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डेल्टा मेघवाल की संदिग्ध मौत की कवरेज को लेकर ‘दलित और स्त्री विरोधी’ राजस्थान पत्रिका कठघरे में !

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बाड़मेर निवासी मेधावी चित्रकार और नाबालिग दलित छात्रा ,17 वर्षीय डेल्टा मेघवाल की बीकानेर के एक कॉलेज में हुई संदिग्ध मौत को लेकर पूरे देश में इंसाफपसंद लोगों में रोष है। शहर-शहर प्रदर्शन हो रहे हैं और सोशल मीडिया में भी डेल्टा को न्याय दिलाने का अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन राजस्थान का सबसे लोकप्रिय अख़बार होने का दावा करने वाले अख़बार ‘राजस्थान पत्रिका’ ने इसे ‘अवैध संबंधों’ (?)  के सार्वजनिक हो जाने से पैदा हुए अवसाद में की गई आत्महत्या बताया है। पत्रिका के इस रुख को उसके दलित और स्त्री विरोधी चरित्र का प्रमाण बताया जा रहा है क्योंकि अख़बार की रिपोर्टिंग में कुछ अहम तथ्यों को पूरी तरह दरकिनार किया गया है। आरोप है कि अख़बार के मालिक गुलाब कोठारी जातिगत आरक्षण के संवैधानिक अधिकार के ख़िलाफ लगातार सार्वजनिक आह्वान करते रहे हैं और यह अख़बार ब्राह्मणवादी सामाजिक अभियान के हाथ का खिलौना ही नहीं उसका अगुवा भी है जो डेल्टा के मामले में एक-बार फिर ज़ाहिर हुआ है।

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आगे बढ़ने से पहले मूल ख़बर जान लें-

बीकानेर के नोखा कस्बे में 29 मार्च को 17 साल की डेल्टा मेघवाल का शव जैन आदर्श बीएड कालेज की पानी की टंकी में मिला। बाडमेर जिले की निवासी डेल्टा के परिजनों ने इसे हत्या और दुष्कर्म का मामला बातते हुए कालेज संचालकों और पीटी मास्टर तथा हॉस्टल की वार्डन के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी। पीटी मास्टर को गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन आरोप है कि पुलिस और प्रशासन लीपापोती में जुटा है। इस सिलसिले में मीडिया विजिल में छपी ख़बर यहाँ पढ़ें।

वैसे,थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि कथित अवैध संबंधों (?) की बात सच है तो फिर लोकलाज में जितनी आत्महत्या की आशंंका है, उतनी ही हत्या कर देने की वजह भी मौजूद है। अख़बार इस पहलू पर निगाह क्यों नहीं डाल रहा है। अगर डेल्टा की मौत वाक़ई पानी में डूबने से हुई तो फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके फेफड़े स्वस्थ कैसे बताये गये और राजस्थान पत्रिका इस बिंदु को छिपा क्यों रहा है। डेल्टा के बदन पर चोट के निशान और टंकी के पास कपड़े पड़े होनाा भी बहुत कुछ कहता है, लेकिन राजस्थान पत्रिका इसकी पड़ताल न करके एक नाबालिग के चरित्र चित्रण में जुटा है।

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बहरहाल, सोशल मीडिया में तमाम जागरूक लोग इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठा रहे हैं। राजस्थान पत्रिका की नीयत पर सवाल उठाते हुे सुरेश जोगेश ने लिखा है–

“आरक्षण विरोधी व दलित दुश्मन गुलाब कोठारी की पत्रिका ने आज यह छापा है कि लड़की के पीटीआई के साथ अवैध सम्बन्ध थे. जिन्हें उजागर होने पर लोकलाज के डर से आत्महत्या की. उन्होंने एक जगह भी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के बारे में नहीं बोला. (क्यूँ नहीं बोला यह जानने के लिए आप तस्वीरें देखिये.) जब पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट साफ़-साफ़ कह रहा है कि लंग्स हेल्दी थे (मौत की वजह पानी नहीं) तो ये शुद्ध ब्राह्मणवादी अखबारों को यह बात भी छापनी चाहिए न. यह कैसी पत्रकारिता हुई कि आप एक तरफ़ा सब लिख डालेंगे, दुसरे के पास सारे सबूत हुए भी.कुछ फैक्ट्स मैं आज रखना चाहूँगा जिसे रखने से मीडिया कतरा रहा है:

1. उसके दाहिने हाथ, दोनों कोहनियों व सीने पर गहरे जख्म हैं जो पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में नहीं है, जिसे मीडिया लिखने से कतरा रहा है.
2. पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के अनुसार फेफड़ों में पानी नहीं मिला है.
3. बालों में गहराई तक नीम की पत्तियां व तिनके मिलना जिन्दगी के लिए उसके संघर्ष को भी दर्शाता है. नीम का पेड़ पानी के टाँके के पास में ही है व टाँके पर काले कपडे का मिलना.

आरएसएस के सदस्य रहे वैद जी पर हाथ डालना आपके लिए कितना मुश्किल है यह मैं समझ पा रहा हूँ वो भी जब इंसान कीआर्थिक व राजनैतिक स्थिति ऐसी हो।”

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उधर, लेखक-आलोचक हिमांशु पांड्या ने लिखा है-

‘राजस्थान पत्रिका का दलित विरोधी, स्त्री विरोधी चरित्र छुपा नहीं है. डेल्टा की हत्या पर उनके संवेदनहीन रुख से यह पुष्ट ही हुआ है. एक बात बताऊँ – हमारे राज्य में बरसों से न जाने कितने लोग मजबूरी में यह अखबार इसलिए खरीदते आ रहे हैं कि इसका दूसरा नाम ‘बैकुंठ सन्देश’ है. यानी शहर में किसी परिचित के निधन की खबर इसी में छपती रही है.
अब मोबाईल, वहाट्स ऐप, इंटरनेट के जमाने में इसकी जरूरत रह गयी है क्या दोस्तों ? ”

#‎JusticeforDeltaMeghwal

ऐसे में सवाल उठता है कि राजस्थान पत्रिका इन सवालों का कोई संतोष जनक जवाब देगा या नहीं। अगर नहीं तो फिर लोगों के पास उस पर लगे आरोपों पर यकीन न करने की कोई वजह नहीं होगी।