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कोरोना काल: “सरकारी झूठों को बिना सजा काटे, जमानत मिल जाती है” (व्यंग्य/विश्लेषण)

कोरोना संक्रमण पर सरकार द्वारा जारी आंकड़ों और लगातार आए बयानों के विरोधाभासों का विश्लेषण करते हुए ये लेख, जब लेखिका ने हमको भेजा तो हम ये तय नहीं कर पाए कि इसको व्यंग्य की श्रेणी में रखें कि विश्लेषण की। अंततः हमने तय किया हम इसको दोनों श्रेणियों में रख सकते हैं। दरअसल वैसे भी भारत सरकार के अब तक के बयानों और आंकड़ों को भी हम ऐसी ही दो श्रेणियों में रख सकते हैं - तो फिर लेख को क्यों नहीं? तो पढ़िए ये व्यंग्य/विश्वलेषण - संपादक

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पाकिस्तानी शायर और लेखक इब्ने इंशा के व्यंग्य संग्रह, “उर्दू की आखिरी किताब”, की ख़ास बात ये है कि उसमें लिखी हुई हर बात आज की घटनाओं पर बहुत सटीक बैठती हैं. लेखिका आप सभी से दरख़्वास्त भी करना चाहेगी कि उसको पढ़ें। एक बात जो इस लेख के सन्दर्भ में याद आती है;

”शाह जमजाह के ज़माने में हर तरफ आज़ादी का दौर-दौरा था. लोग आज़ाद थे और अखबार आज़ाद थे कि जो चाहे कहें जो चाहे लिखें. बशर्ते, वो बादशाह की तारीफ़ में हो, खिलाफ ना हो.”

अगर आपको शाह जमजाह की जगह अपने किसी मनपसंद बादशाह या शासक का नाम याद आ गया हो, तो वो मात्र एक इत्तेफाक और संयोग हो सकता है, बल्कि होना ही चाहिए.

कुछ कहने की नहीं, कुछ भी कहने की आज़ादी

उम्मीद करते हैं कि आप आज़ाद अखबार और आज़ाद लोगों की सुनते होंगे. आज़ाद लोग कुछ भी कह देते हैं, आखिर विचारों की स्वच्छंदता होती हैं उनमें से, जैसे कि हमारे स्वास्थ्य मंत्री, डॉ. हर्षवर्धन का कहना है कि कोरोना एक ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़ (मुसीबत का फ़ायदा) भी साबित हो सकता है, अगर इसके चलते हमारे देश के लोग स्वच्छता के नियम अच्छे से सीख जाएँ. शायद मज़ाक कर रहे थे, इतना मुश्किल वक़्त देखकर कोई भी थोडा हड़बड़ा जाता है. नहीं तो एक स्वास्थ्य मंत्री इतनी बड़ी महामारी को एक अप्रत्यक्ष वरदान मान ले ये थोडा तो क्रूर मज़ाक होना ही चाहिए. इतने क्रूर हो नहीं सकते हर्षवर्धन जी, लेकिन ऐसे मुश्किल समय में वो ये भी चाहते हैं कि हम सब हंसते-खिलखिलाते रहें.

हर्षवर्धन जी, 5 मई को सहज ढंग से कह रहे थे कि देश में तब भी कम्युनिटी ट्रांसमिशन की स्टेज नहीं आई थी. तब गौर करने की बात ये थी कि बहुत सारे संक्रमणों का मूल कारण नहीं मिल पा रहा था. दरअसल जब ऐसा होता है तो दुनिया के लगभग सभी देश इसे कम्युनिटी ट्रांसमिशन स्टेज मानते हैं. परन्तु, भारत किसी भेड़चाल में भरोसा नहीं करता इसलिए ऐसी, किसी भी बात की जब तक खुद ठोंक-बजाकर जांच न कर ले, नहीं मान सकता. जनता की समझ में ये नहीं आ रहा है कि उसको कोरोना के आंकड़े बर्दाश्त नहीं हो रहे हैं या कि ऐसी विपदा में भी इनका इतना हंसमुख और सहज स्वभाव.

हर शाख पर ‘पंछी’ बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा

पर पर हर्षवर्धन जी अकेले हम सबको नहीं हंसा रहे. अभी पिछले महीने 25 अप्रैल की ही बात है कि नीति आयोग के वी.के. पॉल ने एक रिसर्च pejr की, उस रिसर्च के मुताबिक़ भारत में कोविड-19 के संक्रमण – 10 दिन के अंतराल पर दुगुने हो रहे थे. दुगुने और बढ़ने के बावजूद भी पॉल जी का मानना था की 16 मई के बाद भारत में कोई नया संक्रमण का केस नहीं आएगा. ये रहा उनके द्वारा प्रकाशित शोध का वो ग्राफ, जिससे आपको मानने में अगर अब तक दिक्कत हो रही तो देख कर तो जरुर मान जायेंगे.

कोरोनावायरस के संक्रमित लोग ही नहीं, पॉल जी की सोच भी बहुत पॉजिटिव है. ये ज़रूरी है कि सरकार की ओर से ऐसी रिसर्च आती रहे , ढांढस बना रहता है. वैसे भी आंकड़ों पर भरोसा करके सिर्फ दुःख ही मिल रहा है, ऐसी रिसर्च पढ़िए और 16 मई तक अपनी चिंताए भूल जाइए. वैसे भी 2 दिन ही बचे हैं, ज्यादा सस्पेंस बचा भी नहीं है.

भूलने से याद आया, एक और व्यक्ति हैं जो हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं, वो हैं लव अग्रवाल. ये स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव है. ये प्रतिदिन टीवी स्क्रीन पर आकर कोरोनावायरस के आंकड़ों  और स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियों, तैयारियों का विशेष ब्यौरा देते हैं. इनकी दाद देनी पड़ेगी कि इन्होने मरकज़ वाले मुद्दे का पीछा नहीं छोड़ा. अप्रैल के पहले हफ्ते रोज़ बताते थे की जितने केस आये उनमें से मरकज़ वाले मरीज़ कितने थे उसका विस्तारपूर्वक ब्यौरा देते रहे. 5 अप्रैल को जब वो ICMR की प्रेस कांफ्रेंस देने आये तो उन्होंने हर दिन की तरह बताया कि कैसे सरकार सक्रिय तौर से समय से पूर्व सारे संक्रमणों को रोकने में सफल होती जा रही है. शायद इनको भी मज़ाक करना बहुत पसदं हैं, क्योंकि इतना सतर्क और सक्रिय रहने के बाद भी ये मरकज़ की घटना जो दिल्ली में ही हो रही थी उसको रोक नहीं पाए. ऐसे में ये ज़रूर लगता है कि ये बिना सोचे समझे जब बातें कह देते हैं, तो इनका एक ही लक्ष्य होगा कि हम सबको कुछ मुस्कराहट नसीब हो. GDP का पता नहीं, ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस (GNH) पर सरकार का पूरा पूरा ध्यान बरक़रार है.

कोरोना मामलों की गिनती के साथ झूठों की भी गिनती होनी चाहिए

19 अप्रैल को लव अग्रवाल दावा करते हैं की 18 राज्यों में संक्रमण कम तेज़ी से फैल रहा है. वे इन राज्यों में पंजाब , बिहार, हरयाणा , दिल्ली, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ का नाम लेते है. इनका कहना है की इन राज्यों में केस दुगुने होने की गति बाकी राज्यों के मुकाबले कम है. ये बात तो बहुत बार दोहराई जा चुकी है कि टेस्टिंग कम हो रही थी , परन्तु ये ध्यान रखना चाहिए की टेस्टिंग कम होने के बावजूद दुगुनी होने वाली संख्या से कैसे सफलता तय की जा रही थी? अगर टेस्ट नहीं होंगे तो संख्या तो धीमी गति से ही दुगुनी होगी. दूसरा पंजाब, दिल्ली और तमिलनाडु का नाम आज उन राज्यों में शुमार हैं, जहां गिनती देश में सबसे ज्यादा है. तो क्या जिस सक्रिय और सतर्क निगरानी का ज़िक्र लव अग्रवाल रोज़ कर रहे थे उसमें तब भी बीमार लोगों की ट्रेसिंग हो रही थी, बीमार और संभावित बीमारों की नहीं?

ख़ैर जब ये सब ख़त्म होगा तो क्या सरकार से उनके झूठों का हिसाब लिया जाएगा? अगर ये सब मज़ाक में कहा जा रहा है, तो भी ये क्रूर मज़ाक है और अगर सिर्फ झूठ बोल रहे हैं तो सरकार का हक़ है कि वो झूठ बोले क्योंकि सरकारें झूठ के दम पर ही बनती हैं और सत्ता में लौटती हैं. इस लेख को व्यंग्य के तौर पर लिखा है, कृपया सरकार की बातों की तरह मुझे भी ज्यादा गंभीरता से ना लें.

लेखिका सौम्या गुप्ता, डेटा विश्लेषण एक्सपर्ट हैं। उन्होंने भारत से इंजीनीयरिंग करने के बाद शिकागो यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी उच्च शिक्षा हासिल की है। यूएसए और यूके में डेटा एनालिस्ट के तौर पर काम करने के बाद, अब भारत में , इसके सामाजिक अनुप्रयोग पर काम कर रही हैं।

 


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