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संसद चर्चा : अनिर्वाचित जेटली को बार-बार “अनिर्वाचितों की निरंकुशता” की चिंता क्‍यों सताती है?

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यह इत्तफाक नहीं है कि वित्तमंत्री को दूसरी बार यह चिंता स्वायत्तता के रिजर्व बैंक के दावे को लेकर हुयी। अलबत्ता इस बार उन्होंने ‘टाइरेनी आफ अनइलेक्टेड’ नहीं कहा, ‘वीकेनिंग आफ द अथॉरिटी आफ द इलेक्टेड’ की शिकायत की। मामला महज इतना था कि रिजर्व बैंक के डिपुटी गवर्नर विरल आचार्य ने अभी दो सप्ताह पहले बैंक के अधिकार-क्षेत्र में केन्द्र सरकार की दखलंदाजी के खतरों के प्रति आगाह करते हुये याद दिला दिया था कि आठ साल पहले किस तरह करीब साढे छह अरब डालर का अर्जेन्टीना सेन्ट्रल बैंक का सुरक्षित कोष, सरकारी वित्त विभाग को सौंपने के क्रिस्टीना फर्नान्डेज सरकार के दबाव और दबाव में झुकने से बैंक प्रमुख मार्टिन रेड्रैडो के इंकार के बाद आखिरकार 14 दिसम्बर 2010 को मार्टिन को पद छोडना पडा था।
राजेश कुमार

वित्त मंत्री अरुण जेटली की यह चिंता नयी है- निर्वाचित की सत्ता के क्षरण की, निर्वाचित के हक और रसूख को कम करने, कमजोर करने की चिंता, संविधान के वृहत्तर ढांचे की अनदेखी की चिंता। संविधान के इस वृहत्तर ढांचे में, उनके तईं ही, संसदीय लोकतंत्र और निर्वाचित सरकार संविधान के सबसे महत्वपूर्ण मूलभूत घटक हैं, निर्वाचित सरकार के मुखिया, प्रधानमंत्री की जवाबदेही सर्वाधिक है। ‘टाइरेनी आफ अन-इलेक्टेड’ की भी उनकी चिंता पुरानी नहीं है। जेटली ने उच्चतर न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए कालेजियम की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में छह सदस्यों के एक आयोग के गठन का प्रावधान करने वाले 99वें संविधान संशोधन और एनजेएसी कानून को असंवैधानिक बताकर खारिज कर देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर फेसबुक पर ‘ऐन आल्टरनेटिव व्यू’ पेश करते हुए ऐसी चिंताएं जतायी थीं बल्कि उसी सांस में उन्होंने विपक्ष के नेता को संसद में विकल्प की आवाज का मूलभूत प्रतिनिधि, कानून मंत्री को संसद के प्रति जवाबदेह मंत्रिपरिषद का प्रतिनिधि और समवेत रूप में इन सभी को जन-आकांक्षा का प्रतिनिधि बताते हुए आगाह किया था, ‘‘गैर-निर्वाचितों की निरंकुशता भारतीय लोकतंत्र नहीं है और अगर निर्वाचित की अनदेखी की गयी तो लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा।’’

इस नयी चिंता की बात करेंगे, लेकिन बाद में। आखिर यह तो मई 2014 के बाद की बात है, जब उन्होंने साफ-साफ पूछा था कि ‘आखिर चुनाव आयोग और सी.ए.जी. को भी तो निर्वाचित सरकार ही नियुक्त करती है, तो क्या वे पर्याप्त विश्वसनीय नहीं हैं?’ वरना 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनने से पहले संसद की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के तौर पर प्रमुख भाजपा नेता राम नाईक और 2004 में कांग्रेस के सत्तारोहण के बाद इसी हैसियत से भाजपा के अब अप्रासंगिक हो गए नेता मुरली मनोहर जोशी ने सी.ए.जी. की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और इसमें कार्यपालिका की भूमिका न्यूनतम करने की सलाह दी थी। और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले पर तो 15 जून 1949 को संविधान सभा की बहस में प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने स्पष्ट कहा था कि राष्ट्रपति को आयुक्तों की नियुक्ति के अधिकार देने का मतलब प्रधानमंत्री को इसके लिये मनमर्जी की छूट देना होगा। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से मंजूरी का प्रावधान करने के लिये एक संशोधन भी पेश किया था और स्वयं भीमराव आम्बेडकर ने बहस का उत्तर देते हुये माना था कि शिब्बन लाल सक्सेना का यह तर्क काफी वजनी है कि चुनाव आयुक्तों को कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त करने के उपायों के बिना उनका कार्यकाल निश्चित कर देना बेमानी होगा। संविधान सभा की उस चर्चा को तो छोड ही दें, हमारे विद्वान वित्त मंत्री को चुनाव आयुक्तों के चयन के लिये प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की एक समिति बनाने का वी.एम. तारकुंडे समिति का सुझाव भी याद नहीं आया, जबकि इस समिति का गठन 1974 में उस दूसरी आजादी के नेता जयप्रकाश नारायण ने ही किया था, जिसमें सक्रिय भागीदारी का दंभ इतना कि उसी ‘ऐन आल्टरनेटिव व्यू’ में वह कह चुके हैं, ‘‘1975 में जब आपातकाल की घोषणा की गयी तो सुप्रीम कोर्ट ने तो हथियार ही डाल दिये थे, वह मेरे जैसे राजनीतिक लोग ही थे, जो सडकों पर लडे और जेल तक गये।’’

संभव है, 1974 में जेटली की राय दूसरी रही हो, जैसे 2013 में उनकी राय अलग रही थी। तब तो वह इसे एक हकीकत मानते थे कि ‘जनता के बीच में राजनीति की विश्वसनीयता में और राजनीतिक लोगों के ऊपर विश्वास करने में गिरावट आई है।’

दिन मंगलवार, तारीख 17 दिसम्बर 2013। अरुण जेटली ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक 2011’ के संशोधित प्रारूप पर राज्यसभा में चर्चा में भाग ले रहे थे। विधेयक के पुराने प्रारूप पर अपने संदेह स्पष्ट करते हुये उन्होंने कहा था, ‘‘क्या लोकपाल की नियुक्ति में सरकार का पलडा भारी रहेगा, यह हमें शक था और इसीलिये हम यह कहते थे कि अगर सरकार का पलडा भारी रहता है और केन्द्र में केन्द्र की सरकार और राज्यों में राज्य की सरकार अपने मन से लोकपाल की नियुक्ति कर ले, तो फिर उसका राजनीतिक दुरूपयोग होगा। पहले ड्राफ्ट में पांच में से तीन ऐसे लोग थे, जो सरकार का पक्ष ले सकते थे। उसमें एक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया थे, एक लीडर ऑफ अपोजीशन थे, दोनों सरकार के दायरे से बाहर थे। लोकसभा के अध्यक्ष उसमें रहेंगे, प्रधानमंत्री जी रहेंगे, पांचवें सदस्य एक ज्यूरिस्ट आफ एमिनेंस रहेंगे, जिनको सरकार नियुक्त करती है।’’

जेटली और भाजपा के दो अन्य सदस्य इससे पहले, पुराने प्रारूप पर विचार के लिये राज्यसभा की ही एक प्रवर समिति में ‘लोकपाल को प्रदत्त भ्रष्टाचार के तमाम मामलों की जांच के मुतल्लिक सी.बी.आई. का नियंत्रण भारत सरकार के कार्मिक विभाग से लेकर लोकपाल को देने, सी.बी.आई में जांच और अभियोजन के दो स्वतंत्र विंग बनाने, सी.बी.आई. डायरेक्टर के अलावा एक प्रोसीक्यूशन डायरेक्टर भी नियुक्त करने, दोनों की नियुक्ति के लिये प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, लोकसभा के स्पीकर और लोकपाल के अध्यक्ष का एक कालेजियम बनाने और दोनों का कार्यकाल निश्चित करने का सुझाव दे चुके थे। आखिर सी.बी.आई. को नियुक्ति से लेकर जांच और अभियोजन की उसकी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सरकार का पलडा भारी होने से बचाना जो था, यद्यपि वह निर्वाचित सरकार थी, बल्कि लगातार दूसरी बार निर्वाचित। अकारण नहीं था कि राज्यसभा की उसी बहस में जेटली ने लोकपाल को हटाने का भी अधिकार सरकार की बजाय संसद को देने, इसके लिये महाभियोग का प्रावधान करने और इन प्रावधानों से लैस ‘एक विश्वसनीय और क्रेडिबल और वर्केबल लोकपाल कानून पारित’ करने का आह्वान किया था। उन्होंने कहा था, ‘‘इतिहास ने हमें एक और अवसर दिया है कि जो बहस पिछले 46 वर्षों से इस देश में चल रही थी, उसे आज समाप्त कर हम पहल करें।’’ बल्कि राज्यसभा ने उसी दिन और लोकसभा ने अगले दिन विधेयक पारित कर पहल कर भी दी, लेकिन चंद महीनों में केन्द्र में सरकार बदल गयी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता रहे अरुण जेटली सदन के नेता और वित्तमंत्री बन गये और लोकपाल का क्या हुआ, वह तो सर्वज्ञात है।

लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे की मांग के बावजूद भाजपा की सरकार ने कानून में संशोधन कर लोकपाल समिति में सबसे बडे विपक्षी दल के नेता को शामिल करने का प्रावधान नहीं किया, विशेष आमंत्रित के तौर पर समिति की बैठक में भाग लेने से खडगे के इंकार के बहाने लोकपाल की नियुक्ति की लिये अगला कदम वह टालती रही और सरकार के पांच साल बीतने को आये तब अभी सितम्बर में महज सर्च कमेटी का गठन किया।

निर्वाचित की सत्ता के क्षरण की चिंता वित्तमंत्री को पहली बार तब हुई थी, जब अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उच्चतर न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिये कालेजियम की जगह भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में छह सदस्यों के ऐसे आयोग के गठन का प्रावधान करने वाले 99वें संविधान संशोधन और एन.जे.ए.सी. कानून को असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया था, जिसमें राजनीतिक सत्ता के प्रतिनिधियों और नामितों का पलडा भारी होता। आयोग में मुख्य न्यायाधीश के अलावा सुप्रीम कोर्ट के दो अन्य सर्वाधिक सीनियर जजों और कानून एवं न्यायमंत्री और दो प्रतिष्ठित हस्तियों को शामिल करने का प्रावधान था और दोनों प्रतिष्ठित हस्तियों के चयन के लिये मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री तथा विपक्ष के नेता की तीन सदस्यों वाली समिति बनाने का भी।

पांच जजों की संविधान पीठ के 4-1 के बहुमत से घोषित इसी फैसले के बाद जेटली ने ‘ऐन आल्टरनेटिव व्यू’ पेश किया था और कहा था कि ‘संविधान पीठ का फैसला उसी तरह के राजनीति-विरोध का नमूना है जो हाल के वर्षों में प्राइम टाइम डीबेट्स की जान रहा है।

भाजपा और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन से इतर दलों और जमातों की सरकार के वक्त में ‘लोकपाल की नियुक्ति में सरकार का पलडा भारी होने पर आशंकित’ जेटली को तब कतई भान नहीं था, यह नयी समझ है, सरकार में आने के बाद की समझ  कि ‘आखिर चुनाव आयुक्तों और सी.ए.जी. को भी तो निर्वाचित सरकार ही नियुक्त करती है, तो क्या वे पर्याप्त विश्वसनीय नहीं हैं?’ फिर मुख्य न्यायाधीश को, सी.बी.आई डायरेक्टर को भी सीधे सरकार नियुक्त करे, निश्चित कार्यकाल की व्यवस्था के बावजूद रात के अंधेरे में सी.बी.आई डायरेक्टर से निजात पा ली जाये और आर.बी.आई. को भी सीधे सरकार ही चलाये तो मुश्किल क्या है? यह इत्तफाक नहीं है कि वित्तमंत्री को दूसरी बार यह चिंता स्वायत्तता के रिजर्व बैंक के दावे को लेकर हुयी। अलबत्ता इस बार उन्होंने ‘टाइरेनी आफ अनइलेक्टेड’ नहीं कहा, ‘वीकेनिंग आफ द अथॉरिटी आफ द इलेक्टेड’ की शिकायत की। मामला महज इतना था कि रिजर्व बैंक के डिपुटी गवर्नर विरल आचार्य ने अभी दो सप्ताह पहले बैंक के अधिकार-क्षेत्र में केन्द्र सरकार की दखलंदाजी के खतरों के प्रति आगाह करते हुये याद दिला दिया था कि आठ साल पहले किस तरह करीब साढे छह अरब डालर का अर्जेन्टीना सेन्ट्रल बैंक का सुरक्षित कोष, सरकारी वित्त विभाग को सौंपने के क्रिस्टीना फर्नान्डेज सरकार के दबाव और दबाव में झुकने से बैंक प्रमुख मार्टिन रेड्रैडो के इंकार के बाद आखिरकार 14 दिसम्बर 2010 को मार्टिन को पद छोडना पडा था। विरल आचार्य ने गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों और सूक्ष्म, छोटे और मंझोले उद्यमों के लिये रिजर्व बैंक का करीब साढे तीन लाख करोड रुपये का सुरक्षित कोष सरकारी खजाने को मुहैया कराने के इशारों को लेकर तनातनी की खबरों के बीच उक्त टिप्पणी की थी और संभव है कि बैंक के निदेशक मंडल की 19 नवम्बर की बैठक के बाद भारत में भी अर्जेन्टीना दोहराया जाये।

बहरहाल, जेटली ने विरल आचार्य या रिजर्व बैंक का नाम तो नहीं लिया, लेकिन पहला अटल बिहारी वाजपेयी स्मारक व्याख्यान देते हुये उन्होंने सवाल उठाया, ‘‘क्या हम निर्वाचित की अथॉरिटी को कमजोर कर रहे हैं और उसकी जगह सत्ता अनुत्तरदायियों के पक्ष में संकेन्द्रित कर रहे हैं?’’ उन्होंने अंग्रेजी के अपने भाषण में ‘अथॉरिटी’ ही कहा था। आप इसे हिन्दी में प्रभाव, प्राधिकार, शक्ति या सत्ता- कुछ भी पढ सकते हैं या चारों भी।

बदला क्या है? बस सत्ताधारी दल, बस सरकार का रंग! ‘इलेक्टेड’ तो वह भी था जो मई 2014 से पहले सत्ता में था, जो आज विपक्ष में है, जिस पर सरकार के नेताओं का मुसलसल आरोप है कि वह भाजपा और नरेन्दर भाई की जीत को अब तक पचा नहीं पाया है, साढे चार साल बाद भी। तो क्या यह ‘इलेक्टेड’ के वर्चस्व का नहीं, संसद के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये निर्मित हर संवैधानिक संस्था पर नियंत्रण का और सरकार की सर्वशक्तिमत्ता का प्रस्ताव था?


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