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राममन्दिर निर्माण आन्दोलन में क्या दलित-पिछड़ों की कोई भूमिका नहीं थी?

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क्या अयोध्या में ‘वहीं’ राममन्दिर निर्माण के आन्दोलन में दलित और पिछड़ी जातियों की वाकई कोई भूमिका नहीं थी? सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार मन्दिर निर्माण के लिए गठित ‘श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ में इन जातियों के प्रतिनिधित्व में कंजूसी को लेकर उठ रहे विसंवादी सुरों को उनकी औकात बताने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषंगिक संगठन इन दिनों, कम से कम अयोध्या में, कुछ ऐसा ही ‘सिद्ध’ करने में लगे हैं। जीत की खुमारी में ऐसा करते हुए वे यह भी याद नहीं रख रहे कि इससे उनका वह पुराना स्टैंड गलत सिद्ध होता है, जिसके तहत वे राममन्दिर निर्माण को व्यापक हिन्दू समाज की आस्था का प्रश्न बताया करते थे। साथ ही यह दावा भी करते थे कि जाति भेद इस आस्था के कतई इसके आड़े नहीं आता।

बहरहाल, जानकारों की मानें तो पिछले दिनों ब्राह्मणों कहें या सवर्णों के प्रभुत्व वाले ये संगठन इस बात को लेकर बहुत चिंतित हो उठे थे कि श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (जिसकी अयोध्या में पहली बैठक आगामी चार अप्रैल को होनी है) में इन जातियों के शून्य या बेहद कम प्रतिनिधित्व का भाजपा के बाहर से ही नहीं, अन्दर से भी विरोध हो रहा है-यहां तक कि राममंदिर आंदोलन में अहम भूमिका निभा चुके उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी सवाल उठा रहे हैं।

प्रसंगवश, तब कल्याण सिंह और उमा भारती दोनों ट्रस्ट में पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व की मांग के समर्थन में इस तर्क का सहारा ले रहे थे कि राममंदिर आंदोलन का नेतृत्व इन्हीं वर्गों के कल्याण सिंह, उमा भारती और विनय कटियार जैसे नेताओं ने किया। उमा और कल्याण दोनों का कहना था कि जब दलित समुदाय को ट्रस्ट में कामेश्वर चैपाल के रूप में प्रतिनिधित्व मिल गया है, औपचारिक ही सही, तो पिछड़ों को भी मिलना ही चाहिए।

कामेश्वर चौपाल

लेकिन अब अयोध्या में संघ परिवार संगठन उन दोनों की काट के लिए मन्दिर आन्दोलन में इन वर्गों के नेतृत्व तो क्या भागीदारी तक को नकार रहे हैं। वे मंचों पर या सार्वजनिक रूप से इस बाबत प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने से तो बच रहे हैं, लेकिन आपसी या अनौपचारिक बातचीत, विमर्शं या भूमिगत प्रचार में उनकी मांग का भरपूर ‘तार्किक’ प्रतिवाद कर रहे हैं। इस काम में कई शुभचिन्तक पत्रकार भी यह साबित करने में उनकी मदद कर रहे हैं, कि इन ‘बड़े-बडे’ पिछड़े नेताओं के कितने ‘छोटे-छोटे’ मन है। इसके लिए दिवंगत अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा भाजपा के गोवा अधिवेशन में दिये गये उस भाषण को उद्धृत किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘बड़ी कुर्सियों पर छोटे मन के लोग बैठ गये हैं, जिसके चलते गुणतंत्र का लोप होता जा रहा है और अल्पमत का गणतंत्र चल रहा है। इसी सोच का नतीजा है कि महत्वपूर्ण पदों पर अच्छी जानकारी रखने वाले, प्रतिबद्ध, राष्ट्रवादी, अच्छे नागरिक और देश को आगे ले जाने की चिंता करने वालों की जगह जातियों को खोजा, बैठाया और इस पर इतराया जाने लगा है।’

मजे की बात यह कि इस सिलसिले में कई दोहरे-तिहरे ‘तर्क’ इस्तेमाल किये जा रहे हैं। उदाहरण के लिए पहले ‘जाति न पूछो साधु की’ पर टेक रखी जाती है। फिर इससे काम चलता नहीं दिखता तो मन्दिर आन्दोलन में योगदान करने वाले संतों-महंतों की जातियां गिनाकर पूछ लिया जाता है कि दलित और पिछड़े हैं किस खेत की मूली?

संघ परिवार के नजदीकी पत्रकार यह पूछने से भी गुरेज नहीं कर रहे कि आज ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व मांगने वाली ये जातियां मन्दिर आन्दोलन के दौरान या विवादित ढांचे में मूर्तियां रखने से लेकर ताला खुलवाने और उसे ढहाने तक कहां थीं?
उनके अनुसार हिन्दू समाज रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद में रामलला के ‘नेक्स्ट फे्रंड’ देवकीनन्दन अंग्रवाल के नाते जीत पाया है, जिनके निधन के बाद त्रिलोकी नाथ पांडेय ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ बने। इनमें कोई भी पिछड़ा नहीं था। इसी तरह विश्व हिन्दू परिषद द्वारा प्रायोजित रामजन्मभूमि न्यास के गठन और मन्दिर आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महंत परमहंस रामचन्द्र दास और गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ भी नहीं। परमहंस चतुरी तिवारी थे तो अवेद्यनाथ क्षत्रिय, जबकि अशोक सिंघल जैन।

यहां तक कि फैजाबाद की जिला अदालत से विवादित ढांचे में बन्द ताला खुलवाने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह भी दलित या पिछड़े नहीं थे। ताला खोले जाने हेतु मुकदमा अधिवक्ता उमेश पांडेय ने दायर किया, उसका दावा दूसरे अधिवक्ता उदयभान मिश्र ने बनाया, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेश्वर द्विवेदी ने उसके पक्ष में बहस की और जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने फैसला सुनाया। उन दिनों फैजाबाद के जिलाधिकारी इंदुकुमार पांडेय ब्राह्मण थे, जबकि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कर्मवीर सिंह सिख।

एक पत्रकार ने आन्दोलन के दौरान जानें गंवाने वाले रमेश पांडेय, रमेश मिश्र, वसुदेव गुप्ता, अरविन्द रस्तोगी, राजेन्द्र प्रसाद धरिकार, शरद कोठारी और रामकुमार कोठारी वगैरह के नाम आगे करके भी दलित व पिछड़ी जातियों की आन्दोलन में भागीदारी पर सवाल खड़े किये हैं। यह भी लिखा है कि छः दिसम्बर, 1992 के लिए बनी 40-40 रणबांकुरों की 25-30 टीमों में भी दलित व पिछडी जातियों का प्रतिनिधित्व नाममात्र को ही था। फिर इससे भी बड़ा सवाल यह आगे किया है कि आन्दोलन में ओबीसी कोटे के जो लोग थे भी, क्या वे ओबीसी के नाते आन्दोलन में सहभागिता कर रहे थे? जवाब की प्रतीक्षा किये बिना यह दर्पोक्ति भी कर दी है कि बात निकली है तो दूर तलक जायेगी।

यह दर्पोक्ति यों ही नहीं है। ट्रस्ट में दलित और पिछडों के नाम पर भागीदारी की मांग की आगे यह कहकर खिल्ली उड़ाई गई है कि जाति शब्द का उद्भव पुर्तगाली भाषा से हुआ है और मनुस्मृति के अनुसार जातियां राजनीति के लिए नहीं व्यवसाय और पेशों से निर्धारित होती थीं। आजादी के पहले जातीय संगठन समाज सुधार और जातीय उन्नयन का काम करते थे। मगर अब वे सियासत करने लगे हैं, जिसमें ‘फूट डालो और राज करो’ का फार्मूला अचूक माना जाता है। इसका इंगित यह कि इस फार्मूले को राममन्दिर ट्रस्ट में भी तलाशने वाले नेता कदर्थना के पात्र हैं।

लगे हाथों ट्रस्टियों का योगदान भी बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ट्रस्टियों में सबसे महत्वपूर्ण अयोध्या के पूर्व राजा विमलेन्द्रमोहन प्रताप मिश्र ने विश्व हिन्दू परिषद की मन्दिर निर्माण हेतु पत्थर तराशने की कार्यशाला स्थापित करने के लिए वह दस एकड़ भूमि दी थी, जो उनकी मां के नाम थी। इतना ही नहीं, छः दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद शरारती तत्वों ने रामलला की मूर्तियां चोरी कर लीं तो आनन फानन में उन्हीं के घर से दूसरी मूर्तियां आईं। इसी तरह के. परासरन ने सर्वोच्च न्यायालय में नौ साल तक हिन्दू पक्ष की पैरवी की और मुकदमा जीतने में भी बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन यह नहीं बताया जा रहा कि अगर ट्रस्ट में ऐसे योगदानों को ही पुरस्कृत किया गया है तो होम्योपैथी के डाॅक्टर अनिल मिश्र का योगदान क्या है ओर उन्हें ट्रस्ट मेंक्यों शामिल किया गया है?

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