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‘मी लॉर्ड’ होते बहुजन तो क्या मज़दूरों के दर्द पर बेदर्द रह पाती सरकार?

अगर सावधानी से देखा जाए तो यह स्थिति सरकार और न्यायपालिका में गरीब और बहुजन तबके के रिप्रेजेंटेशन से जुड़ी हुई है। पिछले 70 सालों में सरकार ही नहीं बल्कि न्यायपालिका में भी ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की पर्याप्त संख्या नहीं पहुंच पाई है।  सरकारों मे बहुजनों के प्रतिनिधित्व का परिणाम यह है कि आज भी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र मे सरकार बदलने के षड्यन्त्र जारी हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों की पार्टियों मे यह नैतिकता नहीं है कि अभी गरीबों, मजदूरों और किसानों के हित मे मिल जुलकर राहत के काम किए जाएँ। ऐसी कोई सम्मिलित पहल विभिन्न पार्टियों की तरफ से नजर नहीं आ रही है। दूसरी तरफ न्यायपालिका एक विचित्र सा मौन धारण किए बैठी है। वहाँ भी मूल समस्या बहुजन जातियों के प्रतिनिधित्व की ही है। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भी ऊंची जाति के पुरुषों का दबदबा है। ना केवल बहुजन जातियों का बल्कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी ठीक ढंग से नहीं हो रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट ने 28 मई को प्रवासी मजदूरों के मामले पर सुनवाई करते हुए बहुत देर से कुछ दिशानिर्देशों की घोषणा की है। इस प्रकार के दिशा निर्देश 31 मार्च को ही अपेक्षित थे जबकि प्रवासी मजदूरों की समस्या पर पहली बार याचिका दायर की गई थी। 31 मार्च को सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दावा किया था कि एक भी प्रवासी मजदूर सड़क पर नहीं है। सरकार के दावों और इंतेज़ाम से असन्तुष्ट 20 वरिष्ठ वकीलों ने बीते सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र लिखा। इन वकीलों ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्वयं को पीछे रखकर सरकार के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्ति की है।’ इनमें कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, प्रशांत भूषण, आनंद ग्रोवर, इंदिरा जयसिंह जैसे वरिष्ठ और प्रसिद्ध वकील शामिल है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी कार्रवाई को “स्वतः संज्ञान” द्वारा जन्मी कार्रवाई ही बताया है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी किये कि प्रवासी मजदूरों से बस और ट्रेनों का किराया नहीं लिया जाएगा। साथ ही मजदूरों के प्रस्थान बिंदु, यात्रा और उनके गंतव्य स्थान-तीनों मे भोजन और पानी का इंतजाम करना होगा। कोर्ट ने सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि अगले शुक्रवार तक सुप्रीम कोर्ट को इन मजदूरों के बारे में किए गए उपायों की जानकारी दें।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह जो चर्चा हुई और जिस प्रकार के निर्देश दिए गए, उन्हें देखकर चिंता होती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सरकार ही नहीं बल्कि न्यायपालिका भी मजदूरों के प्रति बेहद असंवेदनशील नजर आ रही है। हम सब देख रहे हैं कि पिछले 2 महीने में मजदूर कितनी तकलीफ उठा रहे हैं। ऐसे मे ये गरीब प्रवासी मजदूर अंतिम रूप से सरकार या न्यायपालिका से उम्मीद नहीं करेंगे तो किस से करेंगे? तालाबंदी के इन दो महीनों मे सरकार ने कोरोना महामारी, आर्थिक बदहाली और मजदूरों की समस्या से निपटने का किसी तरह का कोई भी ठोस इंतज़ाम नहीं किया है। एक लोकतंत्र में नागरिकों के शरीर और जीवन की रक्षा का दायित्व सरकार का होता है। देशभर में प्रवासी मजदूर जिस तरह का कष्ट उठा रहे हैं उसको देख कर लगता है कि सरकार अपनी जिम्मेदारी के प्रति जागरूक नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट मे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक विशेष बात कही जो बहुत ही निराश करती है। फैसला लिखे जाने तक वे जोर दे रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश जारी ना करे। तुषार मेहता का कहना था कि इन दिशा निर्देशों से प्रेरित होकर मजदूर बड़ी संख्या में अपने घर की तरफ लौटना शुरू कर देंगे। इस बात का क्या अर्थ निकाला जाए? सरकार सॉलिसिटर जनरल के माध्यम से शायद यह कह रही है कि यह प्रवासी मजदूर बंधुआ हैं जिन्हें संकट की घड़ी में भी अपने घर जाने का अधिकार नहीं है। ठीक इसी तरह की गैर जिम्मेदारी और असंवेदनशीलता राजनेताओं द्वारा भी दिखाई जा रही है। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के मजदूरों को दूसरे राज्यों में जाने के लिए उन से परमीशन लेनी होगी। इस बात से भड़क कर मुंबई से राज ठाकरे ने कहा है कि अन्य राज्यों से आने वाले मजदूरों को हमसे परमिशन लेनी होगी। मजे की बात यह है कि न तो केंद्र सरकार, न उत्तर प्रदेश सरकार और न ही महाराष्ट्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए पर्याप्त कदम  उठाये हैं। सारे प्रवासी मजदूर जैसे तैसे अपने ही पैरों पर अपने घर की तरफ निकले। इस सबके बीच तुषार मेहता, योगी आदित्यनाथ और राज ठाकरे जैसे लोगों के बयानों से एसा लगता है कि यह मजदूरों को कठपुतली या बंधुआ मजदूर समझते हैं।

इस भयानक संकट के दौर में सरकार से और न्यायपालिका से जिस संवेदनशीलता की उम्मीद की जाती है उसका रंच मात्र भी नजर नहीं आ रहा है। इसके विपरीत न्यायपालिका ने सरकारों की जिम्मेदारी तय करने के प्रति जो उदासीनता दिखाई है, उसका भयानक प्रभाव हुआ है। सरकार किसी प्रकार के दबाव और दिशा निर्देश के अभाव में स्वच्छंद होकर अपनी पुरानी शैली में काम करने लगी है। 31 मार्च को प्रवासी मजदूरों के मुद्दे पर जो याचिका खारिज की गई, उसके बाद सरकार को मनमानी करने की खुली छूट मिल गई। अब आलम यह है कि सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर जो सामाजिक कार्यकर्ता सक्रिय थे उन्हें लॉकडाउन के बीच भी गैरकानूनी और अनैतिक रूप से गिरफ्तार किया जा रहा है। हाल ही में  ‘पिंजरा तोड़ ग्रुप’ की दो महिला कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा तुरंत उन्हें जमानत दिए जाने के बावजूद, थोड़ी ही देर बाद उन्हें संगीन आरोपों में फिर से गिरफ्तार करके फिर से कोर्ट के सामने पेश किया गया। अभी कुछ दिन पहले ही दो महीने पुराने दिल्ली हुए दंगों के मामलों में सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि पुलिस की जांच एकतरफा नजर आती है। दिल्ली हाई कोर्ट की  टिप्पणी से साफ नजर आता है कि दिल्ली पुलिस सरकार के इशारे पर मुसलमानों के खिलाफ विशेष रुप से कार्यवाही कर रही है।

ऐसे समय में जबकि भारत के बहुजन पर्याप्त उपायों के अभाव में सबसे ज्यादा पीड़ित है, सवाल उठता है कि सरकार और न्यायपालिका क्या इनकी जरूरतों के लिए जागरूक है? यह कोई नया प्रश्न नहीं है। भारत के इतिहास में अनेक तरह की प्राकृतिक आपदाओं, महामारियो के दौरान भी यही अनुभव किया गया है। ऐसी आपदाओं के समय सरकार की गैर जिम्मेदारियां और भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच जाता है। प्रसिद्ध पत्रकार पी. साईनाथ ने महाराष्ट्र में सूखे पर अपनी रिसर्च के माध्यम से बताया है कि आपदा के दौरान भ्रष्टाचार और अनियमितताये न केवल बढ़ जाती हैं बल्कि आपदाएं हमारे नौकरशाहों, सरकारों और सिविल सोसाइटी तक के लिए उत्सव बन जाती हैं। अभी कोरोना महामारी के बीच भी आयुर्वेदिक काढ़े, वेंटिलेटर, सैनिटाइजर, मास्क सहित अन्य जरूरी चीजों से जुड़े घोटाले उजागर हो रहे हैं। हमें कहीं भी यह नजर नहीं आ रहा है कि सरकार या न्यायपालिका भी, गरीबों के प्रति गंभीर या जागरूक है।

इस सब को देखते हुए प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। अगर सावधानी से देखा जाए तो यह स्थिति सरकार और न्यायपालिका में गरीब और बहुजन तबके के रिप्रेजेंटेशन से जुड़ी हुई है। पिछले 70 सालों में सरकार ही नहीं बल्कि न्यायपालिका में भी ओबीसी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की पर्याप्त संख्या नहीं पहुंच पाई है।  सरकारों मे बहुजनों के प्रतिनिधित्व का परिणाम यह है कि आज भी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र मे सरकार बदलने के षड्यन्त्र जारी हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों की पार्टियों मे यह नैतिकता नहीं है कि अभी गरीबों, मजदूरों और किसानों के हित मे मिल जुलकर राहत के काम किए जाएँ। ऐसी कोई सम्मिलित पहल विभिन्न पार्टियों की तरफ से नजर नहीं आ रही है। दूसरी तरफ न्यायपालिका एक विचित्र सा मौन धारण किए बैठी है। वहाँ भी मूल समस्या बहुजन जातियों के प्रतिनिधित्व की ही है। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में भी ऊंची जाति के पुरुषों का दबदबा है। ना केवल बहुजन जातियों का बल्कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी ठीक ढंग से नहीं हो रहा है।

अभी तक अनुसूचित जाति की तरफ से केवल एक मुख्य न्यायाधीश बन पाए हैं, और केवल 8 महिला न्यायाधीश बन पाई हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि भारतीय समाज में जो वर्ग सबसे ज्यादा वंचित और पिछड़ा है न्यायपालिका में उसकी आवाज सबसे ज्यादा कमजोर है। इसीलिए सवर्णों एवं ऊंची जातियों के व्यापारियों राजनेताओं के मुद्दों पर जिस तेजी से कारवाही और सुनवाई होती है उसका सौवाँ हिस्सा भी भारत के बहुजनों के पक्ष में नजर नहीं आता है। भारतीय समाज मे जिस तरह की बहु-जातीय, बहु-धार्मिक और बहु-भाषाई विविधता है उसका बहुत कम प्रतिनिधित्व भारत की न्यायपालिका मे नजर आता है। कॉलेजियम प्रणाली द्वारा जातीय/धार्मिक समीकरणों और पारिवारिक निकटताओं का ध्यान रखते हुए जिस प्रकार से न्यायाधीशों का चुनाव किया जाता है उसमे भी बहुजनों के प्रतिनिधित्व की कोई संभावना नहीं रह जाती। एक तरफ सवर्ण द्विज लोगों द्वारा नियंत्रित पार्टियों और सरकारों मे गरीब बहुजनों के प्रति संवेदनशीलता नजर नहीं आती है दूसरी तरफ न्यायपालिका भी अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पा रही है। इसके साथ ही मुख्यधारा का मीडिया देश और समाज के मुद्दों को जिस तरह नजरअंदाज करता है वह भी किसी से छुपा नहीं है। ऐसे मे लोकतंत्र के चारों आयाम बहुजन विरोधी नजर आते हैं और भारत के बहुजनों के लिए संकट की इस स्थिति मे स्थितियाँ पहले से ज्यादा गंभीर होती जा रही हैं।



संजय श्रमण जोठे स्वतन्त्र लेखक एवं शोधकर्ता हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं। इंग्लैंड की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन मे स्नातकोत्तर करने के बाद ये भारत के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से पीएचडी कर रहे हैं। बीते 15 वर्षों मे विभिन्न शासकीयगैर शासकीय संस्थाओंविश्वविद्यालयों एवं कंसल्टेंसी एजेंसियों के माध्यम से सामाजिक विकास के मुद्दों पर कार्य करते रहे हैं। इसी के साथ भारत मे ओबीसीअनुसूचित जाति और जनजातियों के धार्मिकसामाजिक और राजनीतिक अधिकार के मुद्दों पर रिसर्च आधारित लेखन मे सक्रिय हैं। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब वर्ष 2015 मे प्रकाशित हुई है और आजकल विभिन्न पत्र पत्रिकाओं मे नवयान बौद्ध धर्म सहित बहुजन समाज की मुक्ति से जुड़े अन्य मुद्दों पर निरंतर लिख रहे हैं। बहुजन दृष्टि उनके कॉलम का नाम है जो हर शनिवार मीडिया विजिल में प्रकाशित हो रहा है। यह इस स्तम्भ की सातवीं कड़ी है।

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