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यह जाति व्यवस्था है जिसके चलते जनता मार खाने के लिए अभिशप्त है

शहरों से पलायन करते इन मज़दूरों पर पुलिस बेरहमी से लाठियां बरसा रही हैं जिसमें पुलिस बुजुर्गों और विक्लांगों तक का लिहाज नहीं कर रही है

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 मार्च को हमेशा की तरह अपने अंदाज में रात के 8 बजे घोषणा की कि रात के 12 बजे से पूरे देश में लॉकडाउन हो जाएगा. इससे चार दिन पहले यानि 18 मार्च को उन्होंने ठीक उसी वक्त रात के 8 बजे 22 मार्च तो जनता कर्फ्यू लगाने की घोषणा कर चुके थे. जनता कर्फ्यू की ‘अपार सफलता’ से अभिभूत होकर ही प्रधानमंत्री मोदी ने 24 तारीख की रात के बारह बजे से पूरे देश को फिर से ‘कर्फ्यू से भी सख्त’ दौर में जाने का आदेश दिया और कहा कि देशहित में यह अगले 21 दिनों तक जारी रहेगा.  प्रधानमंत्री के उस फरमान के 12 घंटे के भीतर अगले दिन के सुबह से ही दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान की सीमाओं पर हजारों लोगों की भीड़ एकत्रित होगी गई. यह दृश्य लगातार विकराल होता चला गया और एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली एनसीआर की सीमाओं पर 24 घंटे के भीतर लगभग पच्चीस लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर इकठ्ठे हो गए.

छनकर आ रही सूचना के मुताबिक महानगरों और शहरों में काम कर रहे मजदूर किसी भी तरह, बदहवासी में अपने परिवार के साथ अपने-अपने गांव लौटने के लिए भागे जा रहे हैं. परिवहन की व्यवस्था न होने के चलते वे अपने दुधमुहें बच्चों को कंधे पर रखे, पीठ पर रखकर, साइकिल, मोटरसाइकिल और कहीं-कहीं तो ठेला पर बैठाकर भूखे-प्यासे चले जा रहे हैं.

इसी क्रम में बरेली से एक वैसा भी वीडियो देखने को मिला जिसमें प्रशासन प्रवासी मजदूरों के उपर सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसे रसायन का छिड़काव किया जा रहा है. इन्हीं वीडियो में कई वैसे वीडियो भी थे जिनमें शहरों से पलायन करते इन मज़दूरों पर पुलिस बेरहमी से लाठियां बरसा रही हैं जिसमें पुलिस बुजुर्गों और विक्लांगों तक का लिहाज नहीं कर रही है.

पूरे देश से आ रही ख़बरों और वीडियो को आप खंगाल कर देखें तो आपको वैसा एक भी वीडियो नहीं मिलेगा जिसमें यह दिखे कि जिसके उपर पुलिस डंडा बरसा रही है उसमें से एक भी आदमी पलटकर पुलिस से उलझते हुई दिखाई दे रहा है. उलझने की बात तो छोड़ ही दीजिए, आपको एक भी ऐसा वीडियो या घटना नहीं दिखाई पड़ेगा जिसमें कोई नागरिक पुलिस से यह सवाल पूछता हुआ नज़र आ रहा है कि आखिर मुझे किस अपराध के लिए मार रहे हो?

आखिर क्या कारण है कि अपना सबकुछ न्योछावर करके लौट रहा इंसान इतना लाचार हो गया है, मार खा रहा है लेकिन प्रतिरोध करने को तैयार नहीं है? इसका जवाब प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज कारवां मैगजीन से बात करते हुए कुछ इन शब्दों में देते हैं, ‘जब लोग भूखे और कमजोर होते हैं तो वे विद्रोह करने की स्थति में नहीं होते हैं.’

मान लिया कि ज्यां द्रेज जिनकी बात कर रहे हैं वे दीन-हीन और किंचित हैं, भूखे व जर्जर हैं. लेकिन पिछले छह वर्षों के इतिहास को देखें तो हम पाते हैं कि जिनकी समाज में बड़ी हैसियत है, वे भी आततायी शासन के खिलाफ खड़ा नहीं हो पा रहा है. अपवादस्वरूप कन्नन गोपीनाथन की बात छोड़ दीजिए जिन्होंने सरकार के दमनकारी और अलोकतांत्रिक नीतियों के कारण आईएएस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया. हाल-फिलहाल एक मात्र उदाहरण गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी बी एन सिंह का है जिन्होंने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के अपमानजनक व्यवहार से दुखी होकर तीन महीने लंबी छुट्टी पर चले गए हैं.

भारत में आम लोगों में सरकार के हर आदेश को हर परिस्थति में स्वीकार कर लेने की प्रवृति को सबसे बेहतर ढंग से राममनोहर लोहिया ने समझा था. अपने विश्लेषण में डॉक्टर लोहिया ने 1962 में कहा था,  ‘पिछले देढ़ हजार वर्ष में हिन्दुस्तानी जनता ने एक बार भी अन्दरूनी जालिम के खिलाफ विद्रोह नहीं किया…..राजा अंदरूनी बन चुका है… लेकिन जालिम है, फिर भी उसके खिलाफ जनता का विद्रोह नहीं हुआ. पिछले पंद्रह सौ बरस के झुके रहने के इतिहास के कारण गुलामी हिन्दुस्तान की जनता की हड्डी और खून का अंग बन गया है.’ लोहिया इसे आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि इसी झुकने को हमारे देश में बड़ा सुन्दर सा नाम दे दिया गया है जिसे ‘समन्वयी’ कहा जाता है, और कहा जाता है कि हम सभी अच्छी बातों को अपने में मिला लिया करते हैं.

डॉक्टर लोहिया ने इस समन्वय का वर्णन दो प्रकार से किया था और कहा था कि एक दास का समन्वय है और दूसरा स्वामी का समन्वय. स्वामी या ताकतवर लोग समन्वय करते हैं तो जांचते-परखते हैं कि कौन सी परायी चीज अच्छी है और उसको किस रूप में अपना लेने से अपनी शक्ति बढ़ेगी? लेकिन नौकर, दास या गुलाम इसे परखता नहीं है. उसके सामने जो भी नयी या परायी चीज आती है, अगर वह ताकतवर है तो वह उसको अपना लेता है. अपने यहां पिछले 1500 साल से जो समन्वय चला आ रहा है, वह ज्यादा इसी ढंग का है. इसका नतीजा यह हुआ है कि आदमी अपनी चीजों के लिए….अपने अस्तित्व के लिए मरने-मिटने के लिए तैयार नहीं होता, वह झुक जाता है. उसमें स्थिरता के लिए भी बड़ी इच्छा पैदा हो जाती है…चाहे जितने गरीब हैं हम, फिर भी हमें एक-एक दो-दो कौड़ी का मोह है…जहां जोखिम नहीं उठाया जाता, वहां फिर कुछ नहीं रह जाता, क्रांति असंभव-सी हो जाती है…..इसीलिए अपने देश में क्रांति प्रायः असम्भव हो गई है. लोग आधे मुर्दा है, भूखे और रोगी हैं लेकिन संतुष्ट भी हैं. संसार के अन्य देशों में गरीबी के साथ असंतोष है और दिल में जलन. यहां थोड़ी बहुत जलन इधर-उधर हो तो हो, लेकिन खास मात्रा में नहीं है.’

राम मनोहर लोहिया ने इसके लिए जाति प्रथा को दोषी माना था. उन्होंने कहा था कि जाति प्रथा हमारे देश की ‘विशिष्ट’ बात है, जो दुनिया में कहीं और नहीं है, इसी के चलते गुलामी में हम सबसे आगे हैं… हमारे देश में जाति प्रथा गैर-बराबरी को ताकत देती है और देशों की जनता गैर-बराबरी को इस डर से स्वीकार किये रहती है कि उस पर ताकत का इस्तेमाल हो जायेगा….अपने देश में लालच और बन्दूक या हथियार के तरीकों के अलावा मंत्र का तरीका भी है. यानी मंत्र की, शब्द की, दिमागी बात की, धर्म के सूत्र की इतनी जबरदस्त ताकत है कि जो दबा हुआ है, गैरबराबर है, आधा मुर्दा है, छोटी जाति का है, वह खुद अपनी अवस्था में संतोष पा लेता है. ऐसे किस्से हैं जो बतलाते हैं कि किस तरह जाति प्रथा ने प्रायः पूरी जनता को यह संतोष दे दिया है.’

अब सड़क पर निकले प्रवासियों के दीनता और रहन-सहन को देखिए तो पता चल जाता है कि अधिकांश प्रवासी दलित, पिछड़े या अल्पसंख्यक समुदाय से होगें. डॉक्टर लोहिया के अनुसार उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि राजा का आदेश मानना उनकी नियति है. अन्यथा क्या कारण है कि 25 लाख प्रवासियों को नियंत्रित करने के लिए पांच हजार से अधिक पुलिसबल तैयार नहीं होगी फिर भी जनता मार खा रही है, भूखे-प्यासे बिना किसी शिकायत के सड़क पर बढती जा रही है जिसके लिए सिर्फ और सिर्फ प्रशासन जिम्मेदार है!

सरकार की विफलता पर और प्रधानमंत्री की जवाबदेही पर बात करने के लिए कोई तैयार नहीं है. सत्तर साल के लोकतांत्रिक इतिहास के अनुभव से हम जानते हैं कि हमारे देश में स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था राज्य सरकार का मसला है, लेकिन राज्य सरकारों को शामिल किए बिना प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन का फैसला ले लिया जाता है, किसी राज्य के मुख्यमंत्री की तरफ से प्रधानमंत्री से एक सवाल नहीं पूछा जाता है कि आपने हमें इस निर्णय में शामिल क्यों नहीं किया!

अब देश के हालात देखिए, राहुल गांधी को छोड़कर एक भी राजनेता ऐसा नहीं है जो प्रधानमंत्री से यह सवाल पूछे कि संकट की इस घड़ी में प्रधानमंत्री की क्या भूमिका है और एक प्रधानमंत्री के रूप में आपने क्या किया है? पिछले छह वर्षों में इस तरह के सवाल पूछने की हैसियत खत्म कर दी गई है कि किसी व्यक्ति द्वारा प्रधानमंत्री की असफलता पर सवाल उठाने की नहीं रहने दी गई है. उल्टे हर वह राज्य सरकार या राज्य के मुख्यमंत्री उस वक्त अभिभूत हो जाते हैं जब उनकी प्रशंसा में प्रधानमंत्री एक शब्द कह देते हैं!

राजनीतिक संकट का यह वैसा दौर है जिसका समाधान राजनीतिक दल ही निकाल सकता है. इसकी लड़ाई राजनीतिक है और इस गतिरोध को तोड़ने के लिए राजनीतिक दलों को राजसत्ता से सवाल पूछना शुरू करना पड़ेगा नहीं तो जनता उसी अवस्था में मार खाते हुए, घसीटते हुए राजा को माय-बाप मानती रहेगी!

 

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