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संवैधानिक नैतिकता के तराजू पर कितना खरा है जस्टिस गोगोई का राज्यसभा में नामांकन

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देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को सेवानिवृत्त हुए मुश्किल से चार महीने ही बीते हैं कि भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 80(1)(a) और 80(3) की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें 16 मार्च, 2020 को राज्यसभा के सदस्य के तौर पर मनोनीत करने का आदेश जारी किया. इस अधिसूचना के जारी होते ही देश भर की मीडिया और सोशल मीडिया पर न्यायाधीश गोगोई को एक तरफ बधाई मिली तो दूसरी तरफ उनकी नियुक्ति को सवालों के कटघरे में खड़ा किया जाने लगा.

पूर्व प्रधान न्यायाधीश गोगोई को किस तरह के सवालों का सामना करना पड़ रहा है, उसका अंदाजा उच्चतम न्यायालय में उनके सहयोगी पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर की इस प्रतिक्रिया से लगाया जा सकता है, “कुछ समय पहले से अटकलें लगायी जा रही थी कि जस्टिस गोगोई को क्या सम्मान मिलेगा? ऐसे में उनका नामांकन आश्चर्यजनक नहीं है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यह फैसला इतनी जल्दी हो गया, जो न्यायपालिका की स्वतन्त्रता, निष्पक्षता और अखंडता पर सवाल खड़े करता है. क्या आखिरी किला भी ढह गया है.”

ऐसा नहीं है कि देश में पहली बार उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश राज्यसभा में गया है या सरकार के अधीन किसी पद पर आसीन हुआ है. देश में संविधान लागू होने के बाद उच्चतम न्यायालय के गिनती के दो या तीन कुछ मुख्य न्यायधीशों को छोड़ दें लगभग सभी ने सेवानिवृत के बाद सरकार के अधीन आयोगों के पदों को सुशोभित किया है. इसी तरह से उच्चतम न्यायालय के दो तिहाई से भी अधिक जजों ने सेवानिवृत के बाद सरकार के अधीन आयोगों के पदों पर नियुक्त हुए हैं. यही नहीं 1983 में न्यायाधीश बहरुल इस्लाम ने उच्चतम न्यायालय से इस्तीफा देकर कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा चुनाव लड़कर उसके सदस्य बने थे, तो 1998 में न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा अपने सेवानिवृत के सात साल बाद कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गये थे. बीते सालों में उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायधीश केजी बालाकृष्णन और एचएल दत्तू राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाये गये हैं.

जब आज़ादी के बाद से आज तक देश के उच्चतम न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालयों के जज सरकार के आयोगों और दूसरे पदों पर नियुक्त होते रहे हैं तो फिर सवाल यह उठता है कि न्यायाधीश रंजन गोगोई को राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा मनोनीत किए जाने पर इतनी हायतौबा क्यों मच रही है? दरअसल इसकी जड़ संविधान सभाओं की बैठक तक में गहरी जमी हुई है, जहां न्यायपालिका की स्वतन्त्रता, निष्पक्षता और अखंडता को लेकर लंबी बहस चली थी और इसलिए ही संविधान में अनुच्छेद 124 और 220 का प्रावधान किया गया. अनुच्छेद 124 (7) के अनुसार भारत के उच्चतम न्यायालय को कोई भी न्यायाधीश भारत के क्षेत्र के भीतर न तो किसी कोर्ट और न ही किसी अथॉरिटी के सामने बहस या कार्य कर सकता है. इसी तरह से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश अनुच्छेद 220 के तहत दूसरे उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय को छोडकर देश की किसी भी अथॉरिटी के समक्ष न तो बहस कर सकते हैं और न ही कार्य कर सकते हैं.

अगर अनुच्छेद 124 और 220 को साफ पढ़ा जाए तो उन सभी राष्ट्रीय आयोगों जैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग इत्यादि में जिसके सदस्य या अध्यक्ष होने की पात्रता उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त होने की है. वे इन अनुच्छेदों के विरोधाभासी प्रतीत होते हैं क्योंकि इनके निर्णयों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है या आदेश के पालन के लिए अपील की जा सकती है. इस तरह से यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 124 और 220 विरोधाभासी है.

दरअसल देश के उच्चतम न्यायालयों के बाकी सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति और न्यायाधीश गोगोई की नियुक्ति में जो साफ अंतर यहीं से दिखाई पड़ता है. देश में 1950 के बाद से उच्चतम न्यायालयों के बाकी सेवानिवृत्त जजों की जो भी नियुक्ति हुई, वह किसी भी आयोग में नियुक्ति के लिए किये गये प्रावधानों के अनुसार की गयी जबकि गोगोई को सीधे राज्यसभा का सदस्य मनोनीत कर दिया गया. ऐसा नहीं है कि इससे पहले इस तरह के बिना प्रावधान वाली नियुक्ति पर सवाल नहीं उठा, 2014 में जब पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाया गया तो पूरे देश में आज तक इसे न्यायपालिका के निर्णयों को प्रभावित करने के बदले नियुक्ति का उदाहरण माना जाता है.

न्यायाधीश गोगोई का मामला इससे आगे का है क्योंकि कांग्रेस की तरफ से जो दो न्यायाधीश राज्यसभा पहुंचे, वे चुनाव लड़कर आये थे लेकिन न्यायाधीश गोगोई को सेवानिवृत्त के चंद महीने बाद ही सीधे राज्यसभा भेज दिया गया, इससे न्यायाधीश गोगोई द्वारा सेवानिवृत्ति से पहले किए गए सारे फैसले सवालों के घेरे में आ गये और इससे न्यायपालिका की स्वतन्त्रता, निष्पक्षता और अखंडता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है.

शायद यही कारण है कि एम सी सीतलवाड़ की अध्यक्षता वाली देश के पहले विधि आयोग ने अपनी 14वीं रिपोर्ट में सिफ़ारिश की थी कि देश की न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि ऐसा कानून लागू किया जाय, जिससे सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट में अस्थायी जज नियुक्त किए जाने को छोड़कर देश के भीतर किसी और पद पर नियुक्त न किए जाएं.

आयोग ने अपनी अनुशंसा में इंगित किया था कि सेवानिवृत्ति के बाद भी न्यायाधीश का आचरण देश की जनता का न्यायपालिका में भरोसा कायम रखने के लिए बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण है. उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने भी कहा था कि सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीश कम से कम दो साल तक किसी भी सरकारी पद को ग्रहण नहीं करेगा, ऐसा संशोधन संविधान में लाया जाना चाहिए ताकि हितों के टकराव और न्यायपालिका की निष्पक्षता को शक के घेरे से बाहर रखा जा सके, जिससे न्यायालय में जनता का भरोसा बहाल रहे.

अगर अमेरिका की बात करें तो वहां पर हितों के टकराव के लिए न्यायाधीश के रिटायर की कोई उम्र सीमा नहीं रखी गयी है जबकि ब्रिटेन में उम्र सीमा 70 साल है और उसके बाद जॉब करने पर कोई पाबंदी न होने के बाद भी कोई जज उच्च नैतिक आदर्शों का पालन करता है और कोई दूसरा पद ग्रहण नहीं करता है. भारत की न्यायपालिका ऐसे आदर्शों का पालन क्यों नहीं कर पाती है? हर बात के लिए कानून क्यों ज़रूरी है? देश के उच्चतम न्यायालय के जज का पद शक्तिशाली और सम्मानजनक होने के बाद भी दूसरे कम महत्व के पदों के लिए उसका लालायित रहना समझ से परे है?

इसलिए ज़रूरी है कि उच्चतम न्यायालय में जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 70 साल कर दी जाए और उसके बाद उनका देश के किसी पद पर फिर से नियुक्ति को प्रतिबंधित करने वाला कानून लाया जाए. इसके लिए संविधान में संशोधन करके अनुच्छेद 148 या 319 के समान प्रभाव वाला प्रावधान करना पड़ेगा, जो क्रमश: भारत के महानियंत्रक एवं लेखा परीक्षक और संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों पर लागू होता है. यह देश में न्याय सुनिश्चित करने, उसे कार्यपालिका के प्रभाव से बचाने और देश की जनता का न्यायालय में भरोसा कायम करने के लिए बहुत ही अधिक ज़रूरी है.

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