधिकार मिलना चाहिए ताकि विश्वस्तरीय शिक्षा के लिए हमारे छात्रों को अमेरिका-इंग्लैंड की खाक न छाननी पड़े। आज बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेश चले जाते हैं। देश में ही क्वालिटी एजुकेशन उपलब्ध हो तो उनके साथ-साथ काफी विदेशी मुद्रा का भी बाहर जाना शायद बंद हो सके। हालांकि शिक्षा में बदलाव की इस बड़ी प्रक्रिया पर सरकार को कुछ वर्षों तक नजर रखनी होगी। कहीं ऐसा न हो कि संसाधन जुटाने की होड़ में कुछ संस्थान औद्योगिक घरानों की जेब में चले जाएं और प्योर अकेडमिक्स का भट्ठा बैठ जाए। अगंभीर विषयों पर शोध बढ़ने की आशंका भी कम नहीं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं ये संस्थान देश के आम आदमी की पहुंच से बाहर न हो जाएं। इनकी फीस इतनी ज्यादा न हो जाए कि गरीब प्रतिभावान छात्र इनका और देश उनकी प्रतिभा का लाभ ही न उठा सके। फिर दूसरे संस्थानों में जिस तरह समाज के वंचित तबकों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था है, इनमें भी किसी न किसी रूप में होनी चाहिए। एक सक्षम निगरानी तंत्र की उपस्थिति में ही यह स्वायत्तता सार्थक हो सकेगी।


जनसत्ता

वोट की खातिर

कर्नाटक सरकार ने राज्य के लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने का जो दांव चला है, वह स्पष्ट तौर पर विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर किया गया फैसला है। राज्य में विधानसभा चुनाव को अब दो महीने भी नहीं बचे हैं। चुनावों के पहले मतदाताओं को लुभाने के लिए सरकारें अक्सर ऐसे सियासी खेल खेलती हैं। सोशल इंजीनियरिंग के ऐसे प्रयोग पहले भी होते रहे हैं। कर्नाटक में अलग धार्मिक दर्जे की लिंगायतों की मांग कोई नई नहीं है। पिछले साल बीदर में लिंगायत समुदाय के लोगों ने बड़ा प्रदर्शन किया था, जिसमें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से भी बड़ी संख्या में लिंगायत समुदाय के लोग पहुंचे थे। तभी सरकार ने इसे लपक लिया और इस मुद्दे पर समिति बना दी, जिसने सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा देने की सिफारिश की। गेंद अब केंद्र के पाले में है। सवाल उठता है कि सिर्फ चुनावी लाभ के लिए कर्नाटक सरकार ने यह जो कदम उठाया, वह कितना उचित है?

चुनावी नफा-नुकसान के लिहाज से लिंगायत समुदाय कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए अहमियत रखता है। राज्य की कुल आबादी में इसकी भागीदारी अठारह फीसद के आसपास है। कांग्रेस लिंगायतों को अपना पुराना वोट बैंक मानती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी लिंगायत समुदाय से आते हैं। समुदाय में उनकी गहरी पैठ है। लिंगायतों को अलग धार्मिक समुदाय मानने के मुद्दे पर राजनीति पुरानी है। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस प्रस्ताव को पहले ही खारिज कर चुके थे। उनका कहना था कि यह फैसला हिंदुओं को बांटने वाला होगा और इससे समुदाय की अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित आरक्षण भी खत्म हो जाएगा। इसलिए अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि सब कुछ जानते-बूझते भी यह दांव क्यों चला गया? बहरहाल, अगर अब केंद्र सरकार इस मसले पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाती तो चुनाव में इसका नुकसान भाजपा को हो सकता है। वहीं लिंगायतों की मांग अपने अंजाम तक पहुंच जाती है तो सफलता का श्रेय कांग्रेस सरकार के खाते में जाएगा। लेकिन जनता, खासतौर से लिंगायत और वीरशैव समुदाय इस मुद्दे पर चल रहे सियासी घमासान और चालों से अनजान नहीं है। वीरशैवों के संत और बलेहोनुर स्थित रंभापुरी पीठ के श्री वीर सोमेश्वर शिवाचार्य स्वामी ने तो इस फैसले को साजिश करार देते हुए कानूनी विकल्प पर विचार करने की धमकी दे डाली है। सुप्रीम कोर्ट ने 1966 में स्वामी नारायण संप्रदाय और 1995 में रामकृष्ण मिशन को हिंदू धर्म से अलग मान्यता देने से इनकार कर दिया था।

इससे पहले कर्नाटक के अलग झंडे का मामला उठाया गया। कन्नड़ लोगों की अस्मिता के नाम पर राज्य मंत्रिमंडल ने अलग झंडे को मंजूरी देकर गेंद केंद्र के पाले में डाल दी थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि झंडा कोड के तहत सिर्फ एक झंडे को मंजूरी दी गई है। इसलिए एक देश का एक झंडा ही होगा। जम्मू-कश्मीर का मामला अपवाद है, क्योंकि उसके लिए संविधान में अलग व्यवस्था है।

सवाल है कि चुनाव करीब आते ही राज्य सरकार को लिंगायत समुदाय और कन्नड अस्मिता की चिंता क्यों सताने लगी! कर्नाटक या और कोई अन्य राज्य सिर्फ वोट हासिल करने के मकसद से प्रांतीय अस्मिता की दुहाई देता हुआ अलग झंडे की मांग करता है, तो देश की एकता से जुड़े सवाल उठेंगे। चुनाव में जाति-धर्म जैसे मुद्दे सिर्फ लोगों को बांटने और द्वेष पैदा करने का काम करते हैं। बेहतर हो कि विकास, रोजगार और नागरिक सुरक्षा जैसे सवाल भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे बनें।


हिन्दुस्तान

उच्च शिक्षा की उड़ान

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता के साथ संस्थानों की आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में सरकार का यह बड़ा फैसला है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने जेएनयू, बीएचयू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद समेत देश के 62 उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्त घोषित कर दिया है। इन संस्थानों को अपने फैसले लेने के लिए अब यूजीसी पर निर्भर नहीं रहना होगा। ये अब खुदमुख्तार होंगे। सरकार का दावा तो यही है कि इन संस्थानों की शैक्षिक गुणवत्ता और इसे बनाए रखने में इनकी निरंतरता को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। माना गया है कि ये संस्थान अपने बूते अपनी दिशा खुद तय कर सकते हैं और स्वाभाविक रूप से ऐसे में उन्हें अपना खर्च भी खुद उठाने में सक्षम बना दिया जाना चाहिए। यानी नए फैसले के बाद ये अपनी दाखिला प्रक्रिया, फीस संरचना और पाठ्यक्रम भी खुद ही तय कर सकेंगे। नए पाठ्यक्रम और विभाग शुरू करने में इन्हें किसी का मुंह नहीं देखना होगा। ऑफ कैंपस गतिविधियों के संचालन, रिसर्च पार्क, कौशल विकास के नए पाठ्यक्रम तैयार करने, विदेशी छात्रों के प्रवेश से जुड़े नियम बनाने, शोध की सुविधाएं बढ़ाने-घटाने का अधिकार भी इनके पास होगा। अपनी परीक्षाओं का मूल्यांकन भी ये खुद करेंगे। इन्हें विदेशी शिक्षक नियुक्त करने के साथ ही अपनी मर्जी का यानी इन्सेंटिव बेस्ड वेतन देने की भी छूट होगी। दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय के साथ समझौता करने, दूरस्थ शिक्षा के नए पाठ्यक्रम बनाने जैसे मामलों में भी इन पर कोई बंदिश नहीं रहेगी।

सरकार की नजर में वैश्विक प्रतिस्पद्र्र्धा के माहौल में उच्च शिक्षा क्षेत्र में ऐसा आमूल और क्रांतिकारी परिवर्तन लाए बिना गुणवत्तापरक शिक्षा की बात सोची भी नहीं जा सकती। यह अलग बात है कि सरकार के इस प्रयास का विभिन्न स्तरों पर पहले से विरोध हो रहा है। तमाम शिक्षाविद, अध्यापक और छात्र इसे सार्वजनिक वित्त पोषित संस्थाओं के व्यवसायीकरण की दिशा में एक और कदम मान रहे हैं। एक झटके में मान भी लिया जाए कि शैक्षिक उदारवाद का यह प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाला होगा, लेकिन यह सब करते वक्त यह भी तो सुनिश्चित करना ही होगा कि वाकई यह कदम रचनात्मक बदलाव लाने वाला ही साबित हो।

इस बात को सिरे से नजरअंदाज करने का कोई कारण नहीं है कि शैक्षिक अराजकता और शिक्षा माफिया के फलने-फूलने के इस दौर में कहीं यह कदम हमारे गौरवशाली संस्थानों को भी व्यावसायिकता के उस दलदल में न धकेल दे, जहां से उन्हें उबार पाना मुश्किल हो जाए। ऐसे समय में, जब निजी स्कूल-कॉलेजों की आर्थिक मनमानी व निरंकुशता की बहस लगातार तेज हो रही हो, माना जा रहा हो कि इनकी मनमानी ने शिक्षा को आम आदमी से दूर कर दिया है, यह कदम कहीं नया खतरा बनकर सामने न आ जाए। यह आशंका अनायास तो नहीं है कि अपने संसाधन खुद जुटाने का अधिकार देकर स्वायत्तता देने वाला यह फैसला भारी फीस वृद्धि और शैक्षिक मनमानी के रूप में बोझ न बन जाए। खतरा यह भी है कि जिस तरह निजी कॉलेजों की मनमानी के कारण हाशिये का समाज उच्च शिक्षा से दूर होता गया है, वही हाल जेएनयू, बीएचयू और एएमयू जैसी संस्थाओं का भी नहीं हो जाएगा, जहां से आम भारतीय बच्चे भी उच्च शिक्षा प्राप्त करके लंबी उड़ान भरते रहे हैं।


अमर उजाला

मोसुल का सच

इराक के मोसुल में 39 भारतीय कामगारों के जीवित होने की जिस झीनी-सी संभावना पर पंजाब सहित देश के दूसरे इलाके के सैकड़ों विवश परिजनों की उम्मीद टिकी थी, अंततः मंगलवार को वह एक झटके से टूट गई। यह एक ऐसी त्रासदी है, जो करीब चार साल पहले घटित हुई थी, पर उसकी पुष्टि अब जाकर हुई है! काम की तलाश में दूसरे देश जाकर समूह में आतंकियों । के हाथों मारे जाने से दुखद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन मौत के करीब चार साल तक उनके बारे में पता न चल पाना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण था। सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि इस दौरान उनके परिजनों पर क्या गुजरी होगी। यह समझा जा सकता है कि | इस मामले में भारत सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकती थी। आईएस के कब्जे के दौरान मोसुल में जब इराक सरकार की ही पहुंच नहीं थी, तो बाहरी देशों की बात ही क्या थी। पिछली जुलाई में मोसुल के आईएस के कब्जे से मुक्त होते ही हमारी सरकार उनकी तलाश में सक्रिय हुई। रडार की मदद से एक गांव के टीले पर सामूहिक कब्र का पता चला और निकाले गए शवों के डीएनए टेस्ट से मिलान कराने के बाद उनके भारतीय होने की पुष्टि हुई। हालांकि इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा । सकती कि उस हादसे के दौरान एक व्यक्ति बच गया था, जिसने खुद को बांग्लादेशी बताकर आतंकियों से पीछा छुड़ाया और भारत लौटा। पर सरकार ने न सिर्फ उसके बयान पर विश्वास नहीं किया, बल्कि उसे परेशान किए जाने के भी आरोप हैं, जो बेहद आश्चर्यजनक है। कोई भी मुआवजा उन 39 लोगों की मौत की भरपाई नहीं कर सकता, जो महज पैंतीस हजार रुपये की नौकरी के लिए इराक गए थे, लेकिन सरकार ऐसे कदम जरूर उठा सकती है, जिससे भविष्य में इस तरह का हादसा न हो। छोटीमोटी नौकरी के लिए लोगों का अनिश्चित सफर पर निकल जाना बताता है कि असंगठित क्षेत्र में भी रोजगार का परिदृश्य कितना भयावह है। तिस पर ऐसे लोगों को फांसने के लिए जगह-जगह दलालों का ऐसा तंत्र है, जो इन्हें झूठी दिलासा देकर जोखिम भरे इलाकों में भेज देता है। कई बार इस तरह की विदेश यात्रा अपने आप में बेहद जोखिम भरी होती है; माल्टा नाव हादसे को आखिर कौन भूल सकता है! मोसुल में मारे गए इन लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि देश भर में फैले दलालों के इस तंत्र की शिनाख्त कर कार्रवाई की जाए।


राजस्थान पत्रिका

दूरगामी फैसला

अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती स्वागत योग्य मानी जा सकती है। शायद इसीलिए न्यायालय ने ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज होते ही गिरफ्तारी को गैर जरूरी बताया। अदालत का मानना है कि मामला दर्ज होने के बाद पहले जांच किया जाना जरूरी है। अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के साथ सामाजिक भेदभाव की खबरें देश के तमाम हिस्सों से आती रहती हैं। इनके साथ होने वाले अपराधों में भी साल-दर-साल बढ़ोत्तरी हो रही है। लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कानून का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग भी हो रहा है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी वैमनस्य को जातीय समीकरणों से जोड़कर कानूनी जामा पहना दिया जाता है। कानून पीड़ितों को न्याय दिलाने का जरिया बने, इससे तो सहमत हुआ भी जा सकता है लेकिन इस कानून के दुरुपयोग का समर्थन शायद ही कोई करे। अदालत ने सही निष्कर्ष निकाला कि कानून बनाते समय संसद को इसके दुरुपयोग की आशंका नहीं रही होगी। यह बात सही है कि देश में शायद ही कोई कानून ऐसा हो जिसका दुरुपयोग नहीं होता है। । लेकिन सवाल इस दुरुपयोग को रोकने का है। देश की शीर्ष अदालत के कहे बिना भी पुलिस मामले की पहले जांच कर सकती थी। कानून कोई भी क्यों न हो, किसी शिकायत की जांच किए बिना गिरफ्तारी को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। कानून का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ सख्ती किए बिना असली पीड़ितों को इसका लाभ नहीं मिल सकता। बात अकेले इसी कानून की नहीं है। दहेज और छेड़छाड़ के मामलों में भी इस प्रकार की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे मामलों में कई बार निर्दोष लोग भी चपेट में आ जाते हैं। सरकारों को आगे आकर तमाम कानूनों में हो रहे दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था करनी चाहिए। हर काम अदालत के भरोसे छोड़ने की प्रवृत्ति भी ठीक नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के संदर्भ में गिरफ्तारी और हिरासत में रखने को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं। मतलब साफ और सीधा है। सर्वोच्च न्यायालय चाहता है कि दलित और वंचितों को न्याय दिलाने के लिए बने कानून का दुरुपयोग रोकना पुलिस का भी काम है और सभी अदालतों का भी।


दैनिक जागरण

लूट का सिलसिला

एक ऐसे समय जब पंजाब नेशनल बैंक में करीब 12 हजार करोड़ रुपये के घोटाले को लेकर बैंकिंग व्यवस्था के साथ सरकार भी सवालों के निशाने पर है तब यह सामने आना किसी आघात से कम नहीं कि चेन्नई की एक कंपनी कनिष्क गोल्ड ने विभिन्न बैंकों से आठ सौ करोड़ रुपये से अधिक की धोखाधड़ी को अंजाम दे दिया। इस कंपनी को 824 करोड़ रुपये का कर्ज देने वाले स्टेट बैंक समेत 14 बैंकों को अंदेशा है कि कंपनी के कर्ता-धर्ता विदेश भाग गए हैं। हालांकि इन बैंकों की ओर से शिकायत मिलने के बाद सीबीआइ ने अभी एफआइआर दर्ज नहीं की है, लेकिन कंपनी के प्रमोटर भूपेश जैन का जिस तरह कुछ अता-पता नहीं उससे यही लगता है कि रपट लिखने की औपचारिकता भर शेष है। भले ही प्रकट रूप में यह दिखे कि पंजाब नेशनल बैंक में घोटाले के बाद एक और बैंक घोटाला सामने आया, लेकिन सच यह है कि अन्य अनेक बैंक घोटालों की तरह इस घोटाले की जड़ें भी कहीं गहरे दफन हैं। 2007 में कनिष्क गोल्ड को कर्ज देने के सिलसिले के साथ ही घोटाले की बुनियाद रख दी गई थी, यह स्पष्ट कर रहे हैं वे दस्तावेज जिनके आधार पर लोन लिया गया। बैंकों की मानें तो कंपनी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कर्ज लिया। इसका सीधा मतलब है कि बिना किसी जांच-परख के करोड़ों रुपये का लोन दे दिया गया। बैंकों की नींद पिछले साल मार्च में तब टूटी जब उन्हें ब्याज की राशि मिलनी बंद हो गई। यह तय है कि अगर रिजर्व बैंक ने फंसे कर्जे यानी एनपीए के बारे में एक निश्चित समय में पूरी सूचना देने का नियम नहीं बनाया होता तो बैंक इसकी परवाह करने वाले नहीं थे कि कर्ज की राशि वापस क्यों नहीं आ रही है? यह लापरवाही की पराकाष्ठा तो नहीं और क्या है कि मार्च 2007 से लेकर जनवरी 2018 तक आठ सौ करोड़ रुपये का कर्ज देने वाले बैंक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे? 1दरअसल यह दीवालिया संहिता में बदलाव किए जाने और रिजर्व बैंक की ओर से एनपीए को लेकर सख्ती दिखाने का नतीजा है कि पहले पंजाब नेशनल बैंक का घोटाला बाहर आया और फिर अन्य कई बैंकों के। यह मानकर चला जाना चाहिए कि कर्ज लेकर भागने अथवा उसे जानबूझकर न चुकाने वालों के और मामले सामने आएंगे। ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि अब बैंकों के पास ऐसे लोगों अर्थात घोटालेबाजों और साथ ही अपनी कारगुजारी छिपाने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। कर्ज देने के नाम पर जो बंदरबांट की गई उसका खुलासा होने में हर्ज नहीं, लेकिन यह ठीक नहीं कि घोटालेबाज कारोबारियों और उनसे साठगांठ रखने वाले बैंक अफसरों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती नहीं दिख रही है। सरकार को न केवल ऐसे भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में कोई मिसाल कायम करनी होगी, बल्कि कर्ज के नाम पर बैंकों से लूट के रास्ते भी बंद करने होंगे। यह ठीक नहीं कि बैंकों के कामकाज को सुधारने और उनकी निगरानी करने की जिम्मेदारी के मामले में रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रलय में सहमति नहीं दिख रही है।


देशबन्धु

मोदी सरकार संवेदनशीलता दिखाए

उम्मीद पर दुनिया कायम होती है। इराक के मोसुल शहर में जून 2014 में जब आतंकी संगठन आईएस ने 40 भारतीयों का अपहरण कर उन्हें बंधक बनाया था, तो यहां भारत में उनके परिजनों इस उम्मीद के सहारे चार सालों तक उनका इंतजार करते रहे कि कभी तो उनकी सलामती की खबर मिलेगी, कभी तो भारत सरकार अपहृतों को वापस ले कर आएगी। लेकिन अब उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मंगलवार को संसद में बताया कि आईएस ने अगवा किए गए 39 भारतीयों की हत्या कर दी है। उनके इस ऐलान के बाद पीड़ित परिवारों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। उनका सरकार से सवाल है कि आखिर इतने बरस उन्हें अंधेरे में क्यों रखा गया? उनकी यह भी शिकायत है कि अधिकारियों ने उन्हें उनके प्रियजनों के मारे जाने के बारे में आधिकारिक जानकारी नहीं दी। इराक में केवल 39 लोगों की हत्या नहीं हुई है, बल्कि उनके साथ 39 परिवारों की जीवन की उम्मीदें भी मर गईं। उनकी यह उम्मीद यूं ही नहीं बंधी थी। इन बरसों में उन्होंने कई बार सरकार से अपने लापता भाई, बेटे, पति को लेकर सवाल पूछे।

संसद में भी सरकार से इस संबंध में जानकारी मांगी गई। लेकिन आधिकारिक और अनाधिकारिक दोनों स्तरों पर सरकार उम्मीद बंधाती रही कि वह उन्हें वापस लाने की कोशिश कर रही है। कभी यह कहा गया कि वे जेल में बंद हैं, कभी उनका पता लगाने की बात कही जाती रही। इस बीच 40 अगवा भारतीयों में से एक हरजीत मसीह बच कर वापस भी आए और 2015 में उन्होंने जानकारी दी कि सभी अगवा भारतीयों को आईएस के लड़कों ने गोली मारकर जान ले ली है। तो उनकी इस सूचना को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गलत बताया। अब मसीह ने सरकार पर आरोप लगाया कि उन्हें पूछताछ के लिए हिरासत में रखा गया और 39 अन्य परिवारों को झूठे आश्वासन दिए, जबकि उसने उनकी मौत की खबर सरकार को दे दी थी। मसीह का कहना है, मैंने सरकार को 39 लोगों के मारे जाने की बात बताई थी, इसके बाद भी मुझ पर विश्वास नहीं किया गया। गौरतलब है कि मसीह के परिवार ने उसे इराक भेजने के लिए 1.5 लाख रुपए उधार लिया था।

इराक में वह एक कंपनी में पाइप फिटर का काम करते थे। यानी आर्थिक और पारिवारिक दोनों दृषिटयों से मसीह कमजोर पृष्ठभूमि के हैं और बावजूद इसके वे सरकार पर आरोप लगाने का जोखिम उठा रहे हैं, तो उनके आरोपों को सेंतमेंत में खारिज नहींं किया जा सकता। बताया जा रहा है कि हरजीत मसीह को भी पैर में गोली लगी थी, लेकिन वे किसी तरह आईएस के चंगुल से निकलने में सफल हुए, यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने खुद को बांग्लादेशी बताया और वहां से बच निकले, क्योंकि आईएस ने बांग्लादेशी मजदूरों को छोड़ दिया था।

सुषमा स्वराज को हरजीत के बच निकलने की कहानी अविश्वसनीय लगी, इसलिए उन्होंने भारतीयों के मारे जाने की खबर को भी सच नहीं माना। यह सही है कि हरजीत मसीह के वापस लौटने की कहानी में कई सवाल उठते हैं, पर इस घटना के एकमात्र चश्मदीद गवाह होने के नाते जब उन्होंने 39 लोगों की हत्या की बात की, तो क्या सरकार को उनकी बात के तमाम सूत्रों को जोड़नेे की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी? यह क्यों कहा गया कि वे भारतीय जेल में हो सकते हैं? सुषमा स्वराज बिना पुष्टि के मौत की खबर नहीं देना चाहती थींं, तो कम से कम यह कह सकती थींकि वे जिंदा हैं इसकी कोई सूचना नहींं है। कम से कम झूठी उम्मीदों में तो उनके परिवारों को नहीं रहना पड़ता।

आईएस ने 2014 में मोसुल पर कब्जा किया था और 2017 में इराक ने उसे मुक्त कराया। आईएस के कब्जे के दौरान तो कोई भी सूचना निकालना लगभग असंभव था, लेकिन 2017 से 2018 के एक साल के अंतराल में तो सरकार को उनकी मौत की खबर लग गई होगी, फिर परिजनों तक जानकारी पहुंचाने में इतना वक्त सरकार ने क्यों लिया? बताया जा रहा है कि विदेश राज्यमंत्री वी के सिंह ने लापता भारतीयों के तलाशी अभियान में काफी मेहनत की। उनकी सराहना करते हुए सुषमा स्वराज ने कहा कि बदूश में खोज के दौरान उन्हें एक छोटे से मकान में जमीन पर सोना पड़ा था। श्री सिंह भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं और एक सैनिक को जिन कठिन हालात में रहना पड़ सकता है, वे उसके अभ्यस्त हैं।

सरकार के मंत्री और भारतीय होने के नाते उन्होंने जो काम किया, उसकी प्रशंसा सही है, लेकिन यह वक्त तो उन सवालों का जवाब देने का है, जो पीड़ित परिवार उठाते रहे हैं। इराक जैसे युद्ध और आतंकवाद ग्रसित देश में आजीविका के लिए इन लोगों को इनके परिवारों ने बड़ी मजबूरी में भेजा होगा। अगर सरकार देश में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती तो इस तरह जान जोखिम में डालकर बाहर कमाने की जरूरत ही नहीं होती। कल लोकसभा में अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विपक्ष की संवेदनहीनता की बात कही थी, कम से कम मोदी सरकार संवेदनशीलता दिखाते हुए इन परिवारों से और मसीह से माफी मांगे कि उन्हें समय पर सही जानकारी नहीं दी गई।