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बिरला जी का ‘हिंदुस्तान’ अमेरिका को बता रहा है पाताललोक ! कोई क्या कर लेगा ?

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”भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे’। ”

यह वाक्य भारत के संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में दर्ज है। इस वाक्य को पढ़ने के बाद अगर आप मीडिया के मौजूदा स्वरूप की ओर नज़र डालें तो या तो हँसी आयेगी या गुस्सा। अगर आपको गुस्सा आता है तो फिर 25 मार्च को लखनऊ से प्रकाशित हिंदुस्तान के मुखपृष्ठ पर भी नज़र डाल लें। सात कॉलम के बैनर के अंदाज़ में लिखी गई ख़बर बताती है कि अमेरिका के होंडुरस के जंगलों में एक लुप्त शहर की खोज हुई है जहाँ वानर पूजा जाता था। बात यहीं तक होती तो पुरातत्व में दिलचस्पी लेने वालों के लिए अच्छी सूचना होती, जैसा कि 3 मार्च को लंदन से छपने वाले द देलीग्राफ में भी छापा था। लेकिन तब हिंदी का दैनिक हिंदुस्तान कैसे होता !

तो हुआ यह कि माननीय शशि शेखर चतुर्वेदी के प्रधान संपादकत्व और यूपी स्टेट हेड और संपादक कृष्णकांत उपाध्याय की अद्भूभुत संपादकीय दृष्टि ने रामेंद्र कुमार सिंह की इस फेंकू ख़बर को रामायण के पाताल लोक से जोड़ दिया। हेडिंग लगाई गई–”वैज्ञानिकों का दावा, अहिरावण का पाताल लोक अमेरिकी महाद्वीप में।”

आगे बताया गया कि जब हनुमान जी, राम और लक्ष्मण को पाताल लोक से छुड़वाने गये तो वहाँ उनका मुकाबला मकरध्वज ( हँसियेगा मत, लिखा है कि उसका जन्म एक मछली के मुँह में हनुमान का पसीना जाने से हुआ था !) से हुआ। बाद में अहिरावण को मारकर मकरध्वज को पाताल लोक का राजा बना कर रामजी वापस चले आये। हो न हो, जो लुप्त शहर मिला है उसमें मकरध्वज की पूजा ही होती थी। इस तरह, हिंदुस्तान के महान पत्रकारों ने मिलकर सिद्ध कर दिया कि रामायण में जो लिखा गया था वह सच्चा इतिहास है।

आप पूछेंगे कि किस वैज्ञानिक ने इसकी पुष्टि की ? जवाब है प्रो.भरत राज सिंह। इनके बारे में यह बताया गया है कि वे कोई वैदिक विज्ञान केंद्र चलाते हैं। उन्होंने जोश में बंगाली रामायण का हवाला देते हुए बताया कि पाताल 1000 योजन दूर था यानी 12800 किलोमीटर, जो  कि भारत और श्रीलंका के बीच है। यानी अमेरिका अचानक गायब हो गया। बहरहाल, जब प्रो.भरत राज सिंह के  बारे में  मीडिया विजिल ने पड़ताल की तो पता चला कि उनते वैदिक केंद्र का मकसद हिंदू धर्मग्रंथों में लिखी बातों के लिए ”प्रमाण” जुटाना है। बाकि जिन वैज्ञानिकों का ज़िक्र किया गया है उनका ज़ोर महज़ इस पर है कि एक लुप्त शहर की खोज कैसे हुई या वहाँ बंदर की पूजा के संकेत मिलते हैं।

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यानी पुरातत्व के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण ख़बर को गपबाज़ी के हवाले कर दिया गया। जिस बात का ज़िक्र चकल्लस कॉलम में होना चाहिए था, वह अगर बैनर बने तो क्या कहा जाएगा। आदिम समाज में तरह-तरह के जानवरों को पूजने वाले कबीले रहे हैं। कुत्ता, हाथी, बंदर, गधा, साॉप जैसे तमाम जीव आज भी पूजे जा रहे हैं जो उसी आदिम समय की याद दिलाते हैं। गदा जैसा हथियार, यानी लकड़ी या पत्थर के मजबूत टुकड़ों को कंधे पर लेकर चलना और लड़ाई या शिकार में इस्तेमाल करने की परंपरा भी आदिम समाजों में स्वाभाविक रूप से पाई जाती रही है।

 

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यह समझना मुश्किल नहीं कि ऐसी ख़बरों का मक़सद अंधश्रद्धा से जूझ रहे समाज को अज्ञान की थोड़ी अफीम और चटाना है। देश संविधान से चलता हो या नहीं, ज़्यादातर पत्रकारों और संपादकों का द़िमाग़ तो मनुस्मृतिसे ही चलता है। यह ग़ौरतलब है कि पुराणों में छपी तरह-तरह की गप्प को इतिहास का ”प्रमाण” बताना उसी राजनीतिक अभियान का हिस्सा है जिसके तहत भारत जैसे महादेश का प्रधानमंत्री गणेशकथा को प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का प्रमाण बताता है। यानी हिंदुस्तान के संपादक ऐसे ही राजनीतिक अभियान को बिरला जी के पैसे से हवा देने में जुटे हैं। यह अज्ञान की अंधड़ बहाने की कोशिश है जिसे सिर्फ़ ”संविधानद्रोह” कहा जा सकता है।

वैसे शशि शेखर चतुर्वेदी और कृष्णकांत उपाध्याय.की जोड़ी के इस कारनामे ने ”अमर उजाला”, वरिष्ठ हिंदी कवि वीरेन डंगवाल के दूर होने की याद दिला दी। कुछ महीने पहले दिवंगत हुए वीरेन जी बरेली में अमर उजाला के संपादक थे। अखबार के मालिकान उन्हें बहुत मानते थे। वीरेनजी की पूरी कोशिश थी कि अमर उजाला में सांप्रदायिक उन्माद की कोई छाया न पड़े जैसा कि तमाम हिंदी अख़बारों में नज़र आ रही थी। जब वरुण गाँधी का हाथ काट देने वाला बयान हवा में था तो उन्होंने बाक़ी हिंदी अख़बारों से उलट वरुण को हीरो बनाने से परहेज़ रखा। तब कृष्णकांत.उपाध्याय वहीं थे और केंद्रीय स्तर पर शशि शेखर चतुर्वेदी पूरे अख़बार का रंग-रोगन तय करते थे। उपाध्याय ने बिना वीरेन जी को बताये, उन्मादी हवा बहाने वाली कुछ ऐसी ख़बरें छपने के लिए भेज दीं जो शशि शेखर चाहते थे। नाराज़ वीरेन डंगवाल ने एक बेहद कड़ी चिट्ठी अख़बार के मालिक अतुल माहेश्वरी को लिखी और अख़बार से अलग हो गये। शायद चतुर्वेदी और उपाध्याय चाहते भी यही थे। अमेरिका को पाताललोक साबित करने की हैसियत में वे यूँ ही नहीं पहुँचे हैं। नीचे अखबार की प्रिंटलाइन में दोनों नाम धुंधलाये नज़र आयेंगे, पौरुष बढ़ाने https://www.acheterviagrafr24.com/viagra-definition/ वाली दवाओं के विज्ञापन तले।
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