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मुक्त मधुशालाओं से उड़ी लॉकडाउन की धज्जियों के बीच राजस्व के नशे पर सवाल

भारत में लॉक डाउन के ढीला पढ़ते ही मदिरा की दुकानों में सोशल डिस्टेंसिंग की जैसी धज्जियां उड़ी उसने हमें याद दिलाया कि भारत में शराब के मामले पर तार्किक बहस करना कितना मुश्किल है। हमारे नगरों में शराब की दुकानों को खोलने में जो अकुशलता दिखाई गई उसके कारण ही भगदड़ हुई। अगर आप 40 दिन लॉकडाउन खोल रहे हैं और भविष्य की बंदी के बारे में अनिश्चितता है तो आप भगदड़ बना रहे हैं। लेकिन यह विषय एक राजनीतिक खतरा रहा है जिससे हम सकुचाते रहे हैं। रूस की तरह कई राज्यों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से शराब की आदत छुड़ाना अत्यंत मुश्किल है। यह न केवल राज्य के खजाने को बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को चिकनाई प्रदान करती है। एक डर यह भी है की इस पर केवल बहस हमें नशाबंदी के फिसलन भरे ढाल पर ले जाएगी। इस समाधान की स्वीकृति मात्र राज्य के दमन को स्वीकार्यता प्रदान कर देगी। याब मदिरा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंदगी के दायरे से निकलकर वृहद सांस्कृतिक युद्ध के दायरे में आ गई है: एक विचित्र स्थिति जिसके आधार पर भारत में प्रगतिशीलता की माप करते हैं। यही वह खिड़की भी है कि जिसके आधार पर उदारवाद को गलत समझा गया।

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प्रताप भानु मेहता

मिखाईल गोर्बाचोव ने तत्कालीन सोवियत संघ में 1985 में एक अभागा शराब विरोधी अभियान चलाया । गोर्बाचोव के जीवनीकार टॉबमैन के अनुसार यह अभियान पोलित ब्यूरो की उच्च स्तरीय समिति की शराब के दुष्प्रभावों पर आई शोचनीय रिपोर्ट के बाद चलाया गया था। इस रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक वर्ष 12 मिलियन पियक्कड़ गिरफ्तार किए गए। 13000 बलात्कार के आरोप और 29000 डकैती के आरोप पियक्कड़ों पर लगाए गए। मदिरा विरोधी अभियान के जन स्वास्थ्य पर लाभदायक नतीजे सामने आये।

अपराध कम हुए और जीवन प्रत्याशा बढ़ गई। लेकिन यह अभियान राजनीतिक और आर्थिक आपदा बन गया। गोर्बाचोव भूल गए कि मदिरा राजस्व की लत जो राज्य को लग गई थी वह कुछ नागरिकों को लगी लत की अपेक्षा बड़ी बीमारी थी। बजट घाटों ने आर्थिक संकट पैदा कर दिया। इतिहासकारों का संदेह है कि सोवियत साम्राज्य के बिखराव से कहीं अधिक इस अभियान ने गोर्बाचोव को अधिक लोकप्रिय बनाया। एक चुटकुला है कि वोदका की लाइन में लगा एक निराश नागरिक गोर्बाचोव को गोली मारने के इरादे से गया और थोड़ी देर में ही पुनः वोदका वाली लाइन में आकर लग गया और बताया कि गोर्बाचोव को गोली मारने के इच्छुकों की लाइन और लंबी है।

भारत में लॉक डाउन के ढीला पढ़ते ही मदिरा की दुकानों में सोशल डिस्टेंसिंग की जैसी धज्जियां उड़ी उसने हमें याद दिलाया कि भारत में शराब के मामले पर तार्किक बहस करना कितना मुश्किल है। हमारे नगरों में शराब की दुकानों को खोलने में जो अकुशलता दिखाई गई उसके कारण ही भगदड़ हुई। अगर आप 40 दिन लॉकडाउन खोल रहे हैं और भविष्य की बंदी के बारे में अनिश्चितता है तो आप भगदड़ बना रहे हैं। लेकिन यह विषय एक राजनीतिक खतरा रहा है जिससे हम सकुचाते रहे हैं। रूस की तरह कई राज्यों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था से शराब की आदत छुड़ाना अत्यंत मुश्किल है। यह न केवल राज्य के खजाने को बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को चिकनाई प्रदान करती है। एक डर यह भी है की इस पर केवल बहस हमें नशाबंदी के फिसलन भरे ढाल पर ले जाएगी। इस समाधान की स्वीकृति मात्र राज्य के दमन को स्वीकार्यता प्रदान कर देगी। या मदिरा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंदगी के दायरे से निकलकर वृहद सांस्कृतिक युद्ध के दायरे में आ गई है: एक विचित्र स्थिति जिसके आधार पर भारत में प्रगतिशीलता की माप करते हैं। यही वह खिड़की भी है कि जिसके आधार पर उदारवाद को गलत समझा गया।

उदारवादियों को नशाबंदी के प्रति नैतिक और व्यवहारिक आधार पर शंकालु होना ही चाहिए। सरकारें जब व्यक्ति के अपने मनपसंद जिंदगी बिताने के अधिकार पर हस्तक्षेप करती है तो वह अपने वैध अधिकार का अत्यधिक अतिक्रमण करती है। निश्चय ही शराब के प्रति नैतिकतावाद या शुद्धतावाद राज्य की नीति का आधार नहीं हो सकते। उदारतावाद का एक अंतर्विरोध है। समाज में उदार स्वतंत्रता पनपने के लिए अधिक आत्मसंयम और निर्णय चाहिए कम नहीं। राज्य को किसी भी तरह की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में दखल नहीं देना चाहिए। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं रह जाएगी या बिल्कुल निरर्थक हो जाएगी अगर इस स्वतंत्रता की छत्रछाया में पनपने वाले नियम नफरत या दूसरों को अधीन बनाने के लिए आवरण का कार्य करते हैं। राज्य को यौन संबंधों में घनिष्ठता के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। लेकिन स्वतंत्रता के नियम गंभीर कीमत लेंगे और नहीं चल पाएंगे अगर यौनिकता की अभिव्यक्ति का स्तर लगातार गिरता जाए या हिंसक हो जाए। जैसा कि हमने लॉकर रूम कांड में देखा है। राज्य को लोगों के पीने के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन यदि पीने की आदत सामाजिक हानि पहुंचाने लगे तो सामाजिक अराजकता फैल जाएगी। जैसा कि हर उदारवादी जानता है कि राजशक्ति की सीमाओं को परिभाषित करना उदारवाद का आसान भाग है। इसका कठिन हिस्सा है जनता को अपनी स्वतंत्रता और नियमों का संतुलन करना सिखाना । दोनों एक दूसरे पर निर्भर करते हैं।

भारत के आभिजात्य के यह सोचने में एक विचित्र अन्यमनस्कता है कि सारी अनुवर्ती मान्यताएं एक साथ सत्य नहीं हो सकती। राज्य लोगों को पीने से मना करे, इसका कोई औचित्य नहीं है। चुनाव सुरक्षित रहना चाहिए। लेकिन पीने की आदत जो आकार ग्रहण कर रही है वह गंभीर सामाजिक समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरे विश्व में 5.3% मौतें शराब से जुड़ी हैं और 20 से 39 तक के बीच यह प्रतिशत 13 है। शराब और यौन संबंधों में हिंसा के बीच के संबंध के साक्ष्य तो चौंकाने वाले हैं । ला ट्रॉबे विश्विद्यालय के सेंटर फ़ॉर एल्को पॉलिसी से लेकर जॉन हॉपकिन्स स्कूल ऑफ मेडिसिन तक इस संबंध की गंभीरता का अध्ययन करने वाले किसी संस्थान के रिसर्च पेपर देखने भर की ज़रूरत है। आपको इसकी गहनता पता चल जाएगी। एक औचक उदाहरण लेते हैं। ला ट्रॉबे विश्वविद्यालय के इंग्रिड विल्सन और एंजेला टैफ्त के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में 50% यौन हिंसा के 73% मामलों में जीवनसाथी के प्रति यौन हिंसा में मदिरा की भूमिका पाई गई। ये आंकड़े दूसरे देशों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। बहुत से अध्ययनों से यह बात सामने आयी है कि परिसर हिंसा में भी कम से कम 50% मामलों में मदिरा की भूमिका है। नशाबंदी का समर्थन करने वाली बिहार की महिलाएं इसमें निहित समाज विज्ञान की बेहतर समझ रखती हैं यद्यपि हम उनके समाधान से सहमत बेशक न हों।

कई अभिजात्य संदर्भों में मदिरा व्यक्तिगत पसंद के प्रयोग का विषय नहीं रह गया है। एक खास तरह के मसीहावाद के साथ मदिरा लगभग एक विचारधारा बन गई है। मेरे अधिकांश मदिरा असेवी मित्र जो विदेशों से लौटे हैं बताते हैं कि अमेरिका में बिना मदिरा के सामाजिक आवागमन दिल्ली के मुकाबले आसान है जहां मदिरा सेवन प्रगतिशीलता का और असेवन प्रतिक्रिया का लक्षण बन गया है। युवा समाजों में यह अक्सर पसंद का विषय नहीं बल्कि अनिवार्यता है और अंत में मदिरा को विचारधारा बनाने में कुछ विचित्र है। कुछ रूढ़िवादी इसे नीति का विषय बनाते हैं। लेकिन प्रगतिशील अभिजात्य इसे कुमत के रूप में स्थापित करने के ज़्यादा बड़े दोषी हैं।

एक तरफ हम ठीक ही सहमति और पसंद का मूल्य बढ़ाते हैं और दूसरी ओर खास मौकों पर मदिरा पर निर्भरता बढ़ते जाने की कोई चिंता नहीं है, और इस प्रकार अपनी सहमति या पसंद को मान्यता देने का प्रयोग करने या उनके एजेंट बनने के अवसर कम होते जा रहे हैं। संयमन का उदारवादी तर्क रूढ़िवादी तर्क से मजबूत है। इसमें कोई भी नशा बंदी के लिए तर्क नहीं है। बल्कि जैसा योगेंद्र यादव ने इशारा किया हमें और अधिक सौम्य होकर उन नीतियों और कदमों के बारे में विचार करना चाहिए जो मदिरा और उसकी विचारधारा के मूल्यवर्धन को कम कर सके जैसे विवेकशीलता से पीने की शिक्षा , सामुदायिक हस्तक्षेप, कानून से मदिरा की दुकानों की सघनता कम करना और प्रतिनिधि विज्ञापनों पर अधिक नियंत्रण समस्या है। इस बारे में थोड़ा सामाजिक संवाद आदि से अच्छे उदारवादियों को अपने चुनाव की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। लेकिन अगर हमें वाकई अपनी चिंता है तो हमें अपनी संस्कृति और राजनीतिक तंत्र की शराब की लत के बारे में भी सवाल उठाना पड़ेगा और एक जटिल समस्या का समाधान खोजना पड़ेगा।

 


हमारे दौर के विशिष्ट चिंतक प्रताप भानु मेहता का यह लेख  हाल में इंडियन एक्सप्रेस में छपा- We need to question our addiction to cultural and political economy of alcohol

अनुवाद- आनंद मालवीय 


 

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