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नेपाल में वाम एकता

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नेपाल की तीन वामपंथी पार्टियों नेकपा-एमाले (के पी ओली), नेकपा-माओवादी केंद्र (प्रचंड) और नया शक्ति (बाबूराम भट्टराई) ने एक साझा मोर्चा बनाया है और कहा है कि 26 नवम्बर और 7 दिसम्बर को होने वाले संघीय और संसदीय चुनावों के बाद आपस में विलय कर वे इसे एक विशाल वामपंथी पार्टी का रूप देंगे. इसे नेपाल की राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में रेखांकित किया जा रहा है. इन पार्टियों का मानना है कि देश की संप्रभुता और अखंडता को बचाए रखने के लिए आज यह जरूरी हो गया है. चीन और भूटान के सीमा विवाद की आड़ में मोदी सरकार ने जिस तरह डोकलाम में सेना की तैनाती की, उससे नेपाल का चिंतित होना स्वाभाविक है. 

इस परिदृश्‍य पर तीसरी दुनिया मामलों के जानकार, समकालीन तीसरी दुनिया के यशस्‍वी संपादक और मीडियाविजिल के सलाहकार मंडल के वरिष्‍ठ सदस्‍य आनंद स्‍वरूप वर्मा का एक लेख नेपाल के अख़बार कांतिपुर में सोमवार को प्रकाशित हुआ है। हिंदी के पाठकों के लिए मीडियाविजिल इसे हिंदी में अविकल प्रस्‍तुत कर रहा है। (संपादक)


आनंदस्‍वरूप वर्मा

नेपाल की जनता को नरेंद्र मोदी का आभारी होना चाहिए कि उन्होंने दूसरी बार उसे एकजुट होने और अपनी संप्रभुता की चिंता के लिए प्रेरित किया। डोकलाम की घटना को लेकर जो खामोश हलचल नेपाल के राजनीतिक और बौद्धिक क्षेत्रों में दिखाई दे रही थी उसके आधार पर इस निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है। 21 अगस्त 2017 को नेपाल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज द्वारा आयोजित एक व्यापक कार्यक्रम में नेपाल के अनेक विद्वानों ने डोकलाम की स्थिति को सामने रखते हुए चिंता व्यक्त की और नेपाल के लिए आने वाले दिनों में इसे बेहद खतरनाक बताया। नेपाल के अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं तथा विभिन्न संचार माध्यमों को देखने से पता चलता है कि नेपाली जनता ने एक ऐसे क्षेत्र में भारतीय सैनिकों के प्रवेश को उचित नहीं माना जो विशुद्ध रूप से भूटान और चीन के बीच का विवादित क्षेत्र है। उसे चीन, भारत और नेपाल के ट्राइ जंक्शन पर स्थित काला पानी की याद आ गयी जो नेपाल की सीमा में है लेकिन जहां भारतीय सेना ने 1962 से ही अपनी सैनिक छावनी बना रखी है और नेपाल के बार-बार कहने पर भी उसे खाली नहीं कर रहा है। उसे सुस्ता और लिपु-लेक की भी याद आ गयी। 3 अक्तूबर को नेकपा (एमाले), नेकपा (माओवादी केंद्र) और नया शक्ति पार्टी ने एक मंच पर आ कर चुनावों के बाद एक दूसरे में विलय की घोषणा की। बेशक, इस घोषणा से पहले दोनों बड़ी पार्टियों ने स्थानीय चुनावों में वामपंथियों की बिखरी ताकत पर चिंता जाहिर की थी लेकिन डोकलाम की घटना ने उन्हें केवल चुनाव की दृष्टि से ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिए भी एकजुट होने के लिए प्रेरित किया और फिर ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसे आम तौर पर असंभव माना जाता था।

इसी तरह का मौका मोदी सरकार ने 2015 में नेपाली जनता को तब दिया था जब उसके बहुप्रतीक्षित संविधान से नाराज होकर मधेसी हित के आड़ में भारत ने आर्थिक नाकेबंदी लागू कर दी थी। नाराजगी के अनेक कारणों में से प्रमुख कारण यह था कि सुषमा स्वराज तथा कुछ अन्य नेताओं के ‘‘अनुरोध’’ के बावजूद नेपाल के नेतृत्व ने संविधान में नेपाल को हिंदू राष्ट्र का दर्जा देने से इनकार कर दिया। नाकेबंदी का असर यह हुआ कि समूचा नेपाल भारत सरकार के खिलाफ हो गया और उसका यह गुस्सा भारत सरकार की समर्थक समझी जाने वाली नेपाली कांग्रेस पर भी उतरा। नतीजे के तौर पर नेपाल के इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संसद के स्पीकर – सभी पदों पर कम्युनिस्ट स्थापित हो गए। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर एमाले की क्रमशः विद्या भंडारी और के.पी.ओली तथा उपराष्ट्रपति और स्पीकर के पद पर क्रमशः नंद किशोर पुन तथा ओनसारी घारती। ये दोनों माओवादी हैं और नंद किशोर पुन तो माओवादियों की जनमुक्ति सेना के वाइस कमांडर भी रह चुके हैं। 2014 में सत्ता संभालते ही नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले नेपाल और भूटान पर ध्यान दिया था और खूब ध्यान दिया था। नतीजे के तौर पर जो सामने आया उससे समूचा संघ नेतृत्व हतप्रभ रह गया। इससे पहले कोई न कोई पद नेपाली कांग्रेस के हिस्से में जरूर रहता था।

बहरहाल, 3 अक्तूबर को देश की दो बड़ी वामपंथी पार्टियों के एकता प्रस्ताव ने लोगों को काफी उत्साहित किया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और खासतौर पर दक्षिण एशिया के एक बड़े देश भारत में जिस तरह धार्मिक कट्टरवादी और फासीवादी ताकतें मजबूत होती जा रही हैं उसे देखते हुए वृहत वामपंथी एकता आज के समय की जरूरत है। भारत में भी पूरी तरह चुनाव में लिप्त सीपीआई, सीपीएम, सीपीआइएमएल जैसी पार्टियों की एकता की चाह रखने वालों की संख्या काफी है हालांकि नेपाल के वामपंथियों और भारत के वामपंथियों में बहुत बड़ा अंतर है। नेपाल के वामपंथी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हैं जबकि भारत के वामपंथी लगातार इस केंद्र से दूर छिटकते गए हैं। इस बुनियादी अंतर के बावजूद फासीवादी ताकतों के उभार को देखते हुए इनकी एकता को यहां भी लोग बहुत जरूरी मानते हैं। प्रचंड और के.पी.ओली की पार्टियों के साथ बाबूराम भट्टराई ने भी अपनी पार्टी के विलय की घोषणा की है जो 2015 में माओवादी पार्टी से अलग हो गए थे। 3 अक्तूबर की सभा में प्रचंड और ओली दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि यह एकता किसी के खिलाफ नहीं है बल्कि देश की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखने के लिए जरूरी हो गई है। यह संदेश केवल नेपाली कांग्रेस के लिए ही नहीं बल्कि भारत सरकार के लिए भी था। आगामी दिसंबर में राष्ट्रीय चुनाव होने वाले हैं और ऐसी स्थिति में इस नई मुहिम से तय है कि वामपंथियों को संसद में दो तिहाई बहुमत मिल सकेगा। संविधान में बहुत सारे संशोधनों के लिए दो तिहाई बहुमत का होना जरूरी है और अगर ऐसा हो सका तो यह सचमुच नेपाल की जनता के लिए और नेपाल के भविष्य के लिए एक सुखद बात होगी।

इस एकता को लेकर कई तरह के सवाल भी पैदा हुए हैं और इनमें मुख्य सवाल यह है कि क्या यह एकता संविधान की मूलभावना -समावेशी एवं समानुपातिक के खिलाफ है? नेपाल के जाने-माने बौद्ध नेता अमरदीप मोक्तान ने अपने एक लेख में इस भावी एकीकरण को ‘‘पहाड़ी ब्राह्मणों की एकता’’ कहते हुए इस बात पर अफसोस जाहिर किया है कि मंच पर एक भी आदिवासी, मधेसी, जनजाति,  या दलित समुदाय का नेता नहीं दिखाई दिया। अगर ऐसा है तो यह सचमुच चिंता की बात है क्योंकि माओवादियों ने हमेशा नेपाल की सामाजिक संरचना में आमूल परिवर्तन को अपना लक्ष्य घोषित किया था और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सभी वर्गों का समावेशीकरण जरूरी है।

अतीत में यह भी देखा गया है कि जनता से प्राप्त शक्ति से अपने को मजबूत स्थिति में रखने के बाद लगभग सभी पार्टियों के नेता भारत के साथ सौदेबाजी में लग जाते हैं। आर्थिक नाकाबंदी के बाद जब के.पी.ओली की सरकार ने चीन के साथ कुछ समझौते किए जिनका महज प्रतीकात्मक महत्व था तो भी भारत इसे बर्दाश्त नहीं कर सका और ओली की सरकार को गिराने के लिए प्रचंड को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया…और उन्होंने खुद को इस्तेमाल होने भी दिया। प्रसंगवश, संविधान बनने के बाद भारत के तत्कालीन राजदूत रंजीत रे के बार-बार मना करने और भारत सरकार के विरोध के झेलते हुए के.पी.ओली को प्रधानमंत्री बनाने में प्रचंड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस तरह की घटनाओं को देखते हुए यह आशंका स्वाभाविक है कि चुनाव के बाद कहीं नेतृत्व का कोई हिस्सा फिर इस तरह की सौदेबाजी में न लग जाए।

माओवादी पार्टी से अलग होते हुए बाबूराम भट्टराई ने जब अपनी पार्टी ‘‘नया शक्ति’’ का गठन किया था उस समय उन्होंने मार्क्सवाद को प्रकारांतर से खारिज करते हुए कहा था कि विश्व राजनीति की बदली हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अब एक वैकल्पिक राजनीति की जरूरत है। अभी 3 अक्तूबर की सभा के बाद उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘‘मैं अभी भी एक वैकल्पिक राजनीति स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील हूं लेकिन इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए समय के अनुसार रास्ता बदलना पड़ता है। किसी भी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल एक रास्ता नहीं होता – समय और परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग रास्ते अख्तियार करने पड़ते हैं लेकिन लक्ष्य वही रहता है।’’

भारत में और नेपाल में भी बहुत सारे लोगों ने यह कहते हुए निराशा व्यक्त की है कि अब माओवादियों ने क्रांति का रास्ता छोड़ दिया। आज नेपाल के माओवादियों को जो लोग नक्सलवाड़ी / दंतेवाड़ा या नेपाल के पुराने झापा विद्रोह से खड़े होकर देख रहे हैं वे भूल रहे हैं कि 2008 के बाद नेपाल के माओवादियों ने पूरी तरह रास्ता बदल दिया जब उन्होंने सशस्त्र संघर्ष को छोड़कर संसद के जरिए बदलाव लाने का लक्ष्य तय किया। ऐसी स्थिति में यह कहना कि क्रांति का काम आज रसातल में चला गया, बहुत बेमानी है। वह दौर तो कब का खत्म हो चुका है। भारत हो या नेपाल इन दोनों देशों में आज कम्युनिस्ट राजनीति की दो धाराएं दिखाई दे रही हैं। एक तो संसदीय दायरे के अंदर है और दूसरा संसद और संविधान के दायरे से बाहर। भारत में इस धारा का प्रतिनिधित्व माओवादी करते हैं और नेपाल में फिलहाल नेत्र बिक्रमचंद (बिप्लव) के अनुयायी। मुझे लगता है कि फासीवाद के बढ़ते खतरे को देखते हुए और आज की विश्व परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए इन दोनों धाराओं के बीच जो अंतर्विरोध है उसे शत्रुतापूर्ण बनाने की बजाय मित्रतापूर्ण ही रखा जाना श्रेयस्कर होगा। दंतेवाड़ा में चल रहे संघर्ष की प्रशंसा करने के बावजूद इस तथ्य को भी रेखांकित करने की जरूरत है कि मनमोहन सिंह सरकार के यूपीए-2 की तुलना में उन्हीं के नेतृत्व में यूपीए-1 के कार्यकाल में बहुत सारी ऐसी नीतियां ली गईं जो जनता के पक्ष में थीं। उस काल में भ्रष्टाचार भी अपेक्षाकृत कम था। इसकी तमाम वजहों में से मुख्य वजह यह थी कि यूपीए-1 के समय सीपीआई और सीपीएम सहित विभिन्न वामपंथी दल एक मोर्चे के रूप में सरकार के साथ थे और उनकी मौजूदगी सरकार पर अंकुश रखने का काम करती थी। इसी वजह से लोकतंत्र का दायरा भी मोदी के शासनकाल की तुलना में काफी विस्तार पा सका था। कहने का मतलब यह है कि आज की परिस्थिति में संसदीय और गैरसंसदीय वाम दोनों की प्रासंगिकता है।

नेपाल में एमाले और माओवादियों की एकता से वामपंथी खेमे में भी ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होगी। जिन लोगों को अभी भी भ्रम है कि माओवादी पार्टी क्रांति का नेतृत्व करेगी वे उससे अलग होकर दूसरे रास्ते की तलाश में अपना समय लगाएंगे। अगर इस विराट वाम एकता से देश का भला नहीं हुआ तो जाहिर सी बात है कि एक बार फिर उन्हें हथियारबंद संघर्ष का रास्ता ही अपनाना पड़ेगा भले ही इसमें कुछ दशक क्यों न लग जाएं।

नेपाल में जो कुछ होता है, वह जनता के पक्ष में है या जनता के खिलाफ इसका एक लिटमस टेस्ट इस बात से भी किया जा सकता है कि भारत सरकार का उस घटना विशेष के प्रति क्या रवैया है। अभी जैसे ही इन दोनों पार्टियों की एकता की चर्चा चली, विदेश मंत्रालय और रॉ के अधिकारियों की भागदौड़ शुरू हो गई और वहां के कुछ पत्रकारों के अनुसार बहुत सारे अधिकारियों ने नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में अपना डेरा जमा लिया। वे नहीं चाहते थे कि किसी भी हालत में यह एकता हो। भारत के शासक वर्ग की चिंता केवल इतनी नहीं है कि नेपाल चीन की ओर न मुखातिब हो जाए बल्कि उससे भी ज्यादा यह चिंता है कि वह आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर न बन जाए। ऐसी स्थिति में इस वामपंथी एकता को एक सकारात्मक घटना मानेंगे।



 

 

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