Home ओप-एड नेहरू जैसा त्याग भारत में किसी ने नहीं किया-पटेल

नेहरू जैसा त्याग भारत में किसी ने नहीं किया-पटेल

मप्र का शासन जिस भवन से चलता है उसका नाम वल्लभ भवन है, अभी नहीं शुरु से है..गुजरात विधानसभा का नाम सरदार पटेल विधानसभा भवन है..देश के बड़े पुलिस अफ़सर जहां प्रशिक्षण लेते हैं, हैदराबाद स्थित उस अकादमी का नाम सरदार पटेल के नाम पर है..सूरत के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी का नाम सरदार पटेल के नाम पर है, गुजरात में सरदार पटेल के नाम पर विश्वविद्यालय हैं,आनंद में वल्लभ विद्यानगर है,मुबंई में नेशनल टेक्नीकल इंस्टीट्यूट है, जोधपुर में पुलिस एवं सिक्युरिटी यूनिवर्सिटी है, गुजरात में उनका मेमोरियल है, म्यूजियम है..देशभर में स्कूल और कॉलेज के नाम सरदार पटेल के नाम पर हैं, सड़कें हैं, पार्क हैं…स्टेडियम और एयरपोर्ट है…और हाँ, अभी अभी मोदी ने देश केजिस सबसे बड़े बांध का शुभारंभ किया है वो ” सरदार सरोवर ” है..इसका शिलान्यास पंडित नेहरु ने किया था.

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1961 में प्रधानमंत्री नेहरू ने ‘सरदार’ सरोवर बाँध की नींव रखी। यह सरदार पटेल के प्रति उनकी विनम्र श्रद्धांजलि थी जिन्होंने आज़ादी और बँटवारे के जटिल दिनों में उनका बखूबी साथ दिया था। नेहरू, पटेल के अनन्य प्रशंसक थे, हालाँकि वैचारिक आधार पर दोनों में मतभेद थे और यह कोई छुपी बात नहीं थी। यह वह दौर था जब मतभेद का अर्थ मनभेद नहीं होता था और एक ही पार्टी में रहते हुए नेता, विभिन्न विषयों पर लिखित असहमतियाँ जताते हुए बहस चलाते थे। सारी दुनिया जान जाती थी कि अमुक विषय पर अमुक नेता के क्या विचार हैं।

कभी पटेल ने आरएसएस को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए उस पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन उनकी मौत के बाद आरएसएस ने नेहरू के बरक्स पटेल को खड़ा करने का सुचिंतित अभियान चलाया। कुछ इस तरह कि जैसे 500 से ज़्यादा रियासतों के भारत संघ में विलय के ‘कारनामे’ में प्रधानमंत्री नेहरू की कोई भूमिका ही नहीं थी, सबकुछ अकेले ‘गृहमंत्री’ पटेल ने कर डाला था। और कश्मीर की समस्या सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘प्रधानमंत्री’ नेहरू की देन थी, गृहमंत्री पटेल का उससे कोई लेना-देना नहीं था। नेहरू के प्रधानमंत्री बनने को भी पटेल के ख़िलाफ़ षड़यंत्र की तरह पेश किया जाता है। सोशल मीडिया में तो इस सिलसिले में सच्चे-झूठे क़िस्सों से भरा, पूरा पाठ्यक्रम मौजूद है।

हद तो ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कहते रहे हैं कि पटेल को इतिहास से मिटाने की कोशिश हुई जबकि वे उसी गुजरात से आते हैं जहाँ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाँध ‘सरदार’ को समर्पित है। यह ‘समर्पण’ नेहरू की ओर से ही था। मोदी ने यह भी कहा था कि नेहरू, सरदार पटेल की अंत्येष्टि में शामिल नहीं हुए थे, जबकि यह सरासर झूठ है। अफ़सोस होता है कि भारत के प्रधानमंत्री के ज्ञान का स्रोत ‘व्हाट्सऐप युनिवर्सिटी’ है।

क्यों न इस मुद्दे पर क्यों ना सीधे पटेल की ही राय जान ली जाए। सोशल मीडिया की अफ़वाहों से बाहर जाकर नेहरू और पटेल के पत्र पढ़े जाएँ।

भारत की आज़ादी का दिन करीब आ रहा था। मंत्रिमंडल के स्वरूप पर चर्चा हो रही थी। 1 अगस्त 1947 को नेहरू ने पटेल को लिखा–

”कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूँ। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं। “

पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा-

“आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी औऱ निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।”

पटेल की ये भावनाएं सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। अपनी मृत्यु के करीब डेढ़ महीने पहले उन्होंने नेहरू को लेकर जो कहा वो किसी वसीयत की तरह है। 2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा—-“अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफादार सिपाही नहीं हूं।”

( ‘सरदार पटेल का पत्र व्यवहार, 1945-50’  प्रकाशक- नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद )

साफ़ है, पटेल को नेहरू की जगह पहला प्रधानमंत्री न बनने पर संघ परिवार के लोग जैसा अफ़सोस जता रहे हैं, वैसा अफ़सोस पटेल को नहीं था। वे आरएसएस नहीं, गांधी के सपनों का भारत बनाना चाहते थे।

दरअसल, जो लोग आजकल पटेल को नेहरू के ख़िलाफ़ खड़ा कर रहे हैं, उन्हें पटेल को जानने-समझने या उनका लिखा पढ़ने में कोई रुचि नहीं है। वे सिर्फ पटेल के सहारे पं.नेहरू से बदला लेना चाहते हैं जिनके आधुनिक, लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष रुख ने उनके ‘हिंदूराष्ट्र प्रोजेक्ट’ को गहरी चोट पहुँचाई थी।

यह आरोप भी सरासर ग़लत है कि सरदार पटेल को भुला दिया गया।  मप्र का शासन जिस भवन से चलता है उसका नाम वल्लभ भवन है, अभी नहीं शुरु से है..गुजरात विधानसभा का नाम सरदार पटेल विधानसभा भवन है..देश के बड़े पुलिस अफ़सर जहां प्रशिक्षण लेते हैं, हैदराबाद स्थित उस अकादमी का नाम सरदार पटेल के नाम पर है..सूरत के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी का नाम सरदार पटेल के नाम पर है, गुजरात में सरदार पटेल के नाम पर विश्वविद्यालय हैं,आनंद में वल्लभ विद्यानगर है,मुबंई में नेशनल टेक्नीकल इंस्टीट्यूट है, जोधपुर में पुलिस एवं सिक्युरिटी यूनिवर्सिटी है, गुजरात में उनका मेमोरियल है, म्यूजियम है..देशभर में स्कूल और कॉलेज के नाम सरदार पटेल के नाम पर हैं, सड़कें हैं, पार्क हैं…स्टेडियम और एयरपोर्ट है…और हाँ, अभी अभी मोदी ने देश केजिस सबसे बड़े बांध का शुभारंभ किया है वो ” सरदार सरोवर ” है..इसका शिलान्यास पंडित नेहरु ने किया था.

क्या भारत को विश्वगुरु समझने या बनाने का दावा करने वाले आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों और नेताओं से सत्य के प्रति आग्रही होने का निवेदन किया जा सकता है ? नेहरू के ख़िलाफ इस असत्य प्रचार से सबसे ज़्यादा दुख तो पटेल को ही हुआ होता। वे आरएसएस को कभी माफ़ नहीं करते। वैसे भी राजनीति में शामिल ना होने का पटेल से किया वादा तो आरएसएस तोड़ ही चुका है।


 

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