Home ओप-एड हाजाओ मिजाजाकी : प्रेम और विश्वास से लबरेज़ दुनिया का अनूठा फ़िल्मकार  

हाजाओ मिजाजाकी : प्रेम और विश्वास से लबरेज़ दुनिया का अनूठा फ़िल्मकार  

मिजाजाकी की फ़िल्में देखने के बाद ऐसा लगता है कि काश हम भी अपनी बच्चियों के लिए एक ऐसी ही झाड़ू का इंतज़ाम कर सकते जिस पर बैठकर वो दुनिया को अपनी नज़र से देख पाती और दुनिया को अपनी सलाहियत से और भी सुन्दर बना पातीं. ऐसे अद्भुत कलाकार हाजाओ मिजाजाकी अपनी सारी उम्र अपने चित्रों और उनसे निर्मित फिल्मों की दुनिया से हर रोज क्रूर होती इस दुनिया को सुन्दर बनाने की जुगत में लगे रहे. वे अस्सी वर्ष की उम्र में अभी भी सुन्दर दुनिया हासिल करने का सपना संजोये अपने सृजन में रत हैं. 

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(इस कठिन कठोर क्वारंटीन समय में संजय जोशी दुनिया की बेहतरीन फ़िल्मों से आपका परिचय करवा रहे हैं. यह मीडिया विजिल के लिए लिखे जा रहे उनके साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिनेमा-सिनेमा’ की  सातवीं कड़ी है। मक़सद है कि हिन्दुस्तानी सिनेमा के साथ–साथ पूरी दुनिया के सिनेमा जगत की पड़ताल हो सके और इसी बहाने हम दूसरे समाजों को भी ठीक से समझ सकें. यह स्तम्भ हर सोमवार को प्रकाशित हो रहा है -संपादक)

1990 के दशक में भारतीय मध्यवर्गीय घरों के बच्चों की भाषा आश्चर्यजनक रूप से आक्रामक हुई. तोतली जुबान वाले बच्चे अक्सर ही ‘मैं तुझको मार दूंगा’, ‘मैं तुझे छोडूंगा नहीं’  जैसे वाक्य बोलते सुनाई देते. यह वही समय था जब परिवार का ढांचा बदल रहा था, रहने की जगहों का वास्तुशिल्प ऊर्ध्वाकार (होरिजेंटल) से सिमटकर लम्बाकार (वर्टीकल) होता जा रहा था. मोहल्ले के पंचायती अड्डों की जगह दीवार पर टंगे टी.वी में आने वाले धारावाहिकों ने लेनी शुरू कर दी थी. इस नयी सांस्कृतिक बदलाव की सबसे बड़ी मार बच्चों पर पड़ी. उन्हें व्यस्त रखने के लिए अधिकाँश मध्यवर्गीय अभिभावकों ने भारी मात्रा में डिज्नी से आयातित हिंदी में रूपांतरित कार्टून श्रृंखलाओं का सहारा लिया. थोड़े ही दिन में यह सहारा बच्चों की अनिवार्य जरुरत बन गया और ‘तुझको मार दूंगा’, ‘तुझे छोडूंगा नहीं’ जैसे वाक्य दुधबोली जुबान पर चढ़ गए. काश, उन दिनों किसी ने हमारा परिचय जापानी एनिमेटर हाजाओ मिजाजाकी से करवाया होता तो हम भी अपने बच्चों को कोसने की बजाय खुश हो रहे होते. 

5 जनवरी 1941 को टोक्यो, जापान में जन्मे  हाजाओ मिजाजाकी का जन्म एक अमीर परिवार में हुआ. पिता की कंपनी लड़ाकू हवाई जहाज के लिए औजार बनाने का काम करती थी. माँ बेहद पढ़ी लिखी अनुशासन प्रिय महिला थी. बचपन में द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुई बमबारी का इनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा जिसने बाद में इनके काम पर गहरा असर डाला. 1963 से अब तक काम कर रहे मिजाजाकी ने जापानी एनीमेशन के विभिन्न उस्तादों से काम सीख कर कई महत्वपूर्ण एनीमेशन फ़िल्मों के निर्माण में सक्रिय योगदान दिया. कुछ में वे आर्टिस्ट थे. कुछ में बराबर के रचनाकार तो बहुत सी फ़िल्मों के अकेले निर्देशक. एनीमेशन फ़िल्म बनाने के अलावा उन्होंने कार्टून किताबें भी लिखीं. उन्होंने जापान और दुनिया की सभी प्रतिष्ठित एनीमेशन कंपनियों में काम किया और एक और कलाकार के साथ मिलकर प्रसिद्ध एनीमेशन स्टूडियो ‘घिबली’ की स्थापना करी. उनके महत्व को देखते हुए जापान के प्रतिष्ठित टी वी चैनल एनएचके पर चार भागों में बनी दस्तावेजी फ़िल्म ‘हाजाओ मिजाजाकी के साथ दस वर्ष’ का प्रसारण भी हुआ. उन्हें जापान के सभी प्रतिष्ठित पुरस्कारों के अलावा वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल के एनिमेशन के लिए ग्रांड प्रिक्स पुरुस्कार और एनीमेशन के लिए आस्कर पुरस्कार से भी नवाजा गया है. जेम्स कैमरून और स्टीवन स्पिलबर्ग जैसे कई नामचीन फ़िल्मकारों ने अपने आपको मिजाजाकी के काम से प्रभावित बताया है.

अमरीका के प्रसिद्ध एनीमेशन स्टूडियो डिज्नी और पिक्सर ने भी मिजाजाकी के काम से प्रभाव को स्वीकारा है. मिजाजाकी को मिले पुरस्कारों और प्रभावों की ये बेहद संछिप्त सूची है. उनके सम्मानों की बृहद सूची का बखान इस लेख का मकसद नहीं है. मियाजाकी होने का सबसे अहम महत्व इस बात में है कि उन्होंने दुनिया को खूबसूरत बनाने की जोरदार कोशिश की. उनकी तमाम फ़िल्मों में मजबूत स्त्री पात्र हैं, प्रकृति मनुष्य से अलहदा नहीं बल्कि मनुष्य की तरह ही सजीव है, पशु पक्षी मनुष्य के साथ संवाद करते हैं, सारी कहानियों का सूत्र किसी अन्तर्निहित कोमलता से जुड़ता है जो हमें प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा देता है और सबसे बड़ी बात युद्ध के विरुद्ध शांति का उद्घोष है. उनकी फ़िल्मों के बाद हमें किसी शांत झरने, सुगन्धित हवा, घने हरे भरे जंगल में घूमने और किसी सुन्दर सपने को देखने का अहसास होता है. 

1963 से 2013 तक पचास साल के सक्रिय रचनात्मक जीवन में वे लगभग इतने ही प्रोजक्टों में किसी न किसी रूप में वे अपना योगदान करते रहे. उनके विशाल काम में से उनकी दो प्रतिनिधि फ़िल्मों ‘माय नेबर टोटोरो’ और ‘किकीस डिलीवरी सर्विस’ (1989) से उनके संसार की थोड़ी झलक मिलेगी शायद.  

1988 में निर्मित और मिजाजाकी द्वारा निर्देशित ‘माय नेबर टोटोरो’ यानि ‘मेरा पड़ोसी टोटोरो’  प्रकृति प्रेम की अद्भुत कहानी है. कहानी बहुत आसान और छोटी है. यूनिवर्सिटी का एक टीचर कुसाकाबे अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराकर पास के ही एक गाँव में अपनी दो छोटी बेटियों सात्स्की और मेई के साथ रहने चला जाता है. नया घर भुतहा है और उसमे एक मजेदार भुतहा जीव है ‘सुसुवातारी’. छोटी बच्ची के लिए इस भुतहे घर में सुसुवातारी को खोजना एक मजेदार यात्रा है. 86 मिनट तक चलने वाली इस फ़िल्म में कोई बड़ी घटना नहीं. सारी फ़िल्म एक ग्रामीण परिवेश से रिश्ता बना रहे शहरी परिवार के रोजमर्रा की जिन्दगी की आसान कहानी है. लेकिन आसान होते हुए भी बहुत कुछ सीखने लायक. फ़िल्म की सारी कहानी इस भुतहे घर और इसके ठीक सामने खड़े विशालकाय कपूर के पेड़ के इर्द गिर्द घटती है. मेई एक दिन इन पेड़ों में  बसने वाली दो आत्माओं का पीछा करते–करते पेड़ के नीचे बने गड्ढे में एक मजेदार जीव टोटोरो से सामना करती हैं. इस दृश्य की रचना मिजाजाकी ने अद्भुत कल्पनाशीलता और कोमलता के साथ की है. एक लम्बी प्राकृतिक सुरंग को पार करते हुए मेई की मुलाकात टोटोरो से होती है. टोटोरो की आँखें बहुत छोटी हैं, पेट बहुत बड़ा और मुंह का जबड़ा तो बहुत ही बड़ा. उसके विशाल पेट पर लधरी हुई नटखट मेई हाथी पर सवार चींटी जैसी लगती है. टोटोरो उसे अपने विशाल जबड़े खोलकर जितना डरता है मेई को उतना ही मजा आता है. हारकर वह छुटकी मेई से अपनी दोस्ती स्वीकार करता है.

यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि प्रकृति के अबूझ रहस्यों से मिजाजाकी डराने की बजाय उनसे दोस्ती करना सिखाते हैं. यह पूरी फ़िल्म ही असल में इस तरह की असंख्य दोस्तियों की मजेदार शृंखला है. फ़िल्म के शुरू में ही गौर करने लायक एक दृश्य है जब आसपड़ोस की वनस्पति की खोज करते प्रोफ़ेसर साहब अपनी दोनों बेटियों के साथ वहां के सबसे पुराने पेड़ को झुककर अभिवादन करते हैं. यह अभिवादन सिर्फ उस परिवार का नहीं बल्कि खुद निर्देशक मिजाजाकी का है जो  बार–बार प्रकृति की शरण में जाते हैं. 

मिजाजाकी के चित्रों में कोई हड़बड़ी नहीं बल्कि वे प्रकृति की एक –एक धड़कन को बहुत तफसील से दिखाना चाहते हैं. इसी फ़िल्म में हरे रंग के इतने प्रकार हैं कि फ़िल्म के सुखद अंत के पहले ही हमारी आँखें इतना हरा सोख लेती हैं कि मन का कोना-अतरा सुकून से भर जाता है. फ़िल्म में एक छोटा सीक्वेंस है जब प्रोफ़ेसर साहब की दोनों बेटियों द्वारा लगाई बगिया में पौधे आते हैं. प्रकृति से जुड़ने का कोई भी मौका मिजाजाकी छोड़ना नहीं चाहते बल्कि ऐसे द्रश्यों को अनुपात से ज्यादा विस्तार भी देते हैं.  पौधों को बढ़ता हुआ देखना सात्स्की और मेई में गजब उत्साह भर देता है. ऐसे ही एक अद्भुत फैंटसी दृश्य की रचना टोटोरो और मेई के बीच शुरू हुए खेल से मिजाजाकी ने की है. दोनों जमीन को देखते हुए ऊंची–ऊंची आवाज़ निकालना शुरू करते हैं. उनकी आवाज़ जितनी तेज होती जाती है जमीन पर उगने वाली वनस्पति का घेरा उतना ही ज्यादा घना होता जाता है. ऐसा करते –करते वहां एक विशाल जंगल खड़ा हो जाता है. मजे की बात है कि ऐसे दृश्यों की रचना वे एक ऐसी फैंटसी की तरह करते हैं जो देखने में महसूसने में एकदम वास्तविक लगती है.

असल में हरी भरी दुनिया का हासिल मिजाजाकी की सतत फैंटसी का हिस्सा है जिसका प्रभाव आप उनकी हर रचना में पायेंगे. मिजाजाकी न सिर्फ़ प्रकृति के करीब जाने की लगातार ताकीद करते हैं बल्कि मनुष्येतर प्राणियों को ज्यादा मानवीय और सहज बनाने की भी हर तरह से कोशिश करते हैं. इसी फ़िल्म का एक मजेदार प्रसंग है जब प्रोफ़ेसर कुसाकाबे को यूनिवर्सिटी से आने में देर हो गयी है और उनकी दोनों बेटियां बस स्टॉप पर उनका इंतज़ार कर रही हैं. छोटी मेई बड़ी सात्स्की के कंधे पर ही सो गई है. इस इंतज़ार में एक अद्भुत संयोग की तरह सात्स्की को टोटोरो के दर्शन होते हैं. उसके लिए यह दुर्लभ क्षण है क्योंकि मेई की बात को वो अब तक उसकी कल्पना ही समझती थी. अब यहाँ टोटोरो को मानवीय दिखाने के लिए एक बेहद आत्मीय दृश्य की रचना मिजाजाकी ने रची है. अपनी विशालकाय डरावनी देह के साथ टोटोरो तात्स्की के बगल खड़ा है दोस्ती बनाने के लिए. इस बीच बारिश शुरू होती है और सकुचाते हुए तात्स्की, टोटोरो को छाता बढ़ाती है. टोटोरो अपनी विशाल देह को छोटे से छाते में समेटते हुए खुद भी तात्स्की जितना दिखने लगता है. जब बारिश की बूँदें टोटोरो के छाते पर गिरती हैं तो वह विशालकाय जानवर भी कुतूहल में डरता है और हमें अपना जैसा लगता है.  अब टोटोरो जब भी रात में दोनों बच्चियों को कपूर के विशाल पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर दिखाई देता है तब तात्स्की का दिया छाता भी उसके सिर पर दिखता है. 

एक दिन छोटी मेई को पड़ोस की दादी के खेत से ताजा पका भुट्टा मिलता है जिसे वह अपनी बीमार मां को भेंट करना चाहती है. माँ के विरह से दुखी मेई अकेले ही उससे मिलने चल देती है. इधर घर पर अकेली बड़ी बहन तात्स्की उसको खोज- खोजकर परेशान हो जाती है. बेचारगी में तास्त्की कपूर के पेड़ के पास जाकर टोटोरो को गुहार लगाती है . टोटोरो एक अच्छे पड़ोसी की तरह उसकी मदद के लिए जादुई बिल्ली वाली बस को बुलाते हैं. इस बस की मदद से तात्स्की , मेई को खोजकर अस्पताल अपनी माँ के पास ले जाती है. एक अद्भुत फैंटेसी में दोनों बेटियां इस जादुई बस में बैठे–बैठे अपनी माँ को देखती हैं और ताजा भुट्टा मेई अपनी मां के कमरे की खिड़की के बाहर रख देती है. माँ भी आश्चर्य के साथ खिड़की पर पड़े भुट्टे को उठाती है जिसपर मेई का सन्देश लिखा है. 

 

अगला सुन्दर दिन फिर पूरे सुकून के साथ शुरू होता है. अब घर में माँ भी है और पिता भी. दोनों बेटियां जब रात में अपने–अपने बिस्तर पर लेटी होती हैं तो विशाल कपूर के पेड़ की सबसे ऊंची टहनी पर टोटोरो भी बैठा दिखाई देता है और हाँ तास्त्की का छाता अब भी उसके सिर के ऊपर तना है.  

1989 में निर्मित उनकी दूसरी फ़िल्म ‘किकीस डिलीवरी सर्विस’ चुड़ैलों के बारे में प्रचलित उस लोक मान्यता पर आधारित जिसमे किशोरावस्था की दहलीज पर पहुँचते ही उन्हें खुद दुनिया को समझना होता था. इस फ़िल्म की नायिका किकी भी ऐसी किशोर चुड़ैल है जो 13 वर्ष की पूरी होने पर अपनी किशोरावस्था में पहुचने वाली है. हर चुड़ैल की तरह किकी को भी एक जादुई झाडू और काली बिल्ली वाली दोस्त जिजी मिलती है. सबसे विदा ले किकी अपनी तरह दुनिया की खोज पर निकलती है. यहाँ हम लोगों को थोड़ा झटका लग सकता है. भारतीय मान्यता के विपरीत कई देशों में चुड़ैल को वैसा बुरा नहीं समझा जाता है और मिजाजाकी की इस चरित्र में दिलचस्पी जादुई झाडू के कारण उपजी होगी. यह फ़िल्म भी उनकी सुन्दर दुनिया को देखने की ललक और दयालु बने रहने के सपने के तहत ही रची– बुनी गयी है. जब किकी समुद्री शहर कोरिको पहुँचने वाली होती है तो आकाश मार्ग में उड़ान भरती चिड़ियाओं के समूह को विस्मय से देखना मिजाजाकी के सघन जीवन प्रेम का ही नतीजा है. उनकी इस रूचि के दर्शन हमें बार–बार पूरी फिल्म में होते हैं और इस कारण एक शहर को सुन्दर बनाने वाले किसी भी कोण से हम अपरिचित नहीं रहते.

जैसा मैंने पहले भी कहा मिजाजाकी जीवन की सुन्दरता , कोमलता और दयालुपन के फिल्मकार हैं. इस बात का निर्वाह पूरी फिल्म में जगह –जगह एक डोर की तरह बिछा दिखता है. फ़िल्म की शुरुआत से ही इस बात के सूत्र मिजाजाकी फ़िल्म में पिरो देते हैं. किकी अपने लिए काम खोज रही है और तभी उसे एक बेकरी की छत से उसकी मालकिन की यह याचना सुनाई पड़ती है कि कैसे उनके कस्टमर के बच्चे की छूटी हुई चूसनी उन तक पहुँच जाए. किकी इसके लिए तुरंत प्रस्तुत होती है . बेकरी की मालकिन ओसोनो को वह अपना असल परिचय देती है और पल भर में अपने जादुई झाडू की बदौलत रोते बच्चे की चूसनी वापिस कर देती है. किकी की इस अद्भुत क्षमता से प्रभावित हो ओसनो उसे सामान पहुचाने का काम दे देती है.अब किकी की डिलीवरी सर्विस शुरू हो गयी है जिसके जरिये उसके भलेपन और शहर की खूबसूरती दिखाने का कोई भी मौका मिजाजाकी नहीं छोड़ते हैं. किकी की उड़ने की अद्भुत क्षमता से प्रभावित उसकी ही उम्र का लड़का टोम्बो जल्द ही उसका दोस्त बन जाता है . टोम्बो का एक ही सपना है. और यह सपना है आकाश में उड़ान भरने का. वह अपनी साइकिल में पंखे लगाकर दिन –रात प्रयोग में लगा रहता है. किकी को भी टोम्बो की दोस्ती में मजा आने लगता है. एक दिन टोम्बो उसे अपने घर होने वाली पार्टी के लिए आमंत्रित करता है लेकिन अपनी डिलीवरी में फंसे रहने के कारण वह पार्टी मिस कर देती है. किकी की मालकिन टोसनो जवान होती लड़की के दिल के तार को समझते हुए चालाकी से एक डिलीवरी टोम्बो के घर के लिए देती है. इस बीच एक गड़बड़ और यह होती है कि जिजी का दिल एक दूसरी बिल्ली पर आने के कारण वह किकी से दूर रहने लगती है और किकी के झाडू की शक्ति भी ख़त्म हो जाती है .

यहाँ फिर से निर्देशक भलमनसाहत को एक बड़ा गुण मानते हुए किकी की एक और दोस्त से यह कहलाते हैं कि किकी को अपनी जादुई झाड़ू फिर से हासिल हो जायेगी अगर कोई बड़ा मकसद उसे मिला जाये. एक मजेदार घटनाक्रम  में शहर में आयोजित एयर शो के विशाल गुब्बारे की गैस गड़बड़ा जाती है और टोम्बो रस्सी के साथ इस गुब्बारे में लटका किकी को दिख जाता है. किकी को एक मकसद दिखता है और इस वजह से उसके झाडू की जादुई शक्ति वापिस आती है. कई तरह के नाटकीय घटनाक्रमों के बाद किकी अपने प्रिय दोस्त टोम्बो को बचा पाती है और शहर की नई स्टार बन जाती है. 

फ़िल्म का अंत किकी द्वारा अपने माँ –पिता को लिखी जा रही चिठ्ठी से होता है जिसमे अपने आत्मनिर्भर  होने के साथ –साथ कोरीको शहर की खूबसूरती का बखान भी विस्तार से होता है. 

इस फ़िल्म को देखने के बाद ऐसा लगता है कि काश हम भी अपनी बच्चियों के लिए एक ऐसी ही झाड़ू का इंतज़ाम कर सकते जिस पर बैठकर वो दुनिया को अपनी नज़र से देख पाती और दुनिया को अपनी सलाहियत से और भी सुन्दर बना पातीं. ऐसे अद्भुत कलाकार हाजाओ मिजाजाकी अपनी सारी उम्र अपने चित्रों और उनसे निर्मित फिल्मों की दुनिया से हर रोज क्रूर होती इस दुनिया को सुन्दर बनाने की जुगत में लगे रहे. वे अस्सी वर्ष की उम्र में अभी भी सुन्दर दुनिया हासिल करने का सपना संजोये अपने सृजन में रत हैं. 

 

कितना अच्छा होता अगर उनकी फ़िल्मों को हमारे पाठ्यक्रम का जरुरी हिस्सा बना दिया जाता.

दोनों फ़िल्मों को आप नीचे क्लिक करके देख सकते हैं।

माय नेबर टोटोरो

किकीस डिलीवरी सर्विस

 



इस शृंखला में वर्णित अधिकाँश फ़िल्में यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं और जो आसानी से नहीं मिलेंगी उनका इंतज़ाम संजय आपके लिए करेंगे. 

दुनियाभर के जरुरी सिनेमा को आम लोगों तक पहुचाने का काम संजय जोशी पिछले 15 वर्षो से लगातार ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के जरिये कर रहे हैं.संजय से thegroup.jsm@gmail.com या 9811577426 पर संपर्क किया जा सकता है -संपादक

 



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