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सामने आया आधार नंबर का असली खेल, अब सरकार सैटेलाइट से रखेगी आपके घर पर नज़र!

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मोदी सरकार देश के नागरिकों का एक डेटाबेस तैयार कर रही है जिससे लोगों की हर गतिविधि पर नज़र रखी जा सके. सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना के आधार पर बनायी जा रही सोशल रजिस्ट्री लोगों की निजी सूचनाओं का ऐसा डेटाबेस है जिसके जरिये सरकार किसी भी नागरिक की हर गतिविधि पर नज़र रख सकती है. यदि मोदी सरकार की यह योजना साकार होती है, तो इससे नागरिकों की निजता पूर्ण रूप से भंग हो जाएगी.

बीते 4 अक्टूबर 2019 को हुई एक बैठक में नीति आयोग के एक सचिव ने हर घर की जियो टैगिंग का प्रस्ताव दिया जिसको इसरो द्वारा निर्मित उपग्रह भवन से जोड़ा जाएगा. अगर यह प्रस्ताव धरातल पर उतरा तो किसी भी व्यक्ति की उसके घर और उसके आसपास होने वाली हर गतिविधि पर नज़र रखी जा सकेगी.

राष्ट्रीय सामाजिक रजिस्ट्री कार्यालय द्वारा मीडिया को दी गयी जानकारी के अनुसार यह 2011 की सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना को अपडेट करने की नियमित प्रक्रिया है. सरकार का कहना है कि इससे सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ सही लोगों को दिया जा सके. इस जनगणना के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय जिम्मेदार संस्था है, जिसकी निगरानी में यह कार्य किया जा रहा है.

हफिंगटन पोस्डेट में छपी एक ख़बर कहती है कि डेटा और इंटरनेट गवर्नेंस शोधकर्ता श्रीनिवास कोडाली द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से प्राप्त दस्तावेज सरकार के दावों के उलट जानकारी देते हैं. सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना की आड़ में सरकार इसके जरिये नागरिकों का एक ऐसा डेटाबेस बनाने का प्रयास कर रही है जो खुद अपडेट होगा. इससे सरकार को निगरानी रखने में आसानी होगी. आधार नम्बर का उपयोग कर सरकार किसी व्यक्ति, उसके परिवार का धर्म, जाति, आय, संपत्ति, शिक्षा, वैवाहिक स्थिति, रोजगार, विकलांगता और परिवारिक इतिहास तक की जानकारी एकत्र कर सकती है.

राष्ट्रीय सामाजिक रजिस्ट्री से प्राप्त दस्तावेजों से स्पष्ट हुआ है कि इसके जरिये गरीबी-रेखा से नीचे पाये जाने वाले परिवार जिनको सरकार सहायता देती है, केवल उनका ही नहीं बल्कि हर भारतीय नागरिक का डेटा इकट्ठा किया जाएगा.

भारतीय जनसंख्या जनगणना अधिनियम 1948 प्रावधान करता है कि प्रत्येक नागरिक की निजता की सुरक्षा की जाएगी जबकि सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना के आधार पर बन रही सोशल रजिस्ट्री में नागरिकों की निजता का कोई प्रावधान नहीं है.

प्राप्त दस्तावेजों से मिली जानकारी के अनुसार सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन कर दिया गया है, कमेटी प्रोजेक्ट की निगरानी करेगी. प्रोजेक्ट के शुरुआती क्रियान्वयन के लिए 2021 तक का समय निर्धारित किया गया है.

सरकार की बनायी इस विशेषज्ञ समिति ने आधार अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव दिया है. अगर यह प्रस्ताव मान लिया जाता है तो सरकार 2018 के उच्चतम न्यायालय के फैसले को रद्द किए बिना आधार के सहारे किसी भी व्यक्ति की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकती है. उच्चतम न्यायालय ने 2018 के फैसले में निजता को मौलिक अधिकार माना था और आधार के असीमित प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया था.

प्राप्त जानकारी के अनुसार 4 अक्टूबर को हुई बैठक में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने आधार नियमों में संशोधन करने का फैसला किया है. अगर इस निर्णय को लागू किया जाता है तो यह 2018 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को अवैध करार देगा.

वहीं यूआइडीएआइ ने “डेटा एक्सचेंज फ्रेमवर्क” का सुझाव दिया है जिससे सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य और केंद्र स्तर पर मंत्रालयों व विभागों में बिखरे हुए सैकड़ों डेटाबेस से आसानी से डेटा का आदान-प्रदान किया जा सके.

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार विश्व बैंक ने भी इस प्रोजेक्ट में योगदान का आश्वासन दिया है. बैंक ने तकनीकी सहायता कार्यक्रम के तहत शुरुआती दो मिलियन डॉलर अनुदान पर सहमति व्यक्त की है.

जातिगत जनगणना का मूल उद्देश्य जाति, आय और हर एक भारतीय नागरिक के सामाजिक मापदंडों को निर्धारित करना था, किसी प्रकार का डेटा एकत्रीकरण नहीं. इसकी शुरुआत 2011 में मनमोहन सिंह सरकार ने की थी.

2011 की जनगणना की परियोजना ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा बनायी गयी थी, जिसको तीन अलग-अलग मंत्रालयों द्वारा पूरा किया गया. ग्रामीण भारत को ग्रामीण विकास मंत्रालय, शहरी निकायों को शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन व राजनीतिक रूप से संवेदनशील जातिगत जनगणना गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) और भारत के जनगणना आयुक्त द्वारा पूर्ण की गयी.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने 3 जुलाई 2015 को SECC द्वारा एकत्र किए गए सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को प्रकाशित किया लेकिन जातिगत आंकड़ों को जारी करने से मना कर दिया.

ग्रामीण विकास मंत्रालय की 13 अक्टूबर 2015 को हुई बैठक के प्रस्तावों के अनुसार मंत्रालय ने संसद की स्थाई समिति को सामाजिक आर्थिक जातिगत डेटा के माध्यम से अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक रजिस्ट्री का सुझाव दिया था.

इस सिलसिले में 27 नवंबर 2015 को ग्रामीण विकास मंत्रालय के तत्कालीन आर्थिक सलाहकार मनोरंजन कुमार ने एक विस्तृत नोट लिखा जिसका मूल आशय यह था कि सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना से प्राप्त डेटा का लगातार अपडेटेशन एक बड़ी परियोजना का आधार बन सकता है.

कुमार के जूनियर ध्रुव कुमार सिंह ने सुझाव दिया था कि सिस्टम को ऑटो अपडेट होते रहना चाहिए. प्रस्तावित प्रणाली भविष्य में ऑटो-अपडेशन के अधीन है क्योंकि लाभार्थियों की प्रोफ़ाइल किसी भी सरकारी लाभ को प्राप्त करने के बाद बदल जाएगी. इस तरह सरकार को लाभार्थियों की स्थिति का पता लगाने में आसानी होगी.

एक दिक्कत इस परियोजना में  गांवों से शहरों की तरफ हो रहा पलायन है जिसके चलते वास्तविक शहरी और ग्रामीण आबादी के बीच के अंतर कर पाना लगातार कठिन होता जा रहा है. इसके लिए मनोरंजन कुमार का सुझाव था कि आधार पर आधारित ऐसे डेटाबेस का निर्माण किया जाए जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की सम्पूर्ण जानकारी उपलब्ध हो. कुमार अपने नोट में लिखते हैं कि सरकार अगर गरीबी जैसी समस्याओं से पार पाना चाहती है तो उसके पास नागरिकों की सम्पूर्ण जानकारी वाले डेटा का होना बहुत ज़रूरी है.

मनोरंजन कुमार के इसी नोट से पांच साल लंबी प्रक्रिया की शुरुआत हो गयी जो अब तक चालू है. इन पांच वर्षों में विभिन्न विभागों, मंत्रालयों, थिंक टैंक और नीति आयोग जैसी एजेंसियों, यूआइडीएआइ और विश्व बैंक ने अपने-अपने सुझाव पेश किए. नीति आयोग को 2016 में इस समिति में शामिल किया गया. 13 मई 2016 को एक वरिष्ठ सांख्यिकी अधिकारी एससी झा द्वारा लिखित नोट के मुताबिक नीति आयोग ने कहा कि अतिरिक्त लाभ के लिए इनफोर्मेशन सिस्टम में फैमिली ट्री (वंशवृक्ष) का कंसेप्ट जोड़ा जाना चाहिए.

डेटा पर कब्जे के इस खेल में सरकारी और गैर-सरकारी अंतर्राष्ट्रीय संस्थान शामिल हैं, जो अपने फायदे के लिहाज से सुझाव दे रहे हैं ताकि इसको अपने मन-मुताबिक ढाला जा सके.

नीति आयोग का सुझाव है कि सामाजिक रजिस्ट्री हर समय महत्वपूर्ण बनी रहे इसके लिए इसे जन्म, मृत्यु और विवाह रजिस्टर से जोड़ा जाना ज़रूरी है. इससे पलायन-विस्थापन से हुए बदलावों पर भी ध्यान दिया जा सकेगा. ग्रामीण विकास मंत्रालय के निदेशक ध्रुव कुमार सिंह के 20 मई 2016 को लिखे नोट से पता चलता है कि इस सुझाव को शामिल करने पर सहमति बन गयी है.

इस मसले पर विश्व बैंक भी बातचीत में शामिल रहा लेकिन अंत समय में उसके सुझावों को नहीं माना गया.

जून 2017 में मंत्रालय ने सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना 2011 के डेटा की व्यवहार्यता की जांच के लिए और सामाजिक रजिस्ट्री के प्रबंधन के लिए अंतरमंत्रालयीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया. इस समिति में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआइडीएआइ), विश्व बैंक, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र, आवास और शहरी विकास मंत्रालय, डिजिटल वित्तीय समावेशन केंद्र और प्रत्यक्ष लाभ स्थानांतरण मिशन के सदस्य शामिल थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 मार्च 2018 को सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना को अपडेट करने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए. जिस समय प्रधानमंत्री ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए उस समय तक सुरक्षा उपायों को लेकर स्थिति साफ नहीं हुई थी.

डेटा के इस खेल के मूल में है आधार संख्या. अगर आधार नहीं होता तो मुमकिन था कि सामाजिक रजिस्ट्री की शुरुआत ही न होती. पहचान के एकमात्र साधन आधार ने इस प्रक्रिया को संभव बना दिया जिससे किसी भी व्यक्ति की पूरी डिटेल एक जगह पर एकत्र हो गयी.

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