Home काॅलम आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 13 अप्रैल, 2018

आज के हिंदी/अंग्रेजी अख़बारों के संपादकीय: 13 अप्रैल, 2018

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जनसत्ता

कठुआ और कानून

जम्मू क्षेत्र के कठुआ जिले में आठ साल की बच्ची के साथ दरिंदगी और फिर उसकी हत्या के मामले में दायर दो आरोपपत्रों में जो खुलासा हुआ है, वह वीभत्स और शर्मनाक है। और भी दुखद यह है कि इस मामले को अब पूरी तरह से सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग दे दिया गया है। हालांकि पहली नजर में ही मामला सीधा-सीधा पूर्वनियोजित अपराध का है। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस पूरी घटना को अंजाम देने में पुलिस न केवल अपराधियों के साथ मिली रही, बल्कि आपराधिक कृत्य में भी भागीदार बनी। घटना इस साल दस जनवरी की है जब बक्करवाल समुदाय की आठ साल की एक लड़की को कुछ लोगों ने अगवा कर एक मंदिर में छिपा लिया था और वहां उसके साथ कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। इसके बाद उसकी हत्या कर दी गई; शव को जंगल में फेंक दिया गया और उसके सिर को पत्थर से कुचल दिया गया। यह सब फोरेंसिक जांच में साबित हो चुका है। आरोपपत्र में पुलिस ने कहा है कि घटना का असली साजिशकर्ता मंदिर कापुजारी था, जिसने अपने बेटे, भतीजे, पुलिस के एक एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) और उसके दोस्तों के साथ हफ्ते भर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया। इसके अलावा, दो पुलिसवालों ने पुजारी से घटना के सबूत करने नष्ट करने के लिए चार लाख रुपए लिए।

इस घटना ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में तूफान ला दिया है। राज्य सरकार में खेमेबंदी उजागर हो गई है। भाजपा खुल कर आरोपियों के पक्ष में उतर आई है तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की बात कहते हुए भरोसा दिलाया है कानून अपना काम करेगा। चौंकाने वाली बात तो यह है कि आरोपियों के समर्थन में जो रैली निकाली गई और बंद रखा गया उसमें भाजपा के दो मंत्री भी शामिल हुए। घटना को अंजाम देने वाले डोगरा समुदाय के हैं और हिंदूवादी संगठनों से जुड़े हैं। कुछ वकीलों ने पुलिस को आरोपपत्र दाखिल करने से रोकने की कोशिश की। कठुआ की घटना जमीन विवाद को लेकर बताई जा रही है जिसे पुजारी खाली कराना चाहता था। इसीलिए उसने इस पूरी वारदात को अंजाम दिया। बक्करवाल मुसलिम समुदाय की अनुसूचित जनजाति है। प्रदेश की कुल मुसलिम आबादी में गुर्जर और बक्करवाल ग्यारह फीसद हैं। ये पशुपालक हैं और इनका स्थायी ठिकाना नहीं है। ये लंबे समय से केंद्रीय वनाधिकार कानून-2006 को जम्मू-कश्मीर में भी लागू करने की मांग कर रहे हैं। भाजपा को लग रहा है कि अगर यह कानून लागू हो गया और गुर्जर-बक्करवाल समुदाय को जंगल की जमीन का हक देना पड़ गया तो इससे जम्मू क्षेत्र में ‘हिंदू समुदाय खतरे में पड़ जाएगा’। जबकि पीडीपी खेमा इन जनजातियों के साथ है।
कठुआ कांड दहला देने वाला है। आरोपियों के बचाव में जिस तरह से भाजपा के मंत्री तक उतर आए, उससे साफ है कि भाजपा हिंदू-मुसलिम का खेल खेलने के लिए किस हद तक जा सकती है। कुछ वकीलों का आरोपियों के पक्ष में उतरना भी चिंताजनक है। इस कांड को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं हो रही हैं उससे प्रदेश की राजनीति में सांप्रदायिकता को ही बढ़ावा मिलेगा। ऐसे में, मुख्यमंत्री कैसे इन हालात से निपटती हैं और पीड़ित पक्ष को न्याय सुनिश्चित करा पाती हैं, यह बड़ी चुनौती तो है ही!


हिंदुस्तान

नई कामयाबी

अभी महज दो हफ्ते पहले ही एक बड़ी नाकामी उसके पल्ले पड़ी थी, लेकिन बड़ी बात यह है कि जीसैट-6 की असफलता से इसरो ने हार नहीं मानी, और अपनी यात्रा को बरकरार रखा। 30 मार्च की उस असफलता के बाद इसरो के वैज्ञानिक और तकनीशियन 12 अप्रैल को फिर से लांच पैड पर थे। सुबह चार बजकर चार मिनट पर जब हम में से ज्यादातर लोग अभी गहरी नींद में ही थे, इसरो ने अपने 43वें मिशन को आकाश में प्रक्षेपित कर दिया। चार चरणों के इस रॉकेट ने महज 19 मिनट के भीतर ही 1,425 किलोग्राम के आईआरएनएसएस-1आई उपग्रह को धरती से ले जाकर दूर अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया।

पिछली उड़ान के बाद इस ताजा उड़ान की तारीख पहले से ही तय थी। एक आशंका यह थी कि इसरो इस बार फूंक-फूंककर कदम रखने के चक्कर में इस उड़ान में देरी कर सकता है। लेकिन इसरो ने ऐसा नहीं होने दिया, जो उसके आत्मविश्वास को ही दर्शाता है। ऐसा नहीं है कि इसरो के लिए यह पहली असफलता थी, ऐसी असफलता यदा-कदा आती ही रहती है। लेकिन इसरो ने यह अच्छी तरह समझ लिया है कि असफलताओं से आगे बढ़ने का टाइम-टेबल नहीं बदलना है। और जहां तक अंतरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपण का मामला है, प्रक्षेपण करने वाली कंपनियों के खाते में नाकामी हर कुछ समय बाद आती ही रहती है। यह भी कहा जाता है कि इसरो की असफलता की दर ऐसी दूसरी एजेंसियों से काफी कम है। यहां तक कि चीन की अंतरिक्ष एजेंसी की असफलताएं इसरो के मुकाबले कहीं बड़ी हैं। इसीलिए दुनिया भर की सरकारें और यहां तक कि निजी कंपनियां तक अपने उपग्रह प्रक्षेपण के लिए इसरो को सौंपती हैं।

इसरो के लिए यह समय काफी महत्वपूर्ण है। अगर वह अपने एक प्रक्षेपण को थोड़ा आगे खिसका देता, तो उसका आगे का सारा कार्यक्रम गड़बड़ा जाता। वह इस समय एक साथ नौ मिशन पर काम कर रहा है। इसके बाद उसे अपने सबसे महत्वाकांक्षी मिशन को सिरे चढ़ाना है। यह मिशन है चांद पर किसी भारतीय को भेजने का। चंद्रयान और उसके बाद मंगलयान के मामले में इसरो को जिस तरह की कामयाबी मिली, उसके बाद इस मिशन में कुछ भी असंभव नहीं लगता, फिर भी यह ऐसा अभियान होगा, जो काफी कड़ी मेहनत की मांग करता है। कोई भी देरी यह सारा कार्यक्रम गड़बड़ा सकती थी।

और अब बात आईआरएनएसएस-1आई की। इसका प्रक्षेपण इसलिए भी समय रहते जरूरी था, क्योंकि आईआरएनएसएस-1एच का प्रक्षेपण कामयाब नहीं रहा था। यह नेविगेशन उपग्रह भारत की कई महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करता है और अंतरिक्ष में जाकर उस सिलसिले को आगे बढ़ाएगा, जो आईआरएनएसएस-1ए के साथ शुरू हुआ था। इसके पहले भारत अमेरिकी जीपीएस व्यवस्था का इस्तेमाल करता था, लेकिन कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने उस क्षेत्र की जीपीएस जानकारी देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद भारत ने अपनी नेविगेशन व्यवस्था शुरू करने का संकल्प लिया था। और छह साल के भीतर ही उसने यह कर भी दिखाया। अमेरिका और भारत के अलावा रूस के पास भी अपनी नेविगेशन व्यवस्था है। यूरोप ने भी हाल ही में यह व्यवस्था विकसित की है। हालांकि चीन अभी भी अपनी नेविगेशन व्यवस्था विकसित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।


अमर उजाला

बर्बरता की पराकाष्ठा
जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में आठ साल की एक बच्ची के साथ कथित सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी निर्मम हत्या कर देने की घटना न केवल स्तब्ध कर देने वाली है, बल्कि इससे पता चलता है कि निर्भया के साथ हुई बर्बरता के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई गई सारी चिंताएं और कवायदें बेमानी साबित हो गई हैं। विगत दस जनवरी को यह बच्ची अपने गांव रसाना से लापता हो गई थी और एक हफ्ते बाद उसका शव बरामद हुआ था। अदालत में दाखिल आरोपपत्र में उसके साथ हुई ज्यादती के जो ब्योरे दर्ज किए गए हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। उसे न केवल आठ दिन तक बंधक बनाकर रखा गया, बल्कि बेहोशी की हालत में उसके साथ कई लोगों ने दरिंदगी की, जिनमें कुछ पुलिसवाले भी शामिल थे। उस बच्ची का सिर्फ यही कसूर था कि वह उस बकरवाल समुदाय से ताल्लुक रखती थी, जिसे वहां से कथित तौर पर बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। राज्य में अनुसूचित जनजाति वर्ग में शामिल यह समुदाय पशपालन के जरिये जीवन-यापन करता है और हाल ही में उसे राज्य की महबूबा मुफ्ती सरकार ने वनाधिकार देने की घोषणा की थी। मगर आरोपपत्र से पता चलता है कि उस मासूम के साथ हुई ज्यादती का प्रमुख साजिशकर्ता सांझी राम कुछ लोगों के साथ मिलकर बकरवाल समुदाय के लोगों को डरा-धमका कर अपने गांव से बेदखल करना चाहता था। यह दुखद है कि इस घटना को सांप्रदायिक रंग देकर इसे जम्मू बनाम कश्मीर
बनाने की भी कोशिश की जा रही है, जिसमें कई स्थानीय वकील तक शामिल हैं, जिन्होंने पहले तो क्राइम ब्रांच को अदालत में आरोपपत्र दाखिल करने से रोकने की कोशिश की। और फिर नाकाम रहने पर बंद का आयोजन कर डाला। हद तो यह है कि आरोपियों का बचाव करने वालों में राज्य की महबूबा सरकार में भाजपा के कोटे के दो मंत्री तक शामिल हैं, जो कह रहे हैं कि वे इस घटना की सीबीआई जांच चाहते हैं ! तो क्या इन मंत्रियों को अपनी ही सरकार के अधीन काम करने वाली पुलिस पर भरोसा नहीं रहा? इस मामले को सांप्रदायिक या । राजनीतिक रंग देने के बजाय जांच एजेंसियों और अदालत को अपना काम करने देना चाहिए, ताकि उस बच्ची के परिजनों को न्याय मिल सके।


दैनिक भास्कर

उपवास की बाहरी प्रतिस्पर्धा और असली हृदय परिवर्तन 

जातिवादी और साम्प्रदायिक हिंसा के बाद शुरू हुई उपवास की राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा प्रदान किया गया यह ऐसा हथियार है, जिसमें उपवास करने वाला स्वयं कष्ट सहकर विरोधी का हृदय परिवर्तन करता है। कई बार यह काम अपने पापों के प्रायश्चित और अपनों के हृदय परिवर्तन के लिए भी किया जाता है। इसलिए संसद के बजट सत्र के बेकार चले जाने के प्रायश्चित स्वरूप अगर सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर उपवास करते तो वह वास्तव में लोकतंत्र बचाओ उपवास होता। विडंबना यह है कि कांग्रेस ने दो दिन पहले एनडीए सरकार के विरुद्ध उपवास किया तो सरकार ने कांग्रेस के विरुद्ध। विपक्ष चाहता था कि संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण का उपयोग वह सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए करे और आगामी चुनाव के लिए सरकार विरोधी माहौल बनाए। इसके लिए वह बैंकिंग घोटाला, सीबीएसई पेपर लीक और अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न अधिनियम को कमजोर बनाए जाने को मुद्‌दा बनाना चाहता था। सरकार नहीं चाहती थी कि संसद के मंच का उसके विरुद्ध इस्तेमाल हो। इस दौरान कई प्रकार के नाटक हुए और उन पार्टियों ने सत्र को बाधित किया जो सरकार की करीबी मानी जाती हैं। अन्नाद्रमुक ने कावेरी जल विवाद का मुद्‌दा इस तरह से उठाया कि तेलुगु देशम और वाईएसआर कांग्रेस व कांग्रेस की अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश बेकार चली गई। अविश्वास प्रस्ताव संसदीय नियमों का हिस्सा भले न हो लेकिन, वह संसदीय परम्परा का दीर्घकालिक हिस्सा है। इसके माध्यम से विपक्ष जनता के असंतोष को व्यक्त करता है और सरकार के कामकाज पर अपना दबाव बनाता है। अब जबकि विपक्ष और सरकार के बीच उपवास की प्रतिस्पर्धा चल रही है तो ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि देखिए मोदी ने पहले सरदार पटेल को कांग्रेस से छीन लिया और अब उन्होंने उपवास करके महात्मा गांधी को भी उनसे हड़प लिया। राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित कांग्रेस के सत्याग्रह यज्ञ को उसके अपने ही लोगों ने भंग कर दिया। उसकी तुलना में मोदी सरकार का उपवास ज्यादा व्यवस्थित रहा। इसके बावजूद असली सवाल हमारी साड़ी के तुम्हारी साड़ी से ज्यादा सफेद होने का नहीं है। सवाल है देश में जातिगत और साम्प्रदायिक सद्‌भाव कायम करने का। काश पूरा देश अंतरमन से उस सद्‌भाव के लिए उपवास करता।


दैनिक जागरण

समझबूझ का संकट

सुप्रीम कोर्ट के जज कुरियन जोसेफ की ओर से लिखी गई चिट्ठी यही बता रही है कि जजों की नियुक्तियों के मामले में सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच वैसी समझबूझ नहीं है जैसी कि होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम की ओर से जजों की नियुक्तियों की अनुशंसा पर सरकार को किसी नतीजे पर पहुंचना ही होगा। या तो वह यह स्पष्ट करे कि उसे कोलेजियम की ओर से सुझाए गए नाम मंजूर क्यों नहीं हैं या फिर इन नामों को अपनी स्वीकृति प्रदान करे। उसके समक्ष एक विकल्प कोलेजियम व्यवस्था के स्थान पर न्यायाधीशों की नियुक्ति की नई व्यवस्था बनाने का भी है। यह ठीक है कि विगत में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक नियुक्ति आयोग को खारिज कर दिया था, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सरकार ऐसे किसी आयोग के गठन की नए सिरे से तैयारी न करे। उचित यह होगा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए न्यायिक आयोग की स्थापना करने वाले संविधान संशोधन विधेयक को नए सिरे से संसद के समक्ष रखें। यह जटिल कार्य अवश्य है, लेकिन यह ठीक नहीं कि न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते रहें। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं है। न्यायाधीशों की ओर से अपने साथियों की नियुक्ति करना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के भी विपरीत है। उचित यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट भी यह समङो कि यदि वह कार्यपालिका के दखल की आशंका को रेखांकित कर कोलेजियम व्यवस्था की वकालत करता रहेगा तो उस पर सवाल उठते ही रहेंगे। 1यह ठीक नहीं है कि एक अरसे से सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसे कारणों से चर्चा में है जो उसकी छवि के अनुकूल नहीं हैं। एक ओर कुछ वरिष्ठ जज प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं तो दूसरी ओर न्यायाधीशों की नियुक्तियों का मसला विवाद से घिरा हुआ है। बेहतर होगा कि एक और जहां सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अपने आंतरिक प्रशासन को आपस में मिल-बैठकर दुरुस्त करें वहीं दूसरी ओर न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मसले पर कार्यपालिका के साथ विचार-विमर्श करके ऐसी कोई व्यवस्था बनाएं जो लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं के अनुकूल हो। विवाद के मसलों को लेकर चिट्ठियां लिखना अथवा प्रेस कांफ्रेंस करना समस्या का हल नहीं है। यह ठीक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज प्रधान न्यायाधीश को कठघरे में तो खड़ा करने में लगे हुए हैं, लेकिन यह नहीं स्पष्ट कर पा रहे हैं कि वह मुकदमों के आवंटन के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए किस तरह न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं? स्पष्ट है कि इन स्थितियों में एक संदेह का वातावरण उत्पन्न हो रहा है। ऐसा वातावरण सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा के लिए उचित नहीं। बेहतर होगा कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश यह समङों कि जिस कोलेजियम व्यवस्था को सिद्धांत रूप में वे भी सही नहीं मानते उसे जारी रखने पर क्यों जोर दे रहे हैं? इसके अतिरिक्त उन्हें यह भी समझना होगा कि न्यायपालिका का नेतृत्व करने के नाते उनकी भी जवाबदेही बनती है। विडंबना यह है कि यह जवाबदेही मुश्किल से ही नजर आती है और यही कारण है कि देश का न्यायिक तंत्र समस्याओं से उबरने का नाम नहीं ले रहा है।


प्रभात खबर

वन कोष का दुरूपयोग

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के बढ़ते खतरे को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण एक अहम मुद्दा है. लेकिन, बड़े दुर्भाग्य की बात हैं कि हमारी सरकारों और संबद्ध विभागों में लापरवाही का आलम है. इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने फिर फटकार लगायी है. मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान नाराज़ खंडपीठ ने कहा कि विधायिका अदालत को बेवकूफ बना रही है और पर्यावरण संरक्षण के लिए जमा की गयी राशि को अन्य मदों में खर्च किया जा रहा है, पर्यावरण के लिए जमा धन का उपयोग सड़कें बनाने, बस स्टैंडों की मरम्मत और कॉलेजों में प्रयोगशालाएं स्थापित करने जैसे कामों में हो रहा है, केंद्र और राज्य सरकारों के पास लंबित यह धनराशि करीब एक लाख करोड़ रुपये है. अदालत ने खीझ कर यहां तक कहा है कि उसने सरकार पर भरोसा किया, लेकिन कुछ काम नहीं हुआ और जब अदालत कठोर टिप्पणी करती है, तो उसे न्यायिक दायरे को अतिक्रमण और सक्रियता का नाम दिया जाता है. यह भी चिंताजनक है।

कि धन का बड़ा हिस्सा संबंधित कोष में ऐसे ही पड़ा हुआ है, वर्ष 2016 बीते तीन दशकों में करीब- के कंपेंसेटरी एफॉरेस्टेशन फंड एक्ट के तहतष प्रावधान है कि किसी वन भूमि के वन्य उद्देश्यों 24 हजार औद्योगिक, से इतर उपयोग का निवेदन करनेवालों से धन रक्षा और जल-विद्युत लिया जाना चाहिए. इसी कानून के अंतर्गत परियोजनाओं के कारण विशेष फंड स्थापित किया गया है, इस कानून की जड़ें 1980 के वन (संरक्षण) कानून में 14 हजार वर्ग किलोमीटर हैं. इस वर्ष फरवरी में इस कानून से संबंधित से अधिक वन क्षेत्र का बहुप्रतीक्षित जरूरी निर्देश भी जारी किये गये हैं, सफाया हो चुका है, ताकि अनुसूचित जनजातियों और परंपरागत रूप से वनों में निवास करनेवालों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने 2006 के कानून के उल्लंघन की शिकायतों को दूर किया जा सके, सरकारी आंकड़ों की मानें, तो बीते तीन दशकों में करीब 24 हजार औद्योगिक, रक्षा और जल-विद्युत परियोजनाओं के कारण 14 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र का सफाया हो चुका है. इसके अलावा 15 हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र अतिक्रमण के कारण नष्ट हो गया है. देश के 21.34 फीसदी हिस्से में यानी सात लाख वर्ग किलोमीटर से कुछ अधिक ही वन बचे हैं, करीब 250 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को हर साल अन्य गतिविधियों के लिए दे दिया जाता है. इस स्थिति को यदि नदियों के प्रदूषण, प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते कहर, जल एवं वायु प्रदूषण, ऊर्जा की बढ़ती खपत जैसी समस्याओं के साथ जोड़कर देखें, तो यह समझना मुश्किल नहीं होगा कि पर्यावरण की रक्षा कितनी आवश्यक है, ऐसे में यदि इस मद में जमा रकम का समुचित उपयोग नहीं होगा, तो

आगामी वर्षों में स्थिति अनियंत्रित हो सकती है. विकास की अपेक्षाओं को पूरा करने और अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ पर्यावरण पर ध्यान देना भी हमारी प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए. अगर इस संबंध में चूकें, कुप्रबंधन और लापरवाही बरकरार रहीं, तो आर्थिक विकास और समृद्धि की आकांक्षाएं फलीभूत न हो सकेंगी.




देशबन्धु

हम नाली के कीड़े

सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस जमाने में कहा जाता है कि खबरें पलक झपकते ही एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाती है। इस वाक्य को अब सुधार लेना चाहिए कि खबरें पहुंचती नहीं है, पहुंचाई जाती हैं और अगर मंशा गलत हो तो खबर को महीनों तक दबाकर भी रखा जा सकता है। जैसे जम्मू-कश्मीर के कठुआ में बच्ची से गैंगरेप और हत्या की खबर को फैलने से रोका गया। 10 जनवरी को घुमंतू गुज्जर समुदाय की बच्ची का अपहरण कर एक हफ्ते तक उसे मंदिर में बंधक रखा गया और इस दौरान नशीली दवाएं खिलाकर बार-बार गैंगरेप किया गया।

इसके बाद बड़ी क्रूरता से उसकी हत्या भी कर दी गई। 17 जनवरी को बच्ची की लाश बरामद हुई। जब उसके परिजन अपनी बच्ची को दफनाने की तैयारी कर रहे थे, तब उन्हें कुछ हिंदू कट्टरपंथियों ने धमकाया, जिसके बाद उन्हें 7 मील दूर, दूसरे गांव में दफन करना पड़ा। इस मामले को विपक्ष के विधायक मियां अल्ताफ ने विधानसभा में भी उठाया, लेकिन कठुआ से बीजेपी विधायक राजीव जसरोटिया ने विधानसभा में कहा कि ये गुज्जरों का पारिवारिक विवाद है। गुज्जर नेता मियां अल्ता$फइस पर बेवजह की राजनीति कर रहे हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने 23 जनवरी को मामले की जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंपा। जिसमें दिल दहलाने वाली बातें सामने आईं। भरोसा ही नहीं होता कि एक मासूम बच्ची के साथ, जो मन और शरीर दोनों से ही नाजुक थी, इस तरह पिशाचों जैसा व्यवहार कोई कर सकता है।

दिल्ली में कुछ साल पहले जो निर्भया कांड हुआ था, उसने तथाकथित तौर पर देश को झकझोर दिया था। निर्भया के साथ हुए गैंगरेप के बाद नाराज लोग सड़कों पर उतर आए थे। लेकिन बच्ची के साथ जो बर्बरता की गई, उसकी तो खबर ही देश में तीन महीने बाद पता चल रही है। ये है डिजीटल इंडिया का एक चेहरा। ऐसे कई चेहरे, कई मुखौटे हमने और चढ़ा रखे हैं। हम दुनिया के सामने उदार, धर्मपरायण समाज हैं। हमारे नेता खुलेआम मंदिर, मस्जिद की राजनीति करते हैं। ईश्वर के नाम की शपथ लेते हैं।

उपवास भी रखते हैं। लेकिन इसी समाज में एक बच्ची को मंदिर में बंधक बना कर रखा जाता है, फिर चार-छह लोग एक हफ्ते तक बार-बार उसका रेप करते हैं। रेप करने के लिए मेरठ से लड़के को जम्मू बुलाते हैं। पुलिसवाला बच्ची को मारने से पहले कहता है, एक बार और रेप करना चाहता हूं। फिर बच्ची का गला दबाकर मारा जाता है और यह देखने के लिए वह मरी या नहीं, उसे पत्थर से कुचला जाता है। इतने पर भी मन नहीं भरा तो बच्ची को इंसाफ दिलाने की कोशिश करने वालों के खिलाफ प्रदर्शन किया जाता है। इस प्रदर्शन में हिंदू समाज के लोग आगे-आगे हैं और उनके हाथों में तिरंगा है।

तिरंगे का इससे बड़ा अपमान क्या होगा, कि उसे बलात्कारियों को बचाने के लिए लहराया जा रहा है। क्या ऐसे समाज को किसी भी तरह से सभ्य कहा जा सकता है। हम तो नाली के कीड़े-मकोड़ों से भी गए गुजरे हो गए हैं। जिस तरह कीड़े-मकोड़े जिंदा रहने के लिए कुछ भी खाते हैं, गंदगी में रहते हैं, परजीवी बने रहते हैं और फिर उसी में मर कर सड़ जाते हैं। हमारी जिंदगी उनसे कुछ अलग तो है नहींं। हम भी केवल अपने जिंदा रहने, अपने लिए सुविधाएं जुटाने, अपने सुखों के लिए जीते हैं और फिर अपने ही खोल में सिमटे हुए मर जाते हैं। सभ्य, जागरूक होने की कोई लालसा हमारे भीतर बची ही नहीं है। हमारी इस स्वार्थवृत्ति का फायदा राजनेता उठाते हैं और ऐसे मासूमों को अपना शिकार बनाते हैं।

निर्भया मामले के बाद कुछ समय के लिए ऐसा लगा था कि समाज में थोड़ी चेतना आई है। लेकिन यह गलतफहमी थी। समाज को धर्म की अफीम इतनी ज्यादा दे दी गई है कि उसमें चेतना बची ही नहीं है। कठुआ में बच्ची के साथ जो हुआ, वह सोची-समझी साजिश थी। 60 साल का सांजी राम, उसका बेटा, भतीजा, तीन पुलिसवाले इन सबने इस साजिश को अंजाम दिया, ताकि मुस्लिम खानाबदोश गुज्जर लोग कठुआ से चले जाएं। दरअसल ये लोग अपने भेड़, बकरियों, घोड़ों के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूमते हैं, नदियों के किनारे डेरा डालते हैं, जहां उनके जानवरों को चरने के लिए घास मिल जाती है। लेकिन सांजी राम जैसे धर्म के अंंधे लोगों को इनका अपने इलाके में आना इतना खटका कि इनकी बच्ची को निशाना बनाकर पूरे समाज को धमकाने की साजिश रच ली गई।

बच्ची की हत्या ही काफी नहीं थी कि अब इस मामले पर अब राजनीति हो रही है और हाथ में तिरंगा लेकर सांप्रदायिक तनाव भी खड़ा किया जा रहा है। बच्ची के दुखी पिता इस प्रदर्शन को देखकर कहते हैं कि ऐसा लग रहा है मेरी बच्ची का फिर से बलात्कार कर, उसे दोबारा कत्ल कर दिया गया है। इस बात को सुनने के बाद क्या अब भी हमें खुद को सभ्य कहने का हक है? हमें कहना चाहिए, हम, नाली के कीड़े…अधर्म के संरक्षक….सभ्य होने की चाह ही नहीं रखते हैं।


The Times of India

Disquiet and Dissent
The Supreme Court ruling that the Chief Justice of India is the master of the roster and has sole discretion of deciding the composition of benches and assigning cases is unexceptionable in law; it reiterates an earlier judgment by a five judge Constitution Bench which asserted the CJI has this prerogative. But eyebrows have been raised over the CJI himself hearing the matter relating to his official powers when ideally speaking it ought to have gone to a different bench, not allocated by him. Given his high constitutional post the principle of Caesar’s wife applies: not even the slightest hint of inappropriateness should apply to his actions.

It would help greatly if the process of allocation of benches is seen to be entirely transparent, and to be fair to CJI Misra he has rolled out two key measures in this direction: the twin publications of collegium recommendations on judicial appointments and a subjectwise roster for allocation of fresh cases. But the principle of Caesar’s wife applies to the Union government – which has been sitting on collegium recommendations for appointment of KM Joseph and Indu Malhotra as SC judges – as well. Government must approve or return the recommendations with reasons for doing so.
Instead its inordinate delay, in a climate where there is a desperate shortage of judges, has set tongues wagging that Joseph’s name hasn’t found favour because he made an adverse judgment against the Centre on imposing President’s Rule in Uttarakhand. Indeed senior SC judge Kurian Joseph set to retire this year has written an anguished letter to the CJI, calling for urgent action to defend the independence of the judiciary.

Another vexed issue that could impact judicial independence is judges taking up government jobs soon after retirement. Two sitting SC judges have rejected post-retirement jobs to reiterate their independence. Shortage of judges, as well as frequent and contentious deliberations between government and collegium on appointments, can be minimised by allowing SC as well as high court judges to serve until 70. It is time to further insulate judges from governments and increase retirement ages, bring pensions on par with last salary drawn, amend statutes to remove requirements for retired judges in tribunals, and create an appointments commission for tribunals that serving judges, lawyers and others can apply to.


The Indian Express

In CJI’s Court
In January, in a dramatic and unprecedented press conference, four senior-most judges of the Supreme Court went public with their grave concerns about its functioning. They raised questions about the conduct of the Chief Justice of India, especially on the constitution of benches and allocation of cases. On Wednesday, an SC bench, led by the CJI, underlined that the CJI is “first among equals” with “exclusive prerogative” to allocate cases and constitute benches and that “there cannot be a presumption of mistrust” about the discharge of the CJI’s constitutional responsibilities. While questions have been raised in the legal fraternity over whether the CJI should have heard a matter involving the powers of his own office, Wednesday’s judgment is unequivocal about the “entrustment of authority” to his office — not just for “the efficient transaction of the administrative and judicial work of the court”, but also, significantly, for “the purpose of securing the position of the Supreme Court as an independent safeguard for the preservation of personal liberty.” Now, CJI Dipak Misra, the pre-eminence of his position as master of the roster underlined, needs to urgently turn his attention to a matter that concerns the position and independence of the Court in the matrix of institutions. He must address the critical issues flagged by a letter written to him by Justice Kurian Joseph, which have to do with the propriety and process of judicial appointments.

Justice Joseph, a member of the collegium, has pointed to the government’s unprecedented act of sitting on the collegium’s recommendation to elevate a judge and a senior advocate to the apex court. It is a matter, he suggests, that concerns — and threatens — the “very life and existence” of the Supreme Court. Reportedly, the central government is sitting on the name of one of the two candidates, Justice K M Joseph, who had ruled in April 2016 against the Centre in the case of imposition of President’s Rule in Uttarakhand. But it is not just the appointment of Justice K M Joseph that has invited allegations of undue executive interference. Last month, Justice Chelameswar, also a member of the collegium, had written to the CJI on the questionable propriety of the law ministry writing directly to the Karnataka High Court, despite the collegium reiterating a name for elevation to the high court. The stalled appointment of judicial officer P Krishna Bhat, accused of sexual harassment by a woman judicial officer and cleared by the court’s inquiry, has also provoked controversy and a busy exchange of letters between the Union Law Ministry, CJI Misra, Chief Justice of Karnataka HC Dinesh Maheshwari and Justice Chelameswar.

These matters — government withholding assent to the elevation of a judge who gave a politically inconvenient verdict, or government blocking an appointment cleared by the court — have gained gravity in the current political moment. Anxieties have gained ground that institutions appear more vulnerable in the face of a political executive armed with a decisive mandate. It is on CJI Misra to step up to the responsibility and challenge of upholding the independence of his institution, to assert its capacity to govern itself and self-regulate. The option of brushing the concerns expressed by Justices Chelameswar and Kurian under the carpet simply does not exist.


The New Indian Express

Ensure Justice to Jammu Rape Victim
The rape and murder of an eight-year-old girl in the town of Kathua in  Jammu has only recently gained traction in the national and social media. Although the crime was committed in January, it has been on and off the radar of the national media, perhaps largely because it happened far away from the national capital. But make no mistake, the nature and brutality of this crime has parallels with the infamous Nirbhaya case. Rather it may even be more diabolical, if the charge sheet filed by the police earlier this week is anything to go by. It is now clear that the crime was premeditated and planned. The accused have been charged with repeatedly raping, drugging and battering the child to death.

The main conspirators allegedly wanted to target the nomadic community to which the girl belonged so that they would leave the village. All over the world, nomadic communities have always been discriminated against, feared and abused by communities who live in settled habitats. After the crime, there was an elaborate plan to cover it up with the help of corrupt policemen and officials. But what is worse is the communal overtones the case has taken. Right-wing Hindus of the region have taken out protest rallies in support of the accused. They even prevented the police from doing their job and filing the charge sheet.

The Kathua case can be termed as a test for India’s democratic and justice delivery credentials. Child rapes happen in every nook and cranny of the country; most of them go unreported. In many it can safely be said that the victims and their families rarely get justice. But the Kathua case, given the silence of the Centre and the BJP, whose ministers even came out in support of the rape accused, should be taken to its logical conclusion. More and more voices are coming out against the brazen attempt to communalise the crime. There is also indignation at the ruling party. The child victim must get justice. Otherwise we would have failed her.


The Telegraph

Dark Room
Two rooms do not always make a more vibrant house. Nothing illustrates this better than the reclusive legislative councils in those Indian states that have a bicameral system. Although Article 171 of the Constitution does provide for a legislative council besides the legislative assembly, only seven of the 29 states have the second chamber now. That itself is a comment on its effectiveness. Many states, including West bengal, have abolished it. But some want it back. Is that because it is now used rather differently from what was envisaged? Members are elected respectively by local bodies of governance, by the assembly, by teachers, by graduates, and some also nominated by the governor from the fields of art, literature and so on. Thus, with members drawn from various walks of life as well as from among politicians, the second chamber was expected to provide a broader perspective on decisions made by the assembly, and function as inbuilt check and balance. In practice, however, that is seldom the case. It has become an extension of the political landscape of the state, furthering the purposes of the state’s dominant power. In Uttar Pradesh,Yogi Adityanath became a member of the state legislative council through the medium of a by-election when he was anointed chief minister. Five of his ministers took the same route, presumably because the Bharatiya Janata Party was looking for a majority in the council so that both chambers of the state legislature could operate without a hitch.

Such an approach completely undermines the purpose of the second chamber. It also demonstrates how the most important office-bearers in a state can evade facing a direct election. The question is not whether Mr Adityanath would have won such an election: it is an inversion of political principle by which the second chamber becomes a back door to governance. It is not only beneficial for leaders defeated in direct election, but it also smooths the way for leaders in a hurry. Or unsure of their electorate. As Nitish Kumar and Sushil Modi seek re-election in the Bihar legislative council, the question of their legitimacy as people’s leaders cannot be avoided. Why should the chief minister and his deputy in a state come through the back door? This sabotages the principle of election by the people, without which democracy loses its meaning. The state legislative council, abolished in most states, should not be maintained to feed political purposes alone.