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कोरोना बाद : चौकस न रहे तो ‘व्यक्तिवाद’ के ताबूत की आख़िरी कील बनेगी महामारी

हम अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को त्यागने के लिए तैयार हैं, क्योंकि हम इस स्वतंत्रता को व्यावहारिक रूप से प्रयोग करने के खतरे को समझते हैं. व्यक्तिवाद के प्रतिनिधि विचार धरे रह गये हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे कार्यों से दूसरों पर कितना असर पड़ सकता है. 

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व्यक्तिवाद या हर व्यक्ति के भीतर आंतरिक मूल्य जोहने वाली धारणा ने सदियों से सामाजिक संगठनों, अर्थव्यवस्था और न्याय के बारे में अपने विचार रेखांकित किये हैं. हालांकि, हाल में व्यक्ति के मौलिक अधिकार व उसकी स्वतंत्रता काफ़ी मुश्किलों में आ गयी है.

पश्चिम में व्यक्तिवाद प्रबोधन (पुनर्जागरण) से उपजा है. यह व्यक्ति के नैतिक मूल्यों में विश्वास करता है और ऐसा मानता है कि व्यक्ति विशेष की रुचियों को राज्य या सामाजिक समूहों की तुलना में तरजीह मिलनी चाहिए. इस विचार ने पूंजीवाद के सामने खड़ी बाधाओं को मिटाया, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति बाज़ार का एक स्वतंत्र एजेंट बन गया.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही पश्चिमी शैली का व्यक्तिवाद अपने शिखर पर रहा है. यहां तक कि यूरोप के एक बड़े हिस्से के सोवियत संघ के अधीन होने के समय तथा चीन में बाज़ार के आगमन से पूर्व भी, अमेरिका ने असभ्य, गर्वोन्मत्त व्यक्तियों को केंद्र में खड़ाकर अपने आधिपत्य से व्यक्तिवाद के विचारों को गति प्रदान की थी.

उसी दौर में महात्मा गांधी और उनके परामर्शदाताओं की मान्यताओं पर आधारित व्यक्तिवाद का एक और रूप देखा गया. इनका व्यक्तिवाद अध्यात्म से जुड़ता था. गांधी ने पहले ही देख लिया था कि पश्चिमी शैली का व्यक्तिवाद केवल भौतिकवाद में तब्दील होकर सीमित हो सकता था.

गांधी ने व्यक्ति को सिर्फ़ उस रूप में नहीं देखा जो केवल अपनी निजी इच्छाओं को पूरा करना चाहता है, बल्कि उन्होंने उसे एक स्वायत्त नैतिक दूत के रूप में भी देखा. व्यक्ति के अनुल्लंघनीय मानवाधिकार सामाजिक प्रगतिशीलता से सीधे जुड़े हुए हैं. मनुष्य मान लिए जाने की बाट जोहते, सबसे नाज़ुक हालात का सामना करने वाले और जिनके नाम पर राज्य और समाज अपने धर्म का पालन करने का दावा करते हैं, आख़िरी पंक्ति में खड़े ऐसे व्यक्तियों पर ध्यान केन्द्रित होना चाहिए.

व्यक्तिवाद का पहला विचार तीन सदियों तक तीव्र नवोन्मेष (नयेपन या खोज) को जन्म देता रहा. व्यवसायियों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने विचारों, उत्पादों और सेवाओं का वैश्विक बाज़ार खड़ा कर दिया. यकीनन, इसके फलस्वरूप लोगों को इतनी समृद्धि भी हासिल हुई, जो पहले कभी नहीं हुई थी.

दूसरे विचार ने व्यक्तियों के विभिन्न कमज़ोर समूहों के कल्याण और सरंक्षण के लिए राज्य आधारित दखल व सामाजिक हस्तक्षेपों को प्रेरित किया है. यह एक बड़ा प्रयोग रहा है. हालांकि, इसका अहसास किसी को नहीं है कि व्यक्ति की गरिमा और जोखिम उठाने की क्षमता को संरक्षित करने के क्रम में हर व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा के जाल में उलझाकर छोड़ दिया है.

हालांकि, पिछले एक दशक या उससे अधिक समय से, व्यक्तिवाद और व्यक्ति की प्रधानता को गंभीर क्षति पहुंची है.

इसके तीन प्रमुख कारण हैं. पहला है आर्थिक पतन के साथ मिश्रित आतंकवाद. जब 9/11 की घटना हुई थी, तो इसके बाद चीज़ें रातोंरात बदल गयी थीं. इससे वैयक्तिकता को सबसे बड़ा झटका लगा था. व्यक्तिवाद व तरक्कीपसंदों का गढ़ माने जाने वाले अमेरिका में लोगों को सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित कराने के बदले में अपनी कई तरह की आज़ादी और निजता को त्यागना पड़ा था. इसके बाद 2008 की आर्थिक मंदी आयी. इसी दौरान दुनिया ने उत्तर-भूमंडलीकरण की तरफ़ कदम बढ़ाये और इसके साथ ही सत्तावादी सरकारों का उदय हुआ, जिसने राज्य सत्ता को संगठित कर लिया.

रूमानी देशभक्ति से ओत-प्रोत कई देशों में, जहां देश के लिए एक व्यक्ति के प्यार को उसकी ईमानदार आलोचना के रूप में भी देखा जाता था, वहां अब कट्टर राष्ट्रवाद ने घर कर लिया था. असहमतियों को हतोत्साहित किया जाने लगा, जिससे स्वतंत्र व्यक्ति राजनीतिक मंचों से दूर होने लगा.

दूसरा कारण है इंटरनेट के दिग्गजों का व्यापक सोशल प्लेटफॉर्म के साथ आगमन होना. पहले तो ये स्वतंत्र व्यक्ति की प्रधानता को ही प्रदर्शित करते दिखे. कभी भी, कहीं भी, कुछ भी उपभोग करने वाला उपभोक्ता राजा था. मज़दूरों को अब स्वनियोजित उद्यमी कहा जाने लगा था, और सारी दुनिया के बीच अपनी राय रखते सिटीजन अब नेटीजन बन गये थे.

दुर्भाग्य से, व्यक्तिगत पसंद बस भ्रम थी, जैसे एक झिलमिलाती मृगतृष्णा. यह उस समय की शुरुआत थी, जिसे अब सर्विलांस कैपिटलिज़्म के डरावने रूप में देखा जा रहा है, जहां कामगार से काम ज़्यादा कराया जाता है और उसे पैसे कम दिये जाते हैं; उपभोक्ता अब सिर्फ डेटा का एक पैक है, और उसकी इच्छा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने नाप रखी है. इन्हीं तकनीकों ने सर्विलांस स्टेट को मजबूती दी है, जिससे व्यक्ति के अधिकार व निजता तेज़ी से खतरे में आई है. यहां तक कि चुनावी लोकतंत्र में किसी व्यक्ति का सबसे अहम योगदान, यानी उसका मत भी प्रभावित किया जाने लगा है.

तीसरा कारण है, दुनिया की आत्मनिर्भरता में तेज़ी से दर्ज़ की जा रही गिरावट. जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण किसी भी सीमा के दायरे से बाहर हैं, एंटीबायोटिक्स प्रतिरोध भी नियंत्रण से बाहर हैं. अफ्रीका का कोई बैक्टीरिया अमेरिका के लोगों को बीमार कर सकता है. इंडोनेशिया में लगी जंगल की आग एशिया के लोगों की सांसें छीन सकती है.

अगर हम सतर्क नहीं हुए तो अब कोविड-19 महामारी व्यक्तिवाद के ताबूत में आख़िरी कील साबित हो सकती है. इसने तत्काल हमें अपने व्यक्तिगत विशेषाधिकारों का समर्पण करके राज्य या अपने अपार्टमेंट परिसर, गांव और शहर के आसन्न समूहों के फरमानों के आगे झुकने को मजबूर कर दिया है. हम अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को त्यागने के लिए तैयार हैं, क्योंकि हम इस स्वतंत्रता को व्यावहारिक रूप से प्रयोग करने के खतरे को समझते हैं. व्यक्तिवाद के प्रतिनिधि विचार धरे रह गये हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारे कार्यों से दूसरों पर कितना असर पड़ सकता है.

लेकिन हमें व्यक्तिवाद के सकारात्मक पहलुओं को खोने से बचाना चाहिए. हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्यक्तिगत पहचान ऐसे किसी समूह द्वारा नहीं बंधी हो, जो व्यवस्था या कानून के प्रति ग़ैर-ज़िम्मेदार है. सरकारी आदेश का पालन करना एक बात है. लेकिन, किसी तर्कहीन डर के आगे घुटने टेक देना अलग बात है. हम पहले ही अनियंत्रित सतर्कता का उभार देख रहे हैं, बल्कि भीड़ की सत्ता कायम होते देख रहे हैं. भयभीत गांववाले बाहरियों के प्रवेश पर पाबंदी लगाते हैं, डॉक्टरों को उनके घरों में लौटने से रोका जाता है, पुलिस अंधाधुंध लाठी चलाती है.

महामारी के बीच ऐसी प्रतिक्रियाएं आगामी भविष्य में सकारात्मक व्यक्तिवाद का अंत कर सकती हैं. समाज को व्यक्तिगत एजेंसी और सामूहिक हित के बीच संतुलन सही करने के लिए तत्काल और रचनात्मक ढंग से प्रयास करना चाहिए. एकांत में रहना मजबूरी है, लेकिन किसी भी व्यक्ति के आंतरिक मूल्यों को कम नहीं होने देना चाहिए. यही किसी भी अच्छे समाज की नींव है.


रोहिनी नीलकेनी

(ये लेख कुछ दिन पहले टाइ्म्स ऑफ इंडिया में छपा। साभार प्रकाशित। अनुवाद देवेश का है।)