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यहां से देखाेः NRC के हल्ले में दब गयी 2012 के सारकेगुड़ा फर्जी मुठभेड़ की जांच रिपोर्ट

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लगभग पिछले दो महीने से सीएए और एनआरसी को लेकर जगह-जगह हो रहे प्रदर्शनों और विरोध के चलते छत्तीसगढ़ के सारकेगुड़ा में जून 2012 में हुए फर्जी मुठभेड़ की खबर काफी हद तक दब गयी। इस मसले को मानवाधिकार कार्यकर्ता व रायपुर की मशहूर वकील सुधा भारद्वाज ने फर्जी मुठभेड़ कहते हुए उठाया था और इसके खिलाफ़ याचिका दायर की थी। उस मुठभेड़ में सात बच्चों को भी मार डाला गया था (इस तरह की बर्बरता हम अतीत में रणवीर सेना के अपराधों में पाते हैं)।

लोगों के दबाव के बाद राज्य की रमण सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन बीजेपी की सरकार ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश वीके अग्रवाल के नेतृत्व में न्यायिक जांच आयोग का गठन किया गया था। जब आयोग गठित किया गया तो उसे जांच के सात बिन्दुओं को ध्यान में रखकर रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा गया था। जांच का पहला विषय था कि क्या सारकेगुड़ा में सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी? जांच आयोग ने लिखा,  “इसका कोई संतोषजनक प्रमाण नहीं है क्योंकि सुरक्षा बलों का कहना है कि मुठभेड़ घने जंगल में हुई थी जबकि मुठभेड़ सारकेगुड़ा, कोट्टागुड़ा और राजपेंडा के तीन गांवों के बीच मैदान में हुई।” अर्थात वह मुठभेड़ नहीं थी।

जिन सात प्रश्नों के इर्द-गिर्द जांच की गई उसमें से अधिकांश बातें गलत साबित हुई हैं। जैसे एक सवाल यह भी था कि आखिर ऐसे कौन से हालात थे जिसके कारण सुरक्षा बलों को गोलियां चलानी पड़ीं? इसका जवाब जस्टिस अग्रवाल ने अपनी रिपोर्ट में जो सौंपा है वह खौफनाक है। रिपोर्ट के अनुसार, “फायरिंग एकतरफा थी जो केवल सीआरपीएफ या पुलिस द्वारा की गई थी- डीआईजी एस इलंगो और डिप्टी कमांडर मनीष बमोला (जो ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे थे) के आचरण, जो खुद स्वीकार करते हैं कि उन्होंने घटना के दौरान एक भी गोली नहीं चलाई। यह स्पष्ट रूप से इशारा करता है कि बैठक के सदस्यों द्वारा गोलीबारी नहीं की गई थी; क्योंकि यदि बैठक में उपस्थित व्यक्तियों द्वारा फायरिंग की गई होती तो उपरोक्त दोनों वरिष्ठ अधिकारीगण भी आत्मरक्षा या प्रतिशोध में फायरिंग करते” (कंडिका- 156)।

जस्टिस अग्रवाल ने लगभग आठ साल के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। इतना वक्त क्यों लगा यह भी विचारणीय सवाल है। आखिर ऐसा क्यों नहीं होता है कि आयोग का कार्यकाल निर्धारित किया जाए जिससे कि जिसके साथ अत्याचार हुआ हो उनमें न्याय का भाव उत्पन्न हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि तात्कालिक सामाजिक-राजनीतिक दबाव के बाद सरकार ने जांच आयोग तो गठित कर दिया लेकिन उसमें जान-बूझकर सहयोग नहीं कर रही हो! सरकार यह सोचकर चल रही हो कि किसी तरह कुछ देर के लिए इस मामले को दबा दिया जाए जिससे कि लोगों में गुस्सा शांत हो जाए। सवाल यह है कि आठ साल के बाद आई रिपोर्ट में वे सारी बातें गलत साबित हुई हैं जिसे पुलिस ने मुठभेड़ का नाम दिया था!

यहां सवाल यह है कि हर बार जनता को ही जवाबदेह होना पड़ेगा क्या? आखिर जिस अधिकारी ने निर्दोष व मासूमों की हत्या कर दी उसके साथ हमारे देश में कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती है? क्या कारण है कि सत्ता बदलते ही अलग तरह के मुठभेड़ ‘होने लगते’ हैं लेकिन अपने आकाओं के कहने पर हर फर्जी मुठभेड़ करनेवाले बाइज्जत बने रहते हैं! किसी के कहने पर हत्या करने वालों की जवाबदेही क्यों नहीं तय होनी चाहिए?

जिस दिन यह रिपोर्ट सामने आई थी उसी दौरान देश के पूर्व गृह व वित्त मंत्री पी चिदबंरम को जेल में रहते हुए सौ दिन हो गए थे। अखबारों ने इसे काफी प्रमुखता से छापा भी था। यह फर्जी मुठभेड़ उसी वक्त हुई थी जब चिदबंरम देश के गृह मंत्री थे। उस नरसंहार की नैतिक जिम्मेदारी पी चिदबंरम और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह पर बराबर की बनती है। चिदंबरम को जेल इसलिए नहीं भेजा गया था कि उन्होंने इस तरह के कई जघन्य अपराध करवाए थे। उनके जेल में होने के राजनीतिक कारण हैं।

लेकिन सुधा भारद्वाज आज भी जेल में हैं तो इसका एकमात्र कारण इसी तरह के मामले हैं क्योंकि वे इसी तरह के फर्जी हत्या, लूट व मुठभेड़ के मामले उठाती रही थीं।

यह सही है कि जब जांच आयोग का गठन हो रहा था तो उसमें यह सुझाने के लिए नहीं कहा गया था कि दोषी अधिकारियों को क्या सजा दी जाए लेकिन जिस फर्जी मुठभेड़ में 17 बेगुनाहों की जान गई उसके लिए जवाबदेह पदाधिकारियों के खिलाफ कौन कार्यवाही करेगा?

समय आ गया है कि गलत को गलत कहा जाए और सही को सही कहा जाए। सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन समाज हमेशा बना रहता है। वैसे राज्य के मुख्यमंत्री भुपेश बघेल ने विधानसभा पटल पर कहा है कि दोषियों को सजा मिलेगी। लेकिन क्या भविष्य में ऐसा नहीं हो सकता है कि जब भी इस तरह के जधन्य अपराध हों, उसकी जांच निश्चित समय सीमा में करवायी जाए।

दूसरा, पीड़ित व्यक्ति या परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए और दोषी अधिकारी- भले ही वह जितना भी ताकतवर हो, उसे इस कृत्य के लिए कड़ी सजा मिलनी चाहिए। इसकी शुरूआत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भुपेश बघेल को ही करनी चाहिए जिससे कि लोगों में यह संदेश भी जाए कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले अपनी जनता के साथ बेहतर न्याय करते हैं। क्योंकि हम यह भी जानते हैं कि अधिकांश मुठभेड़ फर्जी होते हैं और इसका शिकार दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक ही होते हैं।


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