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कोरोना काल- ‘फूल बने अंगारे’ : एपीसोड का प्लॉट अच्छा, पर स्क्रीनप्ले में समस्या है!

इस लेख का शीर्षक पढ़ते हुए कहीं आपको रेखा-रजनीकांत की इसी नाम से बनी पुरानी फिल्म तो नहीं याद आ गयी? इस फिल्म में एक भ्रष्ट और शातिर नेता के खिलाफ लड़ते हुए लोगों की कहानी का ज़िक्र है. इस खबर में जो लिखा है वो तो काल्पनिक नहीं है, परन्तु इस फिल्म के शीर्षक का इस्तेमाल महज एक संयोग माना जाए. पढ़िए सौम्या गुप्ता का व्यंग्यात्मक विश्लेषण।

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प्लॉट

ताली-थाली बजाओ, दिया जलाओ के सरकारी धारावाहिक के तीसरे एपिसोड की स्क्रिप्ट में इस बार सैन्य बलों ने जोर शोर से हिस्सा लिया है. इस धारावाहिक की पृष्ठभूमि, कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ते हुए देश के फ्रंटलाइन वर्कर्स के प्रोत्साहन और सम्मान पर आधारित है. इस बार भारतीय वायु सेना, थल सेना और जल सेना का दायित्व था, इन फ्रंटलाइन वर्कर्स की हौसलाअफज़ाई करना. तभी रविवार सुबह से शाम तक, देश के कोने कोने से भारतीय वायु सेना के अस्पताल परिसरों में पुष्प वर्षा और उनके लड़ाकू विमानों के हवा में प्रदर्शनों की खबरें आती रही. नौ सेना ने भी अपना किरदार बखूबी निभाया और अपने जहाज़ों को “Thank You” वाली रोशनी से जगमगा दिया. थल सेना के बैंड ने भी देश के महतवपूर्ण अस्पतालों में कार्यक्रम का आयोजन किया. जब थल, जल और वायु में धूम मचा ही दी गई है, तो ज़मीन के सवालों का ज़िक्र होना भी ज़रूरी हो जाता है. 

अच्छी स्क्रिप्ट, लेकिन लूपहोल्स रह गए

ये स्क्रिप्ट तो अच्छी थी, लेकिन इसमें कई लूपहोल्स रह गए और फिर उनको स्वीकारने की जगह हमारे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने कह दिया – ‘कमी निकालने वाले पढ़े-लिखे बुद्धिहीन हैं’ तो अब ज़रा इन बुद्धिहीनों की बात भी सुन लीजिए जनाब।

हालांकि अच्छी कहानी के बावजूद, लेखक ने स्क्रीनप्ले में इस बात का ध्यान नहीं रखा कि जिन चिकित्साकर्मियों को हीरो बनाया जा रहा है, जिनके प्रति आभार प्रकट किया जा रहा है – वो निसंदेह हीरो हैं। लेकिन उनका आभार प्रकट करते समय, स्क्रिप्ट में वो ये लिखना भूल गया कि उनके पास पीपीई किट्स और पर्याप्त आधारभूत सुविधाएं भी होनी चाहिए। लेकिन हम फिलहाल इस बात को छोड़ देते हैं, क्योंकि दर्शक के लिए ये बात कई बार दोहराई जा चुकी है और कितनी ही ज़रूरी बात हो, भारतीय दर्शक को बोर नहीं होना है। वो चुनाव में भी मनोरंजन के आधार पर ही वोट देता है।

तो गृह मंत्रालय के हालिया निर्देशों के हिसाब से किसी सार्वजनिक स्थल पर पांच से ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते, सिर्फ विवाह हेतु आयोजनों में 50 लोग इकट्ठे हो सकते हैं और अंतिम संस्कार सम्बंधित कार्यक्रमों में 20 लोग इकट्ठे हो सकते हैं, परन्तु उन्हें भी “Social Distancing” के नियमों का सावधानी से पालन करना होगा. कार्यस्थलों में भी लोगों के इकट्ठे होने पर शिफ्ट्स के बीच में न्यूनतम दूरी रखी जाएगी और भोजन का समय भी एक साथ नहीं रखा जाएगा. निर्देशों के मुताबिक़ चेहरे पर मास्क्स पहनना एकदम अनिवार्य है. परन्तु रविवार को जब वायु और जल सेना के विमानों ने आसमान की ऊँचाइयों को छुआ, तो ये नियम फूलों की बारिश में धुल गए. ये तस्वीरें इन नियमों के पालन का कुछ अलग ही किस्सा बयान करती है.

क्या AIIMS, दिल्ली की इस तस्वीर में सबने वो अनिवार्य मास्क्स पहन रखें हैं जिनका गृह मंत्रालय के निर्देशों में ज़िक्र है?

AIIMS, New Delhi

क्या AIIMS पटना की इन तस्वीरों में 50 से कम लोग इकट्ठे हुए हैं?

AIIMS, Patna

क्या KGMU,लखनऊ की इस तस्वीर में “social distancing” के नियमों का पूर्ण ढंग से पालन हो रहा हैं?

KGMU, Lucknow

क्या बेंगलुरु की इस तस्वीर में कार्यस्थलों की शिफ्ट्स में न्यूनतम दूरी रखी जा रही है?

बेंगलुरु में चिकित्साकर्मी

एक होता है, ध्वनि प्रदूषण

ये तो रही बात फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग की, लेकिन कुछ और भी है – जो आपको चूंकि दिलचस्प नहीं लगता, इसलिए शायद आप नहीं जानते हैं। वो है ध्वनि प्रदूषण के क़ानून – जो ये तय करते हैं कि कौन से इलाके हैं, जो साइलेंट ज़ोन में आते हैं। साल 2000 के इस क़ानून के मुताबिक – अस्पताल एक साइलेंस ज़ोन है। तो क़ानूनन, अस्पताल के चारों 100 मीटर के इलाके में किसी भी तरह का शोर करना अपराध है। इस एक्ट के 6(ii) और 6(iii) के मुताबिक,

साइलेंस ज़ोन में प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर, इस एक्ट के मुताबित जुर्माना चुकाना होगा, ये गतिविधियां हैं –

साइलेंस ज़ोन में ड्रम या ढोल बजाने, प्रेशर या म्यूज़िकल कैसा भी हॉर्न या फिर किसी भी तरह के ट्रम्पेट बजाने की गतिविधि 

किसी भी तरह की संगीतमय, नाटकीय या अन्य प्रस्तुति – भीड़ जुटाती हो

अब ज़रा बताइए कि क्या अस्पतालों के परिसर में या आसपास पुलिस की मोटरसाइकिलों के सैकड़ों साझा हॉर्न्स के साथ दिया गया डॉक्टर्स को सम्मान हो या फिर अस्पताल परिसरों में मिलिटरी बैंड का प्रदर्शन – ये इस क़ानून का पूरे देश में, सरकार या पुलिस या सेना द्वारा ख़ुद उल्लंघन नहीं होगा? क्या चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, पढ़े-लिखो बुद्धिहीनों को इसका जवाब नहीं देना चाहेंगे? 

ये चलते गाने के बीच सड़क पर मज़दूर कहां से आ गए?

3 दिन से फिर प्रवासी मजदूरों का मुद्दा चर्चा में है. ‘पढ़े-लिखे’ बुद्धिहीन ये सवाल इसलिए भी पूछ रहे हैं कि जो सरकार पुष्प वर्षा के खर्चे इतने डंके की चोट पर करती है, तो उसकी ऐसी क्या मजबूरी है कि उसे मजदूरों से श्रमिक ट्रेन का किराया लेना पड़ता है? हाँ, इस किराए के मुद्दे पर जम कर राजनीति हो रही है, जो सरकार कल आसमान से फूल बरसा रही थी-आज उसके आईटी सेल के कार्यकर्ता और पार्टी सदस्य ट्विट्टर पर अंगारों की बारिश कर रहे हैं. कहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रवासी मजदूरों की मदद के बयान पर उलटे सीधे निजी तंज कसे जा रहे हैं, तो कहीं उल्टा विपक्ष से सवाल करते हुए ट्रेंड चलाये जा रहे हैं. ऐसी क्या मजबूरी है हमारी केंद्र सरकार की जो PMcares में CSR के फंड्स लेने के बावजूद उसे राज्य सरकारों पर श्रमिक ट्रेन के भत्ते का भार डालना पड़ रहा है?

सूरत में स्क्रीनप्ले का अनचाहा हिस्सा

सूरत में प्रवासी श्रमिकों का आक्रोश

केंद्र सरकार ये दावा करते नहीं थक रही कि सिर्फ गैर भाजपा शासित राज्यों में मजदूरों से किराया लिया जा रहा है. इतने में दो बड़ी खबरें गुजरात से आती हैं. पहली, जहां गुजरात में मजदूरों का कहना है की ना केंद्र ने ना राज्य सरकार ने उनकी किराए चुकाने में मदद करी है. ऊपर से, सूरत में भारी संख्या में मजदूर सड़क पर उतर आते हैं, घर जाने की गुहार लगाते हुए. ये सूरत में ऐसी तीसरी घटना है.इस विषय पर विस्तार से जानने के लिए आप हमारी दूसरी प्रकाशित खबर भी पढ़ सकते हैं. (क्या सूरत आक्रोश के टाइम बम पर बैठा हुआ है) . गुजरात की ये तस्वीर भाजपा शासित राज्य की कुछ और ही दास्ताँ सुना रही हैं. क्या सोमवार को जो फूल बरसाए थे, वो इन मजदूरों के लिए इन जलते हुए अंगारों का इंधन तो नहीं बन गए?

निर्माता-निर्देशक का दुख

सरकारें ऐलान कर रही हैं , टीवी की डिबेट्स से, अखबारों के माध्यम से, राष्ट्र के नाम संदेशों में की कैसे वो मजदूरों का पूरा पूरा ध्यान रख रही हैं. उनके दुःख, उनकी परेशानियों का हर जगह महिमामंडन किया जा रहा है कि कैसे ये उनका संघर्ष है, बलिदान है. ये सब देख कर गोरख पाण्डेय जिस भी दुनिया में होंगे, अपनी कविता का पाठ कर रहे होंगे, जिसमें वो लिखते हैं  

“जो गरीब हैं उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं मुसीबतें, अमन चैन हरदम है
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा
हम महज अमीरों के तो गम ही गम है”

असली कहानी ज़्यादा फिल्मी होती है 

इस लेख का शीर्षक पढ़ते हुए कहीं आपको रेखा-रजनीकांत की इसी नाम से बनी पुरानी फिल्म तो नहीं याद आ गयी? इस फिल्म में एक भ्रष्ट और शातिर नेता के खिलाफ लड़ते हुए लोगों की कहानी का ज़िक्र है. इस खबर में जो लिखा है वो तो काल्पनिक नहीं है, परन्तु इस फिल्म के शीर्षक का इस्तेमाल महज एक संयोग माना जाए. इस खबर का किसी फिल्म से नहीं, वास्तविक जीवन से सम्बन्ध हैं. गृह मंत्रालय के नियमों का उल्लंघन, मजदूरों पर भत्ते की मार और मजदूरों का सडकों पर उतर आने से, कुछ ऐसे कि कि मानो आकाश के उन फूलों को व्यंग्य और उपहास के शवों पर भेंट चढ़ाया गया था.. 

लेखिका सौम्या गुप्ता, डेटा विश्लेषण एक्सपर्ट हैं। उन्होंने भारत से इंजीनीयरिंग करने के बाद शिकागो यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी उच्च शिक्षा हासिल की है। यूएसए और यूके में डेटा एनालिस्ट के तौर पर काम करने के बाद, अब भारत में , इसके सामाजिक अनुप्रयोग पर काम कर रही हैं।

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