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6 दिसंबर: अख़बार हिंदू एजेंडा पर चल पड़े थे, पत्रकार अब उसकी ही पुतरी थे !

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भाऊ कहिन-3

raghvendraयह बेहद अमानवीय और सेक्यूलर – सोशलिस्ट इंडिया में , अब तक के सबसे बड़े साम्प्रदायिक गुंडागर्दी की तस्वीर है । जिससे बहुत कुछ कुचल दिया गया ।
हम नंगी तलवारों , भालों के साथ एक टांग पर नाचते दढ़ियल साधुओं और हिंसक लफंगई वाली भीड़ में निरुपाय फंसे थे । कुछ के हाथ भोंपू था । वे कुछ भी कह सकते थे , कुछ भी मनवा सकते थे । यह मुस्टंडे , खूंखार और गुर्राते लोगों का हुजूम था जो अयोध्या की तंग गलियों तक में अंड़स गया था ।

मेरी अबतक की नींद में यह कभी – कभी का ही सही लेकिन सबसे भयानक जातीय दु;स्वप्न रहा है । जिसे ,

राजशेखर तुमने कोंच दिया । 30 नवम्बर ( 2016 ) की शाम तुमने मुझसे अचानक ही कहा और मैंने लिखना शुरू कर दिया ।

इसमें क्रमबद्धता मत देखना । इसे सिंक्रोनाइज करने की जरूरत भी नहीं है । हादसे इसी तरह लिखे जाते हैं ।

ज 24 साल बाद न तो अपनी लिखी रपटों की कतरनें हैं , न डायरी । दरअसल मैंने उसे सहेजा भी नहीं । फिर भी यह मुझमें कील सा ठुका था , उसी दिन पता चला , जब तुम्हारा फोन आया । उन्हीं यादों के सहारे लिख रहा हूं । दुःस्वप्न के साथ चलते ।

कड़कड़ … कड़कड़ ठुम्म .. बन जायेगा मन्दिर बनवाने वाला चाहिए ..। एक तरफ : जिस हिन्दू का खून न खौला , खून नहीं वह पानी है ..। कुछ नागा मस्जिद की ओर भाला दिखा रहे थे । यह उसकी नोक पर पूरा मध्यकालीन इतिहास ही टांग लेने जैसा दिख रहा था ।
मैं शेषावतार टीले या मन्दिर से कुछ आगे बढ़ आया था । अचानक पीछे से सिर से टकराती डायरी मेरे सामने गिरी । मैंने उसे उठाया । देखा तो लिखावट अनिल कुमार यादव की थी । पीछे मुड़ा तो देखा अनिल को 8 – 10 कारसेवकों ने घेर लिया था । वह भी उनसे भिड़े थे । डकेन हेराल्ड की एक रिपोर्टर का कपड़ा फाड़ डाला गया । बीबीसी के फोटो पत्रकार की धुनाई शुरू हो चुकी थी । स्व. जयप्रकाश शाही पर छत पर खड़े कुछ कारसेवक , एक बड़ा सा पत्थर गिराने ही वाले थे । उन्हें धक्का मार कर आगे किया । बाल – बाल बचे । कुछ पत्रकार अपनी कार पर लिखे प्रेस में से p और e खुरचने लगे थे । लेकिन , हम सब जिन – जिन अखबारों से थे , उन्होंने अपना कुछ और ही एजेंडा बना लिया । ज्यादातर पत्रकार अब उसकी ही पुतरी थे । अनिल कुमार यादव सा लोहा कितने लोगों में होता है ।

हिन्दू जैसी अलग कटेगरी ( वर्ग या कोटि ) तो , 6 दिसम्बर 1992 के बाद , हिन्दी अखबारों ने फिर से पूरी तरह स्थापित कर दी । जो अंग्रजों के पहले हिन्दुस्तान में थी ही नहीं । जिसकी नींव पड़ी दशहरे के दिन नागपुर में 1925 में । हिंदुत्व ही स्वयंसिद्ध राष्ट्रीयता हो गई । राष्ट्रीयता की संकल्पना को एकधर्मी , एकसांस्कृतिक बनाने में कुछ हिन्दी अखबार तो प्रसार संख्या के लीडर भी होते गए । 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार में लालकृष्ण आडवाणी सूचना – प्रसारण मंत्री थे , तब से 80 के दशक तक , हाथ पकड़ कर अखबारों में लाये या सिफारिश से रखवाए गए , स्वयंसेवक (नगर या जिला प्रचारक ) अपना रंग दिखा रहे थे । जो कुछ अखबारों में निर्णायक हैसियत में थे ।
बेहतर इंसान जाने जाने से बढ़कर क्या कोई खब्त है इस जिंदगी में ….? किससे पूछता ?

6 दिसम्बर 1992 : जाड़े ( शरद ) में भगवा विस्फोट । और हिन्दू होने का गर्व शीर्ष पर था । लेकिन , मुझे यहां भी कैफ़ी आजमी की अयोध्या पर लिखी कविता – राम का वनवास या दूसरा वनवास ही क्यों याद आ रही थी ?

राघवेंद्र दुबे

(वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ़ भाऊ अपने फ़क्कड़ अंदाज़ और निराली भाषा के लिए ख़ासतौर पर जाने जाते हैं। इन दिनों वे अपने पत्रकारीय जीवन की तमाम यादों के दस्तावेज़ तैयार कर रहे हैं। भाऊ 6 दिसंबर 1992 को साथी पत्रकार अनिल कुमार यादव  के साथ अयोध्या में दैनिक जागरण के रिपोर्टर बतौर मौजूद थे जब बाबरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी। भाऊ अपने संस्मरण में जिन राजशेखर को क़िस्सा सुना रहे हैं वे वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं जिन्होंने बड़े प्यार से भाऊ को यादों की वादियों में धकेल दिया है। )

पहले की कड़ियाँ पढ़ें—भाऊ कहिन-1, भाऊ कहिन-2