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नेहरू हर महीने नेताजी सुभाष की बेटी को आर्थिक मदद भेजते रहे, पर विज्ञापन नहीं किया!

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जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर पर विशेष-

डॉ.पंकज श्रीवास्तव


प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ जैसी किताब लिखकर इतिहास को भले ही समृद्ध किया हो, लेकिन लोगों में इतिहास के प्रति दिलचस्पी तो मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही जगाई है। इसके लिए देश की नौजवान पीढ़ी को ख़ासतौर पर उनका आभारी होना चाहिए। वे अपने भाषणों में अगर यक़ीन से परे दावों की मुसलसल धार न छोड़ते तो लोग इतिहास के मूल पाठ की खोज शायद ही करते। इससे पहले स्वतंत्रता आंदोलन के तमाम नायकों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार की खिचड़ी धीमी आँच पर पक रही थी, लेकिन मोदी राज में सामने आए व्हाट्सऐपी ईंधन से यह आँच इतनी तेज़ हुई कि खिचड़ी जल ही गई।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ‘बोस फाइल्स’ का जैसा हल्ला मचा वह याद करने लायक़ है। सुभाष बोस के प्रति अन्याय, उनके ग़ायब होने और उसमें नेहरू सरकार की भूमिका को लेकर जो कहानियाँ दशकों से फैलाई गई थीं और अब उनके साबित होने का वक़्त आ गया था। लेकिन इन फाइलों से जो निकला, वह बिलकुल उलट था। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को नई चमक दे गया।
हमने पहली बार जाना कि सुभाषचंद्र बोस की बेटी के लिए नेहरू ने हर महीने आर्थिक मदद की व्यवस्था कराई थी। वैसे अगर नेताजी के परिवार ने स्वीकार न किया होता तो शायद बहुत लोग यह भी न मानते कि उन्होंने किसी से विवाह भी किया था या एक एक बेटी के पिता भी थे।
नेता जी के प्रेम और विवाह की यह कहानी भी दिलचस्प है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस, इलाज के लिए 1934 में आस्ट्रिया की राजधानी विएना में थे जहाँ वे खाली वक्त का इस्तेमाल अपनी किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ लिखने में कर रहे थे। मदद के लिए उन्हें एक टाइपिस्ट की ज़रूरत थी। 23 साल की एमिली शेंकल का चुनाव इसी काम के लिए हुआ था। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के इस 37 वर्षीय नायक के सीने में एक दिल भी था, जो अपने से 14 साल छोटी एमिली के प्यार भरे स्पर्श से धड़क उठा। ‘स्वदेश’ और ‘स्वदेशी’ में पगे नेताजी की नज़र में  ‘विदेशी’ से प्यार या शादी कोई गुनाह नहीं था। 26 दिसंबर, 1937 को, एमिली के 27वें जन्मदिन पर ऑस्ट्रिया के बादगास्तीन में दोनों ने शादी कर ली। लेकिन उन्हें साथ रहने का अवसर कम ही मिला। वे जल्दी ही भारत लौट आए जहाँ कांग्रेस के अध्यक्ष की कुर्सी उनका इंतज़ार कर रही थी।

स्वतंत्रता आंदोलन की व्यस्तताओं के बीच नेताजी का विदेश जाना कम ही हो पाता था, फिर भी एमिला को लिखी चिट्ठियाँ उनके गहन प्यार की गवाही देती हैं। 29 नवंबर, 1942 को उनकी बेटी अनीता का जन्म हुआ। वे अपनी संतान को देखने गए और वहीं से अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस को ख़त लिखकर इसकी जानकारी दी।

अफ़सोस, वहाँ से लौटकर नेताजी सुभाष जिस मिशन पर निकले, उससे कभी लौट कर नहीं आए। एमिली बोस 1996 तक जीवित रहीं और उनकी बेटी अनीता ने एक मशहूर अर्थशास्त्री के रूप में पहचाान बनाई। ( ऊपर की तस्वीर में पिता की तस्वीर के साथ अनीता खड़ी हैं।)

ज़ाहिर है, एमिली ने सिंगल मदर के रूप में काफ़ी कठिनाइयों के बीच अकेली बेटी को पाला । लेकिन अब हमें पता है कि एक शख्श ऐसा था जो नेता जी के परिवार को लेकर हमेशा चिंतित रहा। वे थे जवाहर लाल नेहरू, जिन्हें सुभाष का विरोधी बताने का पूरा अभियान चलाया गया है। जबकि दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। कोई निजी मतभेद नहीं था। सुभाषचंद्र बोस की ‘सैन्यवाद प्रवृत्ति’ को गाँधी और उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। लेकिन सुभाष हमेशा वैचारिक रूप से नेहरू को अपने करीब पाते थे। नेहरू ने सुभाष के दुबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद कार्यसमिति से इस्तीफ़ा भी नहीं दिया था, जैसा कि पटेल समेत 12 गाँधी अनुयायियों ने किया था पर वे गाँधी की दृष्टि को ज़्यादा महत्वपूर्ण मानते थे। यह नेहरू के प्रति सम्मान ही था कि जब सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई तो एक ब्रिगेड का नाम नेहरू के नाम पर रखा। गाँधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ का संबोधन भी नेता जी ने ही दिया था जो बताता है कि वैचारिक विरोध के बावजूद वे गाँधी जी की महानता के किस क़दर क़ायल थे।

और नेहरू ने क्या किया..। ये तो सब जानते हैं कि लालकिले पर आज़ाद हिंद फौज के अफ़सरों के ख़िलाफ़ चले मुकदमे के लिए उन्होंने वचावपक्ष के वक़ील का चोगा पहना था, लेकिन सुभाष के प्रति उनके निजी प्रेम का खुलासा तो मोदी जी की वजह से हो पाया।

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद रहस्यमय ‘बोस फ़ाइल्स’ के सार्वजनिक होने का बड़ा हल्ला मचा था। जनवरी 2016 में कई फ़ाइलें सार्वजनिक की गईं तो पता चला कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) ने 1954 में नेताजी की बेटी की मदद के लिए एक ट्रस्ट बनाया था, जिससे उन्हें 500 रुपये प्रति माह आर्थिक मदद दी जाती थी। दस्तावेजों के मुताबिक, 23 मई, 1954 को अनिता बोस के लिए दो लाख रुपये का एक ट्रस्ट बनाया गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी. सी. रॉय उसके ट्रस्टी थे।

23 मई, 1954 को नेहरू ने एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। इसमें लिखा है , “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चंद्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

एआईसीसी ने 1964 तक अनिता को 6,000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।

 

और हाँ, नेहरू जी ने इस बात का कभी ढोल नहीं पीटा। न इसका विज्ञापन हुआ और न भाषणों में कोई ज़िक्र। उनके बाद भी इसकी चर्चा काँग्रेस के किसी बड़े नेता ने शायद ही कभी की हो।

 

 

लेखक मीडिया विजिल के संस्थापक संपादक हैं।

14 COMMENTS

  1. अच्छे काम करने वाले कभी ढिंढोरा नही पीटा करते कुछ कमीने लोग अच्छे काम तो करते नही दिखावा का ढिंढोरा खूब पीटते है # मोश

    • भारत माता के गद्दार नेहरू जी पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। जो लोग गुलाम भारत में आजाद हिंद फौज के विरोध में और अपने नाजायज बाप अंग्रेज़ी सेना के पक्ष में अभियान चलायें हों, वही लोग नेहरू जी के बारे में दुष्प्रचार करते हैं ताकि ब्रिटिश सत्ता के प्रति अपनी निष्ठा को छुपाये रख सकें।

  2. अफसोस किस देश को सिर्फ नेहरु के नाम पर कब तक चलाते जाओगे दूसरी बात इतिहास लेखन उनका सराहनीय काम नहीं है क्योंकि उन्होंने विदेशियों की दृष्टि से भारतीय इतिहास देखा और लिखा अगर वह देश के और देशवासियों के भले की सोचते तो हमें प्रेरणा और उत्साह देने वाले नायकों को उजागर जरूर करते नाके हमें अपमानित करने वाले लोगों को उभारा होता यह देश सदियों पुराना है नके वी आर मेकिंग इंडिया

    • Nehru Ji se ek sawaal poonchta. Kyun unhone is baat ko sarvajanik nahi Kiya. Kyun unhone desh ko uski beti se nahi milaya. Kyun woh beti anjaan bani rahi is desh se. This was regret and that’s why he did that. If you think by paying 600 ruppee he can justify things. I am sorry. Today Kashmir issue is the biggest issue credit goes to Nehru

  3. Bhai sidhe mudde par aate hai.. unaki Bibi aur beti videshi mul ke hone ke Karan unko madad pahunchate the… Ab ye bat ujagar Karen ke vo apani jebse karte the ya desh ke tijodise karte… Agar desh ke tijodi se jata to ye bat ab tak ujagar kyon na ki… Kya Bose baby ke parivarik halaat itne kharab the ke unhe aarthik madad ki jarurat padi? Kya Nehru ka isame niji swarth chipa hua hai ? Aaise Kai prashn maujud hote hai.. Kya Inka uttar de payege Nehru ke Bhakt.. ?

    • अंधभक्ति का भी एक हद होते हैं !!!!

    • Vishwa Dev Shastri

      उल्लू जी, किसी single mother के लिए survive करना बहुत कठिन होता है। और लेख में साफ लिखा है कि ट्रस्ट के ज़रिए पैसे जाते थे। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1977 में देसाई सरकार से पहले किसी निजी ट्रस्ट को सरकारी अनुदान नहीं मिलता था। लेख सही से पढ़ते तो शायद ये बकवास न लिखते। और नेहरू विरोध में कुछ भी बकवास कर रहे हो। ये सिर्फ तुम जैसे धूर्त ही सोच सकते हैं कि विदेशी मूल के कारण उनका सहयोग किया गया।

  4. नेहरूआ देशद्रोही, एय्याश था।

    • बहुत ही शर्म की बात है कि अपनी संस्कृति के विपरीत ईश्वर से बिना डरे सुनी सुनाई बातों में आकर गांधी जीऔर नेहरूजी के त्याग को भूलकर उन्हें अपमान जनक भाषा में संबोधित करते हैं।
      ऐसा लगता है धनी परिवार में जन्म लेना उनकी गलती थी।अपने सब सुख साधनों को छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होना आज की इस पीढ़ी की समझ के बाहर है। बहुत बड़ी बड़ी बाते करने वालों आप सभी देश के लिए क्या कर रहे हैं । अपने योगदान को देखिए और विगत को कोसने की बजाय देश हित में अपने योगदान का उल्लेख और आंकलन करें।
      दोनों ही समूहों से निवेदन है कि अपनी भाषा और अभिव्यक्ति पर संयम रखें।

  5. Alok Kumar Mall

    भारत माता के गद्दार नेहरू जी पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। जो लोग गुलाम भारत में आजाद हिंद फौज के विरोध में और अपने नाजायज बाप अंग्रेज़ी सेना के पक्ष में अभियान चलायें हों, वही लोग नेहरू जी के बारे में दुष्प्रचार करते हैं ताकि ब्रिटिश सत्ता के प्रति अपनी निष्ठा को छुपाये रख सकें।

  6. सुबोध मिश्र

    यह सच है ।

  7. Tapas Kumar Bose

    नेहरू क्या थे यह जानने के लिए “भारतीय संविधान” पर गौर करना होगा!, 1951 मे पूंजीपतियों के दबाव में ” भारतीय संविधान” की अवमानना और घोर अपमान किए थे!, 1951 मे स्वतंत्र भारत के पार्लियामेंट अस्तित्व में आया ही नहीं कि आनन-फानन मे “संविधान संशोधन” कर अमीरों की स्वार्थ की रक्षा किए! 9th Shedule के चलते अनुच्छेद 79, 368, 395 और अनुच्छेद 14 का घोर उलंघन किये थे और गरीबो को हमेशा के लिए गरीब रहने के लिए मजबूर कर दिया!

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