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अख़बारनामा: कोरोना पर राजनीति पूरी, ख़बरें अधूरी!

इसमें कोई दो राय नहीं है कि लॉकडाउन से फायदा हुआ होगा. पर मुद्दा यह है कि भारत में सब पता होने के बावजूद लॉक डाउन देर से किया गया. विदेश से आने वालों की जांच ठीक से नहीं की गई और कायदे से क्वारंटाइन नहीं किया गया. अगर यह सब काम समय से और कायदे से किया गया होता तो 700 से ऊपर मौतें नहीं हुई होतीं.

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राजनीति जारी है. बिहार ने अपने प्रवासी मजदूरों और कोटा में फंसे छात्रों को किसी भी तरह की राहत देने से अब तक साफ मना किया है. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बस भेजकर अपने छात्रों को बुला लिए जाने के बाद दूसरे राज्यों से भी ऐसी ही मांग की गई. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ दूसरे राज्य भी इसकी तैयारी कर रहे हैं. ऐसी खबरें बिहार सरकार और राज्य में सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक रूप से परेशान कर सकती है. ऐसी एक खबर दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर प्रमुखता से थी.

पश्चिम बंगाल में केंद्र से टकराव और राज्यपाल की राजनीति जारी है पर मैं जो अखबार देखता हूं उनमें वह कोलकाता से छपने वाले द टेलीग्राफ का ही मुद्दा है. वैसे, दैनिक जागरण में पहले पन्ने पर खबर थी, धनखड़ ने ममता से कहा, राज्य को आपके भरोसे नहीं छोड़ सकते. इससे पहले ममता ने उनसे कहा था कि मैं निर्वाचित प्रतिनिधि हूं आप मनोनीत.

कोरोना संक्रमण के इस दौर में सबसे राहत वाली खबर है, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने वैक्सीन का मानव परीक्षण शुरू किया (नवोदय टाइम्स). पर यह खबर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर राहत देने वाले अंदाज में नहीं दिखी. इसी तरह प्लाज्मा थेरापी से जगी उम्मीद, राजस्थान पत्रिका में पहले पन्ने पर है. लेकिन दैनिक भास्कर ने पहले ही पन्ने पर छापा है, केजरीवाल ने कहा- ठीक हुए मरीज प्लाज्मा दें; एम्स डायरेक्टर बोले- प्लाज्मा जादू की गोली नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार की जो तैयारियां हैं वो तो डरा ही रही हैं.

दवा के बारे में अखबार भी कायदे से नहीं बता रहे है. बढ़ते ग्राफ के साथ शीर्षक है, वायरस नियंत्रण में (हिन्दुस्तान टाइम्स). दैनिक जागरण अपनी लाइन पर कायम है- मई से कम होने लगेगा कोरोना का कहर. द हिन्दू ने एक दिन में सबसे ज्यादा 1752 संक्रमित मिलने के रिकार्ड के साथ यह भी बताया है कि मरने वाले 723 हो गए.

शुक्रवार, 24 अप्रैल के अखबारों की खासियत रही लॉकडाउन से कोरोना के नए मामले कम बढ़ने का दावा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि लॉकडाउन से फायदा हुआ होगा. पर मुद्दा यह है कि भारत में सब पता होने के बावजूद लॉक डाउन देर से किया गया. विदेश से आने वालों की जांच ठीक से नहीं की गई और कायदे से क्वारंटाइन नहीं किया गया. अगर यह सब काम समय से और कायदे से किया गया होता तो 700 से ऊपर मौतें नहीं हुई होतीं. जो हजारों लोग इधर-उधर फंसे हुए हैं वो शायद इच्छित जगह पर पहुंच जाते और जो सैकड़ों लोग पैदल, साइकिल से ठेले से और नाव से गांव जाने को मजबूर हुए वो आराम से गए होते या उन्हें जाना नहीं पड़ता. बहुत संभव है कि लॉक डाउन की जरूरत ही नहीं पढ़ती या उसे बिना बढ़ाए काम चल जाता. पर सरकार दावा कर रही है कि लॉकडाउन से फायदा हुआ है और अखबार उसे छाप रहे हैं.

सरकारी बयान छापने वाले अखबार यह बताना भूल गए कि सबके बावजूद पहले 10,000 मामले 72 दिन में हुए और दूसरे 10,000 मामले आठ ही दिन में हो गए. सरकारी दावे को लीड बनाने वाले अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स प्रमुख हैं. हिन्दी अखबारों में यह खबर हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स और अमर उजाला में पहले पन्ने पर है. दैनिक जागरण में बाकायदा लीड है- लॉक डाउन का असर: काबू में कोरोना. यह शीर्षक तब थी जब मरने वालों की संख्या 600 पार कर चुकी थी. उमर उजाला में जो लीड है वह दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है. अखबार ने सात कॉलम में छापा है, भाजपा नेता के कोरोना संक्रमित पिता की मौत, हड़कंप.

गुरुवार, 23 अप्रैल की सबसे बड़ी खबर थी, आठ दिन में संक्रमितों की संख्या 10 हजार से 20 हजार हो गई. इसके साथ दूसरी महत्वपूर्ण सूचना थी कि देश में संक्रमितों की संख्या 10,000 होने में 72 दिन लगे. इसका मतलब हुआ कि 72 दिन से स्थिति आठ दिन पर आ गई है. यह चिन्ताजनक है. अगर लॉक डाउन के बावजूद बीमारी इतनी तेजी से बढ़ रही है तो हम किस बात पर राहत महसूस कर रहे हैं? कुछ ही दिन पहले दैनिक जागरण का शीर्षक था संक्रमितों की संख्या “6.2 दिन से बढ़कर 7.5 दिन में दूनी हो रही है”. ऐसे में जब 72 दिन की संख्या आठ दिन में दूनी हो गई तो निश्चित रूप से बड़ी खबर थी. यह खबर आधे अधूरे शीर्षक के साथ हिन्दी में राजस्थान पत्रिका और नवोदय टाइम्स में तथा अंग्रेजी में द हिन्दू में थी.

दैनिक भास्कर में यह खबर जरूर पहले पन्ने पर थी कि “बिल गेट्स ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखी और कहा आपका नेतृत्व सराहनीय”. मुझे नहीं पता बिल गेट्स ने किस आधार पर यह कहा है पर आठ दिन में दूनी होने की बात अखबारों ने प्रमुखता से नहीं छापी यह तो आप देख सकते हैं. और अगर ऐसा है तो गेट्स किस बात की तारीफ कर रहे हैं वो जानें. अपना आप खुद देखिए. अखबारों के भरोसे मत रहिए. यह खबर पहले पन्ने की सबसे बड़ी खबर होनी थी अंदर कहीं हो तो संतुष्ट मत रहिए.

बुधवार, 22 अप्रैल को पश्चिम बंगाल सरकार को बताए बगैर केंद्र सरकार की अंतरमंत्रालयी टीम भेजने से पैदा हुआ विवाद हिन्दी के कई अखबारों में पहले पन्ने पर था. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एतराज की खबर से अलग आज की खबर का शीर्षक पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ है. नवोदय टाइम्स, नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान ने इसे उतनी प्रमुखता नहीं दी है जितनी दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका (लीड), अमर उजाला (बॉटम) और दैनिक जागरण (चार कॉलम) ने दी है. दैनिक भास्कर में इस पर चार खबरें हैं. मुख्य खबर का शीर्षक है, ममता सरकार ने केंद्रीय टीमों को होटल में रोका, विवाद बढ़ने पर शाम को फील्ड में जाने दिया.

राजस्थान पत्रिका की मुख्य खबर का शीर्षक है, दिन भर टकराव, काफी खींचतान के बाद केंद्रीय टीम ले पाई जायजा. केंद्र सख्त काम में बाधक न बने बंगाल सरकार. दैनिक जागरण का शीर्षक है, अब कोरोना को लेकर केंद्र और बंगाल सरकार में ठनी. अंग्रेजी अखबारों में रैपिड टेस्ट किट का उपयोग दो दिन रोकने की खबर मुख्य है. हालांकि टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस में यह लीड नहीं है. हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य खबर है, 8 दिन में कोरोना पॉजिटिल मामले दूने होकर 20,000.

मंगलवार, 21 अप्रैल को टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड थी, चीन ने कहा एफडीआई पर प्रतिबंध ‘मनमाना’, पर आपूर्ति जारी रखी. उल्लेखनीय है कि राहुल गांधी की सलाह पर केंद्र सरकार ने यह निर्णय लिया था और इतवार को भी यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड थी. तब अखबार ने इसे अभी तक चीन के खिलाफ प्रतिबंध बताते हुए चौंकाने वाला कदम बताया था. आज की खबर सरकार के इसी निर्णय पर प्रतिक्रिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की लीड थी, केंद्र ने कार्रवाई की, जिलों की निगरानी के लिए टीम भेजे जिसे आदेश जारी करने का अधिकार है. फ्लैग शीर्षक में बताया गया था कि यह टीम जिन राज्यों में जाएगी वे विपक्ष शासित बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान के अलावा सिर्फ भाजपा के मुख्यमंत्री वाला मध्यप्रदेश भी है. उपशीर्षक के मुताबिक, सरकार का दावा है कि नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है और ऐसे 11 जिलों में सात बंगाल के हैं.

द टेलीग्राफ की लीड इसी से संबंधित है. इसका शीर्षक है, कोविड-19 का लाभ उठा रहा है केंद्र. इसके अनुसार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपनी नाखुशी जताई है और लॉकडाउन के संभावित उल्लंघनों का आकलन करने के लिए पूर्व सूचना के बगैर दो अंतर मंत्रालयिक टीम भेजने को प्रोटोकोल का उल्लंघन कहा है.

हिन्दी अखबारों में भी कोरोना को लेकर राजनीति दिखी. दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका की लीड एक जैसी थी, जयपुर, इंदौर, मुंबई में हालात खराब, केंद्र ने छह टीमें भेजीं. अमर उजाला ने उपशीर्षक में लिखा है, महामारी से जंग में शुरू हुई राजनीति. लॉक डाउन में लापरवाही पर केंद्र सख्त हुआ तो राज्यों से टकराव की नौबत, केंद्रीय टीम पर ममता नाराज. मुख्य शीर्षक है, केरल में मनमानी छूट दी, सख्ती हुई तो बैकफुट पर ममता खफा. नवदोय टाइम्स में भी यही बात कही गई है पर सरल अंदाज में – कहीं ढील, कहीं नहीं.

सोमवार, 20 अप्रैल की बहुप्रतीक्षित खबर थी, लॉक डाउन के साथ लगाए गए प्रतिबंधों में कितनी छूट मिलेगी. प्रधानमंत्री की घोषणा के साथ ही इस पर अटकलें शुरू हो गई थीं और यह भी वैसे ही था जैसे लॉक डाउन बढ़ेगा कि नहीं. हालांकि, इस बार स्थिति थोड़ी अलग थी. किसी कैबिनेट सचिव ने नहीं कहा था कि हम इसपर विचार नहीं कर रहे हैं. इसलिए खबर यह नहीं थी कि छूट नहीं मिली. खबर यह होनी थी कि छूट क्यों नहीं मिली. पर ज्यादातर अखबारों ने उससे पल्ला झाड़ लिया. अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू का शीर्षक था, ई-कामर्स फर्में गैर आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई नहीं कर सकती हैं.

इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक था, आज कुछ प्रतिबंध हटाए जाएंगे. प्रवासी मजदूर काम के लिए राज्य में एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं. ई कामर्स फर्म गैर आवश्यक सामानों की डिलीवरी से रोके गए अलग खबर थी. हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक था, प्रतिबंधों में आज छूट नहीं दी जाएगी. द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक वह है जो होना चाहिए, केंद्र की उलटने-पलटने वाली गाड़ी ने ई-टेलर्स को टक्कर मारी.

हिन्दी अखबारों में दैनिक भास्कर ने पूरे कोरोना मामले को लीड बनाया था. मुख्य शीर्षक था- 1. बिना लक्षण वाले मरीज बड़ा खतरा.  2. केंद्र का नया निर्देश: ई कामर्स कंपनियां सिर्फ जरूरी चीजों की डिलीवरी करेंगी और 3. फ्लैग शीर्षक: आज से लॉक डाउन में ढील, लेकिन दिल्ली, पंजाब और तेलंगाना में नहीं. इसके अलावा कई उपशीर्षक थे. नवोदय टाइम्स ने दिल्ली में राहत नहीं को- लीड बनाया था पर सेकेंड लीड थी, कुछ जगहों पर आज से लॉक डाउन में थोड़ी राहत.

राजस्थान पत्रिका ने थैंक गॉड भी कह दिया. फ्लैग शीर्षक था, सख्त लॉक डाउन खत्म. इसके साथ मुख्य शीर्षक था, फैक्ट्री चलेंगी, कामगारों को छूट, जरूरी सामान की दुकानें खुलेंगी. दैनिक जागरण की लीड है, आज खुलेगी राहत की राह. इसके साथ एक अलग खबर है, जहां फंसे मजदूर वहीं मिलेगा काम. अमर उजाला ने सात कॉलम में दो लाइन का शीर्षक लगाया था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था व उद्योगों को आज से शर्तों के साथ राहत, हॉट स्पॉट में कोई रियायत नहीं.


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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