Home ओप-एड COVID-19 के सामने अमेरिका और भारत इतने लाचार क्यों हैं?

COVID-19 के सामने अमेरिका और भारत इतने लाचार क्यों हैं?

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, जर्मनी या अन्य देशों की तरह इस महामारी का प्रभावी रूप से सामना करने में असमर्थ क्यों हैं? इसके लिए दरअसल हमारी राष्ट्रीय, सार्वजनिक वित्त पोषित स्वास्थ्य प्रणाली एक महत्वपूर्ण कारक है। इसमें शक्तिशाली वाणिज्यिक, वर्गीय हित और हमारी राजनीतिक प्रणाली का भ्रष्टाचार शामिल है जो हमें पश्चिमी देशों से तोहफे में मिला है।

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Workers building a makeshift morgue outside of Bellevue Hospital in New York City, 26 March 2020 | SOPA Images/SIPA USA/PA Image

अपनी उन्नत स्वास्थ्य प्रणाली के बावजूद 86,000 मामलों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक कोरोना महामारी का नया केंद्र बन गया है। एक हजार से अधिक अमरीकियों की पहले ही मौत हो चुकी है, लेकिन यह निश्चित रूप से देशों की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों और एक ‘वास्तविक महामारी’ के बीच इस घातक टक्कर की शुरुआत है।

चीन और दक्षिण कोरिया की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों द्वारा कोविड-19 को पहले ही लक्षित कर काबू कर लिया गया है। इसके लिए उन्होंने महामारी के शुरुआत से ही सार्वजनिक स्वास्थ्य संसाधनों को जुटाया और जल्दी से जल्दी परीक्षण कार्यक्रम शुरू किया। कुशलता से हर किसी का परीक्षण हो सके यह सुनिश्चित करने के लिए चीन ने पहले महीने ही 10,000 श्वसन विशेषज्ञों सहित 40,000 डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों को अपने संक्रमित प्रांत हुबेई में भेजा। चीन में कोई नया मामला दर्ज हुए तीन दिन बीत चुके हैं और सामाजिक प्रतिबंध उठाये जाने लगे हैं। दक्षिण कोरिया ने बहुत कम समय में 300,000 से अधिक लोगों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। इस वजह से वहां केवल 131 लोगों की मृत्यु हुई।

डब्ल्यूएचओ के ब्रूस आयलवर्ड ने फरवरी के अंत में चीन का दौरा किया और अपनी रिपोर्ट में कहा, “मुझे लगता है कि चीन से सीखने लायक सबसे महत्वपूर्ण चीज़ उनकी गति है… आप जितनी तेजी से मामलों को ढूंढ सकते हैं, मामलों को अलग कर सकते हैं, और उनके करीबी संपर्कों को ट्रैक कर सकते हैं, उतने ही सफल होंगे। चीन में, उन्होंने बुखार अस्पतालों का एक विशाल नेटवर्क स्थापित किया है। कुछ क्षेत्रों में टीम आपके पास जा कर आपको स्वाब कर सैम्पल ले सकती है और चार से सात घंटे में कोरोना संक्रमण की पुष्टि कर सकती है। गति ही सब कुछ है”।

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जहां अमरीका में विश्व स्तरीय आकस्मिक सुविधा वाले अस्पताल के बेड 0.034% आबादी को सुरक्षित कर सकते हैं वहीं भारत की स्थिति हास्यास्पद है। यहाँ प्रति 1,00,000 व्यक्ति महज 2.3 लोगों के लिए यानि करीब 0.023% के लिए हीं उच्च स्तर की सुविधाएं हैं।

इटली में शोधकर्ताओं ने प्रयोगात्मक रूप से पुष्टि की है कि 75% कोविड-19 के मामले स्पर्शोन्मुख हैं और इसलिए केवल लक्षणों वाले लोगों का परीक्षण अपर्याप्त है। अमेरिका में 20 जनवरी को पहला मामला दर्ज हुआ था और उसी दिन से दक्षिण कोरिया के तर्ज पर वहां व्यापक परीक्षण शुरू हुआ। अब वहां सबसे अधिक मामले हैं और मृत्यु दर में उसका छठां स्थान है। अब भी अमेरिका में परीक्षण मुख्य रूप से लक्षणों वाले लोगों तक सीमित है और  नये मामलों के संपर्कों का लक्षित परीक्षण नहीं किया जा रहा जो चीन में काफी प्रभावी सिद्ध हुआ। इससे यह निश्चित है की स्वस्थ दिखने वाले संक्रमित लोग स्पर्शोन्मुख वाहक बन अनजाने में वायरस फैलाएंगे और संक्रमण जारी रहेगा।

भारत में अब भी पलायन संबंधी समस्याएं जारी हैं जहां हजारों भूखे प्यासे लोग बार्डरों पर फंसे हैं। उनकी जांच के लिए उचित व्यवस्था की कमी भी है। सुरक्षा कर्मियों से लेकर मेडिकल स्टाफ तक के लिए उपकरणों का अभाव है। इससे इस स्पर्शोन्मुख बीमारी के विस्तार को संभावनाएं मिलती हैं।

सवाल उठता है कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया, जर्मनी या अन्य देशों की तरह इस महामारी का प्रभावी रूप से सामना करने में असमर्थ क्यों हैं? इसके लिए दरअसल हमारी राष्ट्रीय, सार्वजनिक वित्त पोषित स्वास्थ्य प्रणाली एक महत्वपूर्ण कारक है। इसमें शक्तिशाली वाणिज्यिक, वर्गीय हित और हमारी राजनीतिक प्रणाली का भ्रष्टाचार शामिल है जो हमें पश्चिमी देशों से तोहफे में मिला है। इसके अलावा हमारी सरकार के सैन्य मसौदों नें “रक्षा” और “सुरक्षा” के महत्व को; कि हमारे देश की अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों को ताक पर रखते हुए, फासीवाद और पूंजीवाद के हित को ध्यान में रखते हुए युद्ध तथा सैन्यवाद, जो संघीय प्राथमिकताओं में भी प्रमुख हैं, को; बजटीय प्रावधानों में पहला स्थान दिया।

लगभग 1947 से ही अपने रक्षा उत्पादन संयंत्रों के अभाव के कारण भारत हथियारों के लिए पूरी तरह पश्चिम पर निर्भर है। हमारे देश का आर्थिक कोष पश्चिमी सैन्य-औद्योगिक परिसर की सेवा करता रहा है और हमारा रक्षा आयात खर्च विश्व में पहले स्थान पर है। अस्पताल, वेंटिलेटर, चिकित्सा प्रशिक्षण, कोविड-19 परीक्षण या ऐसी कोई भी वस्तु जिसकी हमें इस विशिष्ट गैर-सैन्य संकटकाल में सख्त जरूरत है, देश से नदारद है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र की प्रमुख कम्पनियों की मिल्कियत संगठित रूप से धीरे-धीरे बड़े निगमों को हस्तांतरित हुई। भारतीयों के जीवन पर अनुमानित रूप से प्रबल प्रभाव के साथ: छोटे व्यवसाय के लिए अवसर कम होते गए और सार्वजनिक अवसंरचना और सेवाओं में निवेश घटने लगा। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण; स्थानीय समुदायों का विनाश; और राजनीति का व्यवस्थित भ्रष्टाचार अब हमारे सभी जीवन के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करता है और बड़े बैंकों, बड़े फार्मा, बड़े तकनीकी, बड़े डेवलपर्स, सैन्य-औद्योगिक परिसर भारत के सबसे अमीर 1% लोगों के हित में कार्य करते हैं।

लेकिन अब इस असाधारण शिथिल समाज में प्रकृति ने वास्तविक धमाका कर दिया है, एक छोटा वायरस जो लाखों लोगों को मार सकता है। अन्य देश अपनी स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक व्यवस्था के इस सटीक परीक्षण की ओर बढ़ चुके हैं पर हमने अभी भी रेत में सिर गाड़ रखा है।

आखिरकार कब हम अपनी सरकारों द्वारा दिखाये गये नकली सपने से जागेंगे, अपनी आंखें खोलेंगे और हमारे से अलग राजनीतिक, आर्थिक और स्वास्थ्य प्रणाली वाले अपने पड़ोसियों से सीखना शुरू करेंगे? यह बेहद जरूरी है कि हम ऐसा करें क्योंकि हमारा जीवन इसी पर निर्भर है।


प्रस्तुतिः सूर्यकांत सिंह

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