Home ओप-एड काॅलम मौलीवुड: बॉलीवुड के आकाश में मालेगाँव का हेलीकॉप्टर !

मौलीवुड: बॉलीवुड के आकाश में मालेगाँव का हेलीकॉप्टर !

फैज़ा अहमद खान की दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगांव’ के जरिये मालेगांव की दुनिया के बारे में बहुत कुछ पता चलता है. जिसे जानना भी हमारे इस लेख का एक अहम मकसद है. मसलन मालेगांव की लगभग पंद्रह साल चली सिनेमा इंडस्ट्री को हर बार अपनी हीरोइनों के लिए आसपास के शहरों में क्यों चक्कर लगाना पड़ा या फिर तमाम वीडियो पार्लरों के दर्शकों से भरे दृश्यों में महिला चेहरे अपवाद की तरह भी क्यों नहीं दिखाई देते. ऐसे ही यह बात कि अगर फैज़ा यह फ़िल्म बनाकर व्यवस्थित तरह से मालेगांव के सिनेमा प्रेम को हमारे सामने न लातीं तब क्या हम मेनस्ट्रीम मीडिया की छवि से ही आक्रान्त न रहते जो मालेगांव को आजमगढ़ के संजरपुर की तरह आतंकवाद के षड्यंत्र के केंद्र की तरह प्रचारित करता रहा है. तीसरी  बात यह कि मजदूर बहुल कस्बे के लोगों तक संस्कृति के दूसरे रूप क्यों नहीं पहुँच सके? क्या हमारा सांस्कृतिक आन्दोलन अब अपने आसपास के लोगों की जरूरतों से एकदम अनजान हो चला है? चौथा यह कि इस टेक्नोलॉजी विस्फ़ोट के समय में कथा फ़िल्मों का रस अभी भी सबसे रसदार बना हुआ है जिस वजह से मुम्बइया फ़िल्मों के रीमेक की फ़िल्में बनाकर ही एक नयी सिने धारा मालेगांव में विकसित हो जाती है.

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इस कठिन कठोर कोरोना काल में संजय जोशी दुनिया की बेहतरीन फ़िल्मों से आपका परिचय करवा रहे हैं. उनका यह पाक्षिक स्तम्भ सोमवार को प्रकाशित होता है। अब तक प्रकाशित कड़ियाँ आपको लेख के आख़िर में दिये गये एक पूर्व लेख का लिंक खोलने से प्राप्त हो सकती हैं। इस स्तम्भ का मक़सद है कि हिन्दुस्तानी सिनेमाके साथ–साथ पूरी दुनिया के सिनेमा जगत की पड़ताल हो सके और इसी बहाने हम दूसरे समाजों को भी ठीक से समझ सकें -संपादक

महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित मुम्बई से क़रीब 200 किमी की दूरी पर एक कस्बा है मालेगांव. हिंदुस्तान के तमाम दूसरे कस्बों की तरह यह क़स्बा भी नागर अराजकता और गंदगी से लबरेज है. एक नदी है गंदे नाले में तब्दील होती हुई जिसके एक तरफ हिन्दू लोग रहते हैं और दूसरी तरफ मुसलमान. पूरे कस्बे में हर कोने से एक आवाज़ रात –दिन आती रहती है. यह आवाज़ है पावरलूम पर चलने वाले ताना –बाना की है जिसको असंख्य हाथ लय देते हैं. शुक्रवार के दिन क़स्बे में छुट्टी रहती है और शाम 4 बजते ही शहर के 10-12 वीडियो पार्लरों में पावरलूम में छह दिन कस कर मेहनत करने वालों की भीड़ जुटती है. इन साप्ताहिक दर्शकों और नई तकनीक की बदौलत मालेगांव के जुनूनी सिनेमा प्रेमियों ने अपनी तरह से फ़िल्म बनाना शुरू किया. चूंकि मुंबई नजदीक ही थी इसलिए यहाँ की फ़िल्मकारी पर उसका सीधा प्रभाव भी दिखा.

यहाँ की सिनेमाई परम्परा को जिस एक फ़िल्मकार ने ऊंचाई प्रदान की वो हैं फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, छायाकार नासिर शेख. नासिर शेख़ का पूरा बचपन विश्व सिनेमा के साए में बीता. उनके चाचा के शहर में कई वीडियो पार्लर थे, इस वजह बचपन से ही उन्हें हिन्दुस्तानी सिनेमा के साथ–साथ विश्व सिनेमा को देखने का भरपूर मौका मिला. पावरलूम पर सप्ताह भर खटने वाले मजदूर भाइयों को मजा दिलाने के लिए उनके वीडियो पार्लर में कई तरह के प्रयोग किये गए जिसमे से सबसे मजेदार प्रयोग था हालीवुड की फ़िल्मों की अवधि को अपने हिसाब से कम करना. यह प्रयोग भी जब पिट गया तब ठेठ मालेगांवी सिनेमा की शुरुआत हुई. हर सिनेमा प्रेमी के लिए नासिर को भी रमेश सिप्पी की ‘शोले’ ने बहुत प्रभावित किया था. इसलिए जब नासिर ने खुद की फ़िल्म बनानी शुरू की तो सबसे पहला प्रयोग इसी शोले के रीमेक का था. नासिर शेख द्वारा निर्मित और निर्देशित ‘मालेगांव के शोले’ यूं तो रमेश सिप्पी के ‘शोले’ का रीमेक थी लेकिन अपने मजेदार प्रयोगों के कारण मालेगांव की ठेठ अपनी फ़िल्म बन गई और आज तक मालेगांवी सिनेमा की प्रतिनिधि फ़िल्म बनी हुई है. ‘मालेगांवी शोले’ में भी जय और वीरू थे, ठाकुर थे, गब्बर थे. बस जुगाड़ यह था कि डकैती ट्रेन की बजाय बस में हो रही थी, गब्बर के आदमी घोड़ों की बजाय साइकिल पर आ रहे थे. बड़ी मुश्किल से पचास हजार लगाकर नासिर ने एक लाख रूपये कमाए और फ़िल्म बनाने का यह ठेठ देसी तरीका चल निकला. इसके बाद नासिर ने ‘मालेगांव की शान’ ‘मालेगांव की लगान’ जैसी कई और हिट फ़िल्में दी और कई युवाओं को अपना सिनेमा बनाने के लिए प्रेरित भी किया.

नासिर शेख ने दूसरे अन्य सफल फ़िल्म निर्देशकों की तरह से किसी फ़िल्म इंस्टिट्यूट से सिनेमा की पढ़ाई नहीं की बल्कि बचपन में अपने चाचा के वीडियो पार्लर में देखी हुई सैकड़ों फिल्मों और शादी के वीडियो से शुरू हुए सिनेमाई जूनून के कारण अपनी ख़ास सिनेमा भाषा अर्जित की. इस सिनेमा भाषा में जुगाड़ से अर्जित की गयी बहुतेरी सिनेमा तकनीक सस्ता सिनेमा बनाने वालों के लिए एक जरुरी सबक की तरह से है, जैसे बैलगाड़ी के बैलों के ऊपर रखने वाले लकड़ी के ढाँचे का क्रेन की तरह इस्तेमाल या फिर साइकिल की सीट का इस्तेमाल कर ट्रैक शॉट हासिल करना. नासिर की ‘मालेगांव की शान’ में खिलौने वाले हेलिकोप्टर की मदद से असल हेलिकोप्टर का भ्रम बहुत कुशलता से अर्जित किया गया. इन्ही जुगाड़ों की वजह से मालेगांवी सिनेमा कथा फ़िल्मों की लय का पूरी शिद्दत से निर्वाह करता है और कुछ लाख रुपयों में नहीं बल्कि कुछ हज़ार रुपयों में तैयार होकर हिंदुस्तानी सिनेमा में मौलीवुड नाम की एक नयी धारा को जन्म दे सका.

नासिर के एक अभिन्न दोस्त हैं फ़रोग जाफ़री. फ़रोग भी नासिर के तरह सिनेमा के दीवाने हैं और दिन का बहुत सारा समय विश्व सिनेमा को देखने में लगाते हैं. दोनों एक दूसरे  को क्रिएटिव ख़ुराक देते रहते हैं और अक्सर मिल कर काम करते हैं. हिंदुस्तानी फ़िल्मों के मालेगांवी रीमेकों की सफलता के बाद नासिर ने 2008 में हॉलीवुड से टक्कर लेने का फैसला किया और फ़िल्म चुनी ‘सुपरमैन’. इस तरह नासिर के सिनेमाई जुनून की वजह से मालेगांव को ‘मालेगांव का सुपरमैन’ मिली. मुंबई से जन संचार की पढ़ाई कर चुकी युवा विद्यार्थी फैज़ा अहमद खान को जब मालेगांव के सिनेमा प्रेम और इस नयी फ़िल्म के बारे में पता चला तो उन्होंने इस फ़िल्म के बनने पर एक दस्तावेजी फ़िल्म ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगांव’ का निर्माण किया जो 2012  में तैयार हुई.

फैज़ा अहमद खान की दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगांव’ के जरिये मालेगांव की दुनिया के बारे में बहुत कुछ पता चलता है. जिसे जानना भी हमारे इस लेख का एक अहम मकसद है. मसलन मालेगांव की लगभग पंद्रह साल चली सिनेमा इंडस्ट्री को हर बार अपनी हीरोइनों के लिए आसपास के शहरों में क्यों चक्कर लगाना पड़ा या फिर तमाम वीडियो पार्लरों के दर्शकों से भरे दृश्यों में महिला चेहरे अपवाद की तरह भी क्यों नहीं दिखाई देते. ऐसे ही यह बात कि अगर फैज़ा यह फ़िल्म बनाकर व्यवस्थित तरह से मालेगांव के सिनेमा प्रेम को हमारे सामने न लातीं तब क्या हम मेनस्ट्रीम मीडिया की छवि से ही आक्रान्त न रहते जो मालेगांव को आजमगढ़ के संजरपुर की तरह आतंकवाद के षड्यंत्र के केंद्र की तरह प्रचारित करता रहा है. तीसरी  बात यह कि मजदूर बहुल कस्बे के लोगों तक संस्कृति के दूसरे रूप क्यों नहीं पहुँच सके? क्या हमारा सांस्कृतिक आन्दोलन अब अपने आसपास के लोगों की जरूरतों से एकदम अनजान हो चला है? चौथा यह कि इस टेक्नोलॉजी विस्फ़ोट के समय में कथा फ़िल्मों का रस अभी भी सबसे रसदार बना हुआ है जिस वजह से मुम्बइया फ़िल्मों के रीमेक की फ़िल्में बनाकर ही एक नयी सिने धारा मालेगांव में विकसित हो जाती है.

अगर हम ऊपर के पैरे के आख़िरी बिंदु तक ही अपने निष्कर्ष को सीमित कर लेंगे तो हम मालेगांव की सिनेमाई उपलब्धियों को बहुत कम करके आंकने के गलत निष्कर्ष पर पहुँच जायेंगे. नासिर और उसके जैसे तमाम युवा सिनेमा प्रेमियों का सबसे बड़ा हासिल यह है कि टेक्नोलॉजी के उपलब्ध होने को उन्होंने एक अवसर की तरह लिया और अपनी शर्तों पर अपनी सांस्कृतिक जमीन का निर्माण किया. यह निष्कर्ष आपको अधूरा लगेगा अगर आप मालेगांव के समकालीन सिनेमाई परिदृश्य से अच्छी तरह वाकिफ़ नहीं हैं. वीडियो पार्लर वाले जमाने के आखिर –आखिर तक मालेगांव के फ़िल्मकारों ने रीमेक के रास्ते के अलावा अपनी कहानियां भी तलाशनी शुरू कर दी थीं जिस वजह से  ‘धमाल’ और ‘मुन्ना’ जैसी फ़िल्में बनीं. नए ज़माने में मालेगांव कथा फ़िल्मों से आगे बढ़कर यू ट्यूब चैनलों के दौर में पहुँच गया है.

आज के सिनेमाई परिदृश्य में जब एक –एक करके बड़ी पूँजी वाले वितरकों का शिकंजा सिनेमा की कहानी के चुनाव पर कसता जा रहा है मालेगांव से बहुत कुछ सीखने की जरुरत है जिसने न सिर्फ़ अपनी जरूरतों के मुताबिक़ नया सिनेमा बनाया बल्कि अपने दर्शक, वितरण तंत्र और निर्माता भी निर्मित किये.

यह सिलसिला अगर यूं ही चलता रहा तो मालेगांव जैसी जगहों के बारे में हम सिर्फ़ मेनस्ट्रीम मीडिया की एकतरफ़ा कहानी ही न सुनेंगे बल्कि वहां की सच्ची गूँज भी हम तक पहुँच सकेगी.

फ़िल्मों के लिंक :

  1. फैज़ा अहमद खान द्वारा निर्देशित दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘सुपरमैन ऑफ़ मालेगांव’

https://www.youtube.com/watch?v=dqRq7ZpjF0I&t=356s

  1. फीचर फ़िल्म ‘मालेगांव का डान’

https://www.youtube.com/watch?v=5_QUM1gHaxQ&t=842s

पिछली कड़ी–

कोड़ा राजी: कौन देस के वासी, हम कुरुख आदिवासी…?



इस शृंखला में वर्णित अधिकाँश फ़िल्में यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं और जो आसानी से नहीं मिलेंगी उनका इंतज़ाम संजय आपके लिए करेंगे. 

दुनियाभर के जरुरी सिनेमा को आम लोगों तक पहुचाने का काम संजय जोशी पिछले 15 वर्षो से लगातार ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ अभियान के जरिये कर रहे हैं.संजय से thegroup.jsm@gmail.com या 9811577426 पर संपर्क किया जा सकता है -संपादक

 



 

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