Home ओप-एड मनुस्मृति: जिसे आंबेडकर ने जलायी, वो कैसे अदालती कंगूरों पर जगमगायी?

मनुस्मृति: जिसे आंबेडकर ने जलायी, वो कैसे अदालती कंगूरों पर जगमगायी?

अगर भारत की ओर लौटें तो मुखर कहे जाने वाले लोग काश इस बात पर थोड़ा सोचने के लिए तैयार होते कि किस तरह मनु के विश्व नजरिये ने भारतीय समाज को सदियों से कमजोर कर दिया है और किस तरह वह सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर वंचित, उत्पीड़ित तबकों की जिन्दगी में आज भी कहर बरपा रहा है और किस तरह आजादी के सत्तर साल बाद भी दलितों आदिवासियों पर दैनन्दिन अत्याचार होते रहते है। राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो की रिपोर्टों से उन्हे पता चलता कि हर सोलह मिनट पर एक दलित, गैरदलित के हाथों अत्याचार का शिकार होता है जिसमें हर दिन मे चार बलात्कार, हर सप्ताह तेरह दलितों की हत्या आदि शामिल है। किस तरह लोगो को निर्वस्त्र कर घुमाना, उन्हे मल खाने के लिए मजबूर करना, उनकी जमीनों पर कब्जा करना और सामाजिक बहिष्कार करना बेहद आम है और उच्च शिक्षा संस्थान भी इससे अलग नहीं है।

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कुछ दिनों पहले तामिलनाडु उच्च न्यायालय का एक फैसला आया था जिसने सैशन कोर्ट के निर्णय को पलट कर एक व्यक्ति को बेगुनाह साबित कर दिया था। अपराध था अपनी ही बेटी और दामाद पर हमला करवाना जिसमें दामाद की मौत हो गई थी। मां-बाप दोनों ने मिलकर यह साजिश रची थी और दोनो ही रिहा हो गये। भाड़े के हत्यारों को सजा हुई। इस देश में न्यायालय के इस तरह के फैसले से अब जनता को आश्चर्य नहीं होता। सुबह की चाय पीते हुए समाचार पढ़े जाते हैं और भुला दिये जाते हैं।

न्यायालय के इस फैसले के दिन के आसपास उसी प्रदेश में एक पुलिस थाने में पिता पुत्र की बर्बर, अमानवीय और घृणित मारपीट होती है। संबधित मजिस्ट्रेट पुलिस के बयान के आधार पर बिना उन पीड़ितो के पास जाकर उनसे पूछताछ किये पुलिस के पक्ष में आदेश दे देता है और दो दिन बाद उन दोनों की मौत हो जाती है।

कितने सभ्य हैं हम और अपने आप पर कितना गर्व करते हैं हम!

यहां पर इन दोनों मामलो में पुलिस और न्यायालय के निर्णयों और बर्तावों का महत्व नहीं है क्योंकि वे तो परिणाम हैं जो इस देश की जनता के रोजमर्रा के व्यवहारों, विचारों, के साथ साथ जनता की समझ और सोच का नतीजा है। हमें इस तरह के परिणामों की आदत हो जानी चाहिए।

कितने लोगों ने डाॅ. अम्बेडकर की अगुवाई में छेड़े गए पहले “दलित विद्रोह” अर्थात महाड़ सत्याग्रह (1927) के बारे में पढ़ा होगा और यह जाना होगा कि किस तरह उसके पहले चरण में (19-20 मार्च) को महाड़ नामक जगह पर स्थित चवदार तालाब पर हजारों की तादाद में लोग पहुंचे थे और उन्होने वहां पानी पीया था। जानवरों को भी जिस तालाब पर पानी पीने से रोका नहीं जाता था, उस तालाब पर दलित को मनाही थी और इस मनाही के खिलाफ इस सत्याग्रह ने बगावत का बिगुल फूंका था।
सत्याग्रह के दूसरे चरण में (25 दिसम्बर 1927) में उसी महाड़ में डाॅ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था और उनकी इस कार्यवाही की तुलना फ्रैंच इंकलाब (1789) से की थी। इस दहन के पहले जिस प्रस्ताव को गंगाधर सहस्त्रबुद्धे नामक डाॅ. अम्बेडकर के सहयोगी ने पढ़ा था जो खुद पुरोहित जाति से सम्बद्ध थे, उसके शब्द इस प्रकार थे; “यह सम्मेलन इस मत का मजबूत हिमायती है कि मनुस्मृति, अगर हम उसके उन तमाम श्लोकों को देखें जिन्होंने शूद्र जाति को कम करके आंका है, उनकी प्रगति को अवरूद्ध किया है, और उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को स्थाई बनाया है, ऐसी किताब नहीं है जो एक धार्मिक या पवित्र किताब समझी जाए और इस राय को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए, यह सम्मेलन ऐसी धार्मिक किताब के दहन की कार्यवाही को अंजाम दे रहा है जो लोगों का विभाजन करती है और इंसानियत को तबाह करने वाली है।”


इस ऐतिहासिक कार्यवाही के बाद समय-समय पर अपने लेखन और व्याख्यानों में डाॅ. अम्बेडकर ने मनु के विश्व नजरिये की लगातार मुखालिफत की थी। महाड़ सत्याग्रह के लगभग 23 साल बाद जब भारत के संविधान का ऐलान हो रहा था तब अम्बेडकर ने इस अवसर पर कहा था कि उसने “मनु के शासन को समाप्त किया है।”

निश्चित तौर पर उन्हें इस का कतई अनुमान रहा होगा कि भारत के ज्ञात इतिहास के इस महान अवसर-जब उसने एक व्यक्ति एक मत के आधार पर संविधान की घोषणा कर राजनीतिक जनतंत्र में कदम रखा और एक व्यक्ति और एक मूल्य के आधार पर सामाजिक जनतंत्र कायम करने का इरादा जाहिर किया; नस्ल, जाति, लिंग आदि आधारित शोषणों-उत्पीड़नों से मुक्ति की घोषणा की-के सत्तर साल बाद, आबादी का अच्छा खासा हिस्सा अभी भी मनु और उसके चिन्तन से सम्मोहित रहेगा और उसे इस बात पर भी कतई गुरेज नहीं होगा कि वह उनकी मूर्ति की स्थापना करें और उसको सम्मानित करें।

जार्ज फ्लायड नामक अश्वेत व्यक्ति की पुलिस के हाथों हत्या के बाद अमेरिका तथा यूरोप के तमाम इलाकों में ‘ब्लैक लाइव्ज मैटर’ अर्थात ब्लैक जिन्दगियां भी अहमियत रखती हैं के बैनर तले जो व्यापक आंदोलन शुरू हुआ है उसके तहत इन मुल्कों में खड़ी तमाम विवादास्पद व्यक्तियों की मूर्तियों को -जिनमें से कई गुलामों के मालिक थे और उनके व्यापार में मुब्तिला थे और उपनिवेशवादी, नस्लवादी थे- जनसमूहों द्वारा गिराया जा रहा है या प्रशासन द्वारा ही हटाने का निर्णय लिया जा रहा है। यहां तक कि कोलम्बस की मूर्ति को भी गिराया गया है, जिसके बारे में “वर्चस्वशाली” पाठ्यक्रमों में दावा किया जाता रहा है कि उसने अमेरिका को “ढूंढ निकाला” और यह सच्चाई छिपायी जाती रही है कि किस तरह कोलम्बस के वहां पंहुचने से पहले वहां आदिम लोगों की भारी आबादी थी- जिनके लिए “रेड इंडियन” जैसा नस्लवादी सम्बोधन प्रयुक्त होता रहा है- और जिसका व्यापक पैमाने पर कत्लेआम हुआ था।

गौरतलब है कि विवादास्पद मूर्तियों को विस्थापित करने या विवादास्पद नामों से सुशोभित ऐतिहासिक स्मारकों, केन्द्रों के नामांतरण को लेकर चली यह बहस यहंा भी शुरू होती दिख रही है। गुजरात के चर्चित दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता मार्टिन मकवान ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सुश्री सोनिया गांधी को खत लिख कर मांग की है कि जयपुर के उच्च न्यायालय में स्थापित मनु की मूर्ति को वहां से हटाया जाये।

उनके पत्र के मुताबिक मनु की यह मूर्ति “भारत के संविधान और दलितों का अपमान है” और वह डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के इस आहृवान को कमजोर करती है जिसमें उन्होनें कहा था कि अगर एक राष्ट्र के तौर पर हमें आगे बढ़ना है तो जाति का उन्मूलन करना होगा। यह मूर्ति न केवल दलित उत्पीड़न को प्रतिबिम्बित करती है, बल्कि वह महिलाओं और शूद्रों के उत्पीड़न का भी प्रतीक है। कुल मिला कर यह भारत की आबादी का 85 प्रतिशत हिस्सा हैं।

ध्यान रहे, ऐसी मांग रखने वाले वह अकेले नहीं हैं। जब से इस मूर्ति की वहां स्थापना हुई तभी से इस मूर्ति को वहां से हटाने के लिए आवाजें बुलन्द होती रही है।

मनु की मूर्ति की स्थापना को लेकर लेखक, कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता और यहां तक की आम जनसाधारण भी बहुत बेचैन हो रहे हैं और वह समय समय पर सक्रियता के जरिये मांग बुलंद करते रहे हैं। इस मूर्ति की स्थापना को लेकर एक प्रतीकात्मक कार्यवाही दो साल पहले भी सम्पन्न हुई थी जब महाराष्ट्र के अम्बेडकरवादी आन्दोलन से सम्बद्ध दो जुझारू महिलाओं ने-शीलाबाई पवापर, कांता रमेश अहिरे- इस मूर्ति पर काला रंग डाला था। (अक्टूबर-2018)

आज की तारीख में इस मूर्ति के इर्दगिर्द खड़ी हो रही बहस का सबसे विचलित करने वाला पक्ष है कि हमारे समाज का मुखर हिस्सा- जिनमें से अधिकतर उंची जाति से सम्बद्ध होते हैं, इतने दिनों बाद भी मनु के विश्व नजरिये की विसंगतियों को समझने के बजाय, कैसे उसकी आचार संहिता ने व्यापक आबादी को मानवाधिकार से भी महरूम किया था, वह इसी बात को प्रमाणित तथा प्रतिपादित करने में लगा है कि इस “मूल विधिनिर्माता” के चिन्तन को प्रश्नंकित करने की जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं, वह मनु की एक साफसुथरीकृत (सैनेटाईज) छवि भी पेश करने में मुब्तिला है।

निश्चित तौर पर ऊंच-नीच सोपानक्रम पर टिकी संरचना के इन हिमायतियों ने जो सदियों से दृश्य और अदृश्य तरीकों से विशेषाधिकार हासिल किए हैं; उनसे फिलवक्त यह उम्मीद करना बेकार है कि वह आत्मपरीक्षण करने के लिए तैयार होंगे, जैसे कि सिलसिला अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में हाल में चला था जब जार्ज फलायड की हत्या के बाद न्यायाधीशों ने अपने एक खुले पत्र के माध्यम से अपनी बात प्रकट की थी।

अगर भारत की ओर लौटें तो मुखर कहे जाने वाले लोग काश इस बात पर थोड़ा सोचने के लिए तैयार होते कि किस तरह मनु के विश्व नजरिये ने भारतीय समाज को सदियों से कमजोर कर दिया है और किस तरह वह सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर वंचित, उत्पीड़ित तबकों की जिन्दगी में आज भी कहर बरपा रहा है और किस तरह आजादी के सत्तर साल बाद भी दलितों आदिवासियों पर दैनन्दिन अत्याचार होते रहते है। राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो की रिपोर्टों से उन्हे पता चलता कि हर सोलह मिनट पर एक दलित, गैरदलित के हाथों अत्याचार का शिकार होता है जिसमें हर दिन मे चार बलात्कार, हर सप्ताह तेरह दलितों की हत्या आदि शामिल है। किस तरह लोगो को निर्वस्त्र कर घुमाना, उन्हे मल खाने के लिए मजबूर करना, उनकी जमीनों पर कब्जा करना और सामाजिक बहिष्कार करना बेहद आम है और उच्च शिक्षा संस्थान भी इससे अलग नहीं है।

बहरहाल इस बात का अनुमान लगाना कठिन है कि मनु को लेकर वैकल्पिक आख्यान जो समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर आधारित हो- कब मजबूत बन कर उभरेगा? निश्चित ही यह स्थिति तब तक असंभव है जब तक भारतीय समाज में जबरदस्त मंथन न हो और उसमें यह एहसास गहरा न हो कि उसमें आमूलचूल सामाजिक सुधार की जरूरत है।

अपनी बहुचर्चित रचना “द अनटचेबल्स एण्ड पैक्स बिटानिका”, 1931 में डाॅ. अम्बेडकर ने ऐसे बदलाव के रास्ते में खड़ी चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए सर टी0 माधव राव को उद्धृत करते हुए लिखा था जिन्होनें अपने वक्त के हिन्दू समाज के बारे में कहा थाः

“अपने लम्बे जीवनकाल में मनुष्य जब चीजों का अवलोकन करता है और सोचता है, तब उतनी ही गहराई से उसे यह महसूस होता है कि पृथ्वी पर हिंदू समुदाय जैसा और कोई समुदाय नहीं है जो राजनीतिक बुराइयों से कम और स्वतः स्वीकृत या स्वतःनिर्मित और टाले जाने योग्य बुराईयों से कहीं अधिक परेशान रहता है। यह नजरिया बिल्कुल सटीक है और बिना किसी अतिशियोक्ति के हिंदू समाज में सुधार की जरूरत को अभिव्यक्त करता है। सबसे पहले समाज सुधारक गौतम बुद्ध थे। समाज सुधार में कोई भी इतिहास उनसे ही शुरू होना चाहिए और भारत मे समाज सुधार का कोई भी इतिहास उनके बिना पूरा नहीं हो सकता जो उनकी महान उपलब्धियों की अनदेखी करता है।”

मनु को इतिहास तक सीमित करने का सवाल निश्चित तौर पर उत्पीड़ित समुदायों के लिए ही नहीं बल्कि अमन और इंसाफ के हर हिमायती को बेहद जरूरी और मौजू सवाल लग सकता है, लेकिन जिस तरह समाज “राजनीतिक बुराइयों से कम और स्वतः दंडित, स्वतः स्वीकृत या स्वतःनिर्मित और टाले जाने योग्य बुराइयों से कहीं अधिक परेशान रहता है, उसे देखते हुए इस लक्ष्य की तरफ बढ़ने के लिए हमें कैसे कठिन संघर्षो के रास्ते से गुजरना पडे़गा, इसके लिए आज ही से तैयारी जरूरी है।

 



गुरुबख्श सिंह मोंगा छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे। 33 वर्ष बैंक में ट्रेड युनियन मोर्चे पर रहे। पूर्ण साक्षरता अभियान, जिला सिरसा में मुख्य परियोजना संयोजक के तौर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। फिलवक्त बैंक में उप-प्रबंधक पद से  ऐच्छिक सेवानिवृति लेकर जन विज्ञान आंदोलन एवम् साहित्यिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी। 



 

4 COMMENTS

  1. Manusmriti is better than modern Indian Constitution, constitution is a business book if u get master on manipulation of this book then you will protect any criminal, totally confused bundle of law.

    • Constitution gives equality fraternity and liberty to all people of india and those who living in india. Cinstitution is greatest book. Many philosipher and constitution maker has said no other book of constituion is best than the indian constitution book.

    • I think u don’t know about our constitution that why you telling like this.

  2. We have faith in constitution. It is one of the best constitution worldwide but its implementation is not done in true spirit. Most of the lawyers, judges, police officers, corporate houses, and politicians of India are corrupt and have nexus with goons. They have nuisance value so they get change the decision to their own suitability.

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