Home ओप-एड शकुंतला देवी: गणना और गणितज्ञ !

शकुंतला देवी: गणना और गणितज्ञ !

गणित की व्यापक परिभाषा पैटर्न पकड़ने और उनमें नियमों की तलाश करने के रूप में की जाती है है। ये पैटर्न संख्याओं के भी हो सकते हैं और बाढ़ में पुल से गुजरने वाले पानी के भी। शकुंतला देवी अपनी गणनाओं में जो पैटर्न इस्तेमाल करती थीं, उनमें से कुछ उन्होंने बाद में शेयर किए, लेकिन गणितज्ञों की तो क्या कहें, आम आदमी के लिए भी ये किसी काम के नहीं निकले। इसके विपरीत रामानुजन का जोर पैटर्न्स में पैठे नियमों की तलाश पर था और आज भी चोटी के गणितज्ञ उनके किसी प्रमेय का प्रमाण खोजकर गौरवान्वित महसूस करते हैं। दुनियादारी की नजर से देखें तो पैसे-रुपये से बेखबर रामानुजन मात्र साढ़े 32 साल की उम्र में टीबी से मरे, जबकि हर किसी पर शक करने वाली शकुंतला देवी ने अरबपति ज्योतिषी के रूप में साढ़े 83 की उम्र में प्राण छोड़े। बड़ी प्रतिभाओं का उपयोग पैसे से ज्यादा बड़ी चीजें पैदा करने में होना चाहिए, यह सोच भी हर जगह कहां मिलती है!

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कभी कंप्यूटर से भी तेज गणनाओं के लिए मशहूर शकुंतला देवी पर फिल्म बनाना जीवट का काम रहा होगा। इस मामले में अच्छी बात यह रही कि स्क्रिप्ट का आधार उनकी बेटी की किताब को बनाया गया, जिससे एक काम में असाधारण मानी गई एक स्त्री के जीवन की जटिलता पर सबका ध्यान जा सका। यह सुविधा भारत की शीर्ष गणितीय प्रतिभा श्रीनिवास रामानुजन को नहीं हासिल थी, लिहाजा उनपर बनी बाहरी फिल्म शकुंतला देवी की तरह उनके जीवन की बारीकियों में नहीं जा सकी। अलबत्ता इसका अच्छा पहलू यह रहा कि रामानुजन वाली फिल्म से हम कुछ दिलचस्पी उनके काम में भी ले सके, जबकि पर्दे पर शकुंतला देवी का गुणा-भाग देखना दूसरी बार से ही बोर करने लगा और पूरी फिल्म में ऐसे सीन बहुत बार रिपीट हुए। किसी के दिमाग में यह बात जरूर आई होगी कि 12 अंकों वाली दो संख्याओं का गुणा इतनी बार देखने में किसी को कितना मजा आता रहा होगा!

फिल्म की एक बड़ी गलती शकुंतला देवी को शुरू से आखिर तक मैथमेटिशियन (गणितज्ञ) बताना है। हो सकता है, उस समय कुछ अखबार उन्हें गणितज्ञ लिखते भी रहे हों। लेकिन तेज गणनाओं का तमाशा देखना मध्यकालीन यूरोप में और फिर अमेरिका में भी शहरी मध्यवर्ग के लिए मनोरंजन का एक जरिया था और यह तमाशा दिखाने वालों को मैथमेटिशियन नहीं ‘प्रॉडिगल कैलकुलेटर’ (चमत्कारिक संगणक) ही कहा जाता था। जब-तब गणितज्ञों की दिलचस्पी भी उनमें होती थी, लेकिन उनका चमत्कार देखने के बजाय उनके काम का तरीका समझने में। हां, अगर इनमें से किसी में भी कुछ गणितीय प्रतिभा उन्हें दिख जाती थी तो उसे विकसित करने का पूरा प्रयास वे करते थे। गणनात्मक और गणितीय प्रतिभा में फर्क करना एक पेचीदा बात है, लेकिन दोनों की ठोस इंसानी शक्लें देखनी हों तो अपने यहां उन्हें हम शकुंतला देवी और श्रीनिवास रामानुजन की तस्वीरों में देख सकते हैं।

शकुन्तला देवी की प्रतिभा जन्मजात ही कही जाएगी, हालांकि उनको पेशेवर बनाने में मुख्य भूमिका उनके पिता की थी जो सर्कस में शेरों के साथ करतब दिखाते थे। बिना कागज कलम के जोड़ बाकी गुणा भाग और इन पर आधारित मूल निकालने और चक्रवृद्धि ब्याज बताने जैसी बुनियादी अंकगणित से जुड़ी गणनाएं वे असाधारण तेजी से कर लिया करती थीं। गणित में इन चीजों का दखल आठवीं क्लास के बाद ही खतम हो जाता है या नहीं के बराबर रह जाता है। हां, आगे चलकर नंबर थिअरी गणित का एक अलग क्षेत्र जरूर बनता है और उसे गणित की रानी भी कहा जाता है, लेकिन उसमें दखल के लिए आपको नियमों की खोज पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है, जो शकुन्तला देवी की विशिष्टता नहीं

गणित की व्यापक परिभाषा पैटर्न पकड़ने और उनमें नियमों की तलाश करने के रूप में की जाती है है। ये पैटर्न संख्याओं के भी हो सकते हैं और बाढ़ में पुल से गुजरने वाले पानी के भी। शकुंतला देवी अपनी गणनाओं में जो पैटर्न इस्तेमाल करती थीं, उनमें से कुछ उन्होंने बाद में शेयर किए, लेकिन गणितज्ञों की तो क्या कहें, आम आदमी के लिए भी ये किसी काम के नहीं निकले। इसके विपरीत रामानुजन का जोर पैटर्न्स में पैठे नियमों की तलाश पर था और आज भी चोटी के गणितज्ञ उनके किसी प्रमेय का प्रमाण खोजकर गौरवान्वित महसूस करते हैं। दुनियादारी की नजर से देखें तो पैसे-रुपये से बेखबर रामानुजन मात्र साढ़े 32 साल की उम्र में टीबी से मरे, जबकि हर किसी पर शक करने वाली शकुंतला देवी ने अरबपति ज्योतिषी के रूप में साढ़े 83 की उम्र में प्राण छोड़े। बड़ी प्रतिभाओं का उपयोग पैसे से ज्यादा बड़ी चीजें पैदा करने में होना चाहिए, यह सोच भी हर जगह कहां मिलती है!



चंद्रभूषण वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके फेसबुक पेज से साभार।



 

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