Home ओप-एड दस्तावेज़ कलराज ने भी दिया था राजभवन में धरना, लाट साब बनकर भूल...

कलराज ने भी दिया था राजभवन में धरना, लाट साब बनकर भूल गये!

1993 में मिले मुलायम-कांशीराम, वहा हो गये जय श्रीराम के नारे ने बीजेपी की हवा निकाल दी थी। सरकार मुलायम सिंह यादव की बनी थी। लेकिन महात्वाकांक्षाओं और अवसरवाद ने 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड कर डाला। बीजेपी ने इसमें अच्छा मौका देखा और मायावती को बचाने कूद पड़ी। तब कलराज मिश्र बीजेपी के यूपी अध्यक्ष थे। वे दल बल के साथ तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा का घेराव करने राजभवन परिसर में पहुँच गये थे। वहाँ धरना भी दिया था जिसकी तस्वीर ऊपर आप देख चुके हैं।

SHARE

राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र के संवैधानिक आचरण को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं। जिस तरह उन्होंने मंत्रिपरिषद की विधानसभा सत्र बुलाने की दोबारा मिली अनुशंसा की फाइल भी लौटा दी है, उसके बाद किसी को यह शक नहीं रहा है कि राजस्थान का राजभवन बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के इशारों की कठपुतली है।

सबसे दिलचस्प बात तो ये है कि राजभवन के घेराव की बात और धरना प्रदर्शन पर राज्यपाल कलराज मिश्र बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होने इसे धमकाने जैसी बात कही है। इसे एक अभूतपूर्व स्थिति बताया है। पर कलराज मिश्र शायद भूल गये कि ऐसी अभूतपूर्व स्थिति वे खुद भी पैदा कर चुके हैं जब यूपी के राजभवन में वे धरना देने पहुँचे थे।

1993 में मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गये जय श्रीराम के नारे ने बीजेपी की हवा निकाल दी थी। सरकार मुलायम सिंह यादव की बनी थी। लेकिन महात्वाकांक्षाओं और अवसरवाद ने 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड कर डाला। बीजेपी ने इसमें अच्छा मौका देखा और मायावती को बचाने कूद पड़ी। तब कलराज मिश्र बीजेपी के यूपी अध्यक्ष थे। वे दल बल के साथ तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा का घेराव करने राजभवन परिसर में पहुँच गये थे। वहाँ धरना भी दिया था जिसकी तस्वीर ऊपर आप देख चुके हैं।

 

यूपी में राज्यपाल को लाट साहब भी कहते हैं। लाट साब एक मुहावरा भी है ऐसे लगता है कि राजस्थान के लाट साहब बनकर कलराज मिश्र अपने पुराने दिन भूल गये।

अतीत में बीजेपी लगातार राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठाती थी। उन्हें केंद्र की कठपुतली बताने का उसका सिलसिला दशकों चला। जाहिर है, बतौर विपक्ष वो जिस शुचिता और नैतिकता की बात करती थी, सत्ता पाने और उसे बनाये रखने के जुगाड़ में उसकी बलि उसने सबसे पहले ले ली।

जरा याद कीजिए 1998 का वो नज़ारा जब यूपी में राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बरखास्त करके जगदम्बिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया था। खुद अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ पहुँचकर धरने पर बैठ गये थे। उम्मीद की जाती थी कि कभी ये पार्टी केंद्र में आयी तो संवैधानिक मान्यताओं पर कुठाराघात नहीं होगा। लेकिन संघ शाखाओं से निकलकर, जनसंघ और बीजेपी में लंबी राजनीतिक पारी खेलने वालों ने संविधान का जैसा माखौल बनाया है या बना रहे हैं, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी.चिदंबरम ने ठीक ही सवाल उठाया है कि आखिर जब सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों की संविधान पीठ ये फ़ैसला कर चुकी है कि विधानसभा सत्र बुलाने से राज्यपाल मना नहीं कर सकते अगर मंत्रिपरिषद की अनुशंसा हो।

ऐसा नहीं है कि कलराज मिश्र ये जानते नहीं। लेकिन अब वे लाट साहब हैं।

 



 

1 COMMENT

  1. […] में मीडिया विजिल में पहले ही उस समय की तस्वीर समेत लेख प्रकाशित हो चुका है। तस्वीर यहाँ भी […]

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.